मासिक वेब पत्रिका उदंती.com में आप नियमित पढ़ते हैं - शिक्षा • समाज • कला- संस्कृति • पर्यावरण आदि से जुड़े ज्वलंत मुद्दों पर आलेख, और साथ में अनकही • यात्रा वृतांत • संस्मरण • कहानी • कविता • व्यंग्य • लघुकथा • किताबें ... आपकी मौलिक रचनाओं का हमेशा स्वागत है।

Jun 1, 2023

लघुकथाः गुलाब के लिए

- कस्तूरीलाल तागरा

माली ने जैसे ही बगीचे में प्रवेश किया। कुछ पौधे उल्लास से तो कुछ तनाव से भर गए।

माली ने अपनी खुर्पी सँभाली। गुलाब के पौधों के इर्द- गिर्द उग आई घास को खोद- खोदकर क्यारी के बाहर फेंकने लगा। उसके बाद उसने मिट्टी में खाद डाली और क्यारी को पानी से भर दिया।

क्यारी के बाहर एक तरफ घायल पड़े घास को माली इस समय जल्लाद जैसा लग रहा था। पर वह बेचारा कर क्या सकता था। ठीक इसी समय घास को बगीचे के बाहर वाली सड़क से ऊँची- ऊँची आवाजें सुनाई देने लगीं-मजदूर एकता जिन्दाबाद । मजदूर एक ता…

आवाजें और ऊँची होती चली गईं। थोड़ी देर में पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर लाठी चार्ज शुरू कर दिया। आन्दोलनकारी इधर- उधर भागने लगे। चीख- पुकार मच गई। चोट खाये कुछ लोग बचने के लिए बगीचे की ओर भागे। पुलिस लाठियाँ भाँजते हुए वहाँ भी पहुँच गई।

गुलाब ने कोलाहल सुना, तो पास ही घायल पड़ी घास से इठलाते हुए पूछा - ‘अबे घास! यह सब क्या हो रहा है।’

घास ने तिलमिलाकर जवाब दिया। ‘कुछ खास नहीं, बस किसी गुलाब के लिए घास उखाड़ी जा रही है।’

लघुकथाः सीख

  -  अंजलि गुप्ता ‘सिफ़र’

‘छपाक’, उसे थोड़ी ऊँचाई से गिराया गया । छोटे से, सुंदर से, पारदर्शी तालाब में जहाँ छोटे-छोटे प्लास्टिक के पेड़ उगे थे । एक कोने में एक प्लास्टिक का गुड्डा पानी के बुलबुले उड़ा रहा था। वह रोना भूल कर आँखें मिचकाते हुए नज़ारा देखने लगी । तभी उसके पास एक सुंदर सी मछली आई।

‘हेलो’, क्या नाम है तुम्हारा? स्वागत ।

‘मैं, मैं गोल्डी, गोल्ड फिश हूँ। ये कहाँ आ गई मैं?’

‘ये एक्वेरियम है। हम दोनों खूब मज़े करेंगे। मैं कारप फिश हूँ। मीनू कहते हैं सब मुझे। हम दोनों ख़ूब मज़े करेंगे । तुम्हें भूख लगी है? लो, खाना खाओ’

‘वाह!’ गोल्डी मज़े से छोटी-छोटी गोलियाँ खाने लगी थी।

यह सब याद करते- करते गोल्डी वर्तमान में आ गई क्योंकि आज भी उसे बड़ी भूख लगी थी। वैसे मीनू ख़ूब ख्याल रखती उसका । मीनू के साथ समय अच्छा बीत रहा था। वह दोनों ढेर सारी बातें करती। सारा दिन उछलते खेलते बीत जाता।

‘इस घर में सब कुछ बनावटी है ना मीनू, हमें छोड़कर। फूल, पौधे, कोने में पड़ा कुत्ता भी।’

‘हाँ गोल्डी। इंसान का बस चले तो खुद का भी पुतला बनाकर घूमे ।’

‘तुम बोर नहीं होती थी मेरे आने से पहले’

‘अरे नहीं, मैं सारा दिन इन लोगों को देखती थी, उनकी बातें सुनती थी, बड़ी मज़ेदार होती है इनकी बातें। पता है हमें हिंदी में मीन कहते हैं तभी मेरा नाम पड़ा मीनू।’

‘वाह, तुम्हें तो बहुत कुछ पता है लेकिन आपस में तो यह लोग बात करते ही नहीं’

‘हाँ आपस में तो ये लोग कम ही बात करते हैं, लेकिन मोबाइल पर दूसरों से बहुत बातें करते हैं। या फिर सारा दिन मोबाइल और टी. वी. में कुछ न कुछ देखते रहते हैं। सारी समझदारी वहीं से सीखी मैंने।’

‘एक हफ्ते से घर कितना सूना है न, सब लोग चले गए। हमारा खाना भी नहीं छोड़ गए। अब हम क्या खाएँगे,’ गोल्डी रुआँसी हो उठी।

‘तुम्हारा तो नहीं पता; लेकिन ऐसे में मुझे क्या करना चाहिए, यह मैंने इनसे जरूर सीखा है ‘मीनू  गोल्डी की आँखों में देखते हुए बोली।

कुछ देर बाद टैंक में केवल एक ही मछली तैर रही थी।

लेखकों की अजब गज़ब दुनियाः गिनकर शब्‍द लिखने वाले लेखक

-- सूरज प्रकाश

 • एँथनी ट्रोलोप सुबह ठीक 5:30 बजे घड़ी ले कर बैठ जाते और हर पंद्रह मिनट में 250 शब्‍द की सीमा बाँध कर लिखते। 

• एच जी वेल्स का एक हज़ार शब्द प्रति दिन लिखने का औसत आता था।

• चार्ली चैप्‍लिन लगभग एक हज़ार शब्द प्रतिदिन की डिक्टेशन देते थे। इनसे उनकी फिल्मों के लिए तैयार संवादों का लगभग तीन सौ शब्दों का औसत आता था। 

जॉर्ज बर्नार्ड शॉ
• जॉर्ज बर्नार्ड शॉ गिनकर पाँच पेज प्रतिदिन लिखते थे। पांचवें पेज का आखिरी वाक्‍य अगर अधूरा रह गया, तो वे उसे अधूरा ही छोड़ देते थे और अगले दिन पूरा करते थे। किसी वजह से अगर किसी दिन अगर साढ़े चार पेज लिखे, तो अगले दिन साढ़े पाँच पेज लिख कर कोटा पूरा कर लेते थे।।

• जैक लंडन ने अपने पूरे लेखकीय कैरियर में प्रतिदिन 1000 शब्‍द लिखे। 

• विलियम गोल्‍डिंग, नॉर्मन मेलर और आर्थर कानन डायल 3000 शब्‍द प्रतिदिन वाले लेखक थे। 

• लेखन कला में सिद्धहस्‍त माने जाने वाले रॉयमंड का रोज़ाना के शब्‍दों का कोई कोटा तो तय नहीं था; लेकिन वे एक दिन में 5000 शब्‍द लिख कर दिखा चुके थे।

• थॉमस मान दिन में औसतन चार सौ शब्द लिखा करते थे। 

• थॉम्‍स वूल्‍फ जब तक 1800 शब्‍द न लिख लें, रुकने का नाम नहीं लेते थे।

• लायन फ्यूशवेंगर दो हज़ार शब्दों की डिक्टेशन दिया करते थे जिनसे छह सौ लिखे हुए शब्दों का प्रतिदिन का औसत आता था। 

• सामरसेट मॉम चार सौ शब्द प्रतिदिन लिखा करते थे ताकि लिखने का अभ्यास बना रहे। 

• स्‍टीफेन किंग ने अपने लिए 2000 शब्‍द की सीमा बाँध रखी थी, चाहे कुछ भी हो जाये। 

• जेम्‍स जॉयस ने खुद को शब्‍दों या पन्‍नों की सीमा से नहीं बाँधा था। वे गिनकर वाक्‍य लिखते और खुश होते। पूरा समय लगाते उसमें। एक बार उनसे मिलने वाले किसी दोस्‍त ने पू्छा – आज का दिन कैसा रहा तो जायस ने गर्व से बताया - बहुत ही अच्‍छा। पूरे तीन वाक्‍य लिखे हैं आज। 

वहमी लेखक

• दी वार ऑफ़ आर्ट जैसी अनेक प्रेरणादायी किताबों के लेखक कुछ भी टाइप करने से पहले महान यूनानी कवि होमर द्वारा रचित देवी के आह्वान का पाठ करते थे।

• चार्ल्स डिकेंस अपने साथ हमेशा एक कम्पास रखते थे। उनका यह दृढ़ विश्वास था कि यदि वह उत्तर दिशा में सिर रखकर नहीं सोएँगे तो उन्हें मौत उठा ले जाएगी। वह जहाँ कहीं भी गए हमेशा उस कम्पास की सहायता से उत्तर की ओर सिर करके सोते रहे।

फ्लैनेरी ओ’कोनोर
• फ्रेडरिक शिल्‍लर अपनी मेज की दराज में सड़े हुए सेब रखते थे। सड़े हुए सेबों की तीखी गंध ही उनके जीवन और लेखन की प्रेरणा स्रोत थी। इसके बिना वे काम नहीं कर पाते थे। 

• फ्लैनेरी ओ’ कोनोर महोदया ने अपने घर में ही मुर्गी खाना बना रखा था जिसमें मुर्गे, बत्‍तखें, चूजे वगैरह भरे रहते। उनका एक मुर्गा तो उलटे चलने में माहिर था। ये सारे पक्षी उनकी रचनाओं में भी आते थे। फ्लैनेरी ओ’कोनोर सोचते समय वनीला वेफर्स कुतरती रहती थीं।

• लियो टॉलस्टाय को न जाने कैसे वहम हो गया था कि वे पक्षियों की तरह हवा में उड़ सकते हैं। उनकी इस अजीब सनक का यह हाल था कि एक दिन उन्होंने अपने दुमंजिले मकान की खिड़की से पक्षियों की तरह हाथ फड़फड़ाते हुए छलांग लगा दी। हाथ पैर टूटने ही थे। 

• सामरसेट अपने को अंधविश्वासी तो नहीं मानते थे; लेकिन फिर भी वे अपने लिखने के कागजों, पुस्तकों की जिल्दों, घर के प्रवेश द्वारों, यहाँ तक कि ताश की अपनी गड्डियों के सारे पत्तों पर भी दुष्ट नेत्र का चिह्न अंकित करवाते थे। लिखते समय वे सदैव अपने पास एक ताबीज रखते थे, ताकि दुष्ट प्रकृति वाली वस्तुओं का उनके मस्तिष्क पर प्रभाव न पड़े। 

लियो टॉलस्टाय 
सुबह वाले लेखक, रात वाले लेखक

• अमृतलाल नागर सुबह के वक्‍त लखनऊ में अपने घर के अन्दर तख़्त पर बैठ कर लेखन कार्य करते थे। इस तख्‍त का नाम कानपुर था।

• अमृता प्रीतम रात के समय लिखती थीं। जब न कोई आवाज़ होती हो, न टेलीफ़ोन की घंटी बजती हो और न कोई आता-जाता हो। अलबत्‍ता बीच-बीच में चाय की तलब लगती।

• चेखव लिखने का काम आधी रात को या अल सुबह करते।

• जॉन ओ हरा आधी रात को शुरू करके सुबह सात बजे तक लिखते थे। 

• तालस्‍ताय सुबह लिखते थे, जबकि दोस्‍तोवस्‍की रात को लिखते थे। 

• बालजाक रात को लिखते थे। रात को जागने के लिए वे गाढ़ी, काली कॉफी पीते थे। वे 50 बरस की उम्र में कॉफी कोकीन की वजह से मरे थे।

• फ्योदोर दोस्‍तोवस्‍की रात के समय लिखा करते थे। 

• मार्सेल प्राउस्‍ट भी रात को लिखते थे; क्‍योंकि उस वक्‍त उन्‍हें दमे के कारण कम तकलीफ होती थी।

छद्म नाम वाले लेखक

दुनिया भर में हर समय में और हर भाषा में ऐसे अनेक लेखक मिल जायेंगे जो अलग-अलग कारणों से छद्म नाम से लिखते रहे।

• ओ हेनरी बेटी को पालने के मकसद से वे जेल में 14 अलग-अलग छद्म नाम से कहानियाँ लिखते रहे। 

• फर्नांदो पेसोआ आजीवन 75 छद्म नामों से लेखन करते रहे।

• तंगी के दिनों में जॉर्ज बर्नार्ड शॉ ने भी घोस्‍ट राइटिंग की थी। 

• भुवनेश्वर ने कई बार हाडा, वीपी, आरडी आदि छद्म नामों से भी लिखा।

• मोपासां कई छद्म नामों से लिखते रहे।

• अमृतलाल नागर ने अनेक छद्म नामों से लेखन किया। पहले मेघराज इंद्र के नाम से कविताएँ लिखते रहे। बाद में तस्लीम लखनवी के नाम से व्यंग्यपूर्ण स्केच व निबंध लिखने लगे।

• अपने लेखन के शुरुआती दिनों में राही मासूम रज़ा ने शाहिद अख्तर के छद्म नाम से भी लिखना शुरू किया था।

• गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर आठ बरस की उम्र में वे कविता लिखने लगे थे और सोलह बरस की वय में भानुसिंह के छद्मनाम कविता संग्रह दे चुके थे। 

 उपेन्‍द्रनाथ अश्‍क
खूब लिखने वाले लेखक 

इस सूची में कुछ ऐसे लेखकों का जिक्र है, जिन्‍होंने अपने जीवन में सिर्फ लिखा, लिखा और भरपूर लिखा। इतनी किताबें लिख डालीं कि सिर्फ उन्‍हीं की किताबों के बल पर लाइब्रेरी तैयार हो जाए। उपेन्‍द्रनाथ अश्‍क चाहते थे कि वे इतना लिखें कि हर लाइब्रेरी में उनकी किताबों के लिए एक अलग अलमारी हो। वे हिंदी उर्दू पंजाबी में लिखने के बावजूद 50 का आँकड़ा पार नहीं कर पाए। ओशो रजनीश के नाम पर कुल 650 किताबें बतायी जाती हैं। ये वस्‍तुत: मूल किताबें न होकर उनके भाषण हैं, जो किताबों के रूप में रूपांतरित किए गये। वैसे कई बांग्‍ला उपन्‍यासकार 150 किताबों का आंकड़ा पार करते हैं; लेकिन जासूसी उपन्‍यास लेखक सुरेन्‍द्र मोहन पाठक 250 से अधिक उपन्‍यास लिखकर इस सूची में मौजूद हैं। वैसे गुणात्‍मकता की दृष्‍टि से देखें तो राहुल सांकृत्‍यायन की 150 किताबें अच्‍छे-अच्‍छे लेखकों की सैकड़ों किताबों पर भारी पड़ती हैं। (क्रमशः)  

किताबें- समय के चाक पर: संवेदनशीलता का सफ़रनामा

- विजय जोशी

पुस्तक : समय के चाक पर (काव्य संग्रह) माण्डवी सिंह, पृष्ठ संख्या 152, मूल्य – रू. 250/-, वर्ष : मई, 2023, प्रकाशक : संदर्भ प्रकाशन, भोपाल, मो. 9424469015

भोगना हर एक की नियति है। पर भोगे हुए सुख या दुख को कलमबद्ध कर कागज पर उकेर पाने की कला बहुत कम लोगों में होती है। और इसके लिए आवश्यक है अंतस की संवेदनशीलता को सहेजते हुए सतत अभ्यास से कलम की धार पैनी रखना। यह तो हुई पहली बात।

- दूसरी यह कि लेखन की प्रासंगिकता भी तभी तक सार्थक है जब तक कि वह अंतर्मुखी या आत्ममुग्धता से परे जाकर सर्वजन हिताय: सर्वजन सुखाय न हो सके।

 - तीसरी यह कि कोई भी सृजन अंतस की वेदना से रहित हो यह असंभव है। सृजन का सुख भी इसी में समाहित है। और इस मामले में पौराणिक काल से आज तक भाव प्रवीणता में नारी पुरुष के मुक़ाबले कई गुना ऊँची पायदान पर प्रतिष्ठित है।

 -साहित्य तो दरअसल संवेदनशीलता, सृजन, स्नेह, समर्पण का सफ़रनामा है। अगर यह पूरी आभा के साथ किसी कवियित्री की रचनाधर्मिता में प्रस्फुटित हो तो बात अपने आप में अद्भुत हो जाती है और यह स्पष्ट तौर पर उभरी है माण्डवी सिंह के कविता संग्रह ‘समय के चाक पर’ में जिसमें पृथ्वी, प्रकृति, पर्यावरण, पावस, पाहुन, पक्षी इत्यादि के प्रति समर्पित कोमल भाव यूं उभरते हैं।

जब सोनचिरैया उम्मीदों के तिनके चुनकर बुनती हो

मोर पपीहे की बोली कोयल  संग रिश्ता गुनती हो

-  प्रकृति के प्रति यही प्रेम और सशक्त होकर प्रकटित है आगे यूँ:

पावन वसुधा समृद्ध हुई पा पाहुन पग पावस के

हरियाली से संपन्न हुई पा पाहुन पग पावस के

 - आगे अपनी ज़िम्मेदारियों के प्रति सजग कवयित्री का सामाजिक सरोकार समाहित संदेश समाया हुआ है:

हृदय नहीं गर बदल सको तो / हाल बदलकर क्या होगा

 - जीवन की विद्रुपताओं से पाठकों का परिचय भी कुछ यूँ होता है आगे चलकर:

हवान कुंड पर आंच सेंकते हाथ जला कर बैठे हम

छाँव खोजते गाँव आ गए पाँव गला कर बैठे हम

- पर कवियित्री इस दौर तथा परिवेश से निराश भी कतई नहीं है:

विपदाओं में जो मुस्काए / ऐसा अचल प्रदीप बनो

- अगले पृष्ठों में मन के स्नेहिल उर्फ़ श्रृंगार पक्ष की कोमलतम बानगी यूँ मुखरित होती है:

जिन अधरों में मौन छुपा है / वहीं प्यार के गीत पले

 - और आगे भी इसी भाव की व्याख्या समाहित है: 

अपने आँचल, लट, श्वास, गंध में मुझे बसाए रखना

द्वार, देहरी, आँगन में नेह का दीप जलाए रखना

   - और तो और शृंगार की यही धारा हमें याद दिला देती है राधा कृष्ण के निर्मल प्रेम की भी  :  

कान्हा कहाँ इतनी देर लगाई / राधा पथ निरखे पलक बिछाई

 -इंसानी रिश्तों की रवायत से भी कवयित्री भली भांति परिचित है तभी तो लिख पाईं माँ, पिताजी, भाई, बेटी पर:

सृजन की रचना बेटी से/ मिट्टी की महिमा बेटी से

   - भावपूर्ण यात्रा का क्रम निरंतर जारी रहा है पूरे संग्रह में जैसे ‘सावन गीत’, ‘ब्रह्मनाद’। सामाजिक सरोकार मुखरित है कविता हिन्दी, सुख की तलाश, कलम के सिपाही, नारी, अमर शहीद, एकता के सुर, क्षत्राणी इत्यादि में।

 - उत्तरार्ध मुक्त छंद प्रवाहित है किसी अलबेली, अल्हड़, आह्लादकारी नवयौवना नदिया के समान, जहाँ बगैर किसी व्याकरणीय विवशता के निर्मल मन से जो जी में समाया है वह प्रखरता के साथ प्रस्तुत हुआ है।  

- कुल मिलाकर संग्रह में काव्य रस की सारी विधाएँ खुलकर मुखरित हुई हैं कवयित्री के निर्मल मन और मानस के साथ सुरुचिपूर्ण तरीके से। आरंभ से अंत तक उत्सुकता समाहित सुमधुर प्रवाह। उत्तम मुद्रण तथा कवर पृष्ठ।

May 1, 2023

उदंती.com, मई 2023

वर्ष - 15, अंक - 9

एक हजार खोखले शब्दों से

 बेहतर वह एक शब्द है

 जो शांति लाता है।  - गौतम बुद्ध

 इस अंक में 

अनकहीः वरिष्ठ नागरिक होने का दर्द... - डॉ. रत्ना वर्मा

आलेखः देश में शुरू हुआ गर्म हवाओं का प्रकोप - प्रमोद भार्गव

कविताः इस नैया का और खिवैया - रवीन्द्रनाथ टैगोर

स्वास्थ्यः तलाशना होगा रसोई गैस का विकल्प - अली खान

बुद्ध जयंतीः बुद्धम्‌ शरणम्‌ गच्छामि - ओशो

 प्रेरकः अपने अपने वनवास - निशांत

कविताः पर तुम नहीं बदले - कमला निखुर्पा

चोकाः नदी - भीकम सिंह 

जन्म दिवसः शरद जोशी होने का अर्थ - बसन्त राघव

व्यंग्यः अतिथि तुम कब जाओगे  - शरद जोशी

हाइबनः 1. भँवर, 2. दूसरा कबूतर 3. पट्टे का दर्द - सुदर्शन रत्नाकर

व्यंग्यः पोथी पढ़ि -पढ़ि जग मुआ  - रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

कहानीः नदी का इश्क जिंदा था - दिव्या शर्मा

कविताः चाँद डूब गया - डॉ. कविता भट्ट

लेखकों की अजब गज़ब दुनियाः अजीब आदतों वाले लेखक-2 - सूरज प्रकाश

लघुकथाएँः पहरे पर संतरी -आनंद हर्षुल, नोट -अवधेश कुमारमुक्ति -अर्चना वर्मा

कविताः 1. लम्हें , 2. तलाश - पूनम कतरियार

दोहेः साँसों का यह साज - रश्मि विभा त्रिपाठी

जीवन दर्शनः बाधा तोड़ें सबको जोड़ें- पाँच उँगलियों का सिद्धांत - विजय जोशी

 किताबेंः भाषायी तकनीक की जानकारी देती किताब -  प्रमोद भार्गव