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Jan 1, 2026

कविताः परिवार- सात कविताएँ

- जयप्रकाश मानस 




1. विरासत

हम सब

एक ही आँगन में

अलग-अलग दिशाओं की ओर 

बैठे हैं

जब बारिश होती है

तो हर छपाक

एक ही थाली में गिरता है

पर हम सुनते हैं

अलग-अलग स्वर

कभी-कभी

दादा की घड़ी

जो दीवार पर रुकी हुई है

अचानक चल पड़ती है

और हम सब

एक साथ

उसकी टिक-टिक सुनते हैं

मानो कोई पूछ रहा हो -

"क्या यही है वह समय

जिसकी विरासत 

हमें मिली थी?"

2. घर का नक्शा

यह दीवार

जिस पर बच्चे ने

पेंसिल से खींचा था

हम सबका नक्शा

अब उस पर

एक कुर्सी टँगी है

जिसमें बैठकर

कोई रोज़

उन रेखाओं को मिटाता है

जो एक दूसरे से

जुड़ी हुई थीं

हम सब देखते हैं

और चुपचाप

अपने-अपने कमरों में

नए नक्शे बनाते हैं

जिनमें सिर्फ़ एक ही 

व्यक्ति होता है

3. परिवार नाम की चिट्ठी

हर सुबह

माँ की चाय की प्याली में

एक अधूरी चिट्ठी तैरती है

उसमें लिखा होता है -

"प्रिय..."

और फिर ख़ाली जगह

जहाँ हम सब

अपने-अपने हिस्से का प्यार

लिखना भूल जाते हैं

शाम को जब पिता

अख़बार सुलझाते हैं

तो वह चिट्ठी

किसी पन्ने के बीच

सूखी पत्ती की तरह

मिलती है

4. परिवार नाम का सूटकेस

परिवार एक सूटकेस है

जिसमें हम सब

अपने-अपने अधूरे सपने

और कुछ टूटे हुए खिलौने

समेटकर चलते हैं

कभी इसे खोलते हैं

तो निकलती है

एक पुरानी डायरी

जिसमें लिखा है:

"आज पापा ने 

मुझे गोद में उठाया था"

और नीचे

एक फटा हुआ टिकट

जिस पर लिखा है

"एक दिन लौटकर आऊँगा"

पर हम सब जानते हैं

यह सूटकेस

अब कहीं नहीं जाता—

बस हर स्टेशन पर

खुलता और बंद होता है

अपनी ही यादों के अंदर

5. परिवार नाम की नदी

परिवार एक नदी है

जिसमें हम सब

अपनी-अपनी छोटी-छोटी 

प्यास लेकर

उतरते हैं

कुछ लोग किनारे बैठकर

पत्थर फेंकते हैं

ताकि लहरें बनें

और वे अपना चेहरा देख सकें

कुछ गहरे में उतर जाते हैं

और डूबते-डूबते

पानी से पूछते हैं-

"क्या तुम्हें याद है?

हम कभी एक ही धारा में 

बहते थे?"

लेकिन नदी चुप रहती है

बस बहती जाती है

अपने साथ लेकर

हमारे पैरों के निशान

और कुछ टूटे हुए प्रश्न

6. परिवार नाम का पेड़

परिवार एक पेड़ है

जिसकी जड़ें

हमारे सपनों में फैली हैं

कुछ पत्ते हर साल झड़ते हैं

कुछ नए आते हैं

पर कोई नहीं जानता

कि यह पेड़

किसकी याद में उगा था

कभी-कभी हवा चलती है

तो डालियाँ आपस में 

टकराती हैं

और गिरते हैं

कुछ फूल, कुछ काँटे

कुछ अधूरे फल

हम सब नीचे बैठकर

उन्हें समेटते हैं

मानो कोई कह रहा हो—

"यही तो विरासत है

इसे संभालकर रखना"

7.अधूरी तस्वीर

यह तस्वीर

जिसमें हम सब हैं

अधूरी है

क्योंकि जिसने खींची थी

वह खुद

फ्रेम के बाहर खड़ा था

अब हर साल

कोई न कोई

उसकी जगह भरने आता है

पर जैसे ही

हम उसे फ्रेम में रखते हैं

तस्वीर फिर से

अधूरी हो जाती है

11 comments:

  1. वर्तमान की पारिवारिक व्यवस्था के मर्म समझाता हुआ, बहुत कुछ छूट जाने का दर्द सहित संयुक्त खुशी ढूंढती बेहतरीन कविताओं के लिए- शुभकामनाएँ सर।

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    1. जयप्रकाश मानस27 January

      Thanks

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  2. Anonymous06 January

    सभी कविताएं उम्दा और संपूर्ण रूप से घर और घर के मुखिया पर केंद्रित।

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    1. जयप्रकाश मानस27 January

      धन्यवाद

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  3. बहुत ही सामायिक ,...और परिवार के यादों मे गोते लगाते हुए आँखों को नम करती कविताएँ

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    1. जयप्रकाश मानस27 January

      बहुत बहुत स्वागत

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  4. बहुत उत्कृष्ट सृजन। प्रत्येक कविता कुछ सोचने पर मजबूर करती है ।परिवार का अलग अलग चित्र नए संदर्भों में मन को संवेदना से भर देती है।हार्दिक बधाई आदरणीय ।

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  5. Anonymous30 January

    पारिवारिक पृष्ठभूमि पर लिखी सभी कविताएँ बहुत सुंदर, भीतर तक झकझोरती हैं। उत्कृष्ट सृजन के लिए हार्दिक बधाई ।सुदर्शन रत्नाकर

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  6. पता नहीं क्यों मन भर आया...बहुत बधाई

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  7. डॉ सुनीता वर्मा02 February

    कविताएँ दृश्य को लिखती रहीं तीनों कालों को समेटती रही ।वाह

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