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Mar 1, 2022

पर्व - संस्कृति- बस्तर की फागुन मड़ई

 - रविन्द्र गिन्नौरे
                ravindraginnore58@gmail.com

  होली हँसी- ठिठोली और रंग -मस्ती से सराबोर होती है। बस्तर के आदिवासियों की होली अपने अलग अंदाज में मनाई जाती है। आदिवासी अपने रीति-रिवाजों को संजोए हुए होली मनाते हैं दंतेवाड़ा के माई दरबार में। दंतेवाड़ा जहाँ बिराजी हैं  आदिवासियों की आराध्य देवी माँ दंतेश्वरी। डंकिनी शंखिनी नदी संगम के तट पर बसा है दंतेवाड़ा। हर बरस माता के दरबार में होली मनाने आ जुटता है आदिवासी समुदाय अपनी मस्ती और उमंग के साथ। यहाँ फागुन मास की होली नाच गाने के साथ मनाई जाती है जिसे ‘फागुन मड़ई’ कहा जाता है। पूरे दस दिन तक की मड़ई होती है दंतेश्वरी माई की छत्रछाया में। दंतेवाड़ा में फागुन मड़ई शुरू होती है फागुन शुक्ल पक्ष की छठवीं तिथि से। मड़ई में शामिल होने गाँव-गाँव से आदिवासी पहुँचते हैं, सज धज कर अपनी पूरी तैयारी के साथ। आदिवासियों के साथ उनके गाँव के देवी देवताओं का छत्र, बैरक भी पहुँचता है दंतेवाड़ा में। 

   फागुन छठ के दिन दंतेवाड़ा का मेचका डबरा मैदान दूरदराज से आये आमंत्रित देवी-देवताओं के छत्र, बैरक से सज उठता है। सबसे आखरी में आता है माँ दंतेश्वरी का छत्र और कलश। जिनके आते ही परंपरा अनुसार देवताओं को साक्षी मानकर होती है सबसे पहले होती है कलश स्थापना। इसी के साथ दंतेश्वरी माता अनुमति देती है फागुन मड़ई मनाने के लिए। दूसरा दिन होता है फागुन सप्तमी का। सप्तमी को 'ताड़ फलंगा' विधान संपन्न होता है। पूजा- अर्चना के साथ ताड़ पेड़ के 15 पत्ते लाए जाते हैं। ताड़ के पत्तों को धोया जाता है माता तरई तालाब में, फिर ताड़ पत्तों को सहेज लिया जाता है होलिका दहन के लिए। अष्टमी के दिन होता है ‘खोरखुंदनी का विधान’। खोरखुंदनी का मतलब नाच से होता है। ढोल मांदर की थाप, टिंमकी झांझर की झंकार, तान-तान धिन, तान धिन,तांग-तांग की धुन के साथ आदिवासियों का समूह थिरक उठता है। मेचका डबरा के मैदान में अपनी अपनी वेशभूषा में सजे एक नहीं कई आदिवासी समूह थिरक उठते हैं। हर ओर अपनी-अपनी धुन के साथ नाचते, थिरकते आदिवासियों के दल को देखते ही बनता है, ऐसा अद्भुत नजारा। 

  फागुन मड़ाई का विशेष आकर्षण होता है डंडारी नाच। डंडारी नृत्य करते हैं भतरा आदिवासी, अपनी विशिष्ट वेशभूषा के साथ। नृत्य करते भतरा नर्तक कमर से घुटने तक लाल परिधान पहने,सिर पर सुर्ख लाल साफा बाँधे रहते हैं। जिनकी श्याम छातियों पर सफेद कौड़ियों के आभूषण रह- रहकर उनकी थिरकन के साथ कौंध उठते हैं। वसंत का राग,फागुन मड़ई की मस्ती के साथ डंडारी नाच का दौर चलता है और चलता ही रहता है रात भर, नाचने की होड़ लगी रहती है आदिवासियों के बीच। हर कोई अपने समूह के साथ अपनी धुन में थिरकता नजर आता है। तरह-तरह के लोक वाद्यों की धुन वातावरण में गूँज उठती है। गाँव-गाँव के आदिवासी रंग-बिरंगे परिधान पहने उनके समूह ,अपनी-अपनी धुन में नाचते हैं। जहाँ समूचे बस्तर की लोक संस्कृति एकाकार होती, सुहावनी सी लगती है। नाच देखने के लिए आ जुटता है अपार जनसमूह। ‘नाच मांडनी’ नवमी तिथि में होती है। दिन में नाच का दौर शुरू होता है और देर रात तक चलता है आदिवासियों के नृत्य का दौर। कहीं टिमकी डुबकी, कहीं ढोल मृदंग, कहीं चिकारा की धुन के साथ नाचती आदिवासियों की उल्लसित टोली, तो कहीं दूसरी टोली। किसे देखें किसे नहीं देखें नर्तकों के पैर तो थमते ही नहीं। दर्शक घंटों निहारते हैं,  जिनके कान लोक वाद्यों की धुन से सुन्न से हो जाते हैं; मगर टोलियों के नर्तक थिरकते ही रहते हैं रात भर। ‌ ‌ 

  फागुन के माहौल में उमंग उल्लास से भरे आदिवासियों का मेल-मिलाप होता है इस फागुन मड़ई में। बस्तर के लोकजीवन में मेला मंड़ई के आयोजन का उद्देश्य ही होता है मेल मुलाकात करने का। नवमी के तिथि के बाद चार दिन तक चलता है ‘शिकार स्वांग’। दशमी तिथि से त्रयोदशी तक चलने वाला ‘शिकार स्वांग’ बड़ा अनूठा होता है। दशमी के दिन ‘लम्हामार’ दूसरे दिन ‘कोटमीमार’ तीसरे दिन ‘चीतलमार’ और चौथे यानी त्रयोदशी को आयोजित होता है ‘गंवरमार शिकार स्वांग’। शिकार स्वांग के लिए खरगोश, कोटरी चीतल और गौर की आकृतियाँ बनाई जाती हैं। बाँस की कमचिल, रंग बिरंगा कपड़ा और काजल से बनी आकृतियाँ हूबहू जानवरों सरीखी दिखती हैं। इन्हीं आकृतियों को पहनकर आदिवासी जानवरों की नकल करते हैं और शिकारियों को ललचाते हैं। शिकार स्वांग के पहले दिन होता है ‘लम्हामार’। खरगोश की आकृति पहने एक आदिवासी उछलता कूदता निकलता है, सबके सामने से। खरगोश का शिकार करने उसका पीछा करता है आदिवासियों का एक समूह। खरगोश छुप जाता है, फिर कहीं दूर दिखता है नाटकीय अंदाज में खरगोश छुपता फिरता है, शिकारी परेशान हताश होते हैं और काफी मशक्कत के बाद जब खरगोश दिखता है, तब एक धमाका होता है और धराशायी हो जाता है खरगोश। इसी के साथ संपन्न होता है लम्हामार शिकार स्वांग। ‌‌ ऐसे ही होता है कोटरीमार शिकार स्वांग एकादशी के दिन। ‘चीतलमार’ द्वादश के दिन और त्रयोदशी को ‘गंवरमार’ शिकार स्वांग संपन्न होता है भरपूर मनोरंजन के साथ। बस्तर के महाराजा ने शिकार स्वांग की परंपरा शुरू कराई थी मनोरंजन के लिए, जो आज भी परंपरागत रूप से चल रही है। फागुन मड़ई के चार दिन मनोरंजन में ही बिताते हैं। 

  त्रयोदशी आते ही फागुन मड़ई पहुँच जाती है अपनी चरम अवस्था में। मंडई में आमंत्रित देवी देवताओं के छत्र, बैरक लाठ, डांग और पालकियों के बीच दंतेश्वरी माई की डोली का आकर्षण अलग ही होता है। माई अपनी पालकी में विराजी रहती हैं और दिन भर भ्रमण करती हैं पूरे विधि विधान के साथ मेचका डबरा मैदान में। फागुन मड़ई में गाँव-गाँव से आए देवी देवताओं के बीच रस्म होती है ‘देव खिलानी’। देवताओं को अर्पित किया जाता है भोग। शाम का धुँधलका जैसे ही घिरता है वैसे ही शुरू हो जाता है फागुन मंडई का ‘गाली उत्सव’। गालियों की बौछार एक छोर से दूसरे छोर तक चलती है श्लील, अश्लील तरह-तरह की गालियाँ बड़े हास-परिहास लिये हुए। गालियाँ ऐसी कि कोई अपनी मर्यादा कोई नहीं लाँघता, फागुन मड़ई के इस गाली उत्सव में। फिर आती है चतुर्दशी तिथि इस दिन होता है ‘आँवला मार’ आयोजन। सुबह माई दंतेश्वरी की डोली में आँवला अर्पित किया जाता है। फिर वहाँ एकत्र लोग दो समूह में बँट जाते हैं। लोग एक दूसरे पर आँवले की बौछार करते हैं ,आँवला की मार से कौन कैसे बचता है और कौन किस पर भारी पड़ता है, ऐसे आँवला मार आयोजन का दृश्य देखते ही बनता है। फागुन मड़ई का आँवला मार बड़ा मनोरंजक होता है। रात को विधि- विधान के साथ जलाई जाती है होली। दूसरे दिन पूर्णिमा की अलसुबह होता है पादुका पूजन। डंकिनी, शंखनी नदी संगम तट पर जहाँ अंकित हैं भैरव बाबा के पद चिह्न।     

    भैरव बाबा के पद चिन्हों की पूजा अर्चना की जाती है इसके बाद शुरू हो जाता है रंग- गुलाल। होली की मस्ती के साथ रंगों से सराबोर हो जाता है समूचा जनसमूह। फागुन मड़ई का समापन ‘रंग पर्व’ से संपन्न होता है। रंग पर्व के होने के बाद फागुन मड़ई में शामिल होने आए देवी-देवताओं की विदाई होती है दूसरे दिन प्रतिप्रदा को। सम्मानपूर्वक देवी देवताओं की विदाई होती है और देवों के बैरक, छत्र, लाठ लौटने लगते हैं अपने-अपने गाँव। इसी के साथ संपन्न होती है बस्तर की फागुन मड़ई।

3 comments:

शिवजी श्रीवास्तव said...

बस्तर में आयोजित 'फागुन मड़ई'का विस्तार से रोचक वर्णन।वहाँ के आदिवासी समाज की संस्कृति को स्पष्ट करता सुंदर आलेख।बधाई रवीन्द्र गिन्नौरे जी।

Unknown said...

हमारे आदिवासी अंचल की संस्कृति की रोचक जानकारी एवं वर्णन के लिए धन्यवाद।

Mishra said...

बेस्ट है