December 12, 2019

पाँखुरी नोची गई

1-पाँखुरी नोची गई

 - रमेश गौतम 

फिर सुनहरी
पाँखुरी नोंची गई
फिर हमारी शर्म से गर्दन झुकी ।

फिर हताहत
देवियों की देह है
फिर व्यवस्था पर
बहुत सन्देह है
फिर खड़ी
संवदेना चौराहे पर
फिर बड़े दरबार की साँसे रुकी ।

फिर घिनौने क्षण
हमें घेरे हुए
एक गौरैया गगन
कैसे छुए
लौटती जब तक नहीं
फिर नीड़ में
बन्द रहती है हृदय की धुकधुकी ।

फिर सिसकती
एक उजली सभ्यता
फिर सभा में
मूक बैठे देवता
मर गई है
फिर किसी की आत्मा
एक शवयात्रा गली से जा चुकी ।

फिर हुई है
बेअसर कड़वी दवा
फिर बहे कैसे
यहाँ कुँआरी हवा
कुछ करो तो
सार्थक पंचायतों में
छोड़कर बातें पुरानी बेतुकी ।

2-सजल चित्र

  शब्द की

तूलिका से बनाए गए
गीत अनुभूतियों के सजल चित्र हैं
जब उदासी गहन
चीरती है हृदय
देह से खींचता
प्राण निर्मम समय
तब अनायास
संजीवनी की तरह
गीत ही सिद्ध होते परममित्र हैं
आँसुओं के सदा ही
कथानक हुए
हर गली पाँव
संवेदना के छुए
आचरण अक्षरों का
सुवासित हुआ
गीत करुणा-कलित नैन का इत्र हैं
ओढ़कर आवरण
सब गले से लगे
चार रिश्ते नहीं
ढूँढ पाए सगे
पारदर्शी कथा
कागजों पर लिये
नेह की व्यंजना
गीत ही तो यहाँ राम–सौमित्र हैं

3-महानगर!


गौरैया भी
एक घोंसला रखले
इतनी जगह छोड़ना
महानगर।
खड़े किए लोहे के पिंजरे
हत्या कर
हरियाली की,
इतने निर्मम हुए कि
गर्दन काटी
फिर खुशहाली की;
पहले प्यास बुझे
हिरनों की
तब अरण्य से नदी मोड़ना
महानगर।
माटी के आभूषण सारे
बेच रहे हैं सौदागर
गर्भवती
सरसों बेचारी
भटक रही है अब दर–दर
गेहूँ–धान
कहीं बस जाएँ तो
खेतों की मेड़ तोड़ना
महानगर।
फसलों पर
बुलडोजर
डोले
सपने हुए हताहत सब
मूँग दले छाती पर
चढ़कर
बहुमंजिली इमारत अब
फुरसत मिले कभी तो
अपने पाप–पुण्य का
गणित जोड़ना
महानगर।

4- मैं अकेला ही चला हूँ  


मैं अकेला ही चला हूँ
साथ लेकर बस
हठीलापन

एक ज़िद है बादलों को
बाँधकर लाऊँ यहाँ तक
खोल दूँ जल के मुहाने
प्यास फैली है जहाँ तक
धूप में झुलसा हुआ
फिर खिलखिलाए
           नदी का यौवन             

सामने जाकर विषमताएँ
समन्दर से कहूँगा
मरुथलों में हरीतिमा के
छन्द लिखकर ही रहूँगा
दर्प मेघों का
विखण्डित कर रचूँ मैं
बरसता सावन

अग्निगर्भा प्रश्न प्रेषित
कर चुका दरबार में सब
स्वाति जैसे सीपियों को
व्योम से उत्तर मिलें अब
एक ही निश्चय
छुएँ अब दिन सुआपंखी
सभी का मन

सम्पर्कः रंगभूमि, 78–बी, संजय नगर, बरेली-243001

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