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Mar 16, 2019

अलगाववादियों पर शिकंजा

 अलगाववादियों पर शिकंजा
-प्रमोद भार्गव
     यह  भारत जैसे उदार सहिष्णु देशों में ही संभव है कि आप अलगाव और देशद्रोह का खुलेआम राग अलापिए, मासूम युवाओं को भड़काइए, राज्य राष्ट्र की संपत्ति को नुकसान पहुँचाइए, बावजूद आपका बाल भी बाँका होने वाला नहीं है? पाकिस्तान के पक्ष में और भारत के विरोध में नारे लगाने वाले ऐसे लोगों को हम देशद्रोही नहीं मानते, अलबत्ता उनकी सुरक्षा और एेशो-आराम पर करोड़ों रुपए खर्च कर रहे हैं। यह एक ऐसी हैरानी में डालने वाली वजह है, जो अलगाववादियों का केवल भारत में पोषण कर रही है, बल्कि वे भारतीय पासपोर्ट के जरिए दूसरे देशों की सरजमीं पर इतराते हुए भारत के खिलाफ मानवाधिकारों के हनन की वकालत करते हुए विद्रोह की आग भी उगलते हैं। सुरक्षा और सरकारी धन की यह इफरात ही अलगाववादियों को दुनिया में इतराते फिरने का मौका दे रही है। अब बड़ी चोट सहकर भारत पाकपरस्त पाँच अलगाववादियों की सरकारी सुरक्षा हटाने को मजबूर हुई है। जबकि इन सुविधाओं को बंद करने की माँग अर्से से उठ रही थी। 2016 में भाजपा विधायक ने जम्मू-कश्मीर विधानसभा में भी पृथकतावादियों पर अरबों रुपए खर्च करने का मुद्दा उठाया था।
        
    पुलवामा के भीषण हमले और 40 जबाँजों के प्राण खोने के बाद जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने पाँच अलगाववादियों को मिली सुरक्षा वापस ले ली हैं। अब तक यह सुरक्षा केंद्र के परामर्श से राज्य सरकार अस्थायी तौर पर मुहैया करा रही थी। इन नेताओं में ऑल पार्टीज हुर्रियत क्रांफ्रेस के अध्यक्ष मीरवाइज उमर फारूक, जम्मू-कश्मीर डेमोक्रेटिक पार्टी के संस्थापक अध्यक्ष ब्बीर शा, जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रांट हासिम कुर्रेशी, पीपुल्स इंडिपेंडेंट मूवमेंट के अध्यक्ष बिलाल लोन, और मुस्लिम क्रांफ्रेस के अध्यक्ष अब्दुल गनी बट शामिल हैं। उमर फारूक पर 29 जनवरी को पाक के विदेश मंत्री शा महमूद कुरैशी से वार्ता की थी। जिस पर विवाद हुआ था। ब्बीर शा कश्मीर में आत्मनिर्णय के अधिकार की बात करते हैं। जबकि कश्मीर से चार लाख से भी ज्यादा पंडित, सिख, बौद्ध, जैन और अन्य अल्पसंख्यकों को तीस साल पहले विस्थापित कर दिया गया है। यदि शा में थोड़ी भी राष्ट्रभक्ति होती तो वे यहां बहुलतावादी चरित्र की बहाली के लिए इन विस्थापितों के पुनर्वास की बात करते ? हाशिम कुरैशी 1971 में इंडियन एयरलाइंस के विमान अपहर्ताओं में शामिल था। बिलाल लोन पीपुल्स क्रांफ्रेंस के एक अलगाववादी धड़े का नेता है। फारसी का प्राध्यापक रहा अब्दुल गनी बट हुर्रियत का हिस्सा है। इसने कश्मीरी पंडितों के घर जलाने और उन्हें घाटी से बाहर खदेड़ने में अहम भूमिका निभाई थी। इस कारण इसे 1986 में सरकारी नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया था। इन लोगों पर पाकिस्तान से पैसा लेने आईएसआई के लिए जासूसी करने का भी आरोप है। इसका खुलासा हिंदी के एक राष्ट्रीय समाचार चैनल ने किया था। जबकि अब गृह मंत्रालय कह रहा है कि इन अलगाववादियों के पाक खुफिया एजेंसी आईएसआई से संपर्क रखने और विदेशी आर्थिक मदद लेने की जानकारी उसे पहले से है। बाबजूद इन देशद्रोहियों पर नरेंद्र मोदी सरकार कड़ी कानूनी कार्रवाही करने से बचती रही।

विडंबना देखिए जो देश-विरोधी गतिविधियों में ढाई दशक से लिप्त हैं, उन्हें राज्य एवं केंद्र सरकार की तरफ से सुरक्षा-कवच मिला हुआ है। यही नहीं, इन्हें सुरक्षित स्थलों पर ठहराने, देश-विदेश की यात्राएँ कराने और स्वास्थ्य सुविधाएँ उपलब्ध कराने पर पिछले 5 साल में ही 560 करोड़ रुपए खर्च किए हैं। मसलन सालाना करीब 112 करोड़ रुपए इन अलगाववादियों का पृथक्तावादी चरित्र बनाए रखने पर खर्च हुए हैं। इनकी सुरक्षा में निजी अंगरक्षकों के रूप में लगभग 500 और इनके आवासों पर सुरक्षा हेतु 1000 जवान तैनात हैं। पूरे जम्मू-कश्मीर राज्य के 22 जिलों में 670 अलगाववादियों को विशेष सुरक्षा दी गई है। जबकि ये पाकिस्तान का पृथक्तावादी अजेंडा आगे बढ़ा रहे हैं। इनके स्वर बद्जुबान तो हैं ही, पाकिस्तान परस्त भी हैं। कश्मीर के सबसे उम्रदराज अलगाववादी नेता सैयद अली गिलानी कहते हैं, ‘यहाँ केवल इस्लाम चलेगा। इस्लाम की वजह से हम पाकिस्तान के हैं और पाक हमारा है।अलगाववादी महिला नेत्री असिया अंद्राबी पाक का कश्मीर में दखल कानूनी हक मानती हैं। कमोबेश यही स्वर यासीन मलिक और मीरवाइज उमर फारुक का है। यह विडंबना नहीं तो और क्या है कि हम इनकी बद्जुबानी भी सह रहे हैं और इन्हें सुरक्षा व्यक्तिगत खर्च के लिए धन भी मुहैया करा रहे हैं। विश्व में शायद ही किसी अन्य देश में ऐसी विरोधाभासी तस्वीर देखने को मिले ? बावजूद भारत सरकार ऐसे बर्ताब को देशद्रोही नहीं मानती है, तो तय है, इन अलगाववादियों का सरंक्षण कालांतर में देश के लिए आत्मघाती ही साबित होगा ?
            कश्मीरी अलगाववादियों को देश-विदेश में हवाई-यात्रा के लिए टिकट सुविधा, पाँच सितारा होटलों में ठहरने वाहन की सुविधाएँ मुहैया कराई जा रही हैं। स्वास्थ्य खराब होने पर दिल्ली के एम्स से लेकर अपोलो एस्कॉर्ट और वेदांता जैसे महंगे अस्पतालों में इनका उपचार कराया जाता है। इन सब खर्चों को राज्य और केंद्र सरकार मिलकर उठाती हैं। जम्मू-कश्मीर विधानसभा परिषद् में भाजपा सदस्य अजात त्रु ने इस परिप्रेक्ष्य 1916 में आश्चर्यजनक खुलासा किया था। उन्होंने बताया था कि पृथक्तावादियों को विधायकों, मंत्रियों और विधान परिषद् के सदस्यों से कहीं ज्यादा सुरक्षा मिली हुई है? बाद में अजात त्रु ने जो आंकड़े प्रस्तुत किए, उससे सदन अवाक रह गया था। राज्य में कुल 73,363 पुलिसकर्मी हैं, इनमें से समूचे राज्य के 670 अलगाववादियों की सुरक्षा में 18000 कर्मी तैनात हैं। राज्य के सर्व शिक्षा अभियान का कुल वार्षिक खर्च 486 करोड़ है, जबकि इस सुरक्षा पर 560 करोड़ रुपए खर्च हो रहे हैं। अलगाववादियों को ठहरने के लिए महँगे होटलों में 500 कमरे भी आरक्षित हैं। देश के खिलाफ बगावत का स्वर उगलने वालों को इतनी सुख-सुविधाएँ सरकार दे रही है, तो भला वे अलगाव से अलग होने की बात सोचें ही क्यों? देश की मुख्यधारा में क्यों आएँ ? राज्य सरकार इस सुरक्षा को उपलब्ध कराने का कारण अलगाववादी नेताओं और आतंकी संगठनों में कई मुद्दों पर मतभेद बताती रही है। इस तकरीर से ही साफ है कि अलगाववादी राष्ट्र या राज्य के नहीं, बल्कि आतंकवादियों के कहीं ज्यादा निकट हैं। लिहाजा इनके अलगाव के स्वर को पनाह देना कतई राष्ट्रहित में नहीं है।
            ये अलगाववादी कितने चतुर हैं और अपने परिवार के सदस्यों के सुरक्षित भविष्य के लिए कितने चिंतित हैं, यह इनकी कश्मीरियों के प्रति अपनाई जा रही दोगली नीति से पता चलता है। इनका यह आचरण तुम साँप के बिल में हाथ डालो, मैं मंत्र पढ़ता हूँ जैसे मुहाबरे को चरितार्थ करता है। 2010 में पुलिस सेना पर बच्चों, किशोरों और युवाओं से पत्थर फेंकने का तारीका मसरत आलम नाम के अलगाववादी ने इजाद किया था। किंतु इस भारत विरोधी गतिविधि में मसरत की कभी कोई संतान शामिल नहीं रही। इनके सभी बच्चे घाटी से बाहर दिल्ली के महँगे शिक्षा संस्थानों में पढ़कर भविष्य संवारकर देश-विदेश में नौकरी कर रहे हैं। खुद खाएँ गुलगुले और गुड़ से करें परहेज वाली कहावत सैयद अली गिलानी पर भी लागू होती है। आतंकी बुरहान बानी की कब्र पर जमा लोगों को अपने ऑडियो संदेश के जरिए जिहाद और इस्लाम का पाठ पढ़ाने वाले इस चरमपंथी के तीन बेटे और तीन बेटियों में से एक भी अलगाववादी जमात का हिस्सा नहीं है। ये घाटी से बाहर दिल्ली और अमेरिका में पढ़-लिखकर वैभवशाली जीवन जी रहे हैं। यही नहीं इनकी मौज-मस्ती और कश्मीर में अलगाववादी गतिविधियाँ चलाने के लिए इन्हें विदेशों से भी अकूत धन मिल रहा है।

            इन सब हकीकतों के बावजूद पुलवामा में हुए सेना पर हमले के बाद जो सर्वदलीय बैठक संपत्र हुई, उसमें नेताओं ने आतंकवाद को नेस्तनाबूद करने की बहुमत से प्रतिबद्धता तो जताई। सीमापार से निर्यात किए जा रहे आतंक की कड़ी निंदा भी की, लेकिन  पाकिस्तान का नाम लेने से बचते दिखाई दिए। जबकि इन नेताओं को पाकिस्तान का नाम लेने के साथ धारा-370 के खत्म करने की बात भी पुरजोरी से करनी थी ? इस धारा के चलते ही कश्मीरी जनता में अलगाववाद पला-पोषा है ? इसकी छाया में अवाम यह मानने लगा है कि यही वह धारा है, जिसके चलते कश्मीरियों को विशिष्ट अधिकार मिले हैं। नतीजतन वे भारत से अलग हैं। गोया वह कश्मीरियत की बात तो करते हैं, लेकिन उसे भारतीयता से भिन्न मानते हैं। इस मानसिकता को उकसाने का काम अलगाववादी बीते 30 साल से कर रहे हैं। लिहाजा अलगाववादियों पर अंकुश के साथ इस मानसिकता को भी बदलने के लिए एक वैचारिक मुहिम कश्मीर में चलाने की जरूरत है।
सम्पर्कः शब्दार्थ 49,श्रीराम कॉलोनी, शिवपुरी .प्र., मो. 09425488224,9981061100

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एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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