January 15, 2019

नोबेल

यौन हिंसा के खिलाफ
 आवाज़ों को मिला सम्मान
- जाहिद खान
नोबेल समिति ने इस साल के नोबेल शांति पुरस्कार के लिए इराक की यजीदी मूल की नौजवान लड़की नादिया मुराद और कांगो के डॉ. डेनिस मुकवेगे को चुना है। इन दोनों बेमिसाल शख्सियतों को यौन हिंसा के खिलाफ प्रभावी मुहिम चलाने और महिला अधिकारों के लिए उत्कृष्ट कार्य करने के लिए यह प्रतिष्ठित पुरस्कार दिया जा रहा है। दोनों ने अपने-अपने कामों से दुनिया में अमन और लैंगिक समानता बढ़ाने की बेजोड़ कोशिश की और यौन उत्पीड़न के खिलाफ आवाज़ बुलंद की है।
नोबेल समिति की अध्यक्ष बेरिट रेइस एंडरसन ने पत्रकार वार्ता में इन नामों का ऐलान करते हुए कहा कि दोनों ही विजेताओं ने युद्ध क्षेत्र में यौन हिंसा को हथियार की तरह इस्तेमाल करने की मानसिकता के खिलाफ सराहनीय काम किया है। दोनों इस वैश्विक अभिशाप के खिलाफ संघर्ष की एक मिसाल हैं। एक शांतिपूर्ण दुनिया केवल तभी हासिल की जा सकती है, जब महिलाओं और उनके मौलिक अधिकारों एवं सुरक्षा को युद्ध में पहचाना और संरक्षित किया जाए। मुकवेगे और मुराद दोनों एक वैश्विक संकट के खिलाफ संघर्ष की नुमाइंदगी करते आए हैं, जो कि किसी भी संघर्ष से परे है, जिसे बढ़ते हुए ‘मी टू’ आंदोलन ने भी दिखाया है। उन्होंने कहा कि यौन हिंसा के खिलाफ इनके महत्वपूर्ण योगदान को देखते हुए इन्हें नोबेल शांति सम्मान दिया जा रहा है।
पाकिस्तान की मलाला युसुफजई के बाद नादिया मुराद दूसरी ऐसी महिला हैं, जिन्हें इतनी कम उम्र में शांति का नोबेल पुरस्कार मिला है। एक ऐसे वक्त में जब दुनिया में महिलाओं के साथ कई तरह की यौन हिंसा की घटनाएँ सामने आ रही हों, तमाम काशिशों के बाद भी उनका यौन उत्पीड़न रुका नहीं हो, पुरुष आज भी उन्हें अपनी यौन दासी के अलावा कुछ न समझते हों, नादिया मुराद और डॉ. डेनिस मुकवेगे का सम्मानित होना यह आश्वस्ति प्रदान करता है कि यौन हिंसा पीड़िताओं की सिसकियाँ अनसुनी नहीं है। कोई न सिर्फ उनकी आवाज़ सुन रहा है, बल्कि उसे सारी दुनिया के सामने भी ला रहा है। उनके ज़ख्मों पर अपने कामों से मरहम लगा रहा है। आई एस के आतंक से ग्रस्त इराक में नादिया मुराद और गृहयुद्ध में घिरे कांगो में डेनिस मुकवेगे ने यौन हिंसा की पीड़िताओं के मानवाधिकार की रक्षा के लिए अपनी जान तक दांव पर लगा दी है। नोबेल शांति पुरस्कार इन दोनों के साहस को मान्यता प्रदान करना है।  
नादिया मुराद बसी ताहा का जन्म इराक के कोजो शहर में साल 1993 में हुआ था। वे इराक की यजीदी मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं। मुराद ‘नादिया अभियान’ की संस्थापक हैं। यह संस्था नरसंहार, सामूहिक अत्याचार और मानव तस्करी के पीड़ित महिलाओं और बच्चों की मदद करती है। संस्था उन्हें अपनी ज़िंदगी दोबारा जीने और उन बुरी यादों से उबरने में मदद करती है।
नादिया यौन पीड़िताओं की मददगार और दुनिया भर में उनकी आवाज़ क्यों बनी? इसकी कहानी भी बड़ी हैरतअंगेज़ है। नादिया उन 3,000 यजीदी लड़कियों और महिलाओं में से एक है, जिन्हें साल 2014 में इस्लामिक स्टेट (आईएस) के आतंकवादियों ने अपहरण कर लिया था और उनके साथ लगातार बलात्कार और दुर्व्यवहार किया था। वे करीब तीन महीने तक आईएस के आतंकियों के कब्जे में रहीं, जहां उनके साथ दिन-रात बलात्कार किया गया। वह कई बार खरीदी और बेची गई। किसी तरह से वहां से वह अपनी जान बचाकर निकली। उनके चंगुल से छूटने के बाद, उन्होंने यौन हिंसा की शिकार महिलाओं के लिए काम करना शुरू कर दिया। इस वक्त वे पूरी दुनिया में महिलाओं को यौन हिंसा के खिलाफ जागरूक करने का काम कर रही हैं। नादिया मानव तस्करी के पीड़ितों के लिए संयुक्त राष्ट्र की गुडविल एंबेसडर भी हैं। नादिया मुराद ने अपने अनुभवों पर एक किताब भी लिखी है, जिसका नाम ‘दी लॉस्ट गर्ल : माई स्टोरी ऑफ कैप्टिविटी एंड माई फाइट अगेंस्ट द इस्लामिक स्टेट’ है। इस किताब में  आईएस आतंकियों की हैवानियत के किस्से भरे पड़े हैं।
नादिया मुराद की तरह डॉ. डेनिस मुकवेगे भी यौन हिंसा के खिलाफ अभियान चला रहे हैं। वे पेशे से स्त्री रोग विशेषज्ञ हैं और यौन हिंसा की शिकार महिलाओं के लिए लंबे समय से काम कर रहे हैं। ‘दी ग्लोब एंड मॉल’ के मुताबिक डॉ. मुकवेगे, बलात्कार की चोटों को ठीक करने के मामले में दुनिया के अग्रणी विशेषज्ञ हैं। डॉ. मुकवेगे को उनके द्वारा युद्धग्रस्त पूर्वी डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो में महिलाओं को हिंसा, बलात्कार और यौन हिंसा के सदमे से बाहर निकालने में दो दशकों तक किए गए काम के लिए मान्यता मिली है। मुकवेगे कांगो में डॉक्टर चमत्कार के रूप में जाने जाते हैं। कांगो ही नहीं, अन्य अफ्रीकी देशों की महिलाएँ भी उन्हें एक रहनुमा की तरह देखती हैं। मुकवेगे ने अपने द्वारा 1999 में स्थापित पांजी अस्पताल में बलात्कार के हज़ारों पीड़ितों का इलाज किया है। साल 2015 में उनके जीवन पर आधारित फिल्म ‘दी मैन हू मेंड्स विमन’ आई थी। मुकवेगे ने फ्रांसीसी में अपनी आत्मकथा ‘प्ली फॉर लाइफ’ भी लिखी है जिसमें उन्होंने ऐसे तमाम हादसों का ज़िक्र किया है, जिन्होंने उन्हें कांगो में पांजी अस्पताल खोलने को मजबूर किया। अस्पताल में वे संयुक्त राष्ट्र शांति सैनिकों की हिफाज़त का काम करते हैं। डॉ. मुकवेगे युद्ध के दौरान महिलाओं के दुरुपयोग के एक मुखर आलोचक हैं। उन्होंने अपने भाषणों में कई बार बलात्कार को सामूहिक विनाश का हथियार बताया है। मुकवेगे ने अपना नोबेल शांति पुरस्कार दुष्कर्म और यौन हिंसा से प्रभावित सभी महिलाओं को समर्पित किया है।

शांति का नोबेल पुरस्कार किसी ऐसे शख्स या संस्था को दिया जाता है, जो दो देशों के बीच भाईचारे को बढ़ावा देते हैं या फिर समाज के लिए अच्छा काम करते हैं, जिससे लोगों को नई जिंदगी-नई राह मिलती है। नादिया मुराद और डॉ. डेनिस मुकवेगे के नाम सुनकर पहली बार ज़रूर सबको हैरानी हुई, लेकिन बाद में जब इनके काम सामने आए, तो सभी ने इनकी जी भरकर तारीफ की। पूरी दुनिया में घरों से लेकर कार्यस्थलों तक और जंग के मैदान एवं गृहयुद्ध की मार झेल रहे देशों में यौन उत्पीड़न को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। इससे न सिर्फ महिलाएँ प्रभावित हैं, बल्कि मासूम बच्चियों को भी यौन हिंसा का सामना करना पड़ रहा है। यहां तक कि कई युद्धग्रस्त देशों में काम कर रहे संयुक्त राष्ट्र शांति सैनिकों पर भी महिलाओं के यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोप लगे हैं।
एक तरफ हम महिलाओं के लिए लैंगिक समानता और बराबरी की बात करते हैं, तो दूसरी ओर लगातर उनका यौन उत्पीड़न और उनके साथ यौन हिंसा हो रही है। तमाम बड़े-बड़े दावों और कानूनों के बाद भी उनके खिलाफ यौन उत्पीड़न, यौन हिंसा में कोई कमी नहीं आई है। विकसित देश हों या विकासशील देश, दुनिया के सभी देशों में महिलाओं की स्थिति कमोबेश एक जैसी है। उन्हें अपनी ज़िंदगी में कभी न कभी यौन उत्पीड़न या यौन हिंसा का सामना करना पड़ता है। यह वाकई चिंता का विषय है कि दुनिया की आधी आबादी के प्रति हमारा नज़रिया आज भी नहीं बदला है। हम आज भी उन्हें यौन गुड़िया से ज़्यादा नहीं समझते। यह सोचे बिना उनके साथ शारीरिक या मानसिक यौन हिंसा करते हैं कि इससे उनकी भावी ज़िंदगी पर क्या असर पड़ेगा। कहीं इससे उनकी कार्यक्षमता पर तो गलत प्रभाव नहीं पड़ेगा? महिलाओं को यौन उत्पीडन से मुक्ति दिलाकर ही एक समृद्ध एवं सुन्दर दुनिया बनाई जा सकती है। दोनों पुरस्कार विजेता इसी दिशा में काम कर रहे हैं और हमें उनका खुलकर और सक्रिय समर्थन करना चाहिए।(स्रोत फीचर्स)

0 Comments:

लेखकों से... उदंती.com एक सामाजिक- सांस्कृतिक वेब पत्रिका है। पत्रिका में सम- सामयिक लेखों के साथ पर्यावरण, पर्यटन, लोक संस्कृति, ऐतिहासिक- सांस्कृतिक धरोहर से जुड़े लेखों और साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे कहानी, व्यंग्य, लघुकथाएँ, कविता, गीत, ग़ज़ल, यात्रा, संस्मरण आदि का भी समावेश किया गया है। आपकी मौलिक, अप्रकाशित रचनाओं का स्वागत है। रचनाएँ कृपया Email-udanti.com@gmail.com पर प्रेषित करें।
माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास माटी समाज सेवी संस्था, समाज के विभिन्न जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती है। पिछले वर्षों में संस्था ने समाज से जुड़े विभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण, प्रदूषण आदि क्षेत्रों में काम करते हुए जागरुकता लाने का प्रयास किया है। माटी संस्था कई वर्षों से बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में “साथी समाज सेवी संस्था” द्वारा संचालित स्कूल “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपए तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक लोग पिछले कई सालों से उक्त गुरूकुल के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। अनुदान देने वालों में शामिल हैं- अनुदान देने वालों में शामिल हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (U.K.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर, रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी, रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से स्कूल जाने में असमर्थ बच्चे शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होंगे ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेंगे। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ.ग.) मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

उदंती.com तकनीकि सहयोग - संजीव तिवारी

टैम्‍पलैट - आशीष