April 15, 2018

तीन लोकगीत

1. पढ़ाऊँ कैसे छोरा कूँ  -रामचरन गुप्त 
ऐरे चवन्नी भी जब नाय अपने पास, पढ़ाऊँ कैसे छोरा कूँ?

किससे किस्से कहूँ कहौ मैं अपनी किस्मत फूटी के
गाजर खाय-खाय दिन काटे भये न दर्शन रोटी के
एरे बिना किताबन के कैसे हो छटवीं पास, पढ़ाऊँ कैसे छोरा कूँ?

पढ़ि-लिखि के बेटा बन जावै बाबू बहुरें दिन काले
लोहौ कबहू पीटवौ छूटै, मिटैं हथेली के छाले
एरे काऊ तरियाँ ते बुझे जिय मन की प्यास, पढ़ाऊँ कैसे छोरा कूँ?

रामचरन करि खेत-मजूरी ताले कूटत दिन बीते
घोर गरीबी और अभावों में अपने पल-छिन बीते
एरे जा महँगाई ने अधरन को लूटौ हास, पढ़ाऊँ कैसे छोरा कूँ?
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2. नये दौर की रेल
एरे आई-आई है जिय नये दौर की रेल,
मुसाफिर जामें बैठि चलौ।

जा में डिब्बे लगे भये हैं भारत की आजादी के
भगतसिंह की कछू क्रान्ति के कछू बापू की खादी के
एरे जाकी पटरी हैं ज्यों नेहरू और पटेल,
 मुसाफिर जामें बैठि चलौ।।

जा की सीटी लगती जैसे इन्कलाब के नारे हों
जा की छुक-छुक जैसे धड़के फिर से हृदय हमारे हों
एरे जा के ऊपर तू सब श्रद्धा-सुमन उड़ेल,
मुसाफिर जामें बैठि चलौ।।

जाकौ गार्ड वही बनि पावै जाने कोड़े खाये हों
ऐसौ क्रान्तिवीर हो जाते सब गोरे थर्राये हों
एरे जाने काटी हो अंगरेजन की हर जेल,
मुसाफिर जामें बैठि चलौ।।

जामें खेल न खेलै कोई भइया रिश्वतखोरी के
बिना टिकट के, लूट-अपहरण या ठगई के-चोरी के
एरे रामचरन! छलिया के डाली जाय नकेल,
मुसाफिर जामें बैठि चलौ।।
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3. जनियो मत ऐसौ लाला
जननी जनियो तो जनियो ऐसी पूत,
ए दानी हो या हो सूरमा।

पूत पातकी पतित पाप पै पाप प्रसारै
कुल की कोमल बेलि काटि पल-भर में डारै
कुल करै कलंकित काला
जनियो मत ऐसौ लाला।
जननी जनियो तो जनियो ऐसी पूत,
ए दानी हो या हो सूरमा।।

सुत हो संयमशील साहसी
अति विद्वान विवेकशील सत सरल सज्ञानी
रामचरन हो दिव्यदर्श दुखहंता ज्ञानी
रहै सत्य के साथ, करै रवि तुल्य उजाला
जनियो तू ऐसौ लाला।।
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सम्पर्क: रमेशराज, 15/109 , ईसानगर, अलीगढ़- 202001, मोबा. 9634551630

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