December 18, 2017

व्यंग्य

बटन दबा सिटी बजा 
-डॉ. सुरेन्द्र वर्मा
साहित्यकार तो थे ही, वे भाषण-वीर भी थे। पदानुसार भी वे व्याख्याता ही थे। कम्प्यूटर और इंटरनेट विषय पर उनका व्याख्यान चल रहा था। बोले, आज कम्प्यूटर ने आम आदमी को भी साहित्यकार बना दिया है। जिसे देखो कविता करने लगा है, किसी भी बात पर अपना विरोध दर्ज करने के लिए अपनी सटीक टिप्पणियाँ वाट्सएप और फेसबुक पर डालने लगा है। अभी तक सामान्य जन केवल मौखिक रूप से स्थितियों और लोगों पर तंज कसते थे, अब ब्लॉगपर व्यंग्य लिखने लगे हैं। ये एक बड़ी भारी साहित्यिक क्रान्ति हुई है। एक मनचला विद्यार्थी हाथ उठाकर खड़ा हो गया। कहने लगा सच तो यह है सर, आज कम्प्यूटर की दुनिया लम्बा चौड़ा भाषण देने और बड़े बड़े निबंध लिखने के लिए भी हतोत्साहित करती है।
अपनी बात थोड़े में और सटीक कहिए और चलते बनिए। बात अच्छी लगे तो लाइकका बटन दबाइए और आगे बढ़ जाइए। न अच्छी लगे तो चुप रहिए। मन करे तो अपनी व्यंग्य की भड़ास निकालने के लिए उस पर भी लाइक’  का ही बटन दबा दीजिए। कौन देखता है !
इसमे संदेह नहीं, बड़ी विचित्र है कम्प्यूटर की दुनिया। इसमें कुछ भी आभासित हो सकता है। पूरी दुनिया ही आभासी है। सच झूठ लगता है और झूठ सच लग सकता है। फेसबुक पर डाली गई अपनी नागवार सेल्फी पर आपको ढेरों लाइकमिल सकते हैं और आपकी ललित कविता के लालित्य पर अँगूठा दिखाया जा सकता है। कितना ही नियम-विरुद्ध लिख दें, कोई विह्सिल बजाने वाला नहीं है,
मानो सबने सकारात्मक सोचकी कसम खा रखी है। लेकिन कुछ नकचढ़े, जिनके खून में ही तिनिया निकालना होता है, ‘लाइककी इस आभासी व्यवस्था से काफी नाराज़ और दुखी हैं। अरे, हमारी नापसंदगी के लिए भी तो कोई न कोई बटन होना चाहिए। यह क्या, पसंद है तो भी लाइक, नापसंद है तो भी लाइक। बटन दबाना है तो बस लाइक पर ही दबा सकते हैं। और कोई विकल्प है ही नहीं। अब तो इलेक्शन में भी नाटोबटन स्वीकार कर लिया गया है। कम्प्यूटर में भी कुछ इसी प्रकार का नकारात्मक बटन ज़रूरी है। स्वनामधन्य प्रूफ-रीडर- नुमा आलोचक आखिर कहाँ जाएँ! बिना उनके यह दुनिया कितनी सुनी सूनी और सपाट हो जाएगी। ज़रा इस पर भी तो गौर कीजिए। जहाँ देखो स्माइली, हर तरफ लाइक- ये भी भला कोई बात हुई! प्रजातंत्र के लिए विरोध ज़रूरी है। भारत में तो विरोध का नाम ही प्रजातंत्र है। और इंटरनेट पर विरोध के लिए कोई प्रतीकात्मक स्थान तक नहीं! बड़ी ज्यादती है!
गूगल अब थोड़ा थोड़ा मन बना रहा है। सोचा जा रहा है कि लाइक के साथ साथ अब डिसलाइकका विकल्प भी दिया जाए। नकचढ़ों की नकारात्मकता की खुजली का भी कुछ न कुछ इलाज किया जाए। डिसलाइक के बटन की संभावना ने ही पैदाइशी आलोचकों के पेट में गुदगुदी मचाना शुरू कर दी है। गूगल को वे एडवांस में धन्यवाद दे रहे हैं। कितना खुशगवार होगा वह दिन जब डिसलाइकका विकल्प हाथ लग जाएगा। फेसबुक और वाट्सएप पर खुशी की लहर दौड़ गयी है। सुन्दर से सुन्दर सेल्फी पर डिसलाइकबटन न दबाया तो कहना!
कहा गया है कि लाइकका एक विकल्प सीटी बजाना (विह्सिल) भी हो सकता है। मुझे लगता है, यह ज्यादह अच्छा रहेगा क्योंकि सीटी बजने वाले बटन में हमेशा थोड़ी अस्पष्टता की गुंजाइश रहेगी। अपनी रोजमर्रा की ज़िन्दगी में सुन्दर लड़की को देखकर लड़के सीटी मारते हैं वहीं खेल (जैसे फुटबाल) में नियम विरुद्ध खेल होने पर भी सीटी बजा दी जाती है। विह्सिल का विकल्प हमेशा भ्रम में रखेगा कि यह खुशी का इज़हार है या फिर यह फाउल के लिए है। और इसी में सीटी बजाने वाले की सफलता का राज़ है। वैसे यह बात तय है कि सीटी हो या नापसंदगी, विह्सिल हो या डिसलाइक, दोनों ही असहमति के हथियार की तरह ही आभासी दुनिया मे प्रयोग होंगे। लाइक का एकछत्र राज ख़त्म हो जाएगा।

   लेखक परिचय: डॉ. सुरेन्द्र वर्मा का जन्म 26 सितम्बर 1932 को मैंनपुरी, उ.प्र.में। इलाहाबाद विश्वविद्यालय, से दर्शनशास्त्र में  एम.ए.। विक्रम वि.वि. उज्जैन से गांधी दर्शन पर पीएच. डी.। इंदौर में शासकीय कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय में दर्शन शास्त्र के प्रोफ़ेसर एवं विभागाध्यक्ष; मप्र के शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय के प्राचार्य पद से 1992 में सेवानिवृत्त। व्यंग्य संकलन- लोटा और लिफाफा, कुरसियाँ हिल रही हैं, हंसो लेकिन अपने पर, अपने अपने अधबीच, राम भरोसे, हँसी की तलाश में, ब बँधे एक डोरी से। साहित्य कला और संस्कृति-  साहित्य समाज और रचना (उ.प्र. हिन्दी संस्थान द्वारा निबंध के लिए महावीर प्रसाद द्विवेदी पुरस्कार), कला विमर्श और चित्रांकन, संस्कृति का अपहरण, भारतीय कला एवं सस्कृति के प्रतीक, कला संस्कृति और मूल्य, चित्रकार प्रो.रामचन्द्र शुक्ल पर मोनोग्राफ, सरोकार (निबंध संग्रह) कविता- अमृत कण (उपनिषदादि का काव्यानुवाद), कविता के पार कविता, अस्वीकृत सूर्य, राग खटराग (हास्य-व्यंग्य 'तिपाइयाँ), धूप कुंदन (हाइकु संग्रह), उसके लिए (कविता संग्रह), दर्शनशास्त्र और मनोविज्ञान पर 10 और ग्रन्थ। सम्प्रति- स्वतन्त्र लेखन तथा गाँधी दर्शन के विशेषज्ञ के रूप में इलाहाबाद विश्वविद्यालय तथा राजर्षि ओपन वि.वि., इलाहाबाद से सम्बद्ध। 
सम्पर्क: 10, एचआईजी/1, सर्कुलर रोड इलाहाबाद- 211001, मो. 9621222778, 

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