April 20, 2017

लघुकथा

 ज़िद
- रामकुमार आत्रेय
चिड़िया  पिछले दो दिनों से शीतल को परेशान किए जा रही थी। वह घास का एक-एक तिनका चोंच में लातीं और उसे छत पर लटकते पंखे पर जमा कर घोंसला बनाने लगी। इस प्रयास में कुछ तिनके फर्श पर गिर जाते जो बुरे लगते। शीतल को उन्हें बार-बार बुहारना पड़ता। चिड़िया  को भी बार-बार उड़ाना पड़ता सो अलग। वैसे भी वह नहीं चाहती थी कि चिड़िया पंखे पर घोंसला बनाए। कमरे में पोंछा लगाने के बाद ठंडे मौसम में भी पंखा चलाना पड़ता था, ताकि फर्श जल्दी से सूख जाए। पंखा चलाने पर चिड़िया  और उसके अण्डों का फर्श पर गिरना लाजमी था। चिड़िया  थी कि मान ही नही रही थी।
आज दोपहर बाद जब पति-पत्नी लौटे तो यह देखकर हैरान रह गए कि घोंसला पूरा बन चुका है।
चिड़िया  घोंसले में बैठ अपने में डूबी आराम किए जा रही थी, मानो माँ बनने वाली हो। सुहावना सपना देख रह हो। शीतल के पति ने कमरे के बाहर पड़ी छड़ी उठाई और उसकी सहायता से चिड़िया  को भगाने लगे। एक बार तो छड़ी से डराने पर भी चिड़िया  घोंसले से नहीं उड़ी। चुपचाप दूर खड़ी शीतल और छड़ी थामे उसके पति को देखती रही। दूसरी बार जब पति ने जोर से चीखते हुए छड़ी घोंसले की ओर बढ़ाई, तब चिड़िया  सहमी-सी उड़ी और रोशनदान में बैठकर निरीह नजरों से अपने घोंसले को देखने लगी।
इससे पहले कि पति छड़ी से घोंसले को नीचे गिरा देता, शीतल ने उसे टोका 'प्लीज, घोंसला मत गिराओ।
'घोंसला नहीं गिराऊँगा, तो पंखा कैसे चलेगा। तब चिड़िया पंखे के परों से चोट खाकर भी मर सकती है। यह बहुत ज़िद्दी है, घोंसला गिराए बिना नहीं मानेगी।
पति ने अपना हाथ रोक दिया।
शीतल ने कहा, चिड़िया  जिद्दी अवश्य है, लेकिन इसकी ज़िद एक भले काम के लिए है। घर बनाना एक भला काम ही तो है। भले काम के लिए की गई ज़िद्द का हमें सम्मान करना चाहिए। जब तक चिड़िया  के बच्चे बड़े नही होंगे, पंखा नहीं चलाएँगे।शीतल ने पति को प्यार से समझाया।
पति का ऊपर को उठा हाथ, यह सब सुन कर स्वत: ही नीचे को हो गया।
सम्पर्क: 864 /12, आजाद नगर, कुरुक्षेत्र- 136119 हरियाणा, मो. 094162 72588

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लेखकों से अनुरोध...

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माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास
एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें...
माटी समाज सेवी संस्था, समाज के विभिन्न जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। पिछले वर्षों में संस्था ने समाज से जुड़े विभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण, प्रदूषण आदि क्षेत्रों में काम करते हुए जागरुकता लाने का प्रयास किया है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है।
बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से कारीगर आदिवासियों के बीच काम रही “साथी समाज सेवी संस्था” द्वारा संचालित स्कूल “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपए तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक लोग पिछले कई सालों से माटी संस्था के माध्यम से “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। पिछले कई वर्षों से माटी समाज सेवी संस्था उक्त स्कूल के लगभग 15 से 20 बच्चों के लिए शिक्षा शुल्क एकत्रित कर रही है। अनुदान देने वालों में शामिल हैं- प्रियंका-गगन सयाल, लंदन मैनचेस्टर, डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, तरुण खिचरिया, दुर्ग (पत्नी श्रीमती कुमुदिनी खिचरिया की स्मृति में), श्री राजेश चंद्रवंशी (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, पी. एस. राठौर- अहमदाबाद। इस मुहिम में नए युवा सदस्य जुड़ें हैं- आयुश चंद्रवंशी रायपुर, जिन्होंने अपने पहले वेतन से एक बच्चे की शिक्षा की जिम्मेदारी उठायी है, जो स्वागतेय पहल है। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, पंडरी, रायपुर (छग) 492 004, मोबा.94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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