December 25, 2016

गाँधी विचार

सुनहरे अतीत से सुनहरे भविष्य तक
- अनुपम मिश्र, सर्वोदय प्रेस सर्विस, नवम्बर 2011
गाँधी विचार शाश्वत रूप से प्रवाहमय हैं। उनके अनुरूप आचरण की आवश्यकता आज जितनी है, उतनी इसके पहले कभी नहीं थी। गाँधीजी ने सन् 1920 में गुजरात विद्यापीठ की स्थापना की और जीवनपर्यंत इसके कुलपति बने रहे। इस वर्ष विद्यापीठ का दीक्षांत उद्बोधन गाँधीवादी चिंतक अनुपम मिश्र ने दिया। उनका सम्बोधन हमें अतीत, वर्तमान और भविष्य तीनों कालों के बारे में सोचने को बाध्य करता है। खासकर शिक्षा व सामाजिक नजरिए के परिप्रेक्ष्य से। अनुपम जी जिस सहजता से सामाजिक विरोधाभासों को हमारे सामने रखते हैं वह वास्तव में अभिनव है। प्रस्तुत है उनके दीक्षान्त उद्बोधन का पहला भाग- 

पहले दो शब्द अपने बारे में। फिर दो शब्द आज के इस भव्य और पुनीत समारोह के बारे में और फिर दो शब्द हमारे आस-पास बन गई, खड़ी हो रही एक नई-सी दुनिया के बारे में। इस दुनिया से न तो हम ठीक से जुड़ पा रहे हैं और न इससे पूरी तरह अलग हो पाते हैं। हम त्रिशंकु की तरह अधर में लटके रह जाते हैं। अधर की यह अटकन हमें बहुत सालती है, तंग करती रहती है। इसलिए इसे भी थोड़ा समझने की कोशिश करेंगे।
तो इस तरह दो-दो-और दो-कुल छह शब्द ही तो होंगे। पर होंगे कुछ हजार शब्द! यह कैसा जोड़ है? यह कैसा गणित है? यह गणित थोड़ी-सी नई पढ़ाई पढ़ गए संसार का गणित है और उसे यह गणित खूब भाता है, पसंद आता है। वह अपने छोटे-छोटे प्राय: ओछे-ओछे कामों का बखान खूब जोर शोर से करता है और अपनी छोटी-सी दुनिया के अलावा जो एक बहुत बड़ा संसार है, उसके बड़े-बड़े कामों को एक तो जोड़ता तक नहीं, जोड़े भी तो जोड़ का परिणाम बहुत कम करके आँकता है। यह गणित गाँधीजी को जरा भी पसंद नहीं था।
तो पहले दो शब्द अपने बारे में। वह भी इसलिए नहीं कि मुझे अपना कुछ बखान बढ़ा-चढ़ाकर करना है। एकदम साधारण जीवन। न तो आज की आधुनिक पढ़ाई पढ़ी और न बुनियादी तालीम से कुछ सीखने-समझने का मौका मिला। मामूली-सी उपाधि, डिग्री। वह भी साधारण से नंबरों वाली। इतनी मामूली कि उसे दीक्षांत समारोह में जाकर लेने की भी हिम्मत नहीं हुई। वह उसी विश्वविद्यालय में कहीं सुरक्षित रखी होगी या क्या पता अब तक कूड़े में, पस्ती में, रद्दी में बेच दी होगी।
अब दो शब्द आपके इस पुनीत समारोह के बारे में-
आज का यह उत्सव आपके जीवन का एक नया मोड़ है। दीक्षांत यानी दीक्षा का अंत। लेकिन मेरा विनम्र निवेदन है कि वास्तव में आज से आपकी दीक्षा का प्रारंभ होने जा रहा है ; इसलिए इस दीक्षांत समारोह को अब दीक्षारंभ समारोह मानें। गुजराती में इसका नाम बहुत अच्छा है- पदवीदान। वैसे देखा जाए तो आपको यह पदवी दान में नहीं मिल रही। इसे तो आपने अपने श्रम से, बौद्धिक श्रम से अर्जित किया है। पर मैं पदवीदान का शाब्दिक अर्थ नहीं ले रहा। उसका एक अर्थ यह भी है कि जो पदवी आपने अर्जित की है, अब आज यहाँ से बाहर निकलने पर उस पदवी का आप समाज में दान करें। यानी जो ज्ञान आपने अर्जित किया है, अब उसे आप समाज में उनके बीच बाँटने निकलें, जो कई कारणों से ऐसा ज्ञान अर्जित नहीं कर सकते थे। यह ज्ञान आपके लिए ऐसा रामरतन बन जाना चाहिए कि जिसका जितना उपयोग आप करेंगे, वह उतना ही बढ़ता जाए, कभी कहीं भी कम न हो।
विद्यापीठ की स्थापना के समय सन् 1920 में गाँधीजी ने यहीं पर जो पहला भाषण दिया था, उसमें उन्होंने कहा था कि इसकी स्थापना हेतु केवल विद्यादान नहीं है, विद्या देना नहीं है। विद्यार्थी के लिए गुजारे का साधन जुटाना भी एक उद्देश्य है। इस वाक्य को पूरा करते ही उन्होंने आगे के वाक्य में कहा था कि इसके लिए मैं जब इस विद्यापीठ की तुलना दूसरी शिक्षण संस्थाओं से करता हूँ तो मैं चकरा जाता हूँ। उन्होंने इस विद्यापीठ की तुलना उस समय के बड़े माने गए, बड़े बताए गए दूसरे विद्यालयों से करते हुए एक भिन्न अर्थ में इसे अणुविद्यालय, एक लघु यानी छोटा-सा विद्यालय कहा था। यहाँ के मुकाबले दूसरी संस्थाओं में ईंट-पत्थर, चूना कहीं ज्यादा लगा था- ऐसा भी तब गाँधीजी ने कहा था। लेकिन इस मौके पर हम यह दुहरा लें कि अणु दिखता छोटा-सा ही है पर उसके भीतर ताकत तो अपार होती है।
लेकिन अभी उस अणु की शक्ति और ईंट-पत्थर, चूने की बात यहीं छोड़ें। वापस लौटें गुजारे के साधन पर। तब गाँधीजी चकरा गए थे। आज होते तो वे न जाने कितना ज्यादा चकरा जाते। आज तो इसी शहर में ऐसी अनेक शिक्षण संस्थाएँ हैं, जिनमें पदवीदान से पहले ही, उपाधि हाथ में आने से पहले ही 2-5 लाख रुपए की पगार हर महीने मिल सके- ऐसी नौकरी उन छात्रों की गोद में डाल दी जाती है।
ऐसी वैभवशाली नौकरियों की तरफ लालच- भरी निगाह से देखेंगे, और पता चलेगा कि वैसी पगार तो हमें मिलने नहीं वाली ,तो हमें निराशा हो सकती है। एक आशंका यह भी है कि ये अंगूर हमें 'खट्टेलगें। पर एक तीसरा रास्ता है। वैसी नौकरियों और उससे जुड़े एक छोटे से संसार का पूरे विवेक के साथ विश्लेषण करें, अच्छी तरह से उसकी पड़ताल करें , तो हममें सबको न सही, कुछ को तो यह लगेगा ही कि यह सुनहरा-सा दिखने वाला रास्ता जरूरी नहीं कि हमें खूब सुख और खूब संतोष की तरफ ले जाए।
यह रास्ता पश्चिम के देशों, अमीर मान लिये गए जिन देशों के जिस मिट्टी, पत्थर और डामर से बना है, उसकी मजबूती की कोई पक्की गारंटी नहीं है। पिछले दो-पाँच वर्षों में आप सबने देखा ही है कि समृद्धि की सबसे आकर्षक चमक दिखाने वाले अमेरिका जैसे देश भी भयानक मंदी के शिकार हुए हैं और वहाँ भी इस अर्थव्यवस्था ने गजब की तबाही मचाई है। अमेरिका के बाद ग्रीस, स्पेन भी भयानक मंदी में डूबे हैं। उधारी की अर्थव्यवस्था में डूबे इन सभी देशों को तारने के लिए किफायत की लाइफ़ जैकट नहीं फेंकी गई है। उन्हें तो विश्वबैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसे बड़े महाजनों ने और उधार देकर बचाना चाहा है।
हम सब प्राय: यहाँ साधारण घरों से ही आते हैं। हमारे माँ-पिता ने बड़ी मुश्किल से कुछ पैसे बचाए होंगे, ताकि हम पढ़-लिखकर कुछ बन जाएं और उनके कंधों पर जो घर का बड़ा भार टिका है, उसे थोड़ा ही सही, हल्का करें। इसलिए यहाँ से निकल कर कोई ठीक नौकरी मिले तो अच्छा ही होगा। पर मैं आप सबसे एक छोटा-सा निवेदन करूँगा, इस विषय में।
हिंदी में और गुजराती में भी दो शब्द हैं- एक नौकरी दूसरा शब्द है चाकरी। नौकरी कीजिए आप जीविका के लिए ,पर जो भी काम करें उसमें अपना मन ऐसा उंडेल दें कि वह काम आपका खुद का काम बन जाए- किसी दूसरे के लिए किया जाने वाला काम नहीं बने। नौकरी में चाकरी का भाव जितना सध सकेगा आपसे, उतना आनंद आने लगेगा और तब आप उसे केवल पैसे के तराजू पर तोलने के बदले संतोष के तराजू पर तोलने लगेंगे- यह साधना थोड़ी-सी आगे बढ़ी नहीं कि फिर आपको इस तराजू की भी जरूरत नहीं रह जाएगी। आप तोलने वाले सारे बाँ भी फेंक देंगे।
विद्यापीठ बनी सन् 1920 में। इस तरह यह आज हमें काफी पुरानी लगेगी। पर देश में दो और पुरानी विद्यापीठों का मैं कुछ उल्लेख आपके सामने करना चाहूँगा। उनकी उमर देखेंगे तो यह विद्यापीठ एकदम ताजी, आज की लगेगी।
हमारे सुनहरे बताए गए इतिहास में एक विद्यापीठ थी नालंदा और दूसरी थी तक्षशिला। संस्कृत के विद्वान इनके नामों का जो भी अर्थ निकालें, वे जानें। पर इन विद्यापीठों के आसपास रहने वालों ने इनके नामों को अपने हिसाब से सरल कर देखा था- ना-अलम-दा- यानी कम मत देना। ज्ञान कम मत देना। हम तुम्हारी इस विद्यापीठ नालंदा में आए हैं तो हमें खूब ज्यादा से ज्यादा ज्ञान देना।
दूसरी विद्यापीठ का अर्थ है तक्ष यानी तराशना, शिला यानी पत्थर, या चट्टान। अनगढ़ पत्थर में से यानी साधारण से दिखने वाले पत्थर में थे, शिक्षक, अध्यापक अपने सधे हाथों से, औजारों से एक सुंदर मूर्ति तराश कर निकालें। मामूली से छात्र को एक उपयोगी, संवेदनशील नागरिक के रूप में तराश कर उसके परिवार और समाज को वापस करें।
समाज अपनी धुरी पर कायम है
गाँधी विचार पर शोध में ऊर्जा की कमी वास्तव में विचलित करने वाला तथ्य है। अपने आस-पास फैली अनेक बुराइयों के बावजूद अंतत: यह विश्वास हमें ढाँढस बँधाता है कि बहुसंख्य समाज आज भी बेहतर मानवीय संकल्पनाओं से ओतप्रोत है। प्रस्तुत आलेख अनुपम मिश्र द्वारा दिए गए दीक्षान्त भाषण का दूसरा एवं अंतिम भाग है।
नालंदा और तक्षशिला इन दो नामों के साथ छात्र शब्द की भी एक व्याख्या देंखे- जो गुरु के दोषों को एक छत्र की तरह ढंक दे- वह है छात्र। तो इन नामों का यह सुंदर खेल कुछ हजार बरस पहले चला था और हमें आज भी कुछ प्रेरणा दे सकता है। पर हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि नालंदा और तक्षशिला जैसी इतनी बड़ी-बड़ी विद्यापीठ आज खंडहर बन गई हैं और बहुत हुआ तो पर्यटकों के काम आती हैं। संस्थाएँ, खासकर शिक्षण संस्थाएँ केवल ईंट-पत्थर, गारे, चूने से नहीं बनतीं। वे गुरु और छात्रों के सबसे अच्छे संयोग से बनती हैं, उसी से बढ़ती हैं और उसी से टिकती भी हैं। यह बारीक संयोग जब तक वहाँ बना रहा, ये प्रसिद्ध शिक्षण संस्थान भी चलते रहे। आप सब जानते ही हैं कि इनमें से कैसे-कैसे बड़े नाम उस काल में निकले। कैसे-कैसे बड़े-बड़े प्राध्यापक वहा पढ़ाते थे, चाणक्य जैसी विभूतियाँ वहाँ थीं, जिनका लिखा लोग इतने सैकड़ों बरस पहले भी पढ़ते थे और उनके लिखे वे सारे अक्षर आज भी क्षर नहीं हुए हैं, आज भी मिटे नहीं हैं। लोग उन्हें आज भी पढ़ते हैं।
आप बहुत भाग्यशाली हैं कि आपको एक ऐसी विद्यापीठ में प्रवेश का संयोग मिला जिसे खुद गाँधी जी ने बनाया था। जो खुद सन् 1920 से अपनी आखिरी साँस तक इसके कुलपति रहे और उस बेहद कठिन दौर में देश की आजादी से लेकर बीमार की सेवा तक के हजारों कामों को करते हुए भी इस विद्यापीठ का पूरा ध्यान रखा। उन्हें इसके भविष्य के बारे में बहुत आशा थी। उन्होंने इसी आँगन में एक बार कहा था कि मैं खुद तो बूढ़ा हूँ, पका हुआ पत्ता हूँ। दूसरे कामों में फँसा हुआ हूं। मेरे जैसा पका हुआ पत्ता अगर झड़ जाए तो उससे (इस) पेड़ को कोई आँच नहीं आएगी। आचार्य और अध्यापक भी इस पेड़ के पत्ते ही हैं, हालाँकि वे अभी कोमल, मुलायम हैं। कुछ समय बाद वे भी पके पत्ते बनकर शायद झड़ जाएंगे। लेकिन विद्यार्थी इस सुंदर पेड़ की डालियाँ हैं और इन डालियों से भविष्य में आचार्य और अध्यापकों के रूप में पत्ते फूटने वाले हैं।
मैं आप सबके बीच एक तरह से पहली बार ही आया हूँ ;इसलिए यहाँ कि शोध की व्यवस्था के बारे में ठीक-ठीक जानकारी नहीं है मुझे। लेकिन यह निवेदन करना चाहता हूँ कि शोध में यदि श्रद्धा का भाव नहीं जुड़ेगा तो वह कितना ही अच्छा हो, हमें एक डिग्री जरूर देगा पर हमारे समाज को उससे कुछ ज्यादा नहीं मिलेगा। हर वर्ष यहाँ से होने वाले शोध अध्ययनों में से एक दो इस दर्जे के होने ही चाहिए कि वे पूरे देश में अपना झंडा फहरा दें। आखिर आप किसी मामूली विद्यापीठ से नहीं हैं। इसके पीछे गाँधी का झंडा है, जिसने उस अंग्रेजी साम्राज्य का झंडा झुकवा दिया था, जहाँ कभी सूर्यास्त ही नहीं होता था।
मुझे यह बताते हुए अटपटा ही लग रहा है, अच्छा नहीं लग रहा पर पूरे देश में गाँधी विचार की शोध में कोई चमक, उत्साह, आनन्द नहीं दिखता। गांधी अध्ययन केंद्रों की संख्या खूब है और वहाँ से शोध कर उपाधि पाए शोधार्थियों की संख्या भी खूब है- इन आँकड़ों पर हमें गर्व भी हो सकता है पर क्या हम सचमुच कह सकते हैं कि ये शोध, ये शोधार्थी समाज के कुछ काम आ सकेंगे? गुजराती में एक शब्द है- बेदिया ढोर। हम ऐसे ढोर न बने, ऐसे गधे न बनें, जिसकी पीठ पर कुछ वेद रखे हैं। गाँधी का वेद बहुत वजनी है। उसे निरर्थक नहीं ढोना है। तो गाँधी विचार की शोध तो ऐसी हो जो हमें भी तारे और हमारे समाज को भी तारे। हम दोनों को वह इस प्रलय में से बचाकर ले जाए।
आज हमारे अखबार, टेलीविजन के सात दिन-चौबीस घंटे चलने वाले एक-दो नहीं सौ चैनल अमंगलकारी समाचारों से भरे पड़े हैं। तो क्या हम सचमुच ऐसे अनिष्टकारी युग से गुजर रहे हैं? मुझे तो ऐसा नहीं लगता। गांधीजी ने हिन्दस्वराज में जैसा कहा था यह ठीक वैसा ही है- यह तो किनारे की मैल है। बीच बड़ी धारा तो साफ है। समाज के उस बड़े हिस्से के बारे में गाँधीजी ने सौ बरस पहले बड़े विश्वास से कहा था कि उस पर न तो अंग्रेज राज करते हैं और न आप राज कर सकेंगे। हाँ आज वह लगातार उपेक्षित रखे जाने पर शायद थोड़ा टूट गया है, पर अभी भी अपनी धुरी पर कायम है। तो अपनी धुरी से न हटे समाज पर हमारा शोध कितना है? यह हमारी कसौटी बननी चाहिए।
थोड़े पहले विद्यापीठ के वर्णन के उस रूपक में जड़ों का उल्लेख छूट-सा गया था। जड़ों की मजबूती से ही पूरे पेड़ की मजबूती होती है। अब विद्यापीठ की जड़ें कहाँ होंगी? कौन-सी होंगी? उत्तर हमें गांधीजी से ही मिल सकता है। इसी विद्यापीठ में बोलते हुए उन्होंने कहा था कि हिन्दुस्तान का हरेक घर विद्यापीठ है, माता-पिता आचार्य हैं। यह बात अलग है कि घर ने, माता-पिता ने आज वह अपनी विशिष्ट भूमिका खो दी है। लेकिन यहाँ से बाहर निकल जब आप अब अपने नया घर बनाएँ तो उसमें इस विचार की, विद्यापीठ के विचार की जड़ें जरूर पनपने दें। अंग्रेजी भाषा का एक शब्द मुझे बहुत छूता है, बहुत ही आकर्षक लगता है- वह शब्द है पिगमेलियन। यह एक बड़ा विचित्र अर्थ लिये हुए है। हम जो हैं नहीं, पर कोई प्यार से कह दे कि तुम तो ये हो तो हमारा मन हमें वैसा ही बना देना चाहता है। इस शब्द को शीर्षक बनाकर अंग्रेजी के एक बहुत ही बड़े लेखक बर्नाड शॉ ने एक बहुत ही सुंदर नाटक लिखा था और फिर बाद में हालीवुड ने इसी नाटक को आधार बनाकर एक बहुत ही सुंदर फिल्म भी बनाई थी। फिल्म का नाम था माई फेयर लेडी
विनोबा ने भी कहा है हमें सभी बताते हैं कि हम दूसरों के पहाड़ जैसे दोषों को तिल की तरह छोटा बना कर देखें और अपने तिल जैसे दोषों को पहाड़ जितना बड़ा करके देखें। पर विनोबा ने कहा यह सब तो बहुत हो गया। अब दूसरों के भी गुण देखो और दूसरों से भी आगे बढ़ अपने भी गुण देखो- इसे उन्होंने गुणदर्शन नाम दिया है। हम अपने साथियों में गुण देखें, अपने में भी गुण देखें। जो गुण नहीं भी होंगे, उन्हें भी देखेंतो वे हममें धीरे-धीरे आने भी लगेंगे।
जब यह विद्यापीठ बनी थी, तब हम गुलाम थे। इसलिए इसके कुलपति के नाते गाँधीजी जो भी भाषण यहाँ देते थे, उसमें प्राय: सरकार से असहयोग की बात भी करते ही थे। आज हम आजाद हैं पर यह आजादी बड़ी विचित्र है। हम, हमारा समाज इस आजादी को ठीक से समझ ही नहीं पा रहा है। इसलिए आज जो ज्ञान हमने यहाँ अर्जित किया है, उसे यहाँ से बाहर निकल समाज में बाँटने के काम में हम लग सकें तो अच्छा होगा। आज समाज से सहयोग का रास्ता आप बनाएँ। नौकरी जरूर करें पर चाकरी इस समाज की करें।
तब समाज के हर अंग में आपको तिल-तिल गाँधी दिखने लगेंगे। उन तिलों को एकत्र करते जाएँ। पौराणिक किस्सा बताता है कि ब्रह्माजी ने सृष्टि की उत्तमोत्तम चीजों से तिल-तिल जमाकर तिलोत्तमा नामक एक पात्र की रचना की थी। उसी तरह आप समाज में से उत्तम, उत्तम तिल एकत्र कर तिलोत्तम बनें- ऐसी हम सबकी शुभकानाएँ हैं।
अंत में मैं एक बार फिर विनोबा के एक सुंदर कथन से आज के इस पावन प्रसंग को समेटना चाहूँगा। विनोबा कहते हैं कि पानी तो निकलता है, बहता है समुद्र में मिलने के लिए। पर रास्ते में एक छोटा-सा गड्ढ़ा आ जाए, मिल जाए तो वह पहले उसे भरता है। उसे भर कर आगे बढ़ सके तो ठीक नहीं तो वह उतने से ही संतोष पा लेता है। वह किसी से ऐसी शिकायत नहीं करता, कभी ऐसा नहीं सोचता कि अरे मुझे तो समुद्र तक जाने का एक महान उद्देश्य, एक महान लक्ष्य, एक महान सपना पूरा करना था। और वह महान लक्ष्य तो पूरा हो ही नहीं पाया!
तो हम बहना शुरू करें। जीवन की इस यात्रा में छोटे-छोटे गड्ढ़े आएँगे, खूब प्यार के साथ उन्हें भरते चलें। उसी को यहाँ के अच्छे शिक्षण का एक उम्दा परिणाम मानें। इतनी विनम्रता हमें विद्यापीठ से मिली शिक्षा सिखा सके, तो शायद हम समुद्र तक जाने की शक्ति भी बटोर लेंगे।

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