August 12, 2016

वर दे!

वर दे!
- सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला


वर दे!
वीणावादिनि वरदे!
प्रिय स्वतंत्र-रव अमृत-मंत्र नव
भारत में भर दे!

काट अंध उर के बंधन स्तर
बहा जननि ज्योतिर्मय निर्झर
कलुष-भेद - तम हर प्रकाश भर
जगमग जग कर दे!

नव गति, नव लय, ताल, छंद नव,
नवल कंठ, नव जलद - मंद्र रव,
नव नभ के नव विहग-वृन्द को
नव पर नव स्वर दे!

Labels: ,

1 Comments:

At 28 September , Blogger Unknown said...

जय माँ सरस्वती

 

Post a Comment

Subscribe to Post Comments [Atom]

<< Home