March 10, 2013

तीन लघुकथाएँ




1.जीवन-बाती
 - सुधा भार्गव
 इतनी झुकी-झुकी क्यों लग रही है। तेरी सारी अकड़ कहाँ गई?
माँ-बाप के आँगन में छूट गई।
तूने लाडो कब से झुकना सीख लिया ।
शादी के बाद से ही। शादी के समय माँ ने कहा था बेटा सबसे झुककर पेश आना। ससुराल में जो भी मिला उसका झुककर अभिवादन किया। पैर छुए तो कमर नीचे तक झुकानी पड़ी।
-यह तो नई बहू को करना पड़ता ही है। इसमें खास बात क्या है।
बाद में पति को झुकाने के लिए कुछ और झुकना पड़ा।
पति-पत्नी में तो नोक-झोंक होती ही रहती है।
बच्चों का मान रखने को कुछ ज्यादा ही झुकना पड़ा। अब तो मन भी झुक गया है और कमर भी।
इतना मत झुक वरना कमर टूट जाएगी।
सहानुभूति के दो शब्दों ने जीवन बाती को प्रज्ज्वलित कर दिया और वह ठंडी शिला होने से बच  गई।
2.डंक
विशाल की नई-नई- शादी हुई थी। उसकी पत्नी जया ने एम.बी.ए किया था। वह समय-समय पर अपने पति को व्यापार में सलाह दिया करती लेकिन कोई विशेष लाभ नहीं हुआ।
एक दिन जया ने कहा- तुम बहुत सीधे हो। ज्यादा मुनाफा कैसे हो! तुम्हें अवसरवादी, सुविधावादी और समझौतावादी होना चाहिए।
दूसरे दिन समाचार पत्र में खबर छपी- अब लड़कियाँ भी  पिता की संपत्ति में हकदार होंगी।
विशाल ने अखबार जया  के हाथ में थमाते हुए कहा- अब तो तुम्हें भी पिता  की जायदाद में हिस्सा मिलेगा। मेरे ससुर जी से कहो- वे अपने जीते जी तुम्हारा हिस्सा दे दें ताकि व्यापार में उसे लगा सकूँ। मैं यह अवसर गँवाना नहीं चाहता।
3. गुबार
मैं कहे देता हूँ ,मेरे मरने के बाद गरुड़ पुराण ,बुढिय़ा पुराण या पंडित पुराण बैठाने की कोई जरूरत नहीं। जीते जी तो  मैं भीड़ में भी रहकर अकेला रहा, मौत के बाद मृत्यु भोज देकर भीड़ क्या जुटाना। यहाँ के नरक से छुटकारा मिलने पर तो खुद - ब- खुद मोक्ष गले आकर लग जाएगा ।
क्या बात करते हो जी। घर में इतने प्यारे-प्यारे पोता-पोती हैं। बहू-बेटे  खिदमत में खड़े रहते हैं। इनको छोड़कर आप जाने  की कल्पना भी कैसे कर लेते हो। बूढ़ी पत्नी ने मीठी आवाज में कहा।
जिन्दगी क्या घर तक ही सीमित है। चिलचिलाती धूप में सड़कों की धूल खाकर घर आओ तो बिजली नहीं! न ठन्डी  हवा न ठंडा  पानी। लेकिन बिजली का बिल नियम का पाबन्द। नहाने को नल खोलो तो पानी नदारद। पानी का बिल भी कभी मेरे घर का रास्ता नहीं भूलता। जान से भी जाओ और माल से भी जाओ।
रही नाते- रिश्तेदारों की बात! बच्चे माँ-बाप से चिपके रहे ; क्योंकि उनके बिना काम नहीं चला। माँ-बाप बच्चों से पटरी  बैठाते रहे ; क्योंकि उनके बिना वे रह नहीं सकते थे। मुझे जो कहना था बस मैं कह चुका।
बूढ़ा दिल का गुबार निकालकर सोने चला गया।
जागने वालों ने कहा- बूढ़ा सठिया गया है।
संपर्क:  जे 703, स्प्रिन्गफ़ील्ड्स, 17/20 अम्बालीपुर विलेज़, सरजापुर रोड, बेंगलुरु, कर्नाटक - 560102  E-mail-subharga@gmail.com

1 Comment:

रेखा श्रीवास्तव said...

bahut arthpurn laghu kathayen apane men ek sandesh de jati hain.

एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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