February 21, 2013

संस्मरण



 बहाने बसंत के
- सोनल रस्तोगी
अक्सर सोचती हूँ के बसंत मुझे बावरा क्यों करता है, गीतों कविताओ और प्रेम से पहले भी बसंत मन लुभाता था ...पतंगों से घिरा आकाश, तीन दिन पहले से पतंगों में हिस्सेदारी छोटी छोटी चरखियाँ, नशे में झूमती इस छत से उस छत गिरती कागज़ की परियाँ और उनको पाने को लालायित चेहरे, और जिस हाथ में वो परी उतरी उसके चेहरे का विजयी भाव देखने लायक...
बसंत की तैयारी बसंत से एक रात पहले हिस्सा लगता, चोकोर बक्से निकले जाते जो खास तौर पर पतंग रखने के लिए दादाजी और उनके पूर्वजों ने बनवाए थे उसमें विशालकाय अद्धा,पौना पतंगे सारे साल सुकून से सोती उन बड़ी पतंगों को हम हैरत से ताका करते यही हाल चर्खियों के बड़े भाई चरखों को देखकर होता, शीशम और संगमरमर के काम की नक्काशी वाली खूबसूरत ख़ास चरखियाँ जिन्हें हाथ में थामने की हमारी ललक, ललक ही रह जाती, हम हांथों में रंगबिरंगी छोटी-छोटी चरखियाँ थामकर उल्लास में डूब जाते.... फिर आता सबसे कठिन समय जब पतंग-सद्दी-रील का बँटवारा होता, ये सार हिसाब किताब मेरे बड़े ताऊजी के हाथों में था, और उनके फैसले पर कोई उँगली उठा ही नहीं सकता था। सबकी धड़कने तेज,बिना किसी भेदभाव के सारे छोटे बच्चे बराबर पतंगें पाते बड़ों का कोटा ज्यादा था, हमारे भाई बिगड़ जाते ..
ये उड़ाती तो है नहीं फिर इसको इत्ती सारी पतंगें क्यों?
उन्हें ताऊजी आँख के इशारे से कंट्रोल कर देते, आखिर उनकी लाडली भतीजियों से कोई कुछ कैसे कह सकता है, पतंगों के बटवारे के बाद हत्थे पर चरखी रखकर तागा चढ़ाने का काम शुरू होता, और भाई की कोशिश शुरू हो जाती, अरे अपनी गिट्टी मुझे अपनी चरखी में चढ़वाने दे, मैं तुझे पतंग ऊँची करके दे दूंगा, और हम बहल भी जाते। रात को ही फटी-टूटी पतंगों के इलाज का भी इंतज़ाम कर दिया जाता उबले आलू, चावल, लेइ.
 बसंत पंचमी के दिन सुबह कुछ ज्यादा-जल्दी हो जाती आस-पास के घरो में बजने वाला तेज संगीत और वो-काटा का उद्घोष,आप चाहकर भी नहीं सो सकते ...
बसंत की सुबह अक्सर पापा के फरमान से होती ...बिना नहाए कोई छत पर नहीं चढ़ेगा ...जानते थे एक बार जो चढ़ गया वो किसी हालत में नीचे नहीं उतरेगा, वो बालपन का जोश वो उत्साह , बीच-बीच में दादी फ़्लैश बेक में चली जाती घर में इन बच्चों के कुर्ते पीले रंग में रंग देते थे क्या मजाल कोई बच्चा बिना नहाए छत पर चढ़ जाए ...
अपनी अलमारियों में पीले कपड़ों की ढूँढ शुरू हो जाती आखिर ऋतुराज का स्वागत उनके मन-भावन रंग में ही तो करना चाहिए, बचपन से कैशोर्य के बीच छतों पर बहार का त्योहार लगने लगा था हर छत आबाद ,आँखें आकाश की ओर,
 फुर्सत भरा फिर भी बेहद व्यस्त दिन, थकाने वाला पर फुर्तीला दिन जो चेहरे साल भर नहीं दीखते थे वो भी उस दिन नज़र आ जाते, कदम बरबस छत की और चल पड़ते कुछ ख़ास कम्पटीशन होते, सबसे पहली पतंग किसने उड़ाई, सबसे बड़ी पतंग, सबसे ज्यादा पतंगें किसने काटी, किसके म्यूजिक सिस्टम पर सबसे नए गाने बजे, किसकी उँगलियाँ सबसे ज्यादा ज़ख्मी हुई।
 आखिर बसंत के बाद मोहल्ले के मोड़ों पर डिस्कस करने का मसाला भी तो चाहिए।
खैर, वैसे तो सार साल पतंगें आसमान के पहलू में गोते खाती पर तीन दिन इस  त्योहार को ख़ास बना देते पहला छोटा बसंत, बसंत और बूढ़ा बसंत
कितनी तरह की पतंगें सजी धजी, नई पतंगों पर जब कन्ने बाँधे जाते और नजाकत से उनके मुड्ढे मोड़े जाते ताकि हवा का सामना करने को तैयार हो जाएँ।
बसंत की सुबह की सबसे बड़ी चिंता हवा का रुख होती  । आखिर सही हवा के बिना पूरे दिन पतंग कैसे उड़ाई जाएगी, कहीं तूफानी हवा चल गई तो त्यौहार का सत्यानाश। मिन्नतो का दौर चल पड़ता।
बच्चे अल सुबह से छत पर होते बड़े 10-11 बजे तक औरते सारा काम निपटा कर दोपहर में नाश्ता, फल,भुने आलू, मूँगफली, तहरी (पुलाव) से लेकर चाय के कई दौर सब छत पर, हसी ठहाके तो गूंजते पर, कई समझौते भी पड़ोसी छतों से किये जाते ...मसलन तुम मेरी पतंग नहीं काटोगे, लंगर नहीं डालोगे, पंतग कट गई तो डोर नहीं लूटोगे, ये बात अलग है दिन ढलते ढलते सारे समझोते टूट जाते, आखिर आकाश युद्ध में ऐसे समझोते कहाँ चलते है। बड़े बुजुर्गों का छतों पर रहना सुरक्षा और सद्भाव बनाय रखता, थोड़ी तू-तू मैं - मैं  से मामला सुलझ जाता ... सारी रंजिशें पतंगों के साथ कट जाती (हर बार ऐसा नहीं होता एक जनाब हमारी छत पर कट्टा (देसी तमंचा ) लेकर चढ़ आए थे।
सारा दिन तेज़ गीतों के ..कटी  पतंगों के नाम रहता। शाम को आकाश भर आतिशबाजी, एक दूसरे की छत पर जाना लजीज नाश्तों की प्लेटों की अदला बदली और कुछ रंगारंग कार्यक्रम और बसंत बीत जाता। बड़ी पतंगें वापस अपने चौकोर बक्सों में आराम करती, चरखी सारे दिन चक्कर खाने के बाद सुस्ताती, छत अगली सुबह के सन्नाटे को सोच उदास हो जाती, थके हारे नौनिहाल नींद में वो- काटा चिल्लाते या अपनी पतंग काटने के दु:ख में नींद में सुबकते हुए भी पाए जाते, पैरों का दर्द रात को महसूस होता, तेज मांझे से कटी उँगलियाँ टीस मारती पर बसंत से मोहब्बत वैसी ही रहती
लेखक के बारे में: जीवनदायिनी गंगा के तीर फर्रुखाबाद में जन्म। शिक्षा- कंप्यूटर में परास्नातक एवं पत्रकारिता में डिप्लोमा, वर्तमान में गुडग़ाँव में कार्यरत, रुचि- लिखना पढऩा और घूमना।  बचपन में बुआ ने साहित्य के प्रति रूचि को पहचाना तो माँ एवं अध्यापिकाओ ने प्रोत्साहन दिया, हर वक्त मन में कुछ ना कुछ चलता रहता है जब उस पर ध्यान देकर लेखनी थाम लेती हूँ तो माँ शारदा के आशीर्वाद स्वरूप कुछ सार्थक बन जाता है वरना विचार समय की नदी की धार में बह जाते है जो खोजने पर भी नहीं मिलते। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओ में रचनाएँ प्रकाशित व   http://sonal-rastogi.blogspot.in/ कुछ कहानियाँ, कुछ नज्में  ब्लॉग पर नियमित लेखन।
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माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास
एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें...
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