December 28, 2011

एक अलमारी सौ चिंतन

- प्रमोद ताम्बट

छोटे- छोटे दड़बेनुमा फ्लैटों में रहने वालों की, औकात हो या ना हो, हमेशा यह सपना देखने की टुच्ची आदत होती है कि वे पाई- पाई जोड़कर जीवन में कभी ना कभी एक बड़ा बंगला जरूर बनाएंगे। इसीलिए, वे जब भी अपने शुरू होते ही खत्म होने वाले फ्लैट में उपलब्ध थोड़ी बहुत जगह और खुलेपन को नष्ट करने के लिए कोई अलामत खरीदते हैं तो उसका साइज अपने उसी सपनों के बंगले के हिसाब से तय करते हैं, भले ही उस अलामत को फ्लैट के अन्दर पहुँचाने में हम्मालों और अड़ोसियों- पड़ोसियों को नानी याद आ जाए।
हमारे बहुमंजिला भवन के तीसरे माले पर ऐसे ही एक महत्वाकांक्षी परिवार ने एक दिन एक विशालकाय अलमारी खरीदी जिसमें जेवर, कपड़े- लत्ते, जूते- चप्पल आदि- आदि रखने की पृथक- पृथक व्यवस्था के अलावा हवा सम्हालकर रखने और आदमी को बैठाने लायक भी पर्याप्त जगह थी। बाहर की तरफ तीन आइनें शायद इस दूरअंदेशी के साथ लगवाए गए थे कि परिवार के तीनों सदस्यों को एक साथ खड़े होकर मेकअप चुपडऩे के लिए सहूलियत हो सकें।
अपने विशाल साइज के कारण चूँकि अलमारी ने सीढिय़ों के रास्ते ऊपर जाने से साफ इन्कार कर दिया था इसलिए अलमारी की स्थापना के लिए उपस्थित तीस- चालीस शुभचिंतकों ने काफी बहस- मुबाहिसे के बाद सामूहिक रूप से यह तय किया कि उसे रस्सियों के सहारे गंतव्य तक पहुँचाया जाए। आनन- फानन में बिल्डिंग में मौजूद सभी फ्लेटों से सभी प्रकार की रस्सियाँ प्राप्त की गईं और, जिनका आपस में सफल गठबन्धन हो सका उन्हें जोड़कर अलमारी ऊपर चढ़ाने की व्यवस्था की गई। इस भवनारोहण के साहसिक कारनामें में योगदान हो सके इसके लिए कुछ पड़ोसियों ने पुराने पजामों- पेटीकोटों के नाड़ों को भी उदारतापूर्वक प्रस्तुत कर महत्वपूर्ण सहयोगियों में अपना नाम जुड़वाना चाहा मगर उनके वे नाड़े इस ऐतिहासिक आरोहण में उपयोग में नहीं लाए जा सके।
हमारे समाज की विशेषता है कि इस तरह का कोई फालतू काम होते देख तमाम तमाशबीन बिना किसी मुनादी, एनाउंसमेंट के बड़ी तादात में वहाँ आ जुटते हैं। काम में मदद धेले की नहीं करते बस खड़े होकर मुफ्त का तमाशा देखते हैं। मुझे ताज्जुब है कि देश में इस तरह के मुफ्त के तमाशों पर टिकट लगाकर कमाई करने का आइडिया अब तक किसी कार्पोरेट घराने को क्यों नहीं सूझा! बंदरिया के नाच से लेकर घोड़े पर बैठे गधे की बारात तक शहर में रोजाना दस- पचास तो ऐसे वाकये होते ही हैं जिन्हें लोग तमाशबीनों की तरह खड़े होकर मुफ्त का मनोरंजन लाभ ले लेते हैं, और इस सुविधा पर पैसा एक खर्च नहीं करते।
बहरहाल, कई एक तकनीकी विशेषज्ञों की सलाहों के बाद अलमारी को रस्सियों से बाँध कर जैसे ही ऊपर खींचा जाने लगा वैसे ही तमाशबीनों के दिमाग तीव्र गति से सक्रिय हो गए और चिन्तन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान करने लगे। अलमारी के सम्पूर्ण तकनीकी कौशल के साथ रस्सियों से जकड़े होने के बावजूद भी भीड़ में ज्यादा प्रतिशत उन लोगों का था जो सोच रहे थे कि कहीं अलमारी धड़ाम से नीचे ना गिर पड़े। कुछ लोग इससे आगे बढ़कर सोच रहे थे कि नीचे गिरकर अलमारी कहीं चपटी ना हो जाए, ऐसा हुआ तो फिर उसमें कीमती सामान कैसे रखा जा सकेगा! हर चीज हथौड़ी से चपटी करके फिर रखना पड़ेगी। आइने का काँच चूर- चूर होने के विचार से शायद किसी को यह भी चिंता हो गई हो कि वे बेचारे फिर मेकअप कैसे करेंगे।
भीड़ में खड़ी एक बरतन वाली बाई रस्सियों से बँधी ऊपर चढ़ रही अलमारी को देखकर सोचने लगी- 'अगो बाई! इतनी बड़ी अलमारी! लगता है अच्छा पैसे वाला घर है, पगार बरोबर मिलेगी! होली- दिवाली को ईनाम भी भरपूर मिलेगा! बाई, ये घर पकडऩाइच माँगता!'
उधर एक कबाड़ी भीड़ में ठेला खड़ा कर सोच रहा है- 'अब जरूर कबाड़े की छँटाई होगी, अच्छा माल अलमारी में जाएगा और रद्दी माल कबाड़ में। पाल्टी से एडवांस में फौरन डील पक्की कर लेनी चाहिए, वर्ना दूसरा कोई कबाड़ी आ धमकेगा, कम्पटीशन बढ़ जाएगा। परन्तु किसे प्रपोजल दें, कौन घर मालिक है कौन पड़ोसी और कौन हम्माल है कुछ समझ में ही नहीं आ रिया है।'
एक जूने- पुराने कपड़े लेकर घटिया बरतन- भाँडे देने वाली बाई कबाड़ी के उलट सोच रही है- 'इतनी बड़ी आलमारी ले ली कम्बखत- मारों ने, अब फटे- पुराने कपड़े भी इसी में ठूस देंगे, मेरा धंधा चौपट करेंगे ....! इन अलमारी वालों का तो खाना खराब हो, करमजलों ने इतनी बड़ी अलमारी बनाई ही क्यों!'
भीड़ में एक अनुभवी चोर भी खड़ा ऊपर चढ़ती अलमारी को देखकर सोच रहा है- 'कौन से मेक की तिजोरी होगी इसमें। डबल लॉक होगी या सिंगल लॉक! तोडऩे में अन्दाजन कितना टाइम लगेगा। चादर तो यार बहुत ही पतली है, खोलते वक्त बहुत ही आवाज करेगी। अगर नींद खुल गई उल्लू के पट्ठों की तो बेभाव जूते पडेंग़े। ये साले अलमारी बनाने वाले ससुरे ऐसी घटिया अलमारी बनाते ही क्यों हैं जिसको खोलने से जमाने की नींद खुल जाए! प्रोफेशनल कोऑपरेशन साला रह ही नहीं गया आजकल, खुद तो चादर लगाने में चोरी कर लेंगे, और घटिया चादर की कर्कश आवाज के मारे पकड़ा हम जाए तो इन्हें कोई परवाह नहीं।'
हमारे बहुमंजिला भवन के तीसरे माले पर ऐसे ही एक महत्वाकांक्षी परिवार ने एक दिन एक विशालकाय अलमारी खरीदी जिसमें जेवर, कपड़े- लत्ते, जूते- चप्पल आदि- आदि रखने की पृथक- पृथक व्यवस्था के अलावा हवा सम्हालकर रखने और आदमी को बैठाने लायक भी पर्याप्त जगह थी।
एक पुलिस वाला उधर से गुजरा और चोर को खड़ा देख आशा से वह भी बगल में आ खड़ा हुआ। तभी पुलिस वाले को आत्मबोध हो गया कि अलमारी को देखकर चोर अंतत: क्या सोच रहा होगा और चोर भी पलक झपकते ही समझ गया कि पुलिसवाले ने चोर और अलमारी के बीच क्या कार्य योजना तैयार की होगी।
एक नेताजी भी बिना चुनाव सीजन, भूले- भटके इस तरफ चले आए और उन्होंने भी भीड़ में खड़े होकर आदत के विपरीत कुछ देर सोचने का काम किया। वे सोच रहे थे- 'ऐसी ऐसी चार बहुत हो जाएँगी! हजार- हजार की गड्डियाँ सुविधाजनक रूप से समा जाएंगी इसमें। चोर भी उठाकर नहीं ले जा पाएगा। वक्त जरूरत खुद भी छुपने के काम आ सकती है। पता लगाएँ कितने की पड़ेगी या इसी को हथिया लें सुसरी को।'
एक सरकारी दफ्तर के बड़े बाबू सोचने लगे, यह अलमारी मिल जाए तो मैं इसमें रखूँगा क्या! आफिस में होती तो फाइलें रख लेता, फालतू टेबल पर पड़ी रहती हैं, चाहे जो उठाकर निपटा देता है और नुकसान अपना हो जाता है। ताले में रखूँगा तो खुद ही छुपाऊँगा और खुद ही ढूँढग़ा। चार पैसे ज्यादा मिलेंगे।'
एक अलमारी सौ चिन्तन स्वयंस्फूर्त रूप से सामने आ रहे थे। सारे तमाशबीन चिंतक बने हुए थे। जाहिर है हम भी वहाँ खड़े थे और जब गधे- घोड़े सोच रहे हों तो हम कैसे पीछे रह सकते हैं। हमने सोचा ऐसी एक अलमारी हमें मिल जाए तो किताबखोरों से छुटकारा मिल जाए। बाहर के कमरे में खुले में रखी किताबें जिस- तिसकी नजरों में आ जाती हैं, और हम दे ना दें लोग उठाकर ले जाते है, फिर लौटाने का नाम नहीं लेते। अलमारी होगी तो सारी किताबें अन्दर बंद कर देंगे। लोग ना हमारी किताबें देख पाऐंगे और ना अपनी खुद की, जो हम उनके यहाँ से कभी उठाकर लाए थे।

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