December 28, 2011

गैंडों को मिलेगा नया घर लेकिन हाथी कहाँ जाएंगे?

- देवेन्द्र प्रकाश मिश्र

गैंडा जंगल के समीपतर्वी ग्रामीण क्षेत्रों के खेतों की फसलों को भारी नुकसान पहुंचाते हैं। इसके अतिरिक्त दो बार यह मानव हत्या भी कर चुके हैं। गैंडा द्वारा फसल एवं जनहानि का मुआवजा जो प्रदेश सरकार द्वारा तय किया गया है वह काफी कम है। इसके कारण क्षेत्रीय ग्रामीण गैंडों को दुश्मन की दृष्टि से देखते हैं।
उत्तर प्रदेश के एकमात्र दुधवा नेशनल पार्क के गैंडा परिवार पर मंडरा रहे आनुवांशिक प्रदूषण से निपटने के उद्देश्य से आसाम से जल्दी ही एक नर गैंडा दुधवा लाया जाएगा। नए गैंडा का परिवार बसाने के लिए गैंडा पुनर्वास परियोजना का क्षेत्रफल भी बढ़ाने की योजना है। इसके अंतर्गत सैकड़ों एकड़ में फैले प्राकृतिक भादीताल के वनक्षेत्र को ऊर्जाबाड़ से घेरकर संरक्षित किया जाएगा। दुधवा के तीस सदस्यीय गैंडा परिवार के लिए आशियाने का विस्तार भले ही ऊपर से ठीक- ठाक लग रहा हो लेकिन भादीताल इलाके को अपना पंसदीदा शरणगाह बनाकर रहने वाले लगभग चार दर्जन हाथी क्या ऊर्जा बाड़ के भीतर रह पाएंगे? यह स्वयं में विचारणीय प्रश्न है?
यद्यपि गैंडा एवं हाथी एक साथ रह सकते हैं यह भी सर्वविदित है लेकिन इनके बीच होने वाले संघर्ष को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। इन सभी परिस्थितियों पर अध्ययन और विचार विमर्श के बाद ऐसी दूरगामी परियोजना पर कार्य किया जाना हितकर होगा जिसमें दोंनों प्रजाति के वनपशु सुरक्षित रह सकें। कहीं ऐसा न हो कि अति उत्साह में गैंडा परियोजना का विस्तार कर दिया जाए और दुधवा के जंगल में रहने वाले हाथी पलायन को मजबूर हो जाएं।
दुधवा नेशनल पार्क में 'गैंडा पुनर्वास परियोजना' शुरू होने से पहले योजनाकारों ने यह तय किया था कि यहां की समिष्टि में तीस गैंडों को बाहर से लाकर बसाया जाएगा। इनकी संख्या जब पूरी हो जाएगी तब सभी गैंडों को ऊर्जाबाड़ के संरक्षित इलाका से निकालकर खुले जंगल में छोड़ दिया जाएगा। योजनाकारों का यह सपना तो साकार नहीं हो पाया, वरन् सन 1984 में शुरू की गई गैंडा पुनर्वास परियोजना तमाम उतार- चढ़ाव के झंझावतों को झेलकर सफलता के पायदान पर ऊपर चढ़ कर विश्व की एकमात्र अद्वितीय 'पुनर्वास' परियोजना होने का गौरव हासिल कर चुकी है। लेकिन दुधवा के गैंडा परिवार पर आनुवांशिक प्रदूषण यानी 'इनब्रीडिंग' का खतरा इस वजह से मंडरा रहा है क्योंकि यहां का गैंडा परिवार जो तीसरी पीढ़ी में पहुंच गया है वह सभी संताने पितामह गैंडा बांके से उत्पन्न हुई हैं। गैंडा पुर्नवास परियोजना दुधवा नेशनल पार्क की दक्षिण सोनारीपुर वनरेंज के 27 वर्ग किमी वनक्षेत्र को ऊर्जाबाड़ से घेरकर चलायी जा रही है। वर्तमान में तीस सदस्यीय गैंडा परिवार फैसिंग से घिरे जंगल में घूम रहा है। हालांकि इस परिवार के लगभग आधा दर्जन सदस्य नर एवं मादा विभिन्न कारणों के चलते फैंसिंग एरिया से बाहर खुले वनक्षेत्र के साथ ही समीपवर्ती ग्रामीणांचल में घूम रहे हैं। यह गैंडा जंगल के समीपतर्वी ग्रामीण क्षेत्रों के खेतों की फसलों को भारी नुकसान पहुंचाते हैं। इसके अतिरिक्त दो बार यह मानव हत्या भी कर चुके हैं। गैंडा द्वारा फसल एवं जनहानि का मुआवजा जो प्रदेश सरकार द्वारा तय किया गया है वह काफी कम है। इसके कारण क्षेत्रीय ग्रामीण गैंडों को दुश्मन की दृष्टि से देखते हैं। इन परिस्थितियों में अब गैंडा तथा मानव के बीच हो रहे संघर्ष का नया अध्याय इतिहास में जुड़ गया है।
दुधवा के गैंडा परिवार प एक ही नर की संताने होने के कारण उन पर मंडरा रहे इनब्रीडिंग के खतरे की ओर तमाम बार विशेषज्ञों ने वन विभाग के आला अफसरों का ध्यान इंगित कराकर चिंता जाहिर करते हुए इस खतरे से निपटने के लिए बाहर से नर गैंडा दुधवा में लाने की भी वकालत की गई लेकिन नतीजा शून्य ही निकला। आखिर में तीस साल बाद प्रदेश की सरकार के कानों पर जूं रेंगी है। परिणाम स्वरूप दुधवा नेशनल पार्क द्वारा भेजी गई योजना को हरी झंडी दे दी गई है। इस योजना में गैंडों का प्राकृतिक वासस्थल का क्षेत्र बढ़ाए जाने तथा बाहर से गैंडा लाने का उल्लेख किया गया था। आसाम से गैंडा लाने की योजना को स्वीकार करके संरक्षित क्षेत्र को बढ़ाने के लिए बजट को भी स्वीकृति मिल गई है।
दक्षिण सोनारीपुर क्षेत्र की 27 वर्ग किमी फैसिंग एरिया के पास ही बेलरायां रेंज के भादीताल क्षेत्र को शामिल करके तेरह वर्ग किमी जंगल को ऊर्जाबाड़ से संरक्षित करके गैंडों का नया वासस्थल बनाया जाएगा। ऊपर से देखा जाए तो यह योजना दुधवा के गैंडों परिवार के लिए हित में है, लेकिन बीते आधा दशक से पड़ोसी देश नेपाल से माइग्रेट होकर आने वाले हाथियों ने दुधवा नेशनल पार्क के जंगल को अपना शरणगाह बना रखा है। इसमें भादीताल वाला जंगल उनका प्रिय प्राकृतिक वासस्थल है। यद्यपि इससे पूर्व नेपाल से दुधवा आने वाले हाथी ग्रीष्मकाल के समापन में आकर मानसून सत्र दुधवा में व्यतीत करने के बाद शीतकाल शुरू होने पर वापसी कर लेते थे। लेकिन अब लगभग चार दर्जन हाथी नेपाल वापसी करने के बजाय दुधवा में ही पूरे साल डेरा जमाए रहते हैं। अब अगर भादीताल वनक्षेत्र को गैंडा पुनर्वास परियोजना में फैसिंग करके शामिल कर दिया गया तो वहां रहने वाला लगभग पचास सदस्यीय हाथी परिवार कहां जाएगा? इस पर गैंडों के लिए नया वासस्थल चयनित करने वाले योजनाकारों ने ध्यान नहीं दिया है।
देश के बाहर हाथी और गैंडों के संघर्ष के इतिहास को देखा जाए तो सन् 1995- 96 में साउथ अफ्रीका के पिलायंसवर्ग नेशनल पार्क में हाथियों ने मदमस्त अवस्था में बिना किसी कारण कई गैंडों को मार डाला था। इसी दरम्यान केन्या में भी हाथियों द्वारा पालतू पशुओं को मार डालने की घटनाएं हुई थी। यह घटनाएं भी उस स्थिति में हुई थी जब हाथी जंगल के बाहर आने के लिए विभिन्न कारणों से मजबूर हुए थे। दुधवा के हाथियों को देखा जाए तो वह कभी- कभार जंगल के बाहर आकर उत्पात मचाते रहे हैं। जिसका नुकसान क्षेत्रीय किसानों को उठाना पड़ता है। हालांकि स्वयं हाथी भी नुकसान के भागीदार तब बन जाते हैं जब किसी हाथी को अपनी जान देनी पड़ जाती है। इसमें विगत माह जंगल से बाहर आए तीन हाथियों की खेतों में लगे बिजली के पोल के तारों से लगे करंट से झुलस कर मौत हो गई थी। इसके अतिरिक्त ट्रेन से टक्कर लगने से चार हाथियों के मरने की घटना भी दुधवा में हो चुकी है। अब अगर भादीताल वनक्षेत्र के तेरह वर्ग किमी एरिया को ऊर्जाबाड़ से घेर दिया जाएगा तो गैंडा उसमें रह सकते हैं, लेकिन हाथी बंदिश में रह पाएंगे? जवाब होगा शायद नहीं। इस स्थिति में बलशाली हाथी ऊर्जाबाड़ को तोड़कर बाहर आएंगे- जाएंगे। इनके बाद गैंडा भी संरक्षित इलाके के बाहर आ जाएंगे। इस स्थिति में गैंडा और हाथी के बीच संघर्ष होने की घटनाएं हो सकती हैं, जिनको रोकना आसान काम नहीं होगा। इसके अतिरिक्त असुरक्षित इलाका में विचरण करने से गैंडों के जीवन पर शिकारियों की कुदृष्टि का खतरा भी मंडराता रहेगा।
गैंडा पुनर्वास परियोजना के योजनाकारों ने पूर्व ही तय किया था कि तीस गैंडों को बाहर से लाकर उनको पुनर्वासित कराया जाएगा जब यह संख्या पूरी हो जाएगी तब सभी गैंडों को खुले जंगल में यानी ऊर्जाबाड़ के बाहर निकाल दिया जाएगा। तीस गैंडा तो बाहर से नहीं आ पाए वरन् यहां उनकी संख्या तीस तक जरूर पहुंच गई है, जो 27 वर्ग किमी वनक्षेत्र में उर्जावाड़ वाली बंदिश में घूम रहे हैं।
जंगल वनपशुओं का प्राकृतिक घर है उन्हें एक ही एरिया में बंद करके रखना उनके स्वास्थ्य के लिए भी हितकर नहीं माना जा सकता है। जंगल के सीमावर्ती ग्रामीणांचल में बढ़ रहे मानव एवं वन्यजीव संघर्ष को रोकने के लिए अब यह जरूरी हो गया है कि ऐसी कार्य योजना बनायी जाए जिससे वनपशु जंगल के बाहर न आ सके और मानव भी संवेदनशील जंगल सीमा के भीतर प्रवेश न कर सके। दुधवा में 'गैंडा पुनर्वास परियोजना' का विस्तार किया जा रहा है इसमें एक वनपशु यानी गैंडा को नया घर मिलेगा परन्तु दूसरे वनपशु हाथी को आशियाना छोडऩे के लिए मजबूर होना पड़ेगा। इनके बीच संघर्ष बढ़ेगा अलग से। इसको रोकने के लिए जरूरी हो गया है कि जंगल के भीतर वनक्षेत्र को ऊर्जाबाड़ से संरक्षित करने के बजाय वफरजोन के बाद कोर एरिया के वनक्षेत्र की बाउंड्री को तारों से घेर दिया जाए इससे कोर एरिया के विशाल जंगल में गैंडा, हाथी सुरक्षित स्वच्छंद विचरण करे तो उनके बीच संघर्ष भी नहीं होगा। यदि यह किसी कारण से संभव न हो तो केंद्र और प्रदेश की सरकारों को चाहिए कि वह वनपशु से होने वाली फसल क्षति एवं जनहानि की मुआवजा की धनराशि इतनी पर्याप्त कर दे जिससे किसानों के आंसू भी पुंछे साथ में उनका दुख भी कम हो जाए। क्षेत्र की पूरी परिस्थितियों को ध्यान में रखकर अगर सार्थक और कारगर प्रयास समय रहते नहीं किए गये तो भविष्य में जो भी परिणाम सामने आएंगे उसमें वनजीवों तथा मानव को नुकसान ही उठाना पड़ेगा। जिसमें सर्वाधिक क्षति वन्यप्राणियों के हिस्से में आएगी।
संपर्क- हिन्दुस्तान ऑफिस, नगर पालिका कॉम्प्लेक्स, निकट सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, पलिया कला, जिला- खीरी (उप्र) मो. 09415166103 Email- dpmishra7@gmail.com

0 Comments:

लेखकों से... उदंती.com एक सामाजिक- सांस्कृतिक वेब पत्रिका है। पत्रिका में सम- सामयिक लेखों के साथ पर्यावरण, पर्यटन, लोक संस्कृति, ऐतिहासिक- सांस्कृतिक धरोहर से जुड़े लेखों और साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे कहानी, व्यंग्य, लघुकथाएँ, कविता, गीत, ग़ज़ल, यात्रा, संस्मरण आदि का भी समावेश किया गया है। आपकी मौलिक, अप्रकाशित रचनाओं का स्वागत है। रचनाएँ कृपया Email-udanti.com@gmail.com पर प्रेषित करें।
माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास माटी समाज सेवी संस्था, समाज के विभिन्न जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती है। पिछले वर्षों में संस्था ने समाज से जुड़े विभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण, प्रदूषण आदि क्षेत्रों में काम करते हुए जागरुकता लाने का प्रयास किया है। माटी संस्था कई वर्षों से बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में “साथी समाज सेवी संस्था” द्वारा संचालित स्कूल “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपए तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक लोग पिछले कई सालों से उक्त गुरूकुल के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। अनुदान देने वालों में शामिल हैं- अनुदान देने वालों में शामिल हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (U.K.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर, रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी, रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से स्कूल जाने में असमर्थ बच्चे शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होंगे ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेंगे। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ.ग.) मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

उदंती.com तकनीकि सहयोग - संजीव तिवारी

टैम्‍पलैट - आशीष