September 10, 2011

मेरे वतन की खुशबू केसर लुटा रही है

-देवी नागरानी
हर एक देश की तरक्की उसकी भाषा से जुड़ी होती है, जो हमारे अस्तित्व की पहचान है, उसकी अपनी गरिमा है। भाषा केवल अभिव्यक्ति ही नहीं, बोलने वाले की अस्मिता भी है और संस्कृति भी है जिसमें शामिल रहते हैं आपसी संबंधों के मूल्य, बड़ों का आदर-सम्मान, परिवार के सामाजिक सरोकार, रीति-रस्मों के सामूहिक तौर तरीके।
हिंदी भाषा भारतीय जनता के विचारों का माध्यम है, अपने आप को अभिव्यक्त करने की मूल शैली है और इसी नींव पर टिकी है भारतीय संस्कृति। बाल गंगाधर तिलक का कथन इसी सत्य को दिशा दे रहा है 'देश की अखंडता- आजादी के लिए हिन्दी भाषा एक पुल है'।
हमें अपनी हिन्दी जुबां चाहिये, सुनाए जो लोरी वो मां चाहिये
कहा किसने सारा जहां चाहिये, हमें सिर्फ हिन्दोस्तां चाहिये
तिरंगा हमारा हो ऊंचा जहां, निगाहों में वो आसमां चाहिये
मुहब्बत के बहते हों धारे जहां, वतन ऐसा जन्नत निशां चाहिये
जहां देवी भाषा के महके सुमन, वो सुन्दर हमें गुलसितां चाहिये
भारतवर्ष की बुनियाद 'विविधता में एकता' की विशेषता पर टिकी है और इसी डोर में बंधी है देश की विभिन्न जातियां, धर्म व भाषाएं। भारतीय भाषाओं के इतिहास में एक नवसंगठित सोच से नव निर्माण की बुनियाद रखी जा रही है। भारत से विभिन्न देशों में हमारे भारतीय जाकर बसे हैं - मॉरीशस, सूरीनाम, जापान, मास्को, थाईलैंड, इंग्लैंड, यूएसए, कनाडा जहां उनके साथ गई है कश्मीर से कन्याकुमारी तक के अनेक प्रांतों की भाषाएं, जिसमें है उत्तर की पंजाबी, सिंधी, उडिय़ा, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश की भाषाएं, गुजराती, बंगाली, राजस्थानी, मराठी और दक्षिण प्रांतों की तमिल, तेलुगू और कोंकणी भाषा। ये भाषाएं अपनी संस्कृति से जुड़ी रहकर अपने प्रांतीय चरित्र को उजागर करती हैं। संस्कृति को नष्ट होने से बचाना है तो सर्व प्रथम अपनी राष्ट्र भाषा हिन्दी को बचाना पड़ेगा।
आजादी के पहले और आजादी के बाद जो भारतीय विदेशों में जाकर बसे उनमें सामाजिक फर्क है। आजादी के पहले वाले मजबूर, मजदूर, कुछ अनपढ़ लोग गरीबी का समाधान पाने के लिये मॉरीशस, सूरीनाम, गयाना, त्रिनिनाद में जा बसे थे जहां उन्हें अपनी जरूरतों के लिये संघर्ष करना पड़ा।
आजादी के बाद जो भारतीय गए वे कुशल श्रमिक भारतीय थे, पढ़े लिखे थे और महत्वकांक्षा वाले थे। उनमें आत्मविकास की चाह और साथ अपनी मातृभूमि के विकास की चाह भी थी। भारतीय धर्म, संस्कृति, साहित्य की पृष्ठभूमि उनके पास थी, लेकिन उन्हें जो अभाव विदेशों में महसूस होता है वह है, आपसी संबंधों का अभाव। पुरानी और नई पीढ़ी के बीच बढ़ता हुआ जनरेशन गैप। वहां की विकसित जीवनशैली और भारतीय सभ्यता के अंतर के कारण एक असुरक्षा की भावना उत्पन्न होती है। सांस्कृतिक मूल्यों को लेकर, पारिवारिक संबंधों को लेकर, एक अंतरद्वंद्व पैदा होता है और यही अंतरद्वंद्व इस भारतीय भाषा के लिये बड़ी बुनियाद है।
हर एक देश की तरक्की उसकी भाषा से जुड़ी होती है, जो हमारे अस्तित्व की पहचान है, उसकी अपनी गरिमा है। विदेशों में गए भारतीय परिवारों की मुलाकात जिस सभ्यता के साथ होती है उस सभ्यता में किशोर अवस्था आने से पहले बच्चा मां- बाप से अलग हो जाता है, पति- पत्नी के रिश्ते की कडिय़ां आर्थिक आजादी के कारण ढीली पड़ जाती हैं। कुछ पाकर कुछ खोने के बीच के अंतरद्वंद्व का समाधान पाने के लिये भारतीय संस्कृति की स्थापना करने और हिन्दी को विश्व मंच पर स्थान दिलाने का कार्य किया जा रहा है। इस महायज्ञ में हिन्दी भाषी ही नहीं पंजाबी और गुजराती भाषियों का भी योगदान हैं।
अब तो सरिता का बहाव अंतराष्ट्रीयता की ओर बढ़ रहा है। अगर मैं अमेरीका की बात करूं तो इस दिशा में मकसद को मुकाम तक लाने के लिये निम्न रूपों से प्रयत्न हो रहे हैं- 1. संस्थागत 2. व्यक्तिगत व 3. मीडियागत
1. संस्थागत : न्यूयार्क के भारतीय विद्या भवन की ओर से हिन्दी को एक दिशा हासिल हुई है, जिसके अध्यक्ष है नवीन मेहता। डॉ. पी. जयरामन के निर्देशन में हिन्दी शिक्षण और संस्थाओं के साहित्यतिक और सांस्कृतिक कार्य सफलता पूर्वक हो रहे हैं।
अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति एक ऐसा संस्थान है जो विश्व में हिन्दी भाषा और साहित्य के माध्यम से भारतीय संस्कृति के प्रचार- प्रसार के लिये काम कर रही है। इसके नेतृत्व में भाषा की प्रगति को दशा और दिशा मिल रही है। इसके वर्तमान अध्यक्ष हैं गुलाब खंडेलवाल। हिन्दी शिक्षण की दिशा में सफल प्रयासों के कारण आज अमेरिका में कई विश्वविद्यालयों में हिन्दी पढ़ाई जाती है।
हम भारतीयों का लक्ष्य यही है कि जर्मन, फ्रेंच, स्पैनिश, रूसी, चीनी व जापानी भाषाओं की तरह हिन्दी भी हर स्कूल में पढ़ाई जाए। अमेरिका शिक्षा विभाग का ध्यान इस ओर आकर्षित किया जा रहा है। हिन्दी प्रसार के इन प्रयत्नों के अतिरिक्त इसी दशक में समिति ने अपनी वेबसाइट को विकसित किया है, जिसका नाम है।
अमेरिकन काउंसिल फॉर टीचिंग फॉरेन लैंग्वेज की व्यवस्था के अंतर्गत अमेरिका के अनेकों शहरों में हिन्दी की कार्यशालाएं होती हंै जिसमें भावी शिक्षकों को सत्रों में बांटकर गुजराती, पंजाबी, मराठी, बिहारी, सिंधी और विज्ञान से सम्बन्धित कक्षाओं के माध्यम से ज्ञान प्रदान करती हैं।
अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति हिन्दी भाषा के प्रचार- प्रसार से जुड़ी अमेरिका की पहली और सबसे पुरानी संस्था है। इस संस्था की एक विशिष्ट परम्परा रही है अमेरिका में कवि सम्मेलनों का आयोजन। इस समिति की त्रैमासिक मुख्य पत्रिका है विश्वा जिसके संपादक हैं रवि प्रकाश सिंह और साथ में ई-विश्वा नामक त्रैमासिक वेब पत्रिका, रचनाकारों को साहित्य से जोडऩे का बखूबी प्रयास कर रही है।
इसके अतिरिक्त 'अखिल विश्व हिन्दी समिति' संस्थागत रूप में कई स्कूलों की स्थापना करती रही है जहां पर भाषा प्रेमी अटलांटा, क्रानबरी में अपनी सेवाएं प्रेषित कर रहे हैं इस समिति के अध्यक्ष हैं डॉ. बिजय के मेहता। इस समिति के द्वारा आयोजित कई अधिवेशन व साहित्यक गोष्ठियां न्यूयार्क के हिन्दू सेंटर फ्लूशिंग में संपन्न होती हैं। इस संस्था कि ओर से त्रैमासिक पत्रिका 'सौरभ' निकलती है जिसके मुख्य संपादक और अंतर्राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं डा. दाऊजी गुप्त। इन सभी कार्यों से यह स्पष्ट है कि संस्थाओं द्वारा प्रवासी भारतीय भाषा की जड़ें मजबूत करने में लगे हुए है।
न्यूयार्क स्थित 'विश्व हिंदी न्यास समिति' की ओर से प्रतिवर्ष अधिवेशन आयोजित होते हैं इसमें शामिल होने का सौभाग्य मुझे भी मिला है जहां लोक भाषा, लोक गीत, लोक गाथा, नाटक, कथन और प्रस्तुतिकरण का अनूठा संगम इस अधिवेशन के दौरान देखने को मिला। चौधरी, कैलाश शर्मा और उनकी पूरी टीम ने आश्चर्यजनक रूप से 'विभिन्नता में एकता' का जो समन्वय प्रस्तुत किया, वह काबिले तारीफ रहा। वहां देखने को मिलती है हमारे देश के तीज त्यौहार की झलकियां, विभिन्न प्रांतों की शादियों की रस्में, जलियांवाला बाग की अंधाधुंध गोलियों की बौछार और देश के वीरों के स्वतंत्रता संग्राम की स्मृतियां। समिति की ओर से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका 'हिन्दी जगत' देश विदेश को जोडऩे का काम कर रही है। इस कार्य में जापान से सुरेश ऋतुपर्ण जुड़े हुए हैं। कुछ और भी पत्रिकाएं जो अमेरिका व कैनेडा से साहित्य का संचार कर रही है वे हैं हिन्दी चेतना (श्यान त्रिपाठी), वसुधा (स्नेह ठाकुर)।
2. व्यक्तिगत: व्यक्तिगत रूप में कुछ सस्थाएं है जो न्यूयार्क व न्यूजर्सी में बड़े ही सक्रिय रूप से कार्य कर रही है: हिन्दी यूएसए अमेरिका स्थित न्यूजर्सी की जमीं पर नई पीढ़ी को हिन्दी के साथ जोडऩे का काम कर रही है। इसके स्वयंसेवक देवेंद्र सिंह अनेक गतिविधियों द्वारा प्रवासी बच्चों को भारतीय संस्कृति से जोड़े रखने में कामयाब रहे हैं। यहां पच्चीस से ज्यादा पाठशालाएं चल रही हैं और 700 से अधिक छात्र व छात्राएं छठवीं कक्षा तक शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। 50 स्वयंसेवक इस कार्य को अंजाम दे रहे हैं। हिन्दी यूएसए हर साल हिन्दी महोत्सव का आयोजन करता है जहां सामाजिक व सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ तीज त्यौहार के पर्व भी मनाए जाते हैं। हिन्दी भाषा वह धागा है जो हर प्रांतीय भाषा को अपने साथ गूंथ कर उसे अपनी आत्मीयता से जोड़ लेता है। इनकी ओर से प्रकाशित ई-पत्रिका 'कर्म भूमि' अपने प्रयासों से हिन्दी के प्रचार- प्रसार में अपना हाथ बंटा रही है।
हिन्दी विकास मंडल सुधा ओम ढींगरा की देख रेख में अपने आप एक दीप प्रज्वलित कर रहा है। ये हिन्दी सेवक सेविकाएं अपने निजी समय से कुछ समय निकाल कर छुट्टी के दिनों में बाल विहार कक्षाएं चलाकर परदेस में देश का माहौल बनाये रखने में कामयाब हुए हैं। यहां हर साल दो बार संस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं जहां संस्था के छात्रों के अलावा कई रचनाकार, लेखक भी भागीदारी लेते हैं जहां उनका सम्मान भी किया जाता है।
हिन्दू रिलीजन क्लासेस चिनमाया मिशन एंड साधु वासवानी इजन इन डिफरेंट सिटीज ऑफ यूएसए भी इन्हीं संस्कारों से जोडऩे के प्रयास के अंतर्गत आयोजित पाठशालाएं चलाती है, जहां गीता सार, संस्कृत के श्लोक व संगीत सिखाएं जाते हैं। मातृभाषा को भी प्रमुखता मिल रही है जिसमें पंजाबी, गुरुमुखी, सिंध, तमिल, लगभग 20 प्रांतीय भारतीय भाषाएं देवनागरी लिपी में सिखाई जाती हैं। किसी ने खूब कहा है- 'तुम्हारे पास लिपी है, भाषा है, इसलिये तुम हो, लिपी गुम हो जाये, भाषा लुप्त हो जाये, तुम अपनी पहचान खो बैठोगे।'
हिन्दी और क्षेत्रीय भाषाओं का आपस में कोई टकराव नहीं बल्कि वे एक दूसरे के पूरक हैं। किसी कवि ने कहा है-भाषाएं आपस में बहनें, बदल बदल कर पहनें गहने।
3. मीडिया: वैश्वीकरण के इस दौर में संचार प्रणाली द्वारा पूरे विश्व में टेलीफोन, मोबाइल, कम्प्यूटर, टीवी, सिनेमा, रेडियो व इंटरनेट जैसे माध्यमों से भौगोलिक दूरियों का मतलब बदल गया है। जनमानस पर हिन्दी का प्रभाव गहरा हो गया है। ब्लाग के माध्यम से देश विदेश के लोग आपस में जुड़े हैं। अनेकों वेब पत्रिकाएं इंटरनेट द्वारा विदेशों में बसे भारतीय जनता को मिलती हैं इनमें खास है साहित्यकुंज (सुमन घई), अनुभूति एवं अभिव्यक्ति (पुर्णिमा बर्मन), गर्भनाल (आत्माराम जी), वेब दुनिया, और भारत की प्रकाशित पत्रिकाएं और दैनिक पत्र जन मानस पर हिन्दी का गहरा प्रभाव डाल रही हैं। भूगोल के दायरों को मिटाने में कामयाब यह यज्ञ ग्लोबलाइजेशन का सफल संकेत है और इस प्रकार का आदान- प्रदान हिन्दी को
विश्व मंच पर स्थापित करने का महत्वपूर्ण कदम है।
डलास से एक साप्ताहिक रेडियो पत्रिका 'कवितांजली' हर रविवार को प्रसारित होती है जो नेट द्वारा विश्व में सुनी जाती है। भाषाई विकास की दिशा में यह अच्छा प्रयास है। (इस प्रसारण के संयोजक डॉ. नंदलाल सिंह व प्रस्तुतकर्ता आदित्य प्रकाश सिंह हैं।
इंटरनेट की प्रणाली ने दुनिया की सीमा रेखा को मिटा दिया है। कम्प्यूटर पर विभिन्न भाषाओं के फॉन्ट उपलब्ध होने के कारण वेबसाइट संस्करण अंग्रेजी या अन्य कई भाषाओं में पढ़ा जा सकता है, जैसे 'चिट्ठाजगत'। इसी से दुनिया को ग्लोबल विलेज का रूप हासिल हुआ है। अब महात्मा गांधी का विश्व ग्राम का सपना सभी भौगोलिक सीमाएं तोड़कर आधुनिक संचार प्रणालियों द्वारा साकार होता हुआ दिखाई दे रहा है। संस्कृति तोडऩे की नहीं जोडऩे की प्रतिक्रिया है। प्रवासियों ने भारतीय भाषा और संस्कृति को जिस तरह विश्व भर में फैलाया है, वह प्रयास अद्वितीय है।
विश्व मंच पर इस प्रतिभाशाली नव युग की पीढ़ी को सर्व भाषाओं की दिशा में विकसित होता देखकर यह महसूस होता है कि हर युग में रवीन्द्रनाथ टैगोर का एक शांति निकेतन स्थापित हो रहा है। विश्वास बनता जा रहा है कि जहां- जहां इस तरह की संस्कृति पनपती रहेगी वहां- वहां हिन्दुस्तान का दिल धड़कता रहेगा और उसकी सुगंध चहूं ओर फैलती रहेगी। मेरी ग़ज़ल का एक शेर इसी भाव को अभिव्यक्त करता है-
रहती महक है इसमें, मिट्टी की सौंधी-सौंधी
मेरे वतन की खुशबू, केसर लुटा रही है।
इस भाषायी नवजागरण का नया आगाज बाहें फैलाए हमारा स्वागत करने को तैयार है। जयहिन्द
- न्यू जर्सी, dnangrani@gmail.com

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