October 29, 2011

आज भी प्रासंगिक हैं महात्मा के विचार

- कृष्ण कुमार यादव

विश्व पटल पर महात्मा गाँधी सिर्फ एक नाम नहीं अपितु शान्ति और अहिंसा का प्रतीक है। महात्मा गाँधी के पूर्व भी शान्ति और अहिंसा की अवधारणा फलित थी, परन्तु उन्होंने जिस प्रकार सत्याग्रह एवं शान्ति व अहिंसा के रास्तों पर चलते हुये अंग्रेेजों को भारत छोडऩे पर मजबूर कर दिया, उसका कोई दूसरा उदाहरण विश्व इतिहास में देखने को नहीं मिलता। तभी तो प्रख्यात वैज्ञानिक आइंस्टीन ने कहा था कि- 'हजार साल बाद आने वाली नस्लें इस बात पर मुश्किल से विश्वास करेंगी कि हाड़- मांस से बना ऐसा कोई इन्सान धरती पर कभी आया था।' संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी वर्ष 2007 से गाँधी जयन्ती को 'विश्व अहिंसा दिवस' के रूप में मनाये जाने की घोषणा की तो अमेरिकी कांग्रेस में बापू को दुनिया भर में स्वतंत्रता और न्याय का प्रतीक बताते हुए प्रतिनिधि सभा में उनकी 140वीं जयंती मनाने संबंधी प्रस्ताव पेश किया गया। दुनिया के सबसे शक्तिशाली राष्ट्र अमेरिका के मुखिया ओबामा तो गाँधी जी के कायल हैं। उनकी मानें तो अगर भारत में अहिंसात्मक आंदोलन नहीं होता तो अमेरिका में नागरिक अधिकारों के लिए वैसा ही अहिंसात्मक आंदोलन देखने को नहीं मिलता। निश्चितत: दुनिया का यह दृष्टिकोण आज के दौर में शान्ति व अहिंसा के पुजारी महात्मा गाँधी के विचारों की प्रासंगिकता को सिद्ध करता है।
15 अगस्त 1947 को आजादी प्राप्त कर गाँधी जी ने समूचे विश्व को दिखा दिया कि हिंसा जो सभ्य समाज के अस्तित्व को नष्ट करने का खतरा उत्पन्न करती है, का विकल्प ढूँढऩे के लिए स्वयं की पड़ताल करने का भी एक प्रयास होना चाहिए। गाँधी जी सत्य, अहिंसा, स्वदेशी, स्वराज्य व रचनात्मक कार्यक्रमों के कायल थे। इन सभी सिद्धान्तों को उन्होंने न सिर्फ वैचारिक धरातल पर उतारा बल्कि उनमें अन्तरसम्बन्ध भी स्थापित किया।
गाँधी जी को 'महात्मा' की उपाधि से सर्वप्रथम विभूषित करने वाले रवीन्द्र नाथ टैगोर ने कहा था कि- 'गाँधी जी एक राजनीतिज्ञ, संगठनकर्ता, जनमानस के नेता और नैतिक सुधारक के रूप में महान हैं, परन्तु वह मनुष्य के रूप में उससे भी अधिक महान हैं। यद्यपि वह असाध्य रूप से आदर्शवादी थे और अपने निश्चित मापदण्डों द्वारा प्रत्येक कार्य को मापते थे, फिर भी वह मानव प्रेमी हैं न कि खोखले विचारों के प्रेमी।' गाँधी जी सत्य के बहुत बड़े प्रणेता थे और इसके लिये अहिंसा के तरीकों के पक्षपाती थे। सत्याग्रह उनके लिए मात्र नीति नहीं, सिद्धान्त था। वस्तुत: सत्याग्रह के माध्यम से गाँधीजी ने महात्मा बुद्ध, महावीर व तमाम महापुरूषों द्वारा प्रतिपादित अहिंसा के सिद्धान्त को सामाजिक व राष्ट्रीय शक्ति में तब्दील कर दिया। पाश्चात्य विचारक थोरो की व्यक्तिगत सविनय अवज्ञा की अवधारणा को सामाजिक शक्ति में बदलकर ऐसा बेमिसाल जनजागरण पैदा किया जो दीर्घकाल तक अवश्य चलता है, पर असफल नहीं होता। स्वयं गाँधी जी का मानना था कि- 'सत्याग्रह एक ऐसा आध्यात्मिक सिद्धान्त है जो मानव मात्र के प्रेम पर आधारित है। इसमें विरोधियों के प्रति घृणा की भावना नहीं है।' अहिंसा गाँधी जी का प्रमुख सत्याग्रही हथियार था। गाँधी जी के लिये अहिंसा, हिंसा का निषेध मात्र नहीं थी बल्कि एक जीवन पद्धति थी। वे अक्सर कहा करते थे कि आज की दुनिया में जितने लोग जीवित हैं, वे बताते हैं कि दुनिया का आधार हथियार बल नहीं है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण तो यही है कि दुनिया इतने हंगामों के बाद भी टिकी हुई है।
अन्ना के नेतृत्व में चला अन्दोलन एक बार फिर से महात्मा गाँधी जी के सत्य, अहिंसा और सत्याग्रह की प्रासंगिकता को रेखांकित करता है। आखिर जिस पीढ़ी ने गाँधी जी के बारे में मात्र सुना हो, उनके लिए यह अन्दोलन एक रोमांच भी था और आश्चर्य भी।
गाँधी जी की अहिंसा कायरता का प्रतीक नहीं बल्कि अन्तश्चेतना व आत्मा में विश्वास करने वाली वीरता का परिचायक है। उन्होंने इसे व्याख्यायित करते हुये लिखा कि- 'यद्यपि अहिंसा का अर्थ क्रियात्मक रूप से जानबूझकर कष्ट उठाना है, तथापि यह सिद्धान्त दुराचारियों के सामने हथियार डालने का समर्थन नहीं करता। इसके विपरीत यह दुराचारी का पूर्ण आत्मबल से सामना करने की प्रेरणा देता है। इस सिद्धान्त को मानने वाला व्यक्ति अपनी इज्जत, धर्म और आत्मा की रक्षा के लिए एक अन्यायपूर्ण साम्राज्य सहित समस्त शक्तियों को भी चुनौती दे सकता है और अपने पराक्रम द्वारा उसके पतन के बीज भी बो सकता है।' बताते हैं कि जब इटली के तानाशाह मुसोलिनी के आग्रह पर गाँधी जी उससे मिलने गये, तो कईयों ने उन्हें समझाया कि एक अहिंसक व्यक्ति का हिंसक व्यक्ति से मिलना उचित नहीं। पर गाँधी जी ने जवाब दिया कि हिंसक व्यक्ति से हिंसा ज्यादा खतरनाक है और हमारा उद्देश्य सत्य व अहिंसा के माध्यम से अहिंसा को खत्म करना है। गाँधी जी तीन लोगों के साथ मुसोलिनी से मिलने गये, जबकि वहाँ कुर्सियाँ सिर्फ दो थीं। जब मुसोलिनी ने गाँधी जी से बैठने का आग्रह किया तो गाँधी जी ने अपने साथ आये तीनों लोगों को कुर्सी की तरफ इशारा करते हुये बैठने को कहा। मुसोलिनी का सोचना था कि कुर्सी पर सिर्फ गाँधी जी और वो बैठेगा, पर गाँधी जी अपने साथ के तीन अन्य मेहमानों की खातिर कुर्सी पर बैठने को राजी नहीं हुये और अन्तत: मुसोलिनी को तीन अन्य कुर्सियाँ मँगवानी पड़ी। वाकई यह रोचक घटनाक्रम दुनिया के सबसे बड़े तानाशाह और एक अहिंसक सत्याग्रही के बीच घटा था, जिसने तानाशाह को एक सत्याग्रही की बात मानने पर मजबूर कर दिया।
मानव इतिहास पर गाँधी जी का प्रभाव हिटलर और स्तालिन के प्रभाव से अधिक होगा।' आज की नयी पीढ़ी गाँधी जी को एक नए रूप में देखना चाहती है। वह उन्हें एक सन्त के रूप में नहीं वरन व्यवहारिक आदर्शवादी के रूप में प्रस्तुत कर रही है। 'लगे रहो मुन्ना भाई' जैसी फिल्मों की सफलता कहीं- न- कहीं युवाओं का उनसे लगाव प्रतिबिम्बित करती है। आज भी दुनिया भर के सर्वेक्षणों में गाँधी जी को शीर्ष पुरूष घोषित किया जाता है। हाल ही में हिन्दू- सीएनएन, आईवीएन द्वारा 30 वर्ष से कम आयु के भारतीय युवाओं के बीच कराए गए एक सर्वेक्षण में 76 प्रतिशत लोगों ने गाँधी जी को अपना सर्वोच्च रोल मॉडल बताया। बीबीसी द्वारा भारत की स्वतंत्रता के 60 वर्ष पूरे होने पर किये गये एक सर्वेक्षण के मुताबिक आज भी पाश्चात्य देशों में भारत की एक प्रमुख पहचान गाँधी जी हैं। आँकड़े गवाह हैं कि विश्व भर में हर साल गाँधी जी व उनके विचारों पर आधारित लगभग दो हजार पुस्तकों का प्रकाशन हो रहा है एवं हाल के वर्षों में गाँधी जी की कृतियों का अधिकार हासिल करने के लिये प्रकाशकों व लेखकों के आवेदनों की संख्या दो गुनी हो गई है। यही नहीं तमाम पाश्चात्य देशों में गाँधीवाद पर विस्तृत अध्ययन हो रहे हैं, तो भारत में सुन्दरलाल बहुगुणा, अन्ना हजारे, मेघा पाटकर, अरूणा राय से लेकर संदीप पाण्डे तक तमाम ऐसे समाजसेवियों की प्रतिष्ठा कायमहै, जिन्होंने गाँधीवादी मूल्यों द्वारा सामाजिक अन्दोलन खड़ा करने की कोशिशें कीं।
आजादी की लड़ाई की निशानी गाँधी टोपी जो नेताओं के सिर से गायब हो गई थी उसे जन लोकपाल के समर्थन में आमरण अनशन कर रहे समाज सेवी अन्ना हजारे ने एक बार फिर से जीवंत कर दिया। जींस कुर्ता पहने और सिर पर गाँधी टोपी तथा हाथ में तिरंगा लिये युवाओं को सड़कों पर जुलूस के रूप में देखना एक नए भारत का अहसास करा रहा था।
हाल ही में भारत में हुए अन्ना हजारे के अन्दोलन ने एक बार फिर से गाँधी जी तथा उनके अनशन, उपवास और सत्याग्रह को प्रासंगिक बना दिया। यह स्वाभाविक भी है कि कोई आंदोलन अपने आपको अपने देशकाल से और इतिहास से जोड़े। उपभोक्तावादी समाज में जहाँ लोग यह मान बैठे थे कि अब मूल्यों और आदर्शों का कोई अर्थ नहीं रहा, वहाँ 77 साल के बुजुर्ग अन्ना ने समाज में दिनों- ब- दिन बढ़ रहे भ्रष्टाचार और उसके समाधान हेतु जन- लोकपाल की व्यवस्था के समर्थन में लोगों को आंदोलित कर दिया। यही कारण था कि देश का राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा जो स्वतंत्रता और गणतंत्र दिवस जैसे पर्वों पर ही दिखाई देता था और आजादी की लड़ाई की निशानी गाँधी टोपी जो नेताओं के सिर से गायब हो गई थी उसे जन लोकपाल के समर्थन में आमरण अनशन कर रहे समाज सेवी अन्ना हजारे ने एक बार फिर से जीवंत कर दिया। जींस कुर्ता पहने और सिर पर गाँधी टोपी तथा हाथ में तिरंगा लिये युवाओं को सड़कों पर जुलूस के रूप में देखना एक नए भारत का अहसास करा रहा था। आखिर हो भी क्यों न, अन्ना के अनशन के बहाने एक लम्बे समय बाद जाति, धर्म, प्रान्त, दल से परे लगभग पूरा देश को एकजुट होकर खड़ा हो गया। जहाँ यह माना जाने लगा था कि लोग आजादी की कीमत भूलकर अपने- अपने ड्राइंग रूम में कैद हो गए हैं, वहाँ हर कोई आन्दोलन में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करने को उतावला हो उठा।
इस अन्दोलन का सबसे बड़ा गाँधीवादी पहलू यह रहा कि यह आन्दोलन बिना किसी हिंसा और टकराव के अहिंसक रूप में चला, ऐसे में भारत ही नहीं पूरी दुनिया की निगाह इस पर टिकनी स्वाभाविक थी। हाल के दिनों में जिस तरह तमाम देशों में हिंसक आंदोलन और क्रांतियाँ हुई हैं, वहाँ अन्ना के नेतृत्व में चला अन्दोलन एक बार फिर से महात्मा गाँधी जी के सत्य, अहिंसा और सत्याग्रह की प्रासंगिकता को रेखांकित करता है। आखिर जिस पीढ़ी ने गाँधी जी के बारे में मात्र सुना हो, उनके लिए यह अन्दोलन एक रोमांच भी था और आश्चर्य भी। दुनिया के तमाम देशों ने अन्ना हजारे के इस अन्दोलन का न सिर्फ नोटिस लिया, बल्कि एक बार कहा भी कि यह गाँधी जी के देश में गाँधी जी की तर्ज पर चल रहा जन अन्दोलन है। पाकिस्तान जैसे पड़ोसी देश में भी लोग अन्ना से सीख लेकर गाँधी जी की तर्ज पर अब सत्याग्रह कर रहे हैं। आखिर वे कैसे भूल सकते हैं कि गाँधी जी ने कितने दर्द के साथ इस विभाजन को स्वीकारा था। यहाँ तक कि संयुक्त राष्ट्र महासभा में अपने भाषण में अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भी अन्ना हजारे के अन्दोलन की चर्चा की। अन्ना हजारे के इस आन्दोलन ने इतना तो सिद्ध ही कर दिया है कि आज जरूरत गाँधीवाद को समझने की है न कि उसे आदर्श मानकर पिटारे में बन्द कर देने की। स्वयं गाँधी जी का मानना था कि आदर्श एक ऐसी स्थिति है जिसे कभी भी प्राप्त नहीं किया जा सकता बल्कि उसके लिए मात्र प्रयासरत रहा जा सकता है। वस्तुत: सत्य, प्रेम व सहिष्णुता पर आधारित गाँधी जी के सत्याग्रह, अहिंसा व रचनात्मक कार्यक्रम के अचूक मार्गों पर चलकर ही विश्व में व्याप्त असमानता, शोषण, अन्याय, भ्रष्टाचार, आतंकवाद, दुराचार, नक्सलवाद, पर्यावरण असन्तुलन व दिन- ब- दिन बढ़ते सामाजिक अपराध को नियंत्रित किया जा सकता है।
गाँधी जी द्वारा रचनात्मक कार्यक्रम के जरिए विकल्प का निर्माण आज पूर्वोत्तर भारत व जम्मू- कश्मीर जैसे क्षेत्रों की समस्याओं, नक्सलवाद व घरेलू आतंकवाद से निपटने में जितने कारगार हो सकते हैं उतना बल- प्रयोग नहीं हो सकता। गाँधी जी दुनिया के एकमात्र लोकप्रिय व्यक्ति थे जिन्होंने सार्वजनिक रूप से स्वयं को लेकर अभिनव प्रयोग किए और आज भी सार्वजनिक जीवन में नैतिकता, आर्थिक मुद्दों पर उनकी नैतिक सोच व धर्म- सम्प्रदाय पर उनके विचार प्रासंगिक हैं। तभी तो भारत के अन्तिम वायसराय लार्ड माउण्टबेटन ने कहा था- 'गाँधी जी का जीवन खतरों से भरी इस दुनिया को हमेशा शान्ति और अहिंसा के माध्यम से अपना बचाव करने की राह दिखाता रहेगा।'
संपर्क- निदेशक भारतीय डाक सेवा,
अंडमान-निकोबार द्वीप समूह,
पोर्टब्लेयर-744101 मो.- 09476046232
Email - kewalkrishna70@gmail.com


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