July 12, 2011

मेरे बचपन की शाम

- डॉ. राजीव श्रीवास्तव

अठखेलियां करती, खिलखिलाती,
कभी हँसाती, कभी रूलाती,
बहुत याद आती है,
मुझे मेरे बचपन की शाम।
शाम का इंतजार सुबह से ही रहता था,
क्योंकि दिन का सबसे हंसी पल होता था,
बार- बार घड़ी देखते,
और जैसे ही शाम होने का अंदेशा होता,
बाहर आते और दोस्तों को पुकारते।
एक ही पुकार में सभी जमा हो जाते,
मानो इसी का इंतजार हो,
और फिर शुरू हो जाती एक और शाम,
अपने और दोस्तों के नाम।
हमारे खेल बड़े अजीब थे,
याद आता है आम का वो पेड़,
जिस पर 'डोला-पाती' खेलते थे,
एक- डाल से दूसरी डाल पे जाते,
और पकडऩे वाले को खूब छकाते।
और वो 'गुल्ली- डंडा' का खेल,
किसी क्रिकेट से कम नहीं था,
वो डंडे का गुल्ली पर लगना,
और 'टक' की आवाज,
आज भी कानों में गूँजती है।
लूका- छुपी किसे याद नहीं
दूर- दूर भागते, और छिप जाते
फिर दबे पांव आते और
ढूँढऩे वाले की पीठ पर
जोर से मारते, ओए वो झल्ला जाता।
'पीट्ठू' क्या खेल था?,
वो पत्थरों का कीला बनाना,
जो गेंद से ढह जाता,
फिर शुरू होती जंग,
किला दुबारा बनाने की।
'कंचे' रंग बिरंगे गोल- गोल,
छोटे बड़े कई आकर के उंगली में दबा कर,
जोर से मारते, वो जा के सटीक लगता,
और कंचे हो गये अपने।
आज जब घर से बाहर देखता हूँ,
बच्चे ना जाने कौन- सा खेल खेलते हैं,
ज्यादातर बच्चे तो शाम को घर में ही रहते हंै,
क्योंकि उनका दोस्त उनके साथ ही रहता है,
अरे वो वीडियो- गेम्स, कंप्यूटर,
यही तो इनके दोस्त हैं।
इन नये अविष्कारों ने बच्चों से,
इनका बचपन छीन लिया है,
आज वैसी शाम नहीं आती,
आज वैसे खेल नहीं खेले जाते।
जब तक कपड़े गंदे ना हो,
जब तक पसीना झरने की तरह ना बहे,
तो वो खेल कैसा... वो शाम कैसी...
आज बहुत याद आती है,
मुझे मेरे बाचपन की शाम।

मेरे बारे में -

मैं पेशे से डॉक्टर हूं और लगभग 14 सालों से मेडिकल कॉलेज मैं काम कर रहा हूं। मैंने अब तक तीन पुस्तकें चिकित्सा से संबंधित लिखी हैं। मेरा एक उपन्यास प्रकाशित होने वाला है। मेरी कविताएं विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। कविताएं हमारे आसपास हो रही घटनाओं पर आधारित होती हैं। मेरी यही कोशिश रहती है कि कविता के माध्यम से लोगों को संदेश दे सकूं। पता- टाइप 4 के-5 मेडिकल कॉलेज कैंपस, रामपुर रोड हलद्वानी- नैनीताल।
मो. 09837068484, Email- rajivtanu2003@yahoo.co.in

0 Comments:

लेखकों से... उदंती.com एक सामाजिक- सांस्कृतिक वेब पत्रिका है। पत्रिका में सम- सामयिक लेखों के साथ पर्यावरण, पर्यटन, लोक संस्कृति, ऐतिहासिक- सांस्कृतिक धरोहर से जुड़े लेखों और साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे कहानी, व्यंग्य, लघुकथाएँ, कविता, गीत, ग़ज़ल, यात्रा, संस्मरण आदि का भी समावेश किया गया है। आपकी मौलिक, अप्रकाशित रचनाओं का स्वागत है। रचनाएँ कृपया Email-udanti.com@gmail.com पर प्रेषित करें।
माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास माटी समाज सेवी संस्था, समाज के विभिन्न जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती है। पिछले वर्षों में संस्था ने समाज से जुड़े विभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण, प्रदूषण आदि क्षेत्रों में काम करते हुए जागरुकता लाने का प्रयास किया है। माटी संस्था कई वर्षों से बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में “साथी समाज सेवी संस्था” द्वारा संचालित स्कूल “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपए तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक लोग पिछले कई सालों से उक्त गुरूकुल के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। अनुदान देने वालों में शामिल हैं- अनुदान देने वालों में शामिल हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (U.K.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर, रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी, रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से स्कूल जाने में असमर्थ बच्चे शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होंगे ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेंगे। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ.ग.) मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

उदंती.com तकनीकि सहयोग - संजीव तिवारी

टैम्‍पलैट - आशीष