August 26, 2010

पीपली लाइव के बहाने...- छत्तीसगढ़ी फिल्मों का सोनहा बिहान

पीपली लाइव के बहाने...
साहित्य, कला और संस्कृति की तरह फिल्मों को भी समाज का दर्पण कहा जाता है और यदि बात क्षेत्रीय फिल्मों की हो तो उसमें उस प्रदेश की माटी की खूशबू बसी होती है। यदि छत्तीसगढ़ी फिल्मों के इतिहास पर नजर दौड़ाएं तो इसका आरंभिक दौर काफी समृद्ध रहा है। उदंती के इस अंक में प्रसिद्ध कथाकार एवं साहित्यकार डॉ। परदेशी राम वर्मा, जो लगातार क्षेत्रीय मुद्दों पर भी अपनी कलम चलाते हैं ने छत्तीसगढ़ी फिल्मों के इतिहास पर प्रकाश डाला है। उनका यह आलेख इसलिए भी सामयिक बन जाता है क्योंकि हाल ही में प्रदर्शित आमीर खान प्रोडक्शन की फिल्म 'पीपली लाइव' के बहाने छत्तीसगढ़ के लोक गीतों और लोक कलाकारों पर बात करने के लिए एक बार फिर मुद्दा मिल गया है। कला धर्मी राहुल सिंह ने इस फिल्म में शामिल छत्तीसगढ़ के एक लोक गीत चोला माटी के हे राम... के सांस्कृतिक पृष्ठभूमि पर प्रकाश डाला है तो पत्रकार राजेश अग्रवाल ने छत्तीसगढ़ की समृद्ध सांस्कृतिक और कलात्मक धरोहर को भुलाते चले जाने पर आक्रोश व्यक्त किया है। इन तीनों लेखों के माध्यम से अपने प्रदेश की कला एवं संस्कृति से प्रेम करने वालों से अनुरोध करते हैं कि इस विषय पर नए सिरे से चर्चा करें।
- संपादक
इतिहास के आइने में
छत्तीसगढ़ी फिल्मों का सोनहा बिहान
- डॉ. परदेशी राम वर्मा
छत्तीसगढ़ी की पहली फिल्म 'कहि देबे संदेश' एक संदेशपरक फिल्म थी जिसमें छत्तीसगढ़ की उदारता और सहिष्णुता का संदेश था। चालीस वर्ष पूर्व दो भिन्न जातियों के बीच वैवाहिक मेल की कहानी इस फिल्म में थी। हम देख रहे हैं कि चालीस वर्षों बाद छत्तीसगढ़ में अंतर्जातीय विवाह की स्वीकृति तेजी से बढ़ी है।
छत्तीसगढ़ राज्य नौ वर्ष पूर्व बना मगर छत्तीसगढ़ी फिल्मों का सफर चार दशक पूर्व प्रारंभ हो गया था। साहित्य एवं संस्कृति के पुरोधा लगातार सैकड़ों वर्षों से छत्तीसगढ़ राज्य बनाये बैठे थे। संभवत: इसीलिए छत्तीसगढ़ इस तरह शांतिपूर्ण ढंग से अस्तित्व में आ सका।
एक लंबी रचनात्मक प्रक्रिया से गुजर कर बना है हमारा छत्तीसगढ़। इसके निर्माण में भुला दिए जा रहे महान धरतीपुत्रों का योगदान है। इनमें मनु नायक निर्मित पहली छत्तीसगढ़ी फिल्म 'कहि देबे संदेश' के कवि डॉ. हनुमंत नायडू और दूसरी छत्तीसगढ़ी फिल्म 'घर द्वार' के गीतकार हरि ठाकुर ऐसे साधक हैं जिन्हें राज्य बनने के बाद यथोचित महत्व नहीं मिला।
आज जो फिल्में बन रही हैं उनके लिए आधारभूमि उपरोक्त दो फिल्मों से ही मिली। छत्तीसगढ़ी की पहली फिल्म 'कहि देबे संदेश' एक संदेशपरक फिल्म थी जिसमें छत्तीसगढ़ की उदारता और सहिष्णुता का संदेश था। चालीस वर्ष पूर्व दो भिन्न जातियों के बीच वैवाहिक मेल की कहानी इस फिल्म में थी। हम देख रहे हैं कि चालीस वर्षों बाद छत्तीसगढ़ में अंतर्जातीय विवाह की स्वीकृति तेजी से बढ़ी है। मनु नायक 'कहि देबे संदेश' के निर्माता थे। मनु नायक ने अपनी फिल्म में जिन कलाकारों को अवसर दिया वे आज भी छत्तीसगढ़ी फिल्म के लिए अनिवार्य बने हुए हैं। उनमें शिवकुमार दीपक प्रमुख हैं। शिवकुमार दीपक ने कहि देबे संदेश के बाद 'घर द्वार' में भी श्रेष्ठ अभिनय किया। घर द्वार के निर्देशक निर्जन तिवारी थे। निर्माता विजय पांडे एवं निर्देशक निर्जन तिवारी ने घर द्वार में छत्तीसगढ़ के टूटते परिवार की कहानी को प्रमुखता से चित्रित किया। इन दोनों छत्तीसगढ़ी फिल्मों में छत्तीसगढ़ की अस्मिता के लिए संघर्ष करने वाले भावना प्रधान लोगों ने अपना योगदान दिया। बसंत दीवान ने भी फिल्म घर द्वार में अभिनय किया था।
'कहि देबे संदेश' के गीतों को लिखा दुर्ग में अध्यापकीय पेशे से जुड़कर अंचल के साहित्यकारों में विशेष स्थान बनाने वाले डॉ. हनुमंत नायडू ने। 'बिहनिया के उगत सुरूज देवता',
'झमकत नदिया बहिनी लागे,' और 'मोर अंगना के सोन चिरइया बेटी' जैसे सर्वकालिक गीतों को हनुमंत ने लिखा। छत्तीसगढ़ की आंतरिक शक्ति और उसकी विशिष्ट बनावट को भी हम इस फिल्म के चर्चित स्तंभों के माध्यम से जान समझ सकते हैं। हनुमंत जन्मना गैर छत्तीसगढ़ी व्यक्ति थे। छत्तीसगढ़ के गीतकारों के आदर्श बनकर वे मील के पत्थर बन गए। माधवराव सप्रे ने हिन्दी की पहली कहानी छत्तीसगढ़ी पृष्ठभूमि पर रची। 'टोकरी भर मिट्टी' का कथानक छत्तीसगढ़ से जुड़ा हुआ है। यह कहानी हिन्दी कहानी जगत की पहली कृति मानी जाती है। हनुमंत नायडू और माधवराव सप्रे ने छत्तीसगढ़ की आत्मा की पहचान ठीक पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी की तरह की। कौन कहां जन्मा, किसके पुरखे कहां से आये इस तरह के अनुपयोगी और संभ्रम फैलाने वाले कमजोर सवालों के भरपूर उत्तर देने वाले ये छत्तीसगढ़ के लाल अंचल की सर्वाधिक चमत्कार तस्वीर बना सके।
'कहि देबे संदेश' के बाद आई फिल्म 'घर द्वार' की गीत रचयिता छत्तीसगढ़ के लिए मर मिटने वाले सपूत हरि ठाकुर थे।
'लोटा लेके आने वाला, इहां टिकाइन बंगला,
जांगर टोर कमाने वाला, हे कंगला के कंगला'
इसी व्यथा को कविताओं में लगातार विस्तार देने वाले हरि ठाकुर ने घर द्वार में 'गोंदा फुलगे मोर राजा', 'सुन सुन मोर मया पीरा के संगवारी रे' तथा 'आज अधरतिया मोर फुलवारी म' जैसे गीतों का सृजन कर उन लोगों को चकित कर दिया जो उन्हें श्रृंगार गीत रचने में माहिर मानने को तैयार नहीं थे। वैचारिक आलेखों के लिए वंदित एवं अपने चर्चित कई शोध गंरथों के लिए सम्मान प्राप्त हरि ठाकुर ने खुले मन से फिल्म माध्यम को स्वीकार किया। मर्यादा में रहकर संकेतों के माध्यम से श्रृंगार गीतों को रचने का कीर्तिमान हरि ठाकुर ने बनाया।
उपरोक्त दोनों फिल्मों में छत्तीसगढ़ की सच्ची तस्वीर देखते
ही बनती है। छत्तीसगढ़ में फिल्म निर्माण के क्षेत्र में एक लंबा अंतराल आया। 'मोर छइयां भुइंया' फिल्म 'घर द्वार' बनने के तीन दशक बाद आई। तब छत्तीसगढ़ राज्य बनने की धमक अपने पूरे प्रभाव के साथ सुनी-सुनाई जा रही थी। ऐसे दौर में आई यह फिल्म सुपरहिट साबित हुई। इस फिल्म की सफलता से एक नई शुरुआत हुई। उसके बाद 'मया' शब्द को लेकर तीन- चार फिल्में आई। जिसमें से अधिकांश अच्छी चली।
छत्तीसगढ़ी फिल्मों का यह प्रारंभिक दौर है। फिल्म निर्माण के क्षेत्र में आज के दौर में दृष्टि संपन्न समर्थ व्यक्ति नहीं हैं। पैसा लगाकर उससे लाभ कमाने का ही मुख्य उद्देश्य और संघर्ष उनके सामने है। आज के दौर में लगभग सभी फिल्मों में प्रभावी कथा तत्व का अभाव झलकता है। भाषा के मानकीकरण की तरह ही संस्कृति के क्षेत्र में भी स्तर की चिंता चिंतकों को होती है।
छत्तीसगढ़ी फिल्मों में छत्तीसगढ़ी भाषा का तो प्रयोग हो रहा है मगर छत्तीसगढ़ की धड़कन इन फिल्मों में नहीं होती। तीज- त्यौहार, रीति-रिवाज और परंपराओं को भी फिल्मी रंग देते समय निर्माता को केवल फिल्म की सफलता की चिंता रहती है। और इसी चिंता में फूहड़ नृत्य, दुहरे अर्थों के संवाद, नकली दृश्य और अतिरेकपूर्ण भड़ौनी गीतों का भरपूर फिल्मांकन किया जाता है। छत्तीसगढ़ के चिर-परिचित दर्शनीय स्थलों के बदले गलत लोकेशन का चुनाव भी फिल्मकार करते हैं।
छत्तीसगढ़ में देश के किसी भी प्रांत से टक्कर ले सकने वाले मोहक और नयनाभिराम दृश्यवलियों वाले प्रक्षेत्र हैं। वे फिल्मों में कहीं नहीं दिखते। नृत्य कुशल, अनगढ़ भाषा से काम चलाने वाले कलाकारों को साथ लेकर फिल्में बनाई जाती हैं। फिल्म में पैसा लगता है और पैसा छत्तीसगढ़ी के जानकार लोगों के पास नहीं है। इसलिए समझौता अपरिहार्य है।
लेकिन निराशा के बावजूद इन सब परेशानियों से जूझते हुए कुछ फिल्में तो बन ही रही हैं जिन्हें लोग अपना समर्थन देकर राह बनाते चल रहे हैं। हम सबको आशा है शीघ्र ही परिपक्व दौर भी आयेगा जब अंचल में दृष्टि संपन्न निर्देशक और समर्थ निर्माता उभरेंगे। तब होगा छत्तीसगढ़ी फिल्मों का सोनहा बिहान।

पता : एल आई जी-18,
आमदीनगर, हुडको,
भिलाई 490009 (छ.ग.)
मोबाइल- 98279 93494

ब्लॉग- agasdiya.blogspot.com

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2 Comments:

At 05 September , Blogger खबरों की दुनियाँ said...

अच्छी जानकारी ,धन्यवाद । बधाई ।

 
At 26 October , Blogger N Navrahi/एन नवराही said...

क्षेत्रीय सिनेमा के बारे में लिखतें पहल के आधार पर प्रकाशित होनी चाहिएं। हिंदी सिनेमा के बारे में तो हर जगह पढ़ने को मिल जाता है, पर क्षेत्रीय पर मैटर ढूंढ़ना मुश्‍िकल हो जाता है।
उदंती की अच्‍छी पहल के लिए बधाई।

नव्‍यवेश नवराही, जालंधर

 

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