May 24, 2010

कविता

- रामेन्द्र जनवार
मां चाहती है
यूं ही बना रहे
गोबर लिपा आंगन
लगा रहे आंगन में
तुलसी का बिरवा

मां चाहती है
मुंडेर पर जब- तब
आता रहे कागा
बना रहे घर में
अपनों का आना- जाना

मां चाहती है
आंगन के छप्पर से
चुन-चुन कर तिनके
नन्ही गौरैया बेखौ
बनाती रहे घोंसला अपना

मां यही चाहती है
कि बची रहें संवेदनायें
कायम रहे सरोकार
बनी रहे दुनिया सारी

मां चाहती है
कि हर घर के आंगन में
चहकती हुई, फुदकती हुई
बांटती रहे खुशियां यूं ही
मासूम नन्ही गौरैया

गौरैया बहुत परेशान
सूखे सूखे ताल पोखर
सूने खलिहान
बीघा भर धरती में
मुठ्ठी भर धान
चुग्गा-चाई का कहीं
ठौर ना ठिकान
गौरैया बहुत परेशान

कौन जाने कहां गए
मेघों के साए
तपती दुपहरिया
पंखों को झुलसाए
भारी मुश्किल में है
नन्ही सी जान
गौरैया बहुत परेशान

घनी-घनी शाखों पर
बाजों का डेरा
कहां बनाए जाकर
अपना बसेरा
मंजिल अनजानी है
रस्ते वीरान
गौरैया बहुत परेशान

1 Comment:

राजेश उत्‍साही said...

मां और गौरैया के बहाने कितनी सारी बाते रामेन्‍द्र जी इतना सहजता से कह गए कि पता ही नहीं चला। बहुत सुंदर कविता। बधाई।

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