December 02, 2009

ख्वाहिश


- आशीष दशोत्तर
ठोकर खाकर भी समझे हैं खुद को लोग सयाने कुछ,
लो, ऐसे ही लोग चले हैं दुनिया को समझाने कुछ।

पनघट, पीपल, कच्चे घर, कुछ गलियां छोटी-छोटी सी,
आंखों में यूं आ जाते हैं चलकर ख्वाब पुराने कुछ।

आजादी भी अब तो कितनी दूर तलक फैली देखो,
घर में यूं ही आ जाते हैं हरदम लोग डराने कुछ।

राम अगर हैं हमें बचा ले पल-पल होते दंगों से,
ऐसा ही तो कहती होंगी शायद रोज अजाने कुछ।

अपनी- अपनी ख्वाहिश को हर कोई पूरा कर माना,
उसके हिस्से में आए हैं घरवालों के ताने कुछ।

झण्डे, बैनर, जलसे, जमघट, बड़े- बड़े जयघोष हुए,
बीती रात सुलगते देखी हमने वहीं दुकाने कुछ।

मोटी सुई और पक्का धागा घर में हो तो ले आओ,
इसकी- उसकी और उसकी भी सिल दो आज ज़ुबाने कुछ।

2 Comments:

Anonymous said...

सुन्दर कविता...सुंदर भाव..बधाई!

Ajay said...

Bhavpravan aur sunder samyaik kavita hai. kavi ko is rachna ke liye badhai.

Dr. Ajay Pathak, Bilaspur, Chhattisgarh

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