July 18, 2009

पर्दे से निकलकर मुक्केबाजी में चैम्पियन

- अजीता मैनन
14 वर्षीय, जैनब फातिमा ने दक्षिण कोलकता के व्यस्त किड्डरपुर बाजार क्षेत्र में एक लड़कियों से छेड़छाड़ करने वाले को जबरदस्त घूसे से दांत तोड़कर चकित कर दिया। इस मुस्लिम बहुतायत क्षेत्र में दर्शकों ने लड़की की प्रशंसा की और आगे बढ़ गए। लड़कियों से छेड़छाड़ करने वाले को मालूम न था कि जैनाब व उसकी तीनों बहनें प्रशिक्षित मुक्केबाज हैं, जो कि किड्डरपुर के स्कूल ऑफ फीजिकल कल्चर में घण्टों कठिन अभ्यास करती हैं।
उनके पिता, मोहम्मद कैस (45) जो एक क्रेन चालक हैं, अपनी बेटियों को स्कूल भेजने में हिचकिचा रहे थे। उन्होंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि वे अपने बुरके से बाहर निकल कर मुक्केबाजी सीखेंगी। 'उनकी सामुहिक इच्छा शक्ति ऐसी थी कि मुझे उनकी इच्छा के आगे झुकना पड़ा। अब मुझे उनकी उपलब्धि पर गर्व हैं। कितने पिता यह दावा कर सकते हैं कि उनकी बेटियां राष्ट्रीय स्तर की मुक्केबाजी की चैम्पियन हैं?'
छोटी बहिन बुशरा फातिमा, 15 ने बताया कि बहनों में सबसे बड़ी ऐनल फातिमा ने 2004 में यह आरम्भ किया था। वह बादशाह खान शाताब्दि कन्या हाई स्कूल में अपने कक्षा की खिड़की से मुक्केबाजों को स्कूल ऑफ फीजिकल कल्चर के मुक्केबाजी घेरे में अभ्यास करते हुए देखा करती थी, उनमें से कुछ लड़कियां थीं। ऐनल (तब 14 की) मुक्केबाजी सीखना चाहती थी। उसने प्रवेश फॉर्म ले लिया व 'अब्बू' (पिता) के पास गई। वे बहुत गुस्सा हुए लेकिन बहुत समझाने पर, अंत में मान गए।  ऐनल जो अब 18 वर्ष की है और विवाहित है। इससे पहले उसने कई राज्य व राष्ट्रीय स्तर के मुक्केबाजी के मेडल व प्रशस्ति- पत्र प्राप्त किए। छोटी बहनें, जैनब 14, व सौग्रा 12 भी अब बुशरा के साथ मुक्केबाजी घेरे में शामिल हो गई हैं।
पूर्व मुक्केबाज व पश्चिम बंगाल एमेच्योर बॉक्सिंग फैडरेशन के सचिव, मेहराजुद्दीन अहमद, अपना दृष्टिकोण रखते हुए कहते हैं कि- इस इलाके में मुस्लिम लड़कियों के लिए, मुक्केबाजी न केवल मान्यता प्राप्त करने का साधन है वरन यह आय का भी स्रोत है- सामाजिक बंधनों से मुक्ति व अपनी महत्वाकांक्षा पूर्ण करने का माध्यम होने के साथ-साथ। 'परिवारों को यह समझ आ रहा है कि जहां मुक्केबाजी से औरतें अधिक स्वस्थ होती हैं, अपनी सुरक्षा करने में भी समर्थ होती हैं, वहीं विभिन्न प्रतियोगिताओं से मिलने वाली धनराशि से परिवार की आय भी बढ़ती है। इससे सख्त सामाजिक नियमों में ढिलाई में मदद मिलती है।' अहमद ने महिलाओं के लिए स्कूल में मुक्केबाजी 1998 में आरम्भ की थी। वे 150 से अधिक भावी मुक्केबाजों, जो स्कूल के काम चलाऊ घेरे में प्रशिक्षण लेते हैं, के वरिष्ठ कोच हैं। वर्ष 1998 से लगभग 40 महिलाओं ने मुक्केबाजी का प्रशिक्षण लिया और अनेक खेल प्रतियोगिताओं, जैसे कलिंग कप व अन्य राज्य व राष्ट्रीय मुक्केबाजी चैम्पियनशिप इत्यादि में प्रशंसा अर्जित की। 
जैनब बताती है  कि हमारे मण्डल में अधिकांश लड़कियां जैसे-तैसे स्कूली शिक्षा पूरी कर विवाह कर लेती हैं। लेकिन हमें मान्यता और अपने व अपने माता-पिता के लिए पहचान चाहिए थी। मैंने ऐसी लड़कियां देखी हैं जो मैडल जीतती हैं तो उनको समुदाय इज्जत देता है, मैडल के साथ धन भी आता है।
बुशरा, जिसके तीन छोटे भाई भी हैं, कहती है- 'जैनब व मैं हर
साल अपनी पढ़ाई व अन्य सभी के खर्च के लिए पर्याप्त पैसा जीतती हैं,' वह आगे बताती है, 'पिताजी की आय कभी भी सात बच्चों की शिक्षा के लिए पूर्ण नहीं होती थी। ऐनल ने मुक्केबाजी के माध्यम से रास्ता दिखाया और बाकी हम सभी उसके बताए रास्ते का अनुसरण कर रहीं हैं।' जैनब व बुशरा ने कलिंग कप में रजत मैडल व पुरस्कार राशि जीती है।
परंतु यह सब इतना आसान नहीं था। ऐेसी सामाजिक पृष्ठभूमि जिसमें लड़कियां पर्देे के पीछे रहती और दबे स्वर में रहती हैं, इन बहनों को कई साल लग गए सामाजिक अस्वीकृति पर विजय प्राप्त करने में। उनकी मां रूकसाना बेगम 40, एक गृहणी, जिसने अपनी जिन्दगी परदे में बिता दी, एकदम चकित सी रह गई। वह कहतीं है- मेरी बेटियां टी-शर्ट पहने सबके सामने मुक्केबाजी करती! मुझे सामाजिक बहिष्कार का डर था। लेकिन उन्होंने बताया कि अन्य मुस्लिम लड़कियां भी ऐसा कर रही हैं। बेशक कुछ ही। वास्तव में एक शुरूआत तो हुई। मुझे अपने जीवन में कोई अवसर नहीं मिला लेकिन मैं यह देख पाई कि मेरी बेटियां मुक्केबाजी से अपना भविष्य उज्जवल कर रहीं हैं। इसलिए मैं अपनी सहमति को रोक नहीं पाई। 
 बुशरा याद करती है, 'स्थानीय लोग पहले तो हमारे प्रयासों से कु्रद्ध थे। उन्होंने हमारे माता-पिता को सचेत किया था कि स्कूल में लड़कों के साथ मेल-जोल करके व अभद्र कपड़े पहन कर हम नैतिक तौर पर भ्रष्ट हो जाएंगे। जब हमने प्रतियोगिता जीतना आरम्भ किया तब हमारा नाम समाचार पत्रों में छपने लगा और हम पुरस्कार राशि के रू. 3, 500 से 11, 000  तक नियमित घर लाने लगे, हमने पाया कि लोग हमारे पास आने लगे और हमें बधाई देने लगे।'
परंतु शमीम मलिक 15, कहती है कि उसका अनुभव अलग था- मुझे अपने बड़े भाई व अन्य स्थानीय युवाओं से सहयोग मिला। उन्होंने बड़ों को बताया कि लैला अली, जो एक मुस्लिम लड़की है, एक अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की मुक्केबाज है। आज मुस्लिम युवा उन लड़कियों का सहयोग कर रहे हैं जो पढ़ रहीं हैं व व्यवसाय में आना चाहतीं हैं या खेल में अच्छी हैंं। शमीम दूसरे फायदे को भी स्वीकार करती है- मुझे यात्रा करना अच्छा लगता है। प्रतियोगिताों के लिए हमें पूर्ण प्रयोजन पर विभिन्न शहरों व नगरों में जाना होता है। सामान्य स्थिति में इतनें नए स्थानों को नहीं देख पाती, न ही इतने नए लोगों से मिल पाती।
 लेकिन कुछ दिक्कतें भी हैं। अहमद मानते हैं कि इन चैम्पियन मुक्केबाजों की सामाजिक आर्थिक स्थिति अत्यन्त दुखदायी है। उदाहरण के लिए फातिमा बहनें एक कमरे के घर में अपने भाइयों, माता-पिता व तीन बिल्लियों के साथ रहतीं हैं। उनको खुराक कम ही मिलती है- किसी भी स्थिति में एक मुक्केबाज की प्रामाणिक खुराक के बराबर नहीं। वे घर के सारे काम करतीं हैं, स्कूल जातीं हैं और फिर प्रति सायं तीन घण्टे का अभ्यास करना होता है। यह एक कठिन जीवन है, प्रबल इच्छा-शक्ति से ही इनको सफलता मिलती है। अधिक से अधिक वे स्कूल की 20 रुपए प्रतिमाह का अभ्यास शुल्क माफ कर सकते हंै। एम.पी. लोकल एरिया डेवेलपमेंट फण्ड ने स्कूल में एक व्यायामशाला प्रदान की है। जहां महिला मुक्केबाज अब नियमित रूप से अभ्यास व व्यायाम कर सकते हैं लेकिन पोषण व स्वास्थ्य देखरेख की समस्या अभी भी सुलझाई जानी बाकी है।
मुस्तरी बेगम, 46, भावी मुक्केबाज सिमी परवीन की मां कहती है, 'उसके चेहरे पर दो बार चोट आई है मुझे डर है कि कहीं जीवन भर के लिए दाग न रह जाए। हमें उसके विवाह के लिए लड़का ढूंढऩे में कठिनाई होगी। ट्रैकसूट में इधर-उधर घूमना पसंद करने वाली 14 वर्षीय सिमी अपनी मां की चिन्ता पर हंसती है और कहती है कि  'मैं एक-दो चोटों से नहीं घबराती।' इस मुस्कराहट के पीछे वास्तव में प्यारा सा सपना है- सिमी के पिता मोहम्मद सैफुद्दीन बैंक में सुरक्षा कर्मी हैं और वह कहती है कि, 'नौकरी करना चाहती हूं, और अपने पिता, जिन्होंने मुक्केबाजी में मेरा साथ दिया, को खुशी देना चहती हूं। महिला मुक्केबाजों के लिए रेलवे, पुलिस व आर्मी में नौकरियां हैं। यदि मैं एक अच्छी मुक्केबाज हूं, तो मैं जरूर ही नौकरी ढूंढ लूंगी।'
कितने ही पहले के मुक्केबाज, जैसे रजिया बेगम 22, को मुक्केबाजी रैफरी की नौकरी मिल गई है। लेकिन कइयों ने विवाह के लिए नौकरी छोड़ दी है। अहमद कहते हैं- 'यदि लड़कियां कटिबद्घ हों व मुक्केबाजी में बनी रहें, यह उनके लिए धन व प्रसिद्घी दिला सकता है,' वह आगे कहते हैं, 'एक खास उम्र के बाद लड़कियों को मुक्केबाजी घेरे में भेजने के लिए माता-पिता को मनाना बहुत कठिन है।' तथापि, महिला मुक्केबाजों की बढ़ती सफलता से सामाजिक बंधन धीरे-धीरे टूट रहे हैं। अभी 13 लड़कियां 13-15 के उम्र वर्ग में स्कूल में प्रशिक्षण ले रही हैं और वे सभी सम्भावित मैडल विजेता हैं। 
(विमेन्स फीचर सर्विस)

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