January 19, 2009

पैसा कमाना फिल्म निर्माण की बुनियादी शर्त है- महेश भट्ट

-मधु अरोड़ा

महेश भट्ट एक जाने माने फिल्म निर्माता-निर्देशक और लेखक हैं वे अपनी फिल्मों को लेकर हमेशा विवादों में रहते हैं उन्होंने अब तक जनम, सारांश, अर्थ, जख्म जैसी सार्थक फिल्में बनाई तो कई मसाला फिल्में भी बनाई। इसके पीछे वे कारण भी बतातें है कि सार्थक फिल्में बनाने से पेट नहीं भरता, जीने के लिए पैसा भी जरुरी है। प्रस्तुत है फिल्म और साहित्य को लेकर उनसे की गई बातचीत के अंश...

-महेशजी, आज तक पत्रकार आपसे आपकी फिल्मों, इंडस्ट्री में चल रही गॉसिप या फिर किसी विवाद के बारे में पूछते रहे हैं। मेरा सवाल सबसे हटकर है?

0 बेहतर है कि गॉसिप से हटकर सवाल पूछ रही हैं। गॉसिप वालों के लिये मुझ जैसे आदमी के पास कुछ होता नहीं है। न कोई रोमांस है, न ऐडवेंचर! एक स्ट्रगल है जो लगातार चलता जाता है।

-हिन्दी फिल्म जगत ने बांग्ला, तमिल, पंजाबी, अंग्रेजी साहित्य रचनाओं पर तो अच्छी और बड़ी फिल्में दी है, पर ऐसा क्यों है कि किसी भी बड़े फिल्मकार ने हिन्दी साहित्य की किसी भी कृति पर ऐसी कोई फिल्म नहीं बनाई, जैसे कि अंग्रेजी में Gone with the Wind‚ War and Peace‚ Plays of Shakespeare‚ Withering Heights‚ Novels of Dickens‚ Jane Austen and others बनाई हैं?

0 वह एक दौर था जब साहित्य की कृतियों पर फिल्में बनती थीं। अंग्रेजी, रूसी और बांग्ला कृतियों पर बहुत फिल्में बनीं। उस समय सिनेमा का इतना कमर्शियलाइजेशन नहीं हुआ था। फिल्मों की लागत भी कम होती थी। उस दौर में हिन्दी की कृतियों पर भी फिल्में बनीं। कम बनीं, मगर बनीं जरूर। 'चित्रलेखाÓ पर फिल्म बनी और बाद में प्रेमचंद के उपन्यासों और कहानियों पर भी फिल्में बनीं। लेकिन आज के दौर में एक जबरदस्त मॉडर्नाइजेशन आ गया है। जिंदगी बहुत ज्यादा भौतिकवादी और भोगवादी हो गयी है। कमर्शियल एक्सपोज बहुत बढ़ गया है। लागत बहुत बढ़ गयी है। बाजार में जिंदा रहने की जद्दोजहद बढ़ गयी है। कॉम्पिटीशन बहुत है। इधर साहित्य में भी ऐसा कुछ बेहतरीन लिखा नहीं जा रहा जिसका अपना कोई शाश्वत मूल्य हो या बोध हो मैं जानना चाहता हूं कि इस समय हिन्दी की ऐसी कौन सी कृति है जिस पर फिल्म बना कर मैं बाजार की जरूरतों को पूरा कर सकूंगा, एक तेज कॉम्पिटीशन में अपने आपको खड़ा रख सकूंगा। मुझे तो ऐसी कोई कृति नजर नहीं आती।

-आपके साथ जगदम्बाप्रसाद दीक्षित जैसे साहित्यकार मौजूद हैं, आपने भी उनकी या उनके द्वारा सुझाई गई किसी साहित्यिक कृति का इस्तेमाल फिल्म बनाने के लिए नहीं किया। ऐसा क्यों?

0 इस बात को फिर दोहराना चाहूंगा कि सिनेमा एक बहुत ही कमर्शियल माध्यम है। अच्छी साहित्यिक कृतियां सफल कमर्शियल फिल्में बन सकेंगी, इसमें शक की बहुत बड़ी गुंजाइश है। हम जोखिम तो लेते हैं, लेकिन संभावनाओं के आधार पर। फिल्म लोक माध्यम है, साहित्य लोक माध्यम नहीं है। अपने मूल रूप में साहित्य काफी कुछ एसोटिस्ट है। इसलिये यह जरूरी हो गया है कि हम दोनों को अलग-अलग मानकर देखें। सिनेमा का लोक पक्ष जैसे-जैसे हावी होता जा रहा है, लिखित साहित्य से उसकी दूरी बढ़ती जा रही है। साहित्यिक कृतियों पर इधर एक दो फिल्मों का रिमेक हुआ है। लेकिन सवाल पूछा जा सकता है कि इनका ओरिजिनल रूप कितना कुछ कायम रखा गया है। दीक्षित एक साहित्यिक लेखक हैं। फिल्मों में भी हम उनका हर संभव उपयोग कर रहे हैं। उनकी लिखी स्क्रिप्ट्स पर सबसे ज्यादा फिल्में मैंने ही बनायी हैं। यह सिलसिला आगे भी जारी रहेगा।

- मुंबई फिल्म इंडस्ट्री में अथाह पैसा है, फिर भी इंडस्ट्री ने पटकथा लेखन, डायलाग लेखन इत्यादि को विश्वविद्यालयों में विषम के तौर पर लगवाने की मुहिम क्यों नहीं शुरू की?

0 हम लोग फिल्में बनाते हैं। जरूरी होने पर भी बहुत सी मुहिमें शुरू करना हमारा काम नहीं है। अथाह पैसा होने से ही सब कुछ नहीं हो जाता। यह शिक्षा शास्त्रियों का काम है कि फिल्म लेखन को वे आम शिक्षा का विषय बना दें। कई जगह ऐसा किया भी गया है। 'मास कम्यूनिकेशन' की शिक्षा का काफी विस्तार हो रहा है। जगह-जगह कॉलेजों में इसके विभाग खुल रहे हैं जहां फिल्म कला की शिक्षा दी जा रही है।

-इसी से जुड़ा एक और सवाल है कि ज्यादातर फिल्म कंपनियों के स्टोरी डिपार्टमेंट बेहद कमजोर हैं। वे अभी भी गुलशन नंदाई अन्दाज से बाहर नहीं आ पाये है। ऐसा क्यों?

0 फिल्म कंपनियों के स्टोरी डिपार्टमेंट कमजोर हैं या नहीं, इसका फैसला फिल्म उद्योग से बाहर रहने वाले लोग नहीं कर सकते। इसका फैसला तो वह जनता करती है जो फिल्में देखती है। फिल्म चलती है तो इसका मतलब है कि स्टोरी वालों ने अच्छा काम किया है। बुरा काम करते हैं तो फिल्म पिट जाती है। गुलशन नंदा को बुरा क्यों कहती हैं? उन्होंने बहुत सी हिट फिल्में दी हैं। किसी ऊंचे टावर में बैठकर आम लोग इस बात का फैसला नहीं कर सकते कि यह अच्छा है, यह घटिया या कमजोर है।

-राधाकृष्ण प्रकाशन ने एक नई विधा शुरू की है, जिसे मंजरनामा कहा जाता है, यानि कि गुलजार साहब की आंधी के स्क्रीनप्ले का प्रकाशन। क्या आप भी सोचते हैं कि सारांश, अर्थ, डैडी जैसी फिल्मों का मंजरनामा होना चाहिये?

0 'सारांश', 'अर्थ', 'डैडी' जैसी फिल्मों की पटकथाएं प्रकाशित हों तो अच्छा है। लेकिन जो पटकथाएं प्रकाशित की जा रही हैं, वे सेंसर बोर्ड को दी जानेवाली स्क्रिप्ट हैं। फिल्म के तैयार हो जाने के बाद उसके एक-एक शॉट को देखकर सेंसर बोर्ड के लिये स्क्रिप्ट तैयार की जाती है। यह स्क्रिप्ट वह नहीं होती है जिसको लेकर फिल्म शूट की जाती है। शूटिंग स्क्रिप्ट का अपना एक अलग महत्व होता है।

-मुंबई फिल्म इंडस्ट्री में अधिकतर काम अंग्रेजी जबान में होता है। क्या निर्माता निर्देशक का हिन्दी से परिचय न होना ही तो हिन्दी साहित्य के प्रति अन्याय नहीं करवा रहा?

0 अंग्रेजी का प्रभाव काफी है, इसमें शक नहीं। बहुत से फिल्मकार अंग्रेजी माध्यम से पढ़े हुए होते हैं। लेकिन यह दोष फिल्म उद्योग का नहीं है। हमारी पूरा शिक्षा प्रणाली में अंग्रेजी माध्यम को बहुत ज्यादा महत्व दिया गया है। सरकारी कामकाज, व्यापार, व्यवसाय, हर जगह अंग्रेजी का बोलबाला है। यह समस्या सिर्फ फिल्मों की नहीं है। इसका दायरा काफी बड़ा है। इसके बारे में बड़े पैमाने पर विचार होना चाहिए। हिन्दी साहित्य के साथ न्याय-अन्याय के सवाल को भी इसी दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए। वैसा यह कहना जरूरी है कि हिन्दी साहित्य के साथ क्या हो रहा है, न्याय या अन्याय, यह सोचना फिल्मवालों का काम नहीं है।

- क्या आपको लगता है कि हिन्दी साहित्य में वह बात नहीं जो सिनेमा के पर्दे पर आ कर तहलका मचा सके या फिर मुंबई सिनेमा में कोई दिक्कत है। प्रेमचन्द की कृतियों गोदान, गबन, शतरंज के खिलाड़ी आदि पर भी बहुत कमजोर फिल्में बनीं।

0 फिल्मकारों के लिये हिन्दी साहित्य या कोई और साहित्य महत्वपूर्ण नहीं है। मैं पहले कह चुका हूं कि सिनेमा एक लोक कला है और साहित्य पढ़े लिखे लोगों की चीज है, एसीटिस्ट है। इसलिये हिन्दी साहित्य पर किसी और साहित्य में सिनेमा वाली बात का होना जरूरी नहीं है। हिन्दी साहित्य में वो बात नहीं है तो यह स्वाभाविक है। जहां तक प्रेमचंद की कृतियों पर बनीं फिल्मों का सवाल है, मैं आपकी तरह यह जजमेंट नहीं दे सकता कि वे सब की सब कमजोर फिल्में हैं।

-क्या आप हिन्दी साहित्य पढ़ते हैं? अगर हां, तो आपको किन लेखकों की कृतियां प्रभावित करती है?

0 नहीं। हिन्दी साहित्य की कृतियों को पढऩे की ओर मैंने कभी ध्यान नहीं दिया।

-क्या आप भविष्य में किसी महत्वपूर्ण हिन्दी कृति पर फिल्म बनाना चाहेंगे?

0 बनाना चाहूंगा, बशर्ते कि वह कृति लोकप्रिय सिनेमा की जरूरतों को पूरा करती हो। फिलहाल इसकी संभावना नहीं है।

-आप एक समर्थ कल्पनाशील, वरिष्ठ और संवेदनशील फिल्मकार माने जाते हैं। आपने कैरियर की शुरूआत में सारांश, डैडी और अर्थ जैसी बेहतरीन फिल्में दीं। लेकिन क्या वजह हुई कि बाद में ये सिलसिला जारी रहने के बजाय चालू और फार्मूला फिल्मों की ओर मुड़ गया?

0 बदलते हुए वक्त के साथ बदलना जरूरी है। मैंने यह तो कहा है कि जबरदस्त कॉम्पीटीशन है, जबरदस्त कमर्शियलाइजेशन है, लागत में जबरदस्त वृद्धि है। मैं चालू और फार्मूला फिल्में दे रहा हूं या नहीं, यह कहना मुश्किल है। लेकिन मैं बाजार में जिंदा रहने की कोशिश जरूर कर रहा हूं। एक लड़ाई है जिसका लड़ा जाना जरूरी है। मैं वह लड़ाई लड़ रहा हूं।

-क्या आपकी निगाह में एक फिल्म का कोई खास मकसद होता है? मसलन कोई संदेश या कुछ बेहतरीन कहने की कोशिश? या सिर्फ मनोरंजन और पैसा कमाना ही फिल्मों का मकसद रह गया है?

0 बहुत ही साफ बात है कि फिल्मों का सबसे पहला मकसद है मनोरंजन। पैसा कमानेवाली बात इसी से जुड़ी हुई है। करोड़ों की लागत से फिल्म बनती है। मनोरंजन के माध्यम से पैसा कमाना फिल्म - निर्माण का बुनियादी शर्त है। मकसद या संदेश की बात हमेशा बाद में आती है। संदेश हो तो ठीक है, न हो तो भी ठीक है। जिन लोगों को संदेश देना है, वे भाषणों, प्रवचनों और उपदेशों के कैसेट निकालें। फिल्मकारों के लिये 'संदेश' हमेशा दूसरे नंबर पर है। मैं अपनी फिल्मों में 'संदेश' डालने की कोशिश जरूर करता हूं। लेकिन फिल्म-निर्माण की बुनियादी शर्त आज है मनोरंजन और धनोपार्जन।

-वे कौन से कारण हैं कि एक तरफ फिल्मकार बेहतरीन कृतियों पर फिल्में बनाने से डरते है और दूसरी तरफ अच्छी कृतियों के रचनाकार फिल्मी मीडिया से दूर भागते हैं।

0 सचमुच ऐसा नहीं है कि साहित्यकार फिल्म माध्यम से दूर भागते हैं। मैंने तो देखा है कि लगभग हर साहित्यकार फिल्मों से जुडऩे के लिये उत्सुक ही नहीं, लालायित है। उनकी समस्या यह है कि फिल्म माध्यम में वे जम नहीं पाते। उन्हें समझ में ही नहीं आता कि लोक माध्यम क्या होता है, वाणिज्यिक जरूरतें क्या है। इसलिये वे असफल हो कर 'रिजेक्ट' हो जाते हैं। हां, कुछ साहित्यकार फिल्म के लोक स्वरूप को समझते हैं। वे बराबर फिल्म माध्यम से जुड़े रहते हैं।

-क्या आपने सोचा है कि अच्छी कृतियों की तलाश करें ताकि उन पर सार्थक फिल्में बन सकें?

0 नहीं। मैं अच्छी साहित्यिक कृतियों को कोई तलाश नहीं कर रहा हूं। न ही इसकी कोई जरूरत महसूस करता हूं। अच्छी कहानियों की तलाश जरूर रहती है जो कहीं से भी आ सकती हैं, सिर्फ साहित्य से नहीं।

क्या कोई अनूठा विषय है जिस पर आप अपनी सर्वश्रेष्ठ फिल्म बनाना चाहते हों?

सर्वश्रेष्ठ फिल्म बनाने के अवसर में मैं नहीं हूं। न ही किसी अनूठे विषय की तलाश कर रहा हूं।

आप अपनी कौन-सी फिल्म सबसे अच्छी मानते हैं? जिससे दर्शकों के साथ-साथ आपको भी सन्तोष मिला हो।

मैंने कहा न कि मैं सर्वश्रेष्ठ के चक्कर में बिल्कुल नहीं हूं। मुझे 'अर्थ' या 'सारांश' भी उतनी ही 'सर्वश्रेष्ठ' लगती है जितनी 'जख्म' बाजार के लिहाज से। 'सडक़' मेरी बहुत ही सफल फिल्म थी।

1 Comment:

Bhoopesh Pratap Singh said...

This interview is very disappointing for our India. I would never like to read these types interviews in future.

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