November 02, 2008

बुरा मत सुनो , बुरा मत देखो , बुरा मत कहो

बुरा मत सुनो, 

बुरा मत देखो, 

बुरा मत कहो

गांधी जी ने भारत को आजादी तो दिलाई ही साथ ही हमारे लिए जीवन के कुछ सूत्र भी छोड़ गए यदि उनके बताए मार्ग पर मानव चलने लगे तो आज देश भर में जिस तरह हिंसा और अराजकता का माहौल है वह कभी भी न हो।
पिछले साल मैं बच्चों को रायपुर छत्तीसगढ़ में स्थित महंत घासीदास संग्रहालय दिखाने ले गई। पुरातात्विक धरोहरों का अवलोकन करते हुए एक जगह मेरी नजर अचानक रूक गई । मैंने देखा कि वहां पत्थर से बने बापू के तीन बंदर रखें हैं। उसे देख मैं सोचने लगी कि इन पुरातन धरोहरों के बीच बापू के ये तीन बंदर क्या कर रहे हैं। बुरा मत सुनो, बुरा मत देखो और बुरा मत कहो का संदेश देते बापू के इन तीन बंदरों ने इनके बारे में और अधिक जानने के लिए मुझे आकर्षित कर लिया। यद्यपि ये आकृतियां अत्याधिक परिष्कृत नहीं है।
शोधकर्ताओं के अनुसार गांधी जी का प्रिय भजन वैष्णव जन तो तेने कहिए पीर पराई... गुजरात के नरसिंह मेहता द्वारा लिखे भजन पर आधारित है। एक गाल पर कोई चाटा मारे तो दूसरा गाल आगे कर दो उन्होंने बाइबल से ली है जबकि अहिंसा परमो धर्म बौद्ध साहित्य से लिया गया है। इसी तरह अभी तक ऐसा माना जाता रहा है कि महात्मा गांधी के तीन बंदर उनका अपना मौलिक चिंतन है। परंतु गांधी जी के इन तीन बंदरों पर हो रहे शोध और अध्ययन कुछ और ही कहानी बयां करते हैं। और हमें सोचने पर बाध्य करते हैं कि गांधी जी के ये तीन बंदर जो भारतीय जनता के लिए आज सूत्र वाक्य बन गए हैं क्या उपनिषद काल की देन हैं, जिसे बाद में गांधी जी ने भारतीय जनता में प्रचारित प्रसारित किया। क्योंकि रायपुर के महंत घासीदास संग्रहालय में रखी तीन बंदरों की मूर्तियों के बारे में संग्रहालय के अध्यक्ष ने जो जानकारी उपलब्ध कराई है, उसके अनुसार तो हमें अपनी भारतीय संस्कृति को खंगालना होगा।

एक ओर जहां ये मूर्तियां 16 वीं 17वीं शताब्दी की बताई जा रहीं हैं वहीं जब इंटरनेट में इन तीन बंदरों का इतिहास जानने का प्रयास किया गया तो वहां इन बंदरों के बारे में एक और नई जानकारी मिली - जिसमें तीन बंदरों के बारे में कुछ इस तरह बताया गया है - गांधी जी के पास देश- विदेश से लोग अक्सर सलाह लेने के लिए आया करते थे। एक दिन चीन का एक प्रतिनिधिमंडल उनसे मिलने आया। विदेशों से आए लोग गांधी जी को यादगार के लिए अपने देश की कोई न कोई यादगार वस्तु भेंट में देने के लिए लाया करते थे। बातचीत के बाद चीन के इन सदस्यों ने भी गांधी जी को एक भेंट देते हुए कहा कि यह एक बच्चे के खिलौने से बड़ा तो नहीं है लेकिन यह हमारे देश में बहुत ही प्रसिद्ध है।
गांधी जी ने जब इस भेंट को देखा तो उन्होंने पाया कि वह तीन बंदरों का एक सेट है। वे उसे पाकर बहुत खुश हुए, उन्होंने उसे अपने पास रख लिया और जिंदगी भर संभाल कर रखा। इस तरह ये तीन बंदर उनके नाम के साथ हमेशा के लिए जुड़ गए।
इसे पढऩे के बाद यह सोचने पर बाध्य होना पड़ता है कि आखिर ये तीन बंदर बापू के पास आए तो आए कहां से? अगर आपको भी है इसके बारे में कोई नई जानकारी तो आईए उसे सबको बताएं ।
(संकलित- उदंती.com)
गांधी जी के पास कैसे आए ये तीन बंदर
चीन के एक प्रतिनिधिमंडल से मिले तीन बंदरों के सेट को पाकर बापू बहुत खुश हुए, उन्होंने उसे अपने पास बहुत संभाल कर रख लिया।
इन तीन बंदरों के बारे में आपको भी हो कोई नई जानकारी तो हमें जरूर लिखें।

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एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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