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Apr 1, 2025

लघुकथाः आदतें

  - सारिका भूषण

"साहब! मिसरी या गुड़ कुछ थोड़ा- सा मिलेगा क्या? आज रोटी नहीं ला पाया। घर पहुँचने में घंटा भर से ऊपर लग जाएगा।"- ठेकेदार के जाते ही, घर की मामूली मरम्मत का काम करने आया वह दिहाड़ी मजदूर, घर के मालिक को बाहर आते देखकर बोला।

"हाँ ... हाँ । क्यों नहीं ... दो मिनट रुको। अभी लाता हूँ।"- रमेश बाबू उसकी धँसी हुई आँखों और सूखे होंठ से नज़रें हटाकर बोले।

दोपहर का भोजन रमेश बाबू कर चुके थे; इसीलिए डाइनिंग टेबल पर रखे कैसरोल खाली हो चुके थे। बाई से उन्होंने आज ही फ्रिज की सफ़ाई करवाई थी; नहीं तो कुछ बासी खाना तो ज़रूर मिल जाता।

"चलो सत्तू ही चार चम्मच घोलकर दे देता हूँ, उस बेचारे को।" - रमेश बाबू ने नमक, मिर्च और नींबू डालकर बड़े प्यार से एक गिलास सत्तू का घोल तैयार कर दिया। उनके हाथ से स्टील का गिलास लेकर वह मज़दूर एक साँस में सत्तू गटक गया। फिर एक मटमैली बोतल से अपनी तृप्त होती आत्मा को झकझोरते हुए, पानी कंठ से उतार लिया।

रमेश बाबू एकटक देखे जा रहे थे।

"ठीक है साहब, चलता हूँ। कल सुबह 8 बजे तक आ जाऊँगा। हाँ! रोटी लेकर आऊँगा। घरवाली को भगवान ने जल्दी बुला लिया साहब! अभी आदत नहीं हुई है, उसके बिना रहने की!"- वह मज़दूर भारी आवाज़ में बोलता हुआ, हाथ जोड़कर निकल गया।

रमेश बाबू को ध्यान आया कि सत्तू के डब्बे का ढक्कन उनके हाथ में हैं। वे झटपट रसोई में गए और ढक्कन लगाकर डब्बे को ऊपर वाली शेल्फ में रखने लगे। अचानक उन्हें डब्बे पर बीवी की हाथों से लिखा हुआ धुँधला शब्द 'बेसन' दिखा और वे कुछ देर के लिए सन्न हो गए।

उनके सामने दो चेहरे थे- एक तो बेसन को सत्तू समझकर पीने वाला वह भूखा मजदूर, जिसको ग़रीबी की आदत लग चुकी थी और दूसरा चेहरा अपनी बीवी का, जिसको भगवान ने कुछ महीने पहले ही अपने पास बुला लिया था, जिसके बिना रहने की आदत अभी तक उन्हें नहीं लग पाई थी। 

Email- reetu.sarika@gmail.com

कहानीः बालमन

 - डॉ. कनक लता मिश्रा 

बचपन बड़ा ही मासूम होता है, बहुत ही सुंदर, कोमल, नव कोपलों के समान ताजगी से भरा हुआ। सारे ही भावों का शुभारंभ यहीं से होता है। इसे हम यों भी कह सकते हैं कि सारे भावों की जड़े यही से प्रारंभ होती हैं और इसलिए भावों की गुणवत्ता का निर्धारण भी यहीं से होता है और यह इस बात पर निर्भर है कि उसमें किस प्रकार का खाद पानी मिलाया जा रहा है, कितनी धूप, कितनी तपिश, कितनी हवा, कितनी शीतलता मिल रही है। मिट्टी भी बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है। यही कारण है, जिस तरह से हमारे शरीर का रूप, रंग व हमारे शरीर की आकृति दूसरों से भिन्न होती है उसी तरह से हमारे मन का भी रूप रंग और आकार सबसे भिन्न होता है और सबसे अलग अस्तित्व लिए रहता है।

हाँ , तो हम बचपन की बात कर रहे थे। उस बचपन की, जिससे होकर हर कोई गुजरता है। 

  एक छोटी- सी बच्ची रत्ना, जो अब बच्ची नहीं, एक प्रौढ़ा हो चुकी है।  बात उस वक्त की है, जब रत्ना केवल सात वर्ष की थी और मोहल्ले के ही एक शिशु मंदिर की दूसरी कक्षा में पढ़ती थी। उन दिनों बच्चे सुनियोजित जीवन जीने के आदी नहीं होते थे और ना ही बच्चे समाजीकरण की प्रक्रिया को सोशल मीडिया से सीखते थे; बल्कि वास्तविक समाज का अवलोकन करते हुए अपने खेल खिलौनों के माध्यम से सीखते थे। तब वीडियो गेम्स नहीं होते थे और ना ही बच्चों के पास कार्टून चैनल बदलने का विकल्प हुआ करता था। टीवी पर कुछ चुने हुए कार्टून आते थे और वह भी एक निश्चित समय पर और फिर सबसे बड़ी बात तो यह थी कि टीवी भी गिने-चुने घरों में हुआ करते थे। रत्ना के घर में भी नहीं था, हालाँकि रत्ना कभी - कभार माँ से मिन्नत- मशक्कत करके इजाजत ले लेती थी और मोहल्ले की एक चाची के घर जाकर टीवी देख आती थी । पढ़ाई पर ध्यान देने के लिए घरवाले इतना जोर नहीं दिया करते थे। हाँ, स्कूल जाना और रात के समय जब तक माँ खाना ना दें, तब तक किताब लेकर जोर-जोर से पढ़ने का कार्य किया जाता था। दोपहरी तो घर वालों को चकमा देकर सहेलियों के साथ खेलने का समय हुआ करता था । कभी साइकिल चलाना, कभी आम की कैरी तोड़कर किसी एक के घर में इकट्ठा होकर कैरी को छीलकर, काटकर नमक डालकर चटखारे लेकर खाना और किसी - किसी दिन माँ को खुश करने के लिए कैरी लाकर माँ को देना और कहना- माँ चटनी बनाने के लिए लाई हूँ । एक और भी बहुत सुंदर परंपरा थी उन दिनों की और वह यह कि दिवाली के दो एक दिन पहले हर छोटे बड़े घरों में आँगन जो कि उस समय घर का अहम हिस्सा हुआ करता था, छोटा या बड़ा कैसा भी और हाँ खुला हुआ। उसी आँगन के एक कोने में एक बहुत छोटा- सा घर बनाया जाता था, जिसे बच्चे ही मिलकर बनाया करते थे बारी - बारी से सबके घरों में जाकर। किसी किसी परिवार में बड़े भी जिसमें ज्यादातर बड़े भाई- बहन भी रुचि लेते थे और घर को बनाने से लेकर सजाने सँवारने तक में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। घर का रंग- रोगन भी किया जाता था, कभी चावल के आटे से तो कभी हल्दी मिलाकर या कभी चूने से। कुछ पुराने कपड़ों से तथा लकड़ियों से गुड़िया- गुड्डा भी बना करते थे और ये गुड़िया -गुड्डा और उनका परिवार इन्हीं घरों में रहा करते थे। इस घर में वे अपनी संपूर्ण साज़ो-सामान के साथ रहा करते थे। एक दिवाली से दूसरी दिवाली तक का समय अर्थात एक वर्ष का समय अंतराल उनका संपूर्ण जीवन काल होता था इसी एक वर्ष में यह युगल एवं इनका परिवार जीवन के सभी पखवारे जी लिया करते थे।

      रत्ना के छोटे से घर में भी एक बड़ा- सा आँगन, जिसके कोने में हर साल एक छोटा- सा घर बना करता था, जिसमें माता पिता के लिए चाचा चाची के लिए दादा दादी के लिए और अतिथियों के लिए अलग-अलग कमरे हुआ करते थे बच्चों का अस्तित्व माता पिता के होने से हुआ करता था; इसलिए बच्चों के लिए अलग से कमरे नहीं होते थे। पूजा और धार्मिक कार्यों हेतु अलग से स्थान हुआ करता था। उस समय इसके लिए अलग कमरे नहीं होते थे और इसी के साथ घर के एक कोने में सामूहिक रसोईघर होता; क्योंकि यही परंपरा मान्य थी; अतः इस छोटे से गुड़िया गुड्डे के घर में भी यही परंपरा निभाई जाती है। मिट्टी के छोटे छोटे खिलौने वाले बर्तन भी होते थे।

रत्ना ज़्यादातर दादी के साथ सोया करती थी। इसका एक महत्त्वपूर्ण कारण भी था और वह यह था कि दादी सोते समय कहानी तो सुनाती ही थी, साथ ही जब तक रत्ना सो ना जाए, तब तक बालों में हाथ फिराती थी। एक रोज़ रत्ना को देर रात तक नींद नहीं आई। उस रात भी रत्ना दादी के साथ ही सोई थी। उस रात दादी कहानी सुनाते सुनाते सो गई; पर रत्ना देर तक नहीं सो पाई। वृद्ध लोग थोड़ी थोड़ी देर में नींद से जगते रहते हैं, सो दादी भी जगी और जागते ही उनका ध्यान रत्ना पर गया और उन्होंने देखा कि वो अभी तक सोई नहीं, तब उन्होंने पूछा कि बिटिया तुम अभी तक सोई क्यों नहीं? तब रत्ना ने बड़े ही भारी मन से कहा, “माई मुझे चिंता है।” (रत्ना दादी को माई कहती थी)

 माई ने पूछा, “भला किस बात की तुम्हे चिंता हो गई?”

 रत्ना ने बड़े ही रुँधी हुई आवाज़ में जवाब दिया- “माई कल मेरी गुड़िया की शादी है और मेरे पास बर्तन नहीं हैं, जो दीवाली पे लिया था वह सारे टूट गए । मुझे चिंता है, मैं शादी में आने वाले मेहमानों को किस में खाना खिलाऊँगी ?” 

 माई ने बड़े ही प्यार से कहा, “हाँ, यह तो चिंता की बात है; पर अभी सो जाओ। मै कल देख लूँगी और सारी व्यवस्था कर दूँगी।”

 चिंता बाल मन की थी, सो भरोसा आसानी से हो गया और फिर माई ने जैसे ही प्यार से सिर पर हाथ फिराया रत्ना कुछ ही पल में बेसुध होकर सो गई। अगली सुबह चिंता फुर्र हो चुकी थी। सुबह उठते ही स्कूल के लिए तैयार हुई  और मस्ती में स्कूल चली गई। स्कूल में ज्यादातर मोहल्ले की सहेलियाँ ही साथ में पढ़ा करती थीं। उन्हें देखकर रत्ना की चिंता की लकीरें फिर से खींचने लगीं; पर फिर यह सोचकर कि माई सब ठीक कर देगी, वह सबको निमंत्रण देने लगी। सब ने बड़ी उत्सुकता से निमंत्रण स्वीकार किया। रत्ना घर आते ही सबसे पहले माई के पास गई। माई के चेहरे पर एक बहुत ही प्यारी- सी मुस्कान दिखाई दी सुमन को । रत्ना ने माई से कुछ नहीं पूछा बस गले में हाथ डाल कर झूल गई । माई ने स्नेह और रुदन- मिश्रित आवाज में कहा, “छोड़ दे बिटिया, तेरी बूढ़ी माई की हड्डियाँ कमजोर हो गई हैं , टूट जाएँगी, तो फिर शाम को तेरी गुड़िया की शादी कैसे देखने जा पाएगी।”

   रत्ना का भोला मन उछल पड़ा और बड़े ही स्नेहिल भाव से माई को देखने लगी और फिर बोली “माई तुम कितनी अच्छी हो, तुम सारे नए बर्तन ले आई ना? अच्छा माई तुम कौन- सी साड़ी पहनकर आओगी? वही वाली पहनना, जो तुमने छोटे काका की शादी पर पहना था । आओगी ना माई? घर में सबको कहो ना माई, तुम कहोगी, तो सब आएँगे - माँ, दीदी, भइया सब.. सब आएँगे। माई सबसे कह देना कि सब लोग अच्छे कपड़े पहनकर आएँगे। अच्छा माई, तुम बताओ मैं कौन सी वाली फ्रॉक पहनूँ?”

 दादी बड़े ही लाड़ से बोलती हैं, “तू कोई सी भी फ्रॉक पहने तू पुतरी ही लगेगी मेरी बच्ची, जा अब तैयारी कर ले वरना सब मेहमान आ जाएँगे और तू काम में हीं लगी रहेगी।”

 रत्ना ने कहा, “हाँ माई, मैं जा रही हूँ अभी तो बहुत काम बचा है।” और फिर रत्ना ने जल्दी से माँ से खाना लेकर किसी तरह से खत्म किया और फिर तुरंत ही अपनी गुड़िया के उस छोटे से घर में गई। जाकर देखा, तो देखती ही रह गई । घर सफेद रंग से रँगा हुआ है।  बूढ़ी उँगलियों से उस घर की हर ई़ट के किनारे को हल्दी के पीले रंग से किनारी रूप में सजाया गया है। मुख्य द्वार से बाहर छोटी- छोटी ईटों से घेरा बनाया गया। घेरे के अंदर आटे और हल्दी के मिश्रित पाउडर से स्वस्तिक भी बनाया गया है। रत्ना घेरे के अंदर स्वस्तिक को बचाते हुए धीरे- से बैठी। और अब कॉपी के गत्ते से बनाए घर के दरवाज़े को खोला। सभी छोटे- छोटे कमरों में छोटे- बड़े सभी तरह के मिट्टी के बर्तन करीने से सजाए गए हैं। एक कमरे में गुड़िया को नए कपड़े पहनाए गए हैं और उसे छोटी-छोटी मोतियों की नथ और टीके, हार और कर्णफूल भी पहनाएँ गए हैं । यह सब देखकर रत्ना के पैर ज़मीन पर नहीं थे, वह खुशी से फूली नहीं समा रही थी। वह तुरंत माई के पास गई है और मारे ख़ुशी के माई की गोद में अपना सर छुपा लिया। माई भी बड़े प्यार से रत्ना के माथे पर आई हुई लटों को सँवारने लगी।

लेखक के बारे में-  जन्मतिथि- 5 अक्टूबर, 1978, शिक्षा- M.Sc., Ph.D, संप्रति- प्रोफेसर, गृह विज्ञान, सेंट जोसेफ कॉलेज फॉर वुमेन, सिविल लाइंस, गोरखपुर, विधाएँ- कहानी, कविता, उपन्यास, ग़ज़ल, समीक्षा, प्रकाशन- कहानी संग्रह- डेढ़ पाव ज़िन्दगी…पुल भर मन, असंरचित क्षेत्रों में महिलाओं की सामाजिक आर्थिक स्थिति, पत्र पत्रिकाओं में रचना प्रकाशित, संप्रति- प्रोफेसर, गृह विज्ञान, सेंट जोसेफ कॉलेज फॉर वुमेन, सिविल लाइंस, गोरखपुर, Email- kanaklata1802@gmail.com

लघुकथाः मुर्दे

  - युगल

उसे मुर्दाघर में डाल दिया गया था और वह वहाँ पहले से पड़े एक मुर्दे पर औंधा जा पड़ा था। उसकी छाती के नीचे पहले का सिर और गर्दन दबी थी। पहले ने कसमसाते हुए कहा–"जरा परे हटो भाई! क्या मरे पर कोदो दल रहे हो!"

नया बोला–"मैं तो मुर्दा हूँ। अपने से हिल-डुल नहीं सकता।" 

"यहाँ कैसे आए?"

"दंगे में मारा गया। मेरी बीबी और बच्चे…।" उसका गला भर आया।

"मु‍र्दे को दुख नहीं होना चाहिए।" पहले ने सान्त्वना दी–"वैसे तुम किस कौम के थे?"

नया मुर्दा हिचकिचाया– सही बोले या नहीं? फिर उसने तसदीक के लिए पूछा–"और तुम? तुम किस कौम के थे?"

पहले ने तहकीकात की–"तुम्हारे पास कोई हथियार तो नहीं है? मुझे डर लगता है। जिसने मुझे मारा, उसने तो मेरी जात भी नहीं पूछी। गोली मार दी।"

"मु‍र्दे को क्या डर?" नए ने हिम्मत दिलाकर पूछा–"गोली दागने वाला किस कौम का था?"

"मैं तो अंधा हूँ भाई! सड़क पर भीख माँग रहा था।"

"अच्छा हुआ तो मारे गए। एक गंदे काम से फुर्सत मिली।"

अंधा मुर्दा चुप्पी मार गया।

नया मुर्दा बोला–"मुझे अंधों से नफ़रत है, जिन्हें कौम तो दिखलाई पड़ती है, लेकिन इनसान नहीं दिखलाई पड़ता।"

अंधा हँसा–"शायद ख़ुद कत्ल होने के बाद ऐसी आँखें मिलती हैं।"

तभी कोई समाजसेवी मुर्दाघर में शिनाख्ती के लिए आया। उसके आगे मुर्दो का सिर उघाड़–उघाड़ बतलाया गया। समाजसेवी सिर हिला– हिलाकर कहता गया–"नहीं, यह मेरी कौम का नहीं है।"

दोनों मु‍र्दे एक– साथ हँस पड़े– "साला अंधा।"

कविताः शब्द





  - रश्मि विभा त्रिपाठी

फुसफुसाहट, शालीन संवाद, 

बहस या चीख़-पुकार

शब्द बुनते हैं एक दुनिया, 

खोलके अभिव्यक्ति के द्वार

एक रेशमी रूमाल 

या एक नुकीली कटार, 

या दिल को बेधते 

या पोंछते हैं आँसू की धार


स्याही और कलम से 

ये बनाते हमारे भाग्य की रेखाएँ, 

इन्हीं शब्दों के गलियारे से 

हम तय करते हैं दिशाएँ

सब भस्मीभूत कर दे, 

एक शब्द वो आग भड़का दे

जीवन छीन ले या फिर से 

किसी का दिल धड़का दे

नीरव को कलरव में बदले, 

फिर कलरव का खेल पलटता

शब्द की डोर से आदमी 

आदमी से जुड़ता और कटता

शब्द दुत्कारता या 

आवाज़ देकर पास बुलाता है,

पल में रोते को हँसाता है, 

हँसाते को रुलाता है

शब्द के दम पर ही 

कोई बस जाता है यादों में

ये ही छलिया और ये ही 

साथ जीने- मरने के वादों में

दूरियों की दीवार में बना देते हैं 

ये नजदीकी का दर, 

शब्दों के पुल पर हम मिलते 

उस पार से इस पार आकर

चुप्पी के हॉल में 

शब्दों का ही गूँजता संगीत है

इन्हीं से बनते हैं दुश्मन, 

इन्हीं से हर कोई अपना मीत है


विश्वकोश के बाग में जाएँ, 

तो शब्दों के फूल करीने से चुनें

कुछ भी कहने से पहले 

थोड़ी इन शब्दों की भी सुनें

शब्द हमें दूर कर सकते हैं, 

शब्द ही हमें रखते हैं साथ

खोलते दिल के दरवाज़े 

शब्दों के गमकीले हाथ

उसने शब्दों के वो फूल चुने थे, 

जिनमें थी पुनीत प्रेम की सुवास

वो नहीं है मगर 

जिन्दा है उसके होने का अहसास।

किताबेंः समय, समाज और प्रशासन की प्रतिकृति

 - अनुज मिश्रा 

पुस्तकः जवाहरलाल हाज़िर हो ( जेल की सलाखों के पीछे पंडित नेहरू के 3259 दिन); लेखकः पंकज चतुर्वेदी, प्रकाशक: पेंगुइन रैन्डम हाउस इंडिया, वर्ष: 2024, पृष्ठ: 186, मूल्य: ₹ 299, ISBN: 9780143470663

ऐसे दौर में जब देश के पूर्व प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू की विरासत और प्रतिमानों को ध्वस्त करने की कोशिश की जा रही हो और ऐसे में पंकज चतुर्वेदी का जवाहरलाल हाज़िर हो, लिखना एक साहसिक कदम तो है ही। इस साहसिक कदम के लिए लेखक जरूर बधाई के पात्र हैं। यूँ तो पंकज चतुर्वेदी प्रकृति और पर्यावरण क्षेत्र में जानी-मानी हस्ती हैं: पर इतिहास पर लिखी उनकी पुस्तक जवाहरलाल हाज़िर हो भी कहीं से कम नहीं है। इस पुस्तक में सहजता के साथ - साथ प्रामाणिकता में भी कहीं कमी नहीं दिखी, जो लेखक की लेखन-शैली को स्थापित करता है।

यह पुस्तक नेहरू जी के 3259 दिनों की जेल यानी जीवन के सवा आठ साल के जेल यात्रा का चित्रात्मक विवरण तो है ही, जो अदालती कार्यों के दस्तावेज पर आधारित है; पर यह स्वतंत्रता संग्राम का एक महत्त्वपूर्ण विवरण भी देता है। खास बात इस पुस्तक की ये है की नेहरू पर चलाए गए नौ मुकदमों का प्रामाणिक, रोचक और चित्रात्मक वर्णन तो है ही, जिसमें नेहरू साहस और दृढ़ता से ब्रिटिश न्याय व्यवस्था की धज्जियाँ उड़ाते भी दिखते हैं। जब- जब ब्रिटिश मजिस्ट्रेट उनसे सफाई देने के लिए कहता है, उनका उत्तर एक ही होता है: ‘आपकी न्याय व्यवस्था में मुझे कोई विश्वास ही नहीं है’। सफाई में अंग्रेजी व्यवस्था कोई हेरफेर न कर दे इस से बचने के लिए नेहरू लिखित बयान पेश करने की अनुमति माँगते हैं। लेखक ने काफी शोध करके नेहरू के अदालत में दिए गए लिखित बयान को जस का तस इस पुस्तक में पेश किया है, जो उनके तेवर, भारतदर्शन और भारत की आज़ादी पर उनके समर्पण को बताता है।

एक और खासियत इस किताब की ये है, इस पुस्तक से गुजरते ऐसा महसूस होता है कि सिर्फ़ काल और परिवेश बदला है, परिस्थिति सात दशक बाद भी वैसी ही है। कई जगहों पर तो ऐसा प्रतीत होता है, जैसे ये बात आज के हालात पर की गई टिप्पणी हो। चाहे वो किसान आंदोलन का मामला हो या अभिव्यक्ति की आज़ादी का। “बुराई के साथ कोई समझौता या बातचीत नहीं हो सकती, यह संघर्ष लोगों की पूर्ण जीत के साथ ही समाप्त होना चाहिए और हो सकता है” नेहरू जी का यह वक्तव्य आज भी उतना ही सार्थक है। इस पुस्तक ने नेहरू के विचार को पुनः प्रासंगिक कर दिया, जब वे कहते हैं कि “हम अपने बोलने के हक़ को किसी भी क़ीमत पर छीनने नहीं देंगे….किसी भी क़ीमत पर अपने बोलने की आज़ादी के अधिकार को कभी नहीं छोड़ सकते।” नेहरू के ऐसे विचार काल, स्थान और परिवेश के परे दिखता है मानो 1921 में कही बात आज भी उतना ही सटीक बैठती है - “सरकार ने भय, दबाव और आतंक को अपना मुख्य हथियार बना लिया है, जिससे देश के लोगों का दमन हो रहा है, उनकी भावनाओं को कुचला जा रहा है।” जवाहरलाल हाज़िर हो पुस्तक आज के समय, समाज और प्रशासन की प्रतिकृति है। लेखक ने नेहरू की भारत की स्वतंत्रता आंदोलन में पूरे परिवार पिता वकील मोतीलाल नेहरू और अपनी पुत्री इंदिरा समेत उनकी भागीदारी और उन सब पर जेल में हुए मानसिक और शारीरिक यातनाओं का भी संवेदनशीलता चित्रण किया है। इस चित्रण के जरिए यह बताना भी मकसद था कि जो भी अंग्रेजी शासनतंत्र के अस्तित्व को चुनौती देता, उसका यही हश्र होगा। साथ ही, ये पुस्तक यह भी बताता है कि कठोर से कठोर यातनाएँ भी नेहरू के जज्बे को तोड़ नहीं सकीं; बल्कि हर वे यातना उनके आज़ादी के संकल्प को और मजबूत किया।

आज सोशल मीडिया पर नेहरू के खिलाफ तमाम अनर्गल बातें कही जाती हैं। इस पुस्तक में जिस व्यक्ति पर भोग-विलास और सुविधासंपन्नता का आरोप लगता है, वह कैसे सवा आठ साल तक ब्रिटिश जेलों में (कई बार तो सामान्य कैदी के तौर पर) काटता है, इसका भी विस्तृत विवरण है, जिसमें काल कोठारी में बंद नेहरू पर चूहे का उछल कूद मचाना, उन्हें कैसे हथकड़ी लगाई गईं और उनके ऊपर बदसलूकी का भी जिक्र है।

इस पुस्तक में नेहरू के पारिवारिक संकट, पत्नी की गंभीर बीमारी और बेटी इंदिरा के अंतरधार्मिक विवाह, जो तब सामाजिक अपवाद ही था। इसके बावजूद भारत के स्वतंत्रता संग्राम की लौ को कम नहीं होने दिया, इसका भी वर्णन है।

यह पुस्तक सर्वथा प्रासंगिक रहेगी। इनकी कई वजहें हैं: 1- मुकदमों की विस्तृत जानकारी देने के साथ- साथ ये वर्तमान राजनीतिक स्थिति पर भी प्रकाश डालता है। 2- हालाँकि पुस्तक का मूल स्रोत अंग्रेजी है; पर इसका अनुवाद पुस्तक की विषय-वस्तु को कहीं से भी कमजोर करता प्रतीत नहीं होता है। 3- हालाँकि प्रथमदृष्टया लगता है कि यह पुस्तक कांग्रेस - समर्थित विचार-धारा से प्रेरित है; पर दरअसल ऐसा है नही। 4- यह पुस्तक दो तरह के लोगों द्वारा अवश्य पढ़ी जानी चाहिए: नेहरू के प्रशंसक तो पढ़ेंगे ही, पर उनसे भी ज्यादा आवश्यक है तटस्थ विचार रखने वालों द्वारा इसका पढ़ा जाना। ऐसा इसलिए की जब नेहरू पर विलासिता और अकर्मण्यता का राजनीति से प्रेरित आरोप लगते हैं, तो उसका सच्चाई से तर्कों के आधार पर न केवल सत्य को स्थापित किया जा सके बल्कि व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी का डटकर मुकाबला किया जा सके। अगर तटस्थ विचार रखने वालों में थोड़ी भी तार्किकता और संवेदनशीलता बची होगी, तो यह पुस्तक उनकी आँखें खोल देगी। 5- अगर ये पुस्तक नेहरू के साथ जेल की सजा काट रहे लोगों का नेहरू पर उनके विचार को शामिल करता, तो शायद यह पुस्तक और भी रोचक हो जाती।

लेखक ने, जो कि www.indiaclimatechange.com के संपादक हैं, इस पुस्तक को रीसाइकिल पेपर पर प्रकाशित कर पर्यावरण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को ही दर्शाया है।