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Dec 3, 2025

कविताः सरकार

   -  सपन अग्रवाल

नेता कभी लाठी नहीं भाँजते,

प्रशासन कभी वोट नहीं माँगता ,

वंचित कभी सवाल नहीं करते ,

किसान  कभी आराम  नहीं करता,

कुलीन कभी नौकरी नहीं करते।

ये सब मिलकर  बस  सरकार बनाते हैं

और फिर..... सरकार ही

सबकुछ करती है ।

 

कागज़ों में  विकास,

सड़कों पर  खेती,

रैलियों  में  न्याय,

भाषणों में  घोषणा,

घोषणाओं में  रोजगार,

जवाबों में  आश्वासन ,

वेबसी पर सांत्वनाएँ ,

धरनों  पर लाठियाँ ,

जुलूसों में  दंगे ।

 

इतना कुछ करने के बाद भी

यह कह देना निष्ठुरता  होगी

कि 'सरकारें  कुछ नहीं करती '।

 

निरीह मूर्ख हैं वे लोग,

जो कहते हैं-

'सरकारें कुछ नहीं करती'।

Dani mohalla brahmbad, tehsil bayana , dist- bharatpur, Rajasthan-321410

sapangarg019@gmail.com, Mo+91 70622 73970


अतीत के पन्ने सेः विस्थापन के दौर की बिखरती यादें

 - देवी नागरानी

सिन्धी, सिन्धु घाटी सभ्यता के मानव जाति के वंशज हैं। सिन्धु नदी के तट पर रचित वेदों-ग्रंथों की महान और आदर्श संस्कृति और सभ्यता हमारे ही पूर्वजों की देन हैं। वैदिक-संस्कृति की नींव रखने वाले सिन्धु सभ्यता के ही लोग है।

संसार के इतिहास में कठिन से कठिन परिस्थितियों में इतनी बड़ी संख्या में मानवीय पलायन नहीं हुआ, जैसा भारत -विभाजन के वक़्त हुआ। यह अपने आप में एक अजीबो-ग़रीब इतिहास है, जिसने जुड़वाँ ज़ख़्मी देशों को जन्म दिया और एक सिन्धु सभ्यता की सम्पूर्ण जाति को दर-ब-दर की ठोकरें खाने को छोड़ दिया, जो संसार की प्राचीनतम गौरवपूर्ण संस्कृति की जन्मदाता और वारिस हैं।

बस जिसका दर्द वही जाने? कई दिलजले शायर व लेखकों ने उन रिसते हुए ज़ख्मों को अपनी कलम से उस पिघलते लावे को अपने अंदाज़ में परिभाषित करते हुए अभिव्यक्त किया है। मैंने भी इस ओर अपने मन की भावना को यों लिखा है:

उस शिकारी से ये पूछो पर क़तरना भी है क्या

पर कटे पंछी से पूछो ऊँचा उड़ना भी है क्या?

आशियाना ढूँढते हैं, शाख़ से बिछड़े हुए

गिरते उन पत्तों से पूछो, आशियाना भी है क्या? -देवी

विभाजन का दौर मानवीय इतिहास का एक ऐसा वक़्त रहा जिसमें विषम परिस्थितियों की आँधी, शांति, सद्भावना, पारस्परिक संबंध और मानवीय मूल्यों के कोमल हरे-भरे अंकुरों को उजाड़कर नष्ट करता रहा। प्रताड़ना के रेखांकित चिह्न वक़्त की दीवारों में चुने जाने के बावजूद भी रह-रहकर सिसकियाँ भरते रहे हैं, अपने वजूद की तलाश में खामोश खंडहरो में भटकते रहे हैं। इक़बाल का यह शेर इसी दशा को परिभाषित कर रहा है...

ढूँढता फिर रहा हूँ मैं, इकबाल अपने आपको

आप ही गोया मुसाफिर, आप ही मंज़िल हूँ मैं

इस बँटवारे के परिणामस्वरूप विश्व के इतिहास में इतनी संख्या में लोगों का विस्थापन एवं पलायन कभी नहीं हुआ था। अमानुषता ने मानवता की दहलीज़ पर नारी उत्पीड़न की त्रासदी, विस्थापिता, अपहृता बलात्कृता एवं नारियों की अतृप्त आत्माओं की प्रताड़ना ने आज तक उन घावों का मुकम्मिल मरहम नहीं पाया है।

ऐसा परिवर्तन एक खतरनाक षड्यंत्र की तरह आता है या लाया जाता है। यह ऐसे धीमे ज़हर की तरह है कि इन्सानियत मृत्यु की तरफ़ तो बढ़ती हैं; लेकिन आदम उसे विकास का नाम पर आगे और आगे ले जाने में प्रयासरत रहता है। विकास के पुराने और नए मूल्यों में कोई संधि नज़र नहीं आती। पहले समाज के लोगों के भले के लिए प्रयत्न हुआ करते थे, अब हर कार्य को करने के पीछे एक बौद्धिक आधार होता है। अब वे प्रयास, सियासत की चौखट पर व्यापार और सौदेबाज़ी की दुकानें- सी लगने लगे हैं।

उस दौर और इस दौर के बीच, यादों की टँगी हुई भद्दी दीवार कभी नहीं हटी, आज भी लेखक अपनी क़लम की नोक से कभी कविता, कभी संस्मरण, या कहानी-नावेल का स्वरूप देकर उसे दर्ज करने को तत्पर रहते हैं, उनका लेखन कहीं न कहीं विभाजन के पहले और बाद के दर्द की परछाइयों की तस्वीर सामने ले ही आता है।

यह उस समय की बात है जब सिन्धी शरणार्थी बनकर अपनी अना की धज्जियाँ उड़ते हुए देखकर भी कुछ न कर सके। कितने ही ख़ानदानों के जलते चराग़ बुझ गए। अनेक नारियों को क़त्ल करके अपने ही घर आँगन में दफन किया गया, पर शायद अपनी धरती माँ का कर्ज़ चुकाने की खातिर, न्याय के नाम पर यह अन्याय होने लगा। इस प्रलय काल के पश्चात् बर्फ़ की तरह जमा हुआ यह अहसास चट्टान बनकर ठहर सा गया है कि भारत की आजादी पर बलि के बकरे बने सिन्धी अपनी जान की आहुति देते हुए मौत से होली खेल रहे थे।

इस देश और उस देश के बीच में बँटी हुई ज़िंदगी से समझौता करने को विस्थापित इंसान मजबूर रहा, वर्ना कौन अपने देश की आज़ाद फिज़ाओं को छोड़कर, अपनी जड़ों से उखड़कर नव निर्माण की राह का पथिक बनना चाहेगा?

यही दर्द सीने में लिए हुए आज एक लेखक क़लम की नोक से अपनी जीवन गाथा के अंश व्यक्त करते हुए अपनी आपबीती को जगबीती से जोड़ पाता है, जिसमें हृदय का अहसास धड़कता है, जिसमें शामिल हैं- हालात की साज़िश, मुफ़लिसी, बेरोज़गारी, अमानुषता, कहीं खुशहाली, कहीं बेबसी, बीमारी, दरिंदगी, उसूलों की बलि, हद-सरहद पर फ़सादों के जंगल! प्यार नफ़रत की फ़स्ल से पनपती इन्सानियत व मज़हबी टकराव के बारे में पढ़कर आम आदमी अपने ही भाई-बंधुओं के दुख सुख का परिचय पाता है। इसलिए लेखन का रूप भी गतिशील है, वह विस्तृत, विकसित एवं परिवर्तित स्वरुप में सामने आ रहा है।

सिन्धी कौम के वजूद में अज़ाब की दास्ताँ लम्बी है। विभाजन का दर्द नसों में लहू बनकर दौड़ रहा है। लेखकों की रचनात्मक लेखन देश, काल और भाषा की सारी दूरियाँ तमाम फ़ासलों को उलाँघती आ रहा है।

विस्थापन के दौर की बिखरती यादों की धुँधली तस्वीर सामने आते ही वे करह उठाते हैं, जहाँ दर्द को ही दारू समझकर पी लेने के सिवा कोई और चारा बाकी नहीं रह जाता। लेखक अपने-पराये दर्द से परे कुछ भावनात्मक संधि की चौखट पर अनेक किरदारों के माध्यम से उस रिसती हुई पीड़ा को अभिव्यक्त करता रहा, जो मानव के जीवन का हिस्सा बनी। वे दर्द की लकीरें आज भी कहीं न कहीं दिल की दीवारों को खुरचकर बरबस उन जिए हुए पलों की याद दिलाती है। देखा जाए, तो विभाजन देशों का हुआ है, दिलों की लकीरें अब भी जुड़ी हुई हैं।

दर्द की इस गाथा ने सिंध के लेखकों के दिलों में यही भाव बीज साहित्य की सरज़मीन पर बोए हैं। मैंने इस महायज्ञ में सिन्ध-हिन्द के सिन्धी कथाकारों की अनेक कहानियाँ अरबी सिन्धी से हिंदी में अनुवाद किया हैं। इसी ख्वाहिश से कि सिन्धी साहित्य हिन्दी के अदब और अदीबों के बीच पनपता रहे और हम बिन प्रांत के सिन्धी भाषी एक जुट होकर अपनी भाषा और पुरातन साहित्य को हिंदी साहित्य की धारा में सुरक्षित रख पाएँ।

मनोविज्ञानः बच्चों का हास-परिहास और विकास

हास्य-विनोद इंसानी व्यक्तित्व का बहुत पुराना और रोचक पहलू है। बच्चे पूरे वाक्य बोलने या किताब पढ़ने से पहले ही हंसी-मज़ाक और शरारतें करने लगते हैं। यह उनके विकास, दूसरों से जुड़ाव और बुद्धिमत्ता से जुड़ा होता है। 

शोध बताता है कि बच्चे जन्म के कुछ ही महीनों बाद मुस्कराने और थोड़े समय बाद हँसने लगते है। शुरू में वे सरल खेलों से मज़ा लेते हैं; जैसे आँख-मिचौली, गुदगुदी या टेढ़े-मेढ़े चेहरे बनाना। फिर वे अजीब जगहों पर छिपने का नाटक, उछल-कूद या चीज़ों को खिलौने बना कर मज़ा लेने लगते हैं।

धीरे-धीरे बच्चे और उन्नत हास्य करने लगते हैं; जैसे चिढ़ाना, भूमिकाएँ निभाना, बेतुके शब्द बोलना और अंत में शब्दों के खेल और चुटकुले समझना। मनोवैज्ञानिकों ने इसे ‘अर्ली ह्यूमर सर्वे' जैसे शोधों में दर्ज किया है। इससे स्पष्ट होता है कि बच्चे अचानक मज़ाकिया नहीं बन जाते बल्कि धीरे-धीरे यह कौशल विकसित करते हैं, जो आगे चलकर उनकी सोच और संवाद की क्षमता को मज़बूत बनाता है।

हास्य सिर्फ मनोरंजन नहीं है, बल्कि यह सीखने और सामाजिक विकास का एक महत्त्वपूर्ण ज़रिया है। जब कोई बच्चा मज़ाक या चुटकुला समझता है, तो उसे कई बातों पर ध्यान देना पड़ता है - जैसे किसी चीज़ का सामान्य उपयोग क्या है, उसमें क्या अलग या अजीब किया गया है और क्यों वह मज़ेदार लग रहा है। इसका मतलब है कि बच्चा चीज़ों को केवल अपनी नज़र से नहीं; बल्कि दूसरों के दृष्टिकोण से भी देखना सीखता है। मनोवैज्ञानिक इसे ‘थ्योरी ऑफ माइंड’ कहते हैं। जो बच्चे ज़्यादा मज़ाक करते हैं या खेल-खेल में हँसी-मज़ाक करते हैं, वे सामाजिक और मानसिक रूप से ज़्यादा तेज़ी से विकसित होते हैं। वे जल्दी सीखते हैं, बेहतर संवाद करते हैं और अच्छे रिश्ते बना पाते हैं।

हँसी-विनोद हमारे रिश्तों को मज़बूत करने का काम करते हैं। मनोवैज्ञानिक रॉबर्ट प्रोवाइन के अध्ययन में पाया गया कि हम दूसरों के साथ रहते हुए लगभग 30 गुना अधिक हँसते हैं। दिलचस्प बात यह है कि हम केवल 20 प्रतिशत मज़ाक या चुटकुलों पर हँसते है, बकाया तो आम बातचीत के दौरान हँसते हैं। यानी हँसी जुड़ाव, भरोसे और अपनेपन से जुड़ा मामला है।

यह आदत सिर्फ इंसानों तक सीमित नहीं है। चिम्पैंजी और गोरिल्ला जैसे अन्य प्राइमेट भी खेलते समय हँसी जैसी हरकतें दिखाते हैं। वैज्ञानिक मानते हैं कि शुरू में हँसी का विकास ‘सोशल ग्रूमिंग’ के लिए हुआ था। क्योंकि शारीरिक ग्रूमिंग (जैसे एक-दूसरे को साफ करना) छोटे समूहों तक सीमित था और समय लेता था, हँसी शायद एक आसान और तेज़ तरीका बनी जिससे बड़े समूहों में भी अपनापन बढ़ सके। मनुष्यों में हंसी और भी मज़बूत भूमिका निभाती है। यह दो तरह की होती है। एक, स्वाभाविक हंसी (जब हमें सच में कुछ मज़ेदार लगता है)। दूसरी, जान-बूझकर की गई हँसी (जिसे हम दोस्ती जताने, तनाव घटाने या रुचि दिखाने के लिए करते हैं)। दोनों ही तरह की हँसी लोगों को जोड़ने और समूहों को एकजुट रखने में अहम भूमिका निभाती है।

वैज्ञानिक कहते हैं कि इंसानी हँसी हमारी निहायत ‘नैसर्गिक’ अभिव्यक्तियों में से एक है। इंसानों की खासियत यह है कि हम केवल खेल-खेल में नहीं, बल्कि व्यंग्य, कटाक्ष और यहाँ तक कि गहरी दार्शनिक बातों पर भी हँस सकते हैं। यह दिखाता है कि हास्य मानव स्वभाव की बुनियादी विशेषता है। इतिहास में कई दार्शनिकों ने इंसान की अनोखी पहचान को परिभाषित करने की कोशिश की है - अरस्तू ने इसे तार्किकता का नाम दिया, विट्गेंस्टाइन ने इसे भाषा बताया, और सार्त्र ने स्वतंत्र निर्णय; लेकिन हास्य की सर्वव्यापकता और बच्चों द्वारा इसे इतनी जल्दी अपनाना यह संकेत देता है कि हास्य हमारी पहचान के लिए उतना ही ज़रूरी है जितनी तार्किकता या भाषा। कहना गलत न होगा कि हम हँसते हैं इसलिए हम इंसान हैं।

सीखने में हास्य का महत्व

हास्य सीखने को आसान और मज़ेदार बना देता है। शोध बताते हैं कि यदि बच्चों को पढ़ाते समय हँसी-मज़ाक का इस्तेमाल किया जाता है तो बच्चे जल्दी और बेहतर सीखते हैं। यहाँ तक कि खबरें भी मज़ेदार अंदाज़ में सुनाई जाएँ तो लोग उन्हें ज़्यादा दिलचस्पी से सुनते हैं।

बच्चों द्वारा हास्य और कल्पना को मिलाना भी सीखने का हिस्सा है। जैसे केले को फोन बनाना या अजीब से शब्द गढ़ना - ये केवल खेल नहीं बल्कि रचनात्मकता की शुरुआत हैं। हास्य बच्चों को सुरक्षित और मज़ेदार तरीके से नियम तोड़ने का मौका देता है, जिससे वे नई बातें सोच पाते हैं और आगे बढ़ते हैं। धीरे-धीरे यही खेल-खेल में किया गया हास्य उन्हें कहानी कहने, नकल करने और गहराई से सोचने की क्षमता तक ले जाता है।

हालाँकि बच्चों में हास्य बहुत महत्त्वपूर्ण है, लेकिन इस पर उतना शोध नहीं हुआ है जितना अन्य मनोवैज्ञानिक विषयों पर हुआ है। इसका कारण यह है कि छोटे बच्चे अक्सर कहे जाने पर मज़ाक नहीं करते और शोधकर्ताओं के सामने शर्माते भी हैं। कभी-कभी उनका हास्य समझना भी मुश्किल होता है। फिर, कुछ विद्वान् हास्य को हल्का-फुल्का विषय मानते हैं और शोध के लायक नहीं समझते।

लेकिन हाल के अध्ययनों ने इस सोच को बदला है। एलेना होइका जैसे मनोवैज्ञानिकों ने बच्चों के हास्य के विकास को बारीकी से ट्रैक किया और दिखाया कि यह उनके मानसिक विकास से जुड़ा है। यानी यह केवल हँसी-मज़ाक नहीं है, बल्कि बच्चों के विकास में गंभीर और अहम भूमिका निभाता है।

बहरहाल, हास्य का महत्त्व सिर्फ बचपन के विकास या सामाजिक रिश्तों तक सीमित नहीं है। इसकी असली ताकत यह है कि यह हमें इंसान बनाता है। हास्य हमें दुनिया को अलग नज़रिए से देखने, नियमों पर सवाल उठाने, दूसरों से जुड़ने और समाज निर्माण की क्षमता देता है। यह हमारी बुद्धि, रचनात्मकता और खुश रहने की क्षमता को दर्शाता है। (स्रोत फीचर्स)

पिछले दिनोंः रायबरेली में कला, शब्द और चेतना का संगम

 - कुसुम लता सिंह

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उत्सव माहौल में 1 से 9 नवम्बर तक रायबरेली में चले आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी पुस्तक मेले में डॉ. उदय प्रताप सिंह को मिला आचार्य द्विवेदी युग प्रेरक सम्मान और मुंबई के स्केच आर्टिस्ट नितिन महादेव यादव को डॉ. राममनोहर त्रिपाठी लोक सेवा सम्मान। दीपक सैनी की मिमिक्री पर ठहाके गूँजे और रस्सा कशी में बुजुर्गों का दिखा जोश- 

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आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी स्मृति न्यास के तत्त्वावधान में रायबरेली के फिरोज गांधी कॉलेज परिसर में ‘आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी पुस्तक मेला – 2025’ नौ दिनों तक साहित्य, समाजसेवा और सांस्कृतिक चेतना का केंद्र बना रहा। मेले में गंभीर साहित्यिक विमर्श भी हुए और हंसी-ठहाके भी गूंजे। बच्चों से बड़ों तक के लिए आयोजनों की भरमार थी।1 से 9 नवम्बर तक चले इस आयोजन ने साबित कर दिया कि आचार्य द्विवेदी की कर्मभूमि आज भी हिंदी के अक्षर-संस्कारों से धड़कती है। 

ये मेला ऐतिहासिक होने वाला है, इसका अंदाजा पहले ही दिन लग गया। जब देश के सबसे बड़े चिकित्सीय संस्थान एम्स-रायबरेली की डायरेक्टर डॉ. अमिता जैन मेले का उद्घाटन करने पहुँची। उन्होंने बच्चों के साथ पूरे मेले का भ्रमण किया और किताबों को करीब से देखा-पढ़ा। कार्यक्रम में उन्होंने बच्चों को यादगार सीख इन शब्दों में दी-'पुस्तकें मानवता की सबसे बड़ी शिक्षक हैं। डिजिटल युग में भी पढ़ने की संस्कृति को जीवित रखना समाज की जिम्मेदारी है। युवाओं को डिजिटल युग में भी पुस्तकों से जुड़ाव बनाए रखना चाहिए।'

मेले का दूसरा दिन प्रतिभाओं को समर्पित रहा। मुंबई पुलिस को 500 से अधिक अपराधी पकड़वाने में मदद करने वाले स्केच आर्टिस्ट नितिन महादेव यादव को डॉ. राम मनोहर त्रिपाठी लोक सेवा सम्मान और रायबरेली की टॉपर छात्रा प्रांजलि जायसवाल को शिवानन्द मिश्र ‘लाले’ सम्मान दिया गया। पहली बार मुंबई से रायबरेली पहुँचे स्केच आर्टिस्ट नितिन यादव ने कहा कि कला समाज सेवा का भी सशक्त माध्यम है जबकि प्रांजलि ने इसे अपनी प्रेरणा बताया।

3 और 4 नवंबर की शाम हँसी-ठहाकों और संगीतमय सुरों से गूँज उठी। पुस्तक मेले में तीसरे दिन दिल्ली से आए प्रसिद्ध कलाकार दीपक सैनी ने अपनी शानदार मिमिक्री और लाफ्टर शो से दर्शकों को इस कदर लोटपोट कर दिया कि पूरा पंडाल देर तक तालियों की गड़गड़ाहट से गूँजता रहा। चौथे दिन उस्ताद अब्दुल रशीद खाँ सम्मान ग्रहण करने आईं अयोध्या की प्रसिद्ध लोकगायिका संजोली पांडेय और शाम्भवी शुक्ला ने अपनी मधुर आवाज से समाँ बाँध दिया। दोनों के पारंपरिक लोकगीतों की भावपूर्ण प्रस्तुति ने दर्शकों को अपनी जड़ों से जोड़ दिया। मेले में शाम की पाली में जहाँ स्थानीय प्रतिभाओं को नया मंच मिल रहा था, वहीं दिन में बच्चों को हुनर दिखाने का मौका भी दिया गया। बच्चों के लिए निबंध, भाषण, चित्रकला और स्लोगन प्रतियोगिताएँ हुईं और उन्हें पुरस्कृत भी किया गया।  

पुस्तक मेले में 5 नवंबर को हुए 'आयुष मेले' के बाद शाम को भारत की लोकसंस्कृति की अद्भुत और यादगार झलक देखने को मिली। माता कौशल्या के कोसल प्रदेश और आज के (पश्चिम ओडिशा) से आई बच्चियों और कलाकारों के बेटियों के जन्म से लेकर विदाई से जुड़े लोक नृत्य की प्रस्तुति की छटा फिजाँ में बिखर गई। कलाकार भावों में इस कदर रँगे और उनको देखकर दर्शकों की आँखों से आँसू छलक पड़े। ये दृश्य देखकर माहौल थोड़ी देर तक गम्भीर भी हो गया। लोगों ने एकटंकिया म्यूजिक स्कूल-पदमपुर से प्रशिक्षण पा रहे इन बच्चों को प्रस्तुति के बाद आशीर्वाद दिया। 6 नंवबर को भी मेले में हुए सांस्कृतिक कार्यक्रमों में रायबरेली जनपद के युवा कलाकारों ने अपनी प्रतिभा दिखाई। 

7 नवंबर को आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी पुस्तक मेले के सातवें दिन आचार्य द्विवेदी न्यास की ओर से श्रेष्ठ कवि व पूर्व सांसद डॉ. उदय प्रताप सिंह को आचार्य द्विवेदी युग प्रेरक सम्मान से सम्मानित किया गया। सम्मान ग्रहण करते हुए डॉ. उदय प्रताप भावुक हो गए। उन्होंने कहा कि हिंदी के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के नाम का सम्मान मिलना गौरव की बात है। सम्मान समारोह के बाद कवि सम्मेलन में कवयित्री डॉ. सरिता शर्मा ने अपनी नई कविता 'सुनो समंदर, तिरस्कार सहते-सहते, सूख रही है एक नदी बहते-बहते..' पढ़ी। बुजुर्ग महिलाओं और पुरुषों ने रस्साकशी, रूमाल झपट्टा प्रतियोगिता और म्यूजिकल चेयर रेस में जोश दिखाकर अपने बचपन को फिर से याद किया। 'आचार्य पथ' स्मारिका का विमोचन संपादक आनंद स्वरूप श्रीवास्तव ने अतिथियों से कराया।

 आठवाँ दिन मुशायरे के नाम रहा। इस दरम्यान पहला वाकिफ रायबरेलवी स्मृति सम्मान मरणोपरांत प्रयागराज के मरहूम शायर डॉ. जमीर अहसन को दिया गया, जिसे उनकी बेटियों अतिया नूर और कुदसिया ज़मीर ने ग्रहण किया। मुशायरे का बिस्मिल्लाह प्रयागराज के जीशान फ़तेहपुरी ने किया। उन्होंने मोहब्बत की राह में नफ़रत बोने पर गजल पढ़ी। अतिया नूर का इस शेर-'जब वह चला तो कतरा समंदर का हो गया, आँखों में ठहरा अश्क तो पत्थर का हो गया' खूब दाद मिली। रायबरेली की शायरा तारा इकबाल की गजल 'रिश्तों के ख़ुमार में हम फिर से आ गए, यानी दुआ सलाम में हम फिर से आ गए...' को बहुत सराहा गया। इस कार्यक्रम में बुजुर्ग शायर हसन रायबरेली ने माँ गंगा पर शेर पेश किए, जिससे पूरा माहौल मंत्रमुग्ध हो गया। लखनऊ के महेंद्र भीष्म के उपन्यास 'हाँ मैं हूँ' और अयोध्या की कवयित्री मानसी द्विवेदी के गीत संग्रह 'नदी सी मैं' पर गंभीर विमर्श भी हुआ। 

 समापन दिवस पर युवा गायिका दृष्टि पांडेय की सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के बाद भजन संध्या और फिर फूलों की होली ने बेमौसम माहौल होलियाना कर दिया। नौ दिनों तक चला आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी पुस्तक मेला संस्कृति, साहित्य और मानवीय जुड़ाव का उत्सव बन गया, जिसने यह साबित किया कि रायबरेली की धरती पर किताबों के साथ भावनाओं-कलाओं की गूँज आज भी इसलिए सुनी-सुनाई जाती है; क्योंकि आचार्य द्विवेदी साहित्य भाषा व्याकरण के साथ-साथ इतिहास भूगोल विज्ञान और कलाओं के भी पारखी थे। उनके निबंध 'संगीत के स्वर' और 'भारतीय चित्रकला' आज भी चाव से पढ़े-पढ़ाए जाते हैं। 

सम्प्रतिः प्रबंध संपादक एवं प्रकाशक, ककसाड़ पत्रिका दिल्ली, मो. 9968288050


बाल जगतः चौपाइयाँ...

  - सुशीला 'शील' स्वयंसिद्धा

1.  मिट्ठू प्यारे
मिट्ठू प्यारे यह बतलाओ।। 
रटते कैसे मुझे सिखाओ।।
 मुझको नहीं किताब लुभाती।।
 मोबाइल की चैट बुलाती।।

 दुखड़ा अपना किसे सुनाऊँ।।
 बहन न भाई किसे बुलाऊँ।।
खेलूँ किसके सँग तुम बोलो।। 
मन की अपनी साँकल खोलो।।

 इस छोटे पिंजर में तंगी।।
यहाँ न कोई  साथी- संगी।।
 मम्मी- पापा इसको जानें।।
 अपना हक़ आज़ादी मानें ।।

 मिट्ठू मैं पंछी हो जाऊँ।।
 नभ में विचरूँ खुशी मनाऊँ।।
 जीभर दोनों भरें उड़ानें
 तब ही खुश अपना दिल मानें।। 

 थक जाएँ तो उतरें नीचे।।
 बैठ आम अमरूद- बगीचे।।
 जीभर चुगलें दाना-दुनका।।
 जीवन जी लें अपने मन का।।

2. चिंटू 
का सपना


चिंटू जी के वारे न्यारे।।
पूर्ण हुए जो सपने सारे।।
उड़नखटोले बैठा ढोटा।।
हवा लगी तब देने झोटा।।

उड़ना बादल के भी ऊपर।।
तैर-तैरकर नापे अम्बर।।
दूर क्षितिज की छवि थी न्यारी।।
मनहर ज्यों सोने की क्यारी।।

संध्या रानी आई छम-छम।।
तारे करते चम चम चम चम।।
चन्दा मामा बड़े भले थे।।
बड़े प्यार से गले मिले थे।।

चन्दा मामा बने हिंडोला।।
धरती दिखती जैसे गोला।।
झिलमिल तारे दिखते प्यारे।।
ग्रह- नक्षत्र बहुत  ही प्यारे।।

चिंटू सोचे ध्रुव से मिल लूँ।।
उनसे बातें कर कुछ खिल लूँ।।
हाथ मिलाने उतरा नीचे।।
गिरा शून्य में आँखें मीचे।।

काँप रहा था डर के मारे।।
मम्मी-मम्मी मात्र पुकारे।।
मम्मी आईं गले लगाया।।
सपना था- उसको समझाया।।

बहुत झेंपकर हँसता चिंटू।।
हँसी  उड़ाएँ  छुटकी मिंटू।।
शून्य नहीं है यह है बिस्तर।।
अभी सो रहा है तू जिस पर।।

पूर्व प्रधानाचार्या, जयपुर, राजस्थान, मो. - 9351228446