मासिक वेब पत्रिका उदंती.com में आप नियमित पढ़ते हैं - शिक्षा • समाज • कला- संस्कृति • पर्यावरण आदि से जुड़े ज्वलंत मुद्दों पर आलेख, और साथ में अनकही • यात्रा वृतांत • संस्मरण • कहानी • कविता • व्यंग्य • लघुकथा • किताबें ... आपकी मौलिक रचनाओं का हमेशा स्वागत है।

Jan 1, 2023

बाल कहानीः दादा जी की नसीहतें

  - पवित्रा अग्रवाल

अमित नई कॉलोनी में रहता था। उसके पड़ोस में एक नया परिवार रहने आया था, उसमें दादाजी की उम्र के एक व्यक्ति और उनकी पत्नी थीं । वह लंगड़ा कर चलते थे और कड़क स्वभाव के थे। वह अपने साथ बहुत से गमले लाए थे, जिस में बहुत तरह के रंग- बिरंगे फूल खिलते थे। उन्होंने कोई माली नहीं रखा था।  वह अपने पौधों की बच्चों की तरह देख भाल करते थे, वह बाँसुरी भी बहुत अच्छी बजाते थे।

    बच्चे उन पौधों को देख कर बहुत ललचाते थे, उनका बस चलता तो वह एक भी फूल पौधों पर नहीं छोड़ते पर उनका कड़क स्वभाव देख कर बच्चे उनसे दूर ही रहते थे ।

एक दिन पौधों के पास किसी को न देख कर सौमेश अपने को नहीं रोक पाया और दो तीन फूल तोड़ लिए, तब ही वहाँ दादाजी आ गए और उसका हाथ पकड़ कर बोले यह क्या कर रहे हो ? ... आगे से ऐसा गलती मत करना वरना तुम्हारे पापा से शिकायत कर दूँगा, अब जाओ यहाँ से।’

तब से बच्चों ने उन दादाजी टाइप व्यक्ति का नाम लंगड़दीन रख दिया और उन्हें देखकर एक गाना गाते थे – ‘लंगड़दीन, बजाए बीन '

पतंग के दिन आने वाले थे । बाजार रंग- बिरंगी, छोटी- बड़ी पतंगों से भरा पड़ा था। रास्ता चलते बच्चे बड़ी हसरत से पंतगों को देखते थे पर अभी स्कूल खुले हुए थे तो पतंग उड़ाने की छूट उन्हें नहीं मिली थी। पर जैसे- जैसे पतंग के दिन नजदीक आ रहे थे दादा जी का दखल बढ़ने लगा था । वह निकलते बैठते बच्चों को बहुत नसीहतें देने लगे थे । किसी से कहते, ‘सुनो आराम से पतंग उड़ाना, लूटने के लिए उसके पीछे मत दौड़ना, गिर गए तो जान भी जा सकती है।... देखों बच्चों लोहे की छड़ से पतंग लूटने की कोशिश कभी नहीं करना, ऊपर जा रहे हाई टेंशन वायरों से छड़ टकरा गई तो कोई बचाने वाला नहीं मिलेगा और बच्चों सुनो पतंग लूटने या उड़ाने के लिए छत की  मुँडेर पर भी मत चढ़ना ।’

   कुछ बच्चे ये नसीहतें सुन- सुन कर उनसे चिढ़ने लगे थे पर कोई जवाब नहीं देते थे। एक कान से सुन कर दूसरे कान से निकाल देते थे। स्कूल की छुट्टी होते ही बच्चे पतंग उड़ाने की फ़िराक में रहते थे। दोपहर को पापा लोग तो काम पर चले जाते थे, जिनकी मम्मी नौकरी करती थीं वह भी घर में नहीं होती थीं, ऐसे में बच्चों को पतंग उड़ाने का मौका मिल जाता था  बस ऐसे ही एक दिन अमित के मम्मी पापा काम पर गए हुए थे, दादी गाँव में थीं। अमित घर में अकेला था। उसकी छत बहुत बड़ी थी, वह अपने दो तीन दोस्तों के साथ छत पर पहुँच गया था। सब अपनी अपनी पतगें और चरक लेकर आ गए थे और बड़ी तल्लीनता से पतंग उड़ा रहे थे। अमित के दोस्तों की कई पतंगें कट गई थीं।

पर अमित की एक भी नहीं कटी थी। यह देख उसके दोस्त बोले “क्या बात है अमित तुम ने तो कई पतंगें काट डालीं;  पर तुम्हारी अभी तक एक भी नहीं कटी है। कहीं तुम चाइनीज मांजा तो इस्तेमाल नहीं कर रहे ?”

‘यह पुराना चरक है, हो सकता है इसमें चायनीज मांजा ही हो, पर इस वर्ष तो मम्मी - पापा ने चायनीज मांजा न लाने का आदेश दे दिया है। बहुत खतरनाक होता है, पक्षी तो छोड़ो आदमी की जान पर भी बन आती है। आज के बाद इस चरक को इस्तेमाल नहीं करूँगा’

तभी एक बहुत बड़ी और बहुत सुंदर उड़ती पतंग पर बच्चों की नजर गई तो वह पतंग उड़ाना भूल कर उस को ही देखते रह गए और उसे पाने के लिए उस पतंग से पेच लड़ा कर उसे काटने की कोशिश करने लगे।

देखते ही देखते वह पतंग कट कर नीचे की तरफ आने लगी और बच्चे अपनी पतंगों को हवा में ही छोड़ कर उसे पकड़ने की कोशिश करने लगे। एक बच्चे ने वहाँ पड़ी लोहे की सरिया को उठाना चाहा तो दूसरे बच्चे को लंगड़दीन दादा की बात याद आ गई।  बच्चे ने छड़ उसके हाथ से ले कर दूसरे कोने में फेंक दी पर उस समय बच्चे किसी भी तरह पतंग लूट लेना चाहते थे और तभी अचानक वह हादसा हो गया. अमित छत से नीचे गिर गया था। आस पास कोई नहीं दिख रहा था।  बच्चे मदद के लिए चिल्लाने लगे।

शोर सुन कर दादा लंगड़दीन बाहर आए, अमित को बेहोश पड़ा देख कर जल्दी से बच्चों की मदद से ऑटो में डालकर अस्पताल ले गए । जगह जगह से खून बह रहा था। डाक्टर को सौंप कर वह हताश से बैठ गए थे । तब बच्चों ने बताया कि पतंग लूटने के चक्कर में अमित छत से गिरा है। अमित के माता -पिता घर पर नहीं थे और किसी को उनका मोबाइल नंबर भी नहीं पता था।  समस्या थी कि उन्हें कैसे सूचित किया जाए। अमित के दोस्त को उसके चाचा जी का घर पता था। वह दौड़कर उनके घर गया और अमित के छत से गिर जाने की बात बताई। फोन पर सूचना मिलते ही उसके माता पिता बहुत घबराए हुए आये। उनके चेहरे पर हवाइयाँ उड़ रही थीं।

तभी डॉक्टर ने आकर बताया ‘बच्चा अभी भी बेहोश है, उसे समय से न लाया गया होता तो खून बहुत बह जाता पर हमें अभी भी उसे एक यूनिट खून चढ़ाना पड़ेगा उसका ब्लड ग्रुप ओ पॉजेटिव है, आप में से किसी का यह ग्रुप हो तो खून दे सकते हैं। ’

तभी दादा जी आकर बोले- ‘मेरा ब्लड ग्रुप ओ पॉजेटिव है , आप चाहें तो मेरा ले सकते हैं’

तभी अमित के पिता आगे आये और हाथ जोड़ते हुए बोले - ‘नहीं अंकल जी आप का एहसान हम जिंदगी भर नहीं भुला सकते, मेरा भी यही ग्रुप है, खून तो मैं दे दूँगा।’

डॉक्टर ने राहत की साँस लेते हुए कहा ‘हमें उम्मीद है कि वह जल्दी ही होश में आ जायेगा, बस एक बार उसे होश आ जाये फिर चिंता की कोई बात नहीं है। चोटें और फ्रेकचर की चिंता नहीं है।  समय लगेगा पर वह ठीक हो जायेगा। ’

     बच्चे आदर से लंगड़दीन को दादा जी कहने लगे थे। अमित के माता पिता ने अश्रुपूर्ण आँखों से दादा जी को  बच्चों के साथ  घर जाने को कहा ।

घर लौटते समय रास्ते में दादा जी ने कहा – ‘बच्चों मुझे मालूम है कि तुम लोग मुझे देखकर ‘लंगड़दीन बजाये बीन’ का गाना गाते हो। हँसते हुए  पर बच्चों  मैं तो बीन नहीं, बाँसुरी बजाता हूँ ’

बच्चों ने शर्मिंदा होकर सॉरी बोला और कहा -‘हम कभी  उल्टा-सीधा गाना नहीं गाएँगे।दादा जी आप बाँसुरी बहुत अच्छी बजाते हैं, हमें भी सिखा देंगे ?”.

‘जरूर सिखाऊँगा पर एक बात बताऊँ , मैं हमेशा से लंगड़ा नहीं था। जब मैं पन्द्रह वर्ष का था, तो पतंग लूटने के चक्कर में छत  से गिर गया था । बच तो गया पर जीवन भर के लिए लंगड़ा हो गया ।... इसीलिए बच्चों  मैं तुम लोगों को सावधानी से पतंग उड़ाने की  नसीहतें देता रहता था, पर मेरी कोशिश बेकार गई।'

‘एक बार फिर सॉरी दादा जी, अब हम सब हमेशा आपकी बात मानेंगे, हमें माफ कर दीजिए। '

 ‘ठीक है बच्चों अब अपने अपने घर जाओ’

सम्पर्कः बेंगलौर (कर्नाटक), मो.- 9393385447, agarwalpavitra78@gmail.com

कहानीः अजनबी

- प्रियंका गुप्ता

 सुबह के साढ़े छह बज गए थे और मोबाइल में बजती बाँसुरी की मधुर धुन से मेरी नींद पूरी तौर से खुल चुकी थी। जो थोड़ा-बहुत आलस बचा था, वह भी खिड़की से आती सुबह की मुलायम रोशनी ने भगा दिया। बिस्तर से उतरकर मैंने एक भरपूर अँगड़ाई ली, बालों को क्लचर के हवाले करते हुए स्लीपर पहनी और बाथरूम जाने से पहले रोज़ की तरह इलेक्ट्रिक केतली का प्लग ऑन कर दिया।

जब तक बाहर आई, गर्मागर्म भाप उगलती मेरी ब्लैक टी तैयार थी। म्यूज़िक सिस्टम पर धीमी आवाज़ में अपने पसन्दीदा गानों की सीडी चलाकर मैंने चाय का कप और अख़बार उठाया और खिड़की के पास आकर बैठ गई। ये मेरी फ़ेवरेट जगह थी। अख़बार की ख़बरों में डूबने से पहले ब्लैक टी पीते हुए बाहर ताकना मुझे बेहद पसन्द था। चीनी -दूध वाली चाय मैं तब पीती थी, जब किसी बात को सेलिब्रेट करने का दिल करता था ।

दूर आसमान में आवारागर्दी करते बादलों के सफ़ेद टुकड़ों से आकृतियाँ बनाने में मैं इतना मशगूल थी कि मोबाइल की घण्टी ने भी मुझे चौंका दिया। जाने क्यों पहला ख़याल एकदम से यही आया कि ये तुम्हारा फोन होगा...हैप्पी एनीवर्सरी कहने को...तेरह फ़रवरी जो थी...। आज ही के दिन तो हम मिले थे न...। पर शाम्भवी का फोन देखकर एक ठण्डी साँस निकल गई...। अब काहे की हैप्पी एनीवर्सरी...पन्द्रह दिन तो बीत चुके हैं सब ख़त्म हुए...।

पाँच सालों तक हम दोनों के बीच मीलों की ये दूरी उतनी कभी नहीं खली, जितना आज अखर रही थी। तुम पास होते, तो शायद कुछ बातें तय करने की गुंजाइश भी होती, पर तुम तो हर तरह से दूर हो चुके थे...। तन से तो हमेशा थे ही, अब तो मन भी मेरे पास नहीं रहा था ।

कोई और दिन होता, तो अपनी बचपन की सहेली शाम्भवी से पटर-पटर मैं कितनी लम्बी बातें कर लेती...जैसे तुमसे करती थी, पर आज दिल नहीं किया। उसने पूछा भी, पर तबियत ख़राब होने का बहाना करते हुए मैंने नकली मस्ती दिखाई और फिर जितना जल्दी फोन रख सकती थी, रख दिया...। न चाहते हुए भी मेरी आँख से दो बूँद गर्म आँसू निकलकर गालों पर बहते हुए कहीं खो गए...।

रॉकिंग चेयर पर आँख मूँदकर धीमे-धीमे झूलते हुए मुझे ये भी याद नहीं रहा कि अनछुई चाय बिल्कुल ठण्डी हो चुकी है, ठीक मेरी उम्मीदों की तरह...।

तुम जितनी तेज़ी से आए थे मेरी ज़िन्दगी में, उतने ही आहिस्ता से चले भी गए...। शाम्भवी ने जब हमारा परिचय कराया था, तब उस मुस्कराते चेहरे वाले लड़के से हाथ मिलाते वक़्त ये कहाँ सोचा था कि इन हाथों को ज़िन्दगी भर के लिए थामना चाहूँगी...। शाम्भवी तो जैसे ऑब्सेस्ड थी तुमसे...। समीर ये...समीर वो...सुनते-सुनते तुमसे ज़्यादा मिले बिना ही तुमको मानो बहुत जान गई। तुमसे जुड़ी हर बात सुनते हुए मेरे सामने हमेशा तुम्हारा वही मुस्कराता चेहरा आ जाता था...। जिस पार्टी में हम मिले थे, उसमें देखकर ही कोई भी ये बता सकता था कि तुम कितने पॉपुलर हो...। तुम्हारे साधारण से साँवले चेहरे पर भी एक अजब-सी कशिश थी...। सबसे तुम्हारा वह गर्मजोशी से मिलना, शालीनता भरी वह कम बोलने की आदत के बावजूद कितना कुछ कहती वे मुस्कराती आँखें...। अगर तुम्हें अच्छे से जानने वाली शाम्भवी तुम्हारी फ़ैन थी, तो क्या ग़लत था, तुम्हारे सम्मोहन से पहली ही मुलाक़ात में मैं भी कहाँ बची थी।

तुम तो नहीं पीते, पर उस पार्टी में कुछ अधिक पी चुके दो लड़कों से मैं बेहद असहज हो गई थी। एक लापरवाही से तुम टहलते हुए आए और बड़े अधिकार से मुझे अपने लिए कोल्ड-ड्रिंक लाने को बोल दिया था। सच कहूँ, उस पल को जब भी आँख बन्द करके देखती हूँ, आज भी उतना ही अच्छा लगता है।

एक बात बताऊँ ? वैसे मुझे पता है, तुम पहले से ही ये बात जानते हो, पर आज तुमसे कन्फ़ेस कर रही...। तुम्हारे क़रीब आने के बाद मैं कुछ ज़्यादा ही पजेसिव हो गई थी। तभी तो बाद में कभी शाम्भवी जब तुम्हारे बारे में बातें करती, मैं अन्दर से जल-सी जाती। उससे ईर्ष्या होती, वह जब चाहे तुमसे मिल सकती थी...और मैं...? मुझे तो अक्सर कई महीनों का इंतज़ार करना पड़ता, तब कहीं जाकर एक-दो दिनों के लिए हम मिल पाते...। कभी कभी गिल्ट भी होता था, इतना पजेसिव होना भी अच्छा नहीं न...। 

याद है, एक बार मैने मज़ाक-सा करते हुए तुम्हें अपनी इस फ़ीलिंग के बारे में बताया था। सब स्वीकारते हुए अन्दर से एक डर भी था...इतना जलनखोर देखकर तुमने मुझे ग़लत समझ लिया तो...? या फिर इरीटेट हो गए तो...? पर तुमने बेपरवाही से मेरी बात को हँसी में उड़ा दिया था ,"अच्छा है न तुम जेलेस होती हो...प्यार में ऐसा होना बहुत नॉर्मल है...।"

तुम्हारी आवाज़ की खनक से मुझे शक़ भी हुआ था, तुम मेरी इस हालत को शायद एन्ज्यॉय कर रहे थे। हो सकता है, बेआवाज़ हँस भी रहे हो...। दिल किया, सामने होते तो फोन तुम्हारे सिर पर पटक देती। मैं यहाँ जल-जल के मरूँ और तुम्हें मज़े आएँ...?

तुम्हारे लिए मेरे इस पज़ेसिवनेस के ज़िम्मेदार तो तुम खुद थे न...। अपने छोटे-बड़े, जाने कितने अधिकार तुमने मुझे दे दिए थे। मैं इस मामले में थोड़ा भी नखरा दिखाती और सामने तुम्हारा रेडीमेड जवाब होता... मुझे क्या, मेरा कुछ नुकसान हुआ, तो तुम जानना...। ठीक न...? अब इस लहरियादार क्वेश्चन मार्क वाले पॉज़ के बाद कौन होता, जो झक न मार लेता...? शाम की ऑफिशियल पार्टी में क्या पहनना है से लेकर सुबह के ब्रेकफास्ट में क्या खाओगे, सब तय करना मेरे जिम्मे था । ये तो ये, पर अक्सर की तुम्हारी वो ज़िदें...तौबा...! फलाँ-फलाँ काम तुम नहीं करोगी, तो मैं तो किसी हालत में नहीं करूँगा...। पता नहीं, अपनी बात मनवाने के लिए तुम इतने सख़्त कैसे हो जाते थे...।

 तुमसे मिलने तक मैं खुद को लेकर कितना कन्फ़्यूज़्ड थी। हर बात का गिल्ट लेना...मानो दुनिया में सुनामी और भूकम्प भी मेरी वजह से ही आते हों...। बात-बात पर आँसू निकल आना...। तुम्हारे सामने स्काइप पर ही पहली बार रोई थी, तो तुमको यूँ गम्भीर देखकर मैं थोड़ा सहम गई थी...। शायद बाकी मर्दों की तरह तुम भी इरीटेट हो गए हो...और मेरे शान्त होते ही तुमने पूछा था...आज नहाने का इन्तज़ाम हो गया न...? मेरी ट्यूबलाइट जलने तक तुम वैसे ही धीर-गम्भीर चेहरा लिये मुझे ताकते रहे थे, बस तुम्हारी आँखें हँस रही थीं...और मैं किसी खिसियानी बिल्ली की तरह खम्बा नोचते हुए लॉगआउट हो गई थी...।

दुनिया के सामने एक मैच्योर इन्सान तुम्हारे सामने पता नहीं कैसे किसी भी बात पर हँसने-रोने-रूठने वाली बच्ची बन जाती थी। तुम हमेशा मुझे सँभाल जो लेते थे...। गज़ब के मैच्योर थे तुम...अपनी धुन के पक्के...अपने काम में जुनून की हद तक डूब जाने वाले...। जब कभी मेरा फोन कटने के साथ मैसेज आता...आय एम बिज़ी...विल कॉल यू लेटर...मैं अपने मोबाइल पर तुम्हारी फोटो पर अपने फोटोशॉप के सारे हुनर इस्तेमाल कर लेती...। लेकिन तुम भी बड़े ढीठ हुआ करते...। न चिढ़ना, न लड़ना...बस एक स्माइली से काम चल जाता था तुम्हारा...। पर जब तुम  सामने होते, तो तुम्हारी ये क्यूट सी स्माइल भी कुछ न कर पाती और अपनी चिकोटियों से मैं तुम्हें तंग कर ही लेती। उसके बाद की पिलो-फ़ाइट में तुमसे हारकर जीतने की उस बाजीगरी खुशी को तुम क्या जानो समीर बाबू...। तुम्हारा ऐसा बचपना भी शायद सिर्फ मैंने ही देखा है न...?

तुम्हारे साथ के इन पाँच सालों में ऐसी छोटी-छोटी खुशियाँ तो मैंने बहुत इकट्ठा की हैं...। अब उन ढेर सारी तस्वीरों की बात ही देख लो...। तुम्हारी तो आदत थी न शुरू से...एक छोटा- सा रुमाल भी खरीदते, तो उसकी फोटो खींचकर मेरी मेल पर भेज देते...। मेरे लैपटॉप के एक फोल्डर में ऐसी हज़ारों तस्वीरें इकठ्ठा होती गईं...। तुम्हारा अधखाया बर्गर, तुम्हारा टूटा हुआ चश्मा...तुम्हारी फेंके जाने वाली चप्पल से लेकर तुम्हारे नए जूतों तक को उस एक फोल्डर ने अपने अन्दर छुपा रखा है...। पर जाने कब और कैसे उस फोल्डर में तस्वीरें जुड़ने की संख्या कम होती गई...। तुम्हारे साथ शेयर की हुई ऐसी अनगिनत बातें भी मेरे दिल के एक फ़ोल्डर में जमा होती थीं। इतनी दूर होने पर भी हम कब, कहाँ और किसके साथ हैं, कब खाना खाया और कब लंच का गोला मार दिया...सब पता रहती थीं। कभी साथ न रहने की कमी खली ही नहीं...।

पर सब दिन एक-से नहीं होते न...। अब जब मैं तुमसे तुम्हारी नई पिक्चर माँगती, तुमको वो बेहद बचकानी-सी ख़्वाहिश लगती...। तुम्हें टाइम-बेटाइम फोन करने पर मैसेज़ तो उसी तरह आते, पर स्माइली बनाना तुम भूलने लगे थे। उल्टे स्टॉप बिहेविंग लाइक अ चाइल्ड सुनकर मैं जाने कितनी बार फोन ही स्विच ऑफ़ करके रखने लगी। तुम शायद कभी नहीं जान पाओगे कि अक्सर दिन में कई बार मैं मोबाइल उठाकर देखती और फिर पहले से भी ज़्यादा बुझे मन से वापस भी रख देती...। काम की मसरूफ़ियत तुम्हारी याददाश्त पर भी असर डालने लगी थी, तभी तो लंदन से रानो दी के लाए स्वेटर और पापा के नए फ्लैट बुक कराने के बारे में तो तुम बताना ही भूल गए थे...। उस दिन पूरा फोल्डर हार्ड डिस्क में ट्रांसफर करने से पहले पता नहीं क्यों मैंने हरेक तस्वीर को गौर से देखा था...।

हम दोनों ही परिवार के साथ रहते थे, पर एक अर्से बाद पता नहीं तुम अपने घर के ज़्यादा आदर्श बेटे बन गए या मैं ही अधिक नालायक बेटी थी...। तभी तो अक्सर तुम मुझे समझाना शुरू कर देते... अरे यार...ये क्या बात हुई कि मुझसे बात करते हुए ही तुमको अच्छी नींद आ सकती है...। ज़रूरी नहीं है कि रोज़ रात को हम इतनी देर तक बात करें ही...। अच्छी किताबें पढ़ो...मूवी देखो...गाने सुनो...। खुद ही सो जाओगी...।

मैंने हमेशा की तरह बिना बहस किए तुम्हारी बात मान ली थी और कई रातों तक करवटें बदलते हुए रात काट ली...।

मुझे अगर तुमसे बातें किए बिना नींद नहीं आती थी, तो मेरे जगाए बिना तुम्हारी आँखें नहीं खुलती थीं। रात में मुझे सोते हुए चाहे जितनी देर हो जाती, तुम्हारे बताए टाइम पर मैं हमेशा पूरी सजगता से जाग जाती। जिन दिनों हमने रात की बातें बन्द की, उस समय भी तुम्हारे मैसेज से मुझे अगले दिन के अलार्म का पता चल जाता। सुबह जब तक तुम फोन उठाकर मुझे आश्वस्त न कर देते, मैं लगातार तुमको फोन मिलाए जाती...। आखिरकार मेरे इस इम्पल्सिवनेस से भी तुम इरीटेट हो गए थे, "क्या यार...! इतना जीना भी हराम न करो...। एक बार रिंग मार दी, काम ख़तम...। वैसे अब मैं भी अपना अलार्म लगाने लगा हूँ, तो फ़ालतू में मेरी वजह से अपनी नींद न खराब किया करो...। खुद जागने लगा हूँ अब...।"

 मैं बिना बात पड़ी इस डाँट से हमेशा की तरह रुआँसी हो गई तो तुम नर्म पड़ गए थे, पर इस बार काँटा कहीं गहरे धँसा था। सुबह तुमसे पहले जागने के बावजूद मैं तुम्हें जगाने से कतराने लगी थी। उन दिनों मन अजीब-सा उचाट रहने लगा था। मेरा कितना कुछ अनकहा सुना करते थे तुम...। फिर क्यों तुम भी नहीं जान पाए कि सुबह की वह कुछ पलों की गुड मॉर्निंग कॉल मेरे लिए दिन भर किसी टॉनिक का काम करती थी? रात की बेचैनी भरी नींद भी उस कॉल के बाद तरोताज़ा हो जाती थी।

जैसे जैसे वक़्त बीत रहा था, मेरी ज़िन्दगी मानो पीछे भाग रही थी...हम दोनों दिन-ब-दिन अजनबी होते जा रहे थे । अक्सर मुझे यह भी नहीं पता होता कि मेरी कौन सी बात तुमको ख़ुशी देगी और किस बात से तुम नाराज़  होगे...। तुम्हारे ऊपर तुम्हारे कैरियर का प्रेशर था, तो मेरे घरवालों की ओर से मेरी शादी की बेचैनियाँ थी...।

तुमको जब ये बात बताई थी मैंने, तुम कुछ देर बिल्कुल खामोश हो गए। मैं तो अब तुम्हारी ख़ामोशी को तुम्हारी आवाज़ से ज़्यादा पहचानने लगी थी...। मुझे पता था, तुम अपने सामने बस ऐंवेही किसी चीज  को ताकते हुए अपने में गुम हो गए होगे। एक हाथ से कान पर मोबाइल चिपकाए दूसरे हाथ की उँगलियों से कुछ आड़ा-तिरछा खींच रहे होगे...और जब मैं तुम्हारा नाम लूँगी, तुम जैसे किसी ध्यान से जागकर यूँ दिखाओगे जैसे उस दौरान कही गई हर बात तुमने सुनी हो...।

तुम मुझे कितना भी बहला लो;  पर सच तो यही था कि तुम अक्सर मेरी पूरी बात सुनते ही नहीं थे। हाँ-हूँ करने के बावजूद तुम्हारा ध्यान जाने कहाँ होता । मेरे कहे गए कुछ आखिरी शब्दों की चाभी से तुम पूरी बात का ताला खोल लेना चाहते थे...। खूब समझती थी मैं तुम्हारी चालाकी...।

सब कुछ समझने के बावजूद कभी ये नहीं समझ पाई कि दुनिया की हर चीज की एक एक्सपायरी डेट होती है...हमारा रिश्ता भी एक्सपायर हो रहा था । उस दिन तुमको ऐसे हिचकिचाते हुए मैंने पहली बार देखा था...। सबसे पहले तो आश्चर्य इस बात से हुआ था कि तुमने अपने आप मुझे स्काइप पर आने को कहा, वरना ये तो मैं थी जो हमेशा विडियो चैट के लिए तुम्हारी मिन्नतें करती । अजीब सी खुशी हुई...साथ ही पता नहीं क्यों एक अनजाना डर भी लगा । शायद इसी को `सिक्स्थ सेंस’ कहते हैं ।

तुम्हें सामने देखकर हमेशा की तरह मैं चहक रही थी, पर तुम सपाट थे । मेरे टोकने पर तुम मुस्कराए तो, पर उस पल वो मुस्कान सिर्फ तुम्हारे होंठों पर ही टिकी रही...आँखों तक गई ही नहीं । मुझे तभी शक़ हुआ था...ठीक हो न तुम...? जवाब में तुमने सिर्फ `हूँ’ किया था, गर्दन की हल्की जुम्बिश के साथ...।

तुम्हारा मूड ठीक करने के लिए मैं बेवजह अजीब- अजीब मुँह बना कर तुम्हें हँसाने की कोशिश कर रही थी कि तुमने सुनो तो सुनिधि कहकर मेरे बचपने पर एकदम स्टॉप लगा दिया । जाने कितने अरसे बाद तुमने मेरा पूरा नाम लिया था । सुधि फिर से तुम्हारे लिए सुनिधि हो गई, कुछ तो गड़बड़ थी ।

मैं एकदम चुप होकर टुकुर टुकुर तुम्हारा मुँह ताक रही थी, उधर तुम फिर नज़रें चुराए मेज़ पर जाने कौन सी कलाकारी कर रहे थे । अबकी बार मैं इरिटेट हो गई...चलो यार, बाद में बात करते हैं...। जैसे कुछ याद आया हो, कुछ इस तरह तुमने एक साँस में ही विदेश में लगी अपनी नई नौकरी और उसे ज्वाइन करने के अपने निर्णय, दोनों के बारे में बता डाला ।

मैं हैरान भी थी और हर्ट भी...। किसी की याददाश्त क्या इतनी खराब हो सकती है कि वह इतनी बड़ी बात बताना भी भूल जाए...? कब तुमने अप्लाई किया, कब तुमको नौकरी मिली और कब तुमने सारी फोर्मलिटी पूरी कर डाली, ये सब बताना तुम्हारे लिए ग़ैर-ज़रूरी हो गया ?

उस एक पल में ही मुझे लगा, मैं तुम्हें पहचानती ही नहीं...जानना तो बहुत दूर की बात है...। तुम्हारी शायद अपनी मजबूरियाँ रही हों, पर किसी अजनबी के साथ आगे के सफ़र की उम्मीद करना मेरी मजबूरी नहीं थी ।

 मुझे तुम्हारी सफाई सुनने में कोई इंटरेस्ट नहीं था । सच कहूँ तो तुम्हारी किसी बात में मेरा कोई इंटरेस्ट नहीं  बचा था । इसलिए ये भी नहीं जानती कि किसी समझदार, मैच्योर इंसान की तरह अलविदा कहने के साथ मुझे लॉगआउट होते देख तुमको कैसा लगा होगा...।

डोरबेल बजी तो मैं अपने ख़्यालों से बाहर आ गई...इस समय तो मेड ही होगी । ब्लैक टी का कप सिंक पर रख मैं दरवाज़ा खोलने बढ़ गई...। आज इसी को बोल देती हूँ, एक कप बढ़िया दूध और शक्कर वाली चाय बना के पिला दे...।

सम्पर्कः एम.आई.जी- 292, कैलाश विहार, आवास विकास योजना संख्या- एक, कल्याणपुर, कानपुर- 208017 (उ.प्र), priyanka.gupta.knpr@gmail.com, मो. 9919025046

तीन लघुकथाएँ- 1. वर्तमान का दंश, 2. खूबसूरत, 3, पहेली

  -  डॉ . सुषमा गुप्ता

1. वर्तमान का दंश

"और हीरो! क्या चल रहा है लाइफ में?"कईं सालों बाद मुम्बई से दिल्ली अपने छोटे भाई के घर आए रामनाथ जी ने अपने सत्रह साल के भतीजे से पूछा।

"कुछ खास नहीं ताऊजी, बस आई.आई.टी की तैयारी कर रहा हूँ।"

"अरे पढ़ाई वढ़ाई तो चलती रहती है। तू तो ये बता तेरी गर्लफ्रैंड्स कितनी है?"

उन्होंने हँसते हुए पूछा।

"अरे क्या ताऊजी, आप भी न। मैं नहीं पड़ता इन चक्करों में।"

"हट! ज़िन्दगी खराब है तेरी फिर। अबे जवानी में ये सब नहीं करेगा तो बुढ़ापे में करेगा क्या। पूछ अपने बाप से

 स्कूल कॉलेज में कैसे लड़कियों की लाइन लगती थी मेरे पीछे। साले घर की इज्जत का तो ख्याल रख।"

रामनाथ जी ज़ोर से हँसते हुए बोले।

"मुझे है न ख्याल घर की इज्जत का ताऊजी।"-बाहर से आती मिताली बोली।

"क्या मतलब?"

"मतलब ये, मेरे है न खूब सारे बॉय फ्रैंड्स। आप चिंता मत करो। मैं हूँ न खानदान की परम्परा निभाने को।"-मिताली दाँत दिखाती हुई चहकी।

रामनाथ जी की हँसी में ब्रेक लग गया और चेहरा गुस्से से तमतमाने लगा।


2. खूबसूरत

देर रात हम समंदर किनारे बैठे थे।

देर मतलब.. बहुत देर।

यही कोई रात का डेढ़ बजा होगा। समंदर की लहरें उफान पर थी।

मैं नीली डेनिम शॉर्ट्स और सफेद स्पैगिटी में, अपने घुटने मोड़कर बैठी, उँगली से रेत पर आड़ी- तिरछी आकृतियाँ बना रही थी।

ब्लैक शॉर्ट्स और ब्लैक सैंडो पहने वो वहीं पास में, रेत पर लेटा, सिर के नीचे दोनों हाथ टिकाए, एकटक आसमान देखता हुआ बोला, “रात बहुत काली है। है ना!”

मैंने शुतुरमुर्ग की तरह झट से गर्दन उठाकर आसमान की तरफ देखा और फिर आसपास।

उसके स्लीपर और मेरे सैंडल साथ रखे थे, रेत पर कुछ इस तरह  कि लहर बार-बार आती और उन्हें चूमकर वापस चली जाती। यही खेल, लहर कभी-कभी हमारी देह के साथ भी करती थी।

उसकी बात के जवाब में मैंने कहा, “चाँद नजर आ रहा है?”

वह मेरी तरफ देखकर मुस्कुरा दिया।

रेत में पड़ी एक टूटी सीप उठाकर मैंने उस पर फेंकते हुए कहा- “इतना फिल्मी होने की ज़रूरत नहीं है। मुझे नहीं, आसमान में देखो।”

उसको फिल्मी कहने के बाद मैंने खुद भी उँगली का इशारा उसकी तरफ करते हुए, आसमान के चाँद की तरफ उँगली घुमाते हुए कहा, “उसको कह रही हूँ। उसकी रोशनी देखते हो? उसकी चाँदनी से लहरों पर पड़ने वाली झिलमिलाहट को देखो। तुम कहते हो कि रात काली है। मैं कहती हूँ कि यह अद्भुत रोशनी देखो जो छन- छनकर नीचे बिखर रही है। कितना कुछ इसमें जगमगा रहा है। अक्सर जिन चीजों के लिए कहा जाता है कि वह सिर्फ़ दिखाई देती हैं, अगर ध्यान से महसूस करो, तो वह सुनाई भी देती हैं। तुम इस समय न सिर्फ रोशनी को देख सकते हो; बल्कि सुन भी सकते हो। कैसे घुँघरू – घुँघरू  बजती चाँदनी , लहरों पर नृत्य कर रही है। और यह जादू सिर्फ रात में होता है दिन में नहीं।”

उसने करवट लेकर मेरी तरफ पलटते हुए कोहनी मोड़कर अपनी हथेली पर गाल टिकाते हुए कहा, “तुम्हें और क्या-क्या दिख रहा है?”

“मुझे दिख रहा है कि यह बात पुरानी है कि हर रात के बाद सुबह होती है। बात अब यह है कि रात अपने आप में खूबसूरत होती हैं। दुःख की रोशनी हमारे भीतर बिल्कुल अलग तरह का उजास भरती है। हमें भीतर से एनरिच, एनलाइट करती है। और फिर हम तो उदास फितरत के लोग हैं जानेमन । हमें तो इसी की गलबहियाँ में रस आता है।”

उसने मुस्कुराते हुए पूछा , “मेरे साथ चलोगी?”

मैंने हँसते हुए कहा, “डूब मरने के अलावा मेरे पास और भी बेहतर बिगाड़ हैं ज़िंदगी के।”

फिर घुँघरू- सी चाँदनी में हँसी खनकती रही।

रेत पर कदमों के दो जोड़ी निशान देर तक उभरते मिटते रहे।

3. पहेली

इच्छाओं के खोखले  बाँस में पाँच छेद करके बाँसुरी बना ली,  हालाँकि सुर अभी साधने नहीं आए; पर मेरी अंतिम इच्छा यही है कि कभी साधने आएँ भी ना।

चप्पल बड़ी होती जा रही थी, पैर उतने का उतना ही था। यह बात मुझे हैरान करने लगी। एक रोज़ नदी किनारे चप्पल उतारकर नदी में पैर डालते हुए मैंने उससे यह बात कही। उसने कुछ देर चप्पल को देखा, कुछ देर मेरे पैर को और गंभीर होकर कहा-“तुम्हारा पैर सिकुड़ता जा रहा है, चप्पल नहीं बड़ी हो रही।”

उसके यह कहने के बाद, मैंने भी एक बार चप्पल को देखा और फिर बहुत देर अपने पैर को फिर उसकी तरफ देख कर कहा- “मन अगर पैर की जगह है, तो पैर कहाँ हैं!”

कविताः दुआ का पौधा

  - रश्मि विभा त्रिपाठी

मेरे आगे

तनकर खड़ा था

क्या करती

पाँव छूने को चली

दुख मुझसे बड़ा था

अचानक

उसकी आँखों में

उतर आई खीज बड़ी

पल में टूटी अकड़

भीतर तक जल-भुन गया

और लौटना पड़ा

उसे

मुँह की खाए

अपनी हार से चिड़चिड़ाए

आदमी की तरह

करते हुए बड़-बड़, बड़-बड़

सुनो

उसने देख लिया

कि

तुमने जो रोपा था

द्वार पर

दुआ का पौधा

उसने अब कसकर

पकड़ ली है जड़।


दो लघुकथाएँ- 1. पपेट शो, 2.देवो भवः

  -  दीपाली ठाकुर

1. पपेट शो

"आर! "

"आरव. जल्दी आओ बेटा रिसेप्शन में जाना है न! आज, चलो जल्दी से तैयार हो जाओ।"

"क्या मम्मा अभी तो दस मिनट बस खेल" आरव ने झुंझलाकर कहा।

" कल खेल लेना " -खुशबू ने अपनी चूड़ियों का सेट जमाते कहा।

"कभी नहीं आता कल, आप रोज बोलती हो कल खेलना और रोज कभी मार्केट ,कभी आपकी किट्टी-" रुआँसा आरव चिल्ला पड़ा।

" बिहेव योरसेल्फ, ऐसे बात करते है बड़ों से तुम बहुत बिगड़ गए हो”- खुशबू ने आरव का हाथ खींचते हुए लगभग घसीटते हुए बाथरूम तक ला छोड़ा।

"अब अच्छे से मुँह हाथ धोकर आओ”- आँखें तरेरते हुए खुशबू बोली।

नन्हे आरव ने दरवाज़ा बंद कर पहले आँसुओं से चेहरा धोया, फिर साबुन से मुँह- हाथ धो मुस्कुराता हुआ अपनी वार्ड रॉब से अपनी फेवरेट टी शर्ट और केप्री निकाल ली ।

खुशबू ने उसकी ड्रेस देखी, तो वो वापस रख फुल स्लीव की शर्ट और फुल पेंट निकालकर सख्त आवाज़ में कहा-" ये पहनो! "

" ये मुझे पसंद नहीं है कॉलर चुभते हैं ,और मैं तेज़ दौड़.....

"हर बात पर बहस, हम पार्टी में जा रहे है।" और उसने जबरदस्ती कपड़ों में कैद कर दिया नन्हे जिस्म को।

आरव तैयार था

"मम्मा मैं खेल लूँ थोड़ी देर ,जब तक आप तैयार हो रहे हो?”  नन्हा आरव मनुहार करता हुआ बोला।

" नहीं, बिल्कुल नहीं। फिर से गंदे हो जाओगे – “ वो साड़ी जमाते हुई बोली।

"टी वी देख लो थोड़ी देर”- खुशबू ने फिर निर्देश दिया।

आरव को समझ नहीं आता कि जब मम्मा कहे, तब टी वी देखना बुरा क्यूँ नहीं है, जब वो कहे कल करूँगा तब कल कभी नहीं आता

टीवी पर पपेट शो चल रहा था । बड़ी प्यारी- प्यारी पपेट्स डोर खीचने वाले के इशारों पर नाच रही थी ।

आरव को बड़ा मजा आ रहा था। वो उन पपेट्स को देखकर बहुत खुश हो रहा था । अचानक टी वी की स्क्रीन पर अँधेरा छा गया ।

खुशबू तैयार थी और रिमोट के पावर बटन पर उसकी उँगली यकायक पपेट का चेहरा आरव के चेहरे में और डोर पकड़ने वाले का खुशबू के चेहरे में बदल गया ।

पपेट शो चालू था।

2. देवो भवः

द्वार पर बीच की जगह आने जाने के लिए छोड़ दोनों किवाड़ों की चौखट से लगी सुंदर रंगोली, दाएँ -बाएँ टेराकोटा के छोटी -छोटी तख्तियाँ, जिन पर शुभ - लाभ और चौखट के मध्य स्वस्तिक का चिह्न; आँगन में सुंदर टेराकोटा का कलात्मक तुलसी चौरा, तुलसी जी को अर्पित कुमकुम, फूल जो गृहस्वामी / स्वामिनी की आस्था के साक्षी हो- जैसे, घंटी का निशान बने हुए बटन पर हाथ धरते ही पवित्र गायत्री मंत्र जब उच्चारित होने लगा, मेरे तन मन का पुलक जैसे रोम -रोम से प्रदर्शित होने लगा ; पाश्चात्य अंधानुकरण के इस युग में ऐसा देसीपन शुद्ध पवित्र परिवेश कौन नहीं रीझ जाएगा ।

मैं भी गदगद भतीजे के घर के सात्विक , संस्कारित माहौल से; बैठक की साज- सज्जा भी मनमोहक भारतीय स्वाद लिये हुए, सर्वप्रथम विघ्नेश के दर्शन प्रवेश लेते ही, एक तरफ दीवार पर सागोन की लकड़ी का ‘अतिथि देवो भवः’ का कट आउट मैं तो निहाल।

पत्नी अस्पताल के आई सी यू में थी; इसी बड़े शहर में भतीजे के घर गए बरसों हो गए, जब मिलता बड़े प्रेम से कितनी मनुहार करता घर आने की, इसीलिए आज मन किया कि उसके घर जाया जाए ।

    आदर सत्कार भी ऐसा कि भतीजे, बहू दोनों बच्चों ने पैर छुए मैंने भी हर्षाए स्वर में कहा- "घर तो बहुत सुंदर सजाया है।”

भतीजे ने कहा- "जी ट्रेडिशनल इंडियन थीम में इंटीरियर है।"

 न जाने कितने व्यंजनों की सूची बनी मेरी आवभगत के लिए और फिर भतीजे ने पत्नी से मेरी पसंद बताकर -

जैसी मैं पीता वैसी बिना शक्कर की चाय के साथ मेरी पसंद के भुने चने और सींग दाने, अब पसंद नापसंद का इतना ध्यान मेरे खुद के बच्चे नहीं रख पाते, मैंने सोचा रात का खाना खाकर ही अस्पताल लौटूँ। भतीजे ने आता हूँ कह मोहलत माँगी  और अंदर चला गया ।

 लघुशंका से निवृत्त होने की चेष्टा से अंदर गया; किन्तु शायद गलत दिशा पकड़ ली कमरे के बाहर पहुँचा ही था कि पति -पत्नी की आवाजें सुन स्तब्ध रह गया।

स्त्री स्वर- "कर दी खातिरदारी अब खाने पर मत रोक लेना, नहीं तो रोज़ का झंझट पाल लिया समझो अभी तो टाइम लगेगा बुआ जी को ठीक होने में।"

पुरुष स्वर " ओहहो, तुम टेंशन मत लो मैं सम्हाल लूँगा ।"

स्त्री स्वर " हाँ हाँ सँभालो, चाहे जो बहाना बनाओ पर पीछा छुड़ा लेना ।"

मान बनाए रखने के लिए दबे पाँव उल्टे लौटा, तो नज़रें अतिथि देवो भवः पर अटक गई । सहसा जैसे उसका अर्थ समझ आ गया और मैं अंतर्धान हो गया।

सम्पर्कः बी-2/38, 'ठाकुर विला', रोहिनीपुरम, लोकमान्य सोसायटी, रायपुर (छ. ग.) deepalee.thakur@gmail.com