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Jan 1, 2023

तीन लघुकथाएँ- 1. वर्तमान का दंश, 2. खूबसूरत, 3, पहेली

  -  डॉ . सुषमा गुप्ता

1. वर्तमान का दंश

"और हीरो! क्या चल रहा है लाइफ में?"कईं सालों बाद मुम्बई से दिल्ली अपने छोटे भाई के घर आए रामनाथ जी ने अपने सत्रह साल के भतीजे से पूछा।

"कुछ खास नहीं ताऊजी, बस आई.आई.टी की तैयारी कर रहा हूँ।"

"अरे पढ़ाई वढ़ाई तो चलती रहती है। तू तो ये बता तेरी गर्लफ्रैंड्स कितनी है?"

उन्होंने हँसते हुए पूछा।

"अरे क्या ताऊजी, आप भी न। मैं नहीं पड़ता इन चक्करों में।"

"हट! ज़िन्दगी खराब है तेरी फिर। अबे जवानी में ये सब नहीं करेगा तो बुढ़ापे में करेगा क्या। पूछ अपने बाप से

 स्कूल कॉलेज में कैसे लड़कियों की लाइन लगती थी मेरे पीछे। साले घर की इज्जत का तो ख्याल रख।"

रामनाथ जी ज़ोर से हँसते हुए बोले।

"मुझे है न ख्याल घर की इज्जत का ताऊजी।"-बाहर से आती मिताली बोली।

"क्या मतलब?"

"मतलब ये, मेरे है न खूब सारे बॉय फ्रैंड्स। आप चिंता मत करो। मैं हूँ न खानदान की परम्परा निभाने को।"-मिताली दाँत दिखाती हुई चहकी।

रामनाथ जी की हँसी में ब्रेक लग गया और चेहरा गुस्से से तमतमाने लगा।


2. खूबसूरत

देर रात हम समंदर किनारे बैठे थे।

देर मतलब.. बहुत देर।

यही कोई रात का डेढ़ बजा होगा। समंदर की लहरें उफान पर थी।

मैं नीली डेनिम शॉर्ट्स और सफेद स्पैगिटी में, अपने घुटने मोड़कर बैठी, उँगली से रेत पर आड़ी- तिरछी आकृतियाँ बना रही थी।

ब्लैक शॉर्ट्स और ब्लैक सैंडो पहने वो वहीं पास में, रेत पर लेटा, सिर के नीचे दोनों हाथ टिकाए, एकटक आसमान देखता हुआ बोला, “रात बहुत काली है। है ना!”

मैंने शुतुरमुर्ग की तरह झट से गर्दन उठाकर आसमान की तरफ देखा और फिर आसपास।

उसके स्लीपर और मेरे सैंडल साथ रखे थे, रेत पर कुछ इस तरह  कि लहर बार-बार आती और उन्हें चूमकर वापस चली जाती। यही खेल, लहर कभी-कभी हमारी देह के साथ भी करती थी।

उसकी बात के जवाब में मैंने कहा, “चाँद नजर आ रहा है?”

वह मेरी तरफ देखकर मुस्कुरा दिया।

रेत में पड़ी एक टूटी सीप उठाकर मैंने उस पर फेंकते हुए कहा- “इतना फिल्मी होने की ज़रूरत नहीं है। मुझे नहीं, आसमान में देखो।”

उसको फिल्मी कहने के बाद मैंने खुद भी उँगली का इशारा उसकी तरफ करते हुए, आसमान के चाँद की तरफ उँगली घुमाते हुए कहा, “उसको कह रही हूँ। उसकी रोशनी देखते हो? उसकी चाँदनी से लहरों पर पड़ने वाली झिलमिलाहट को देखो। तुम कहते हो कि रात काली है। मैं कहती हूँ कि यह अद्भुत रोशनी देखो जो छन- छनकर नीचे बिखर रही है। कितना कुछ इसमें जगमगा रहा है। अक्सर जिन चीजों के लिए कहा जाता है कि वह सिर्फ़ दिखाई देती हैं, अगर ध्यान से महसूस करो, तो वह सुनाई भी देती हैं। तुम इस समय न सिर्फ रोशनी को देख सकते हो; बल्कि सुन भी सकते हो। कैसे घुँघरू – घुँघरू  बजती चाँदनी , लहरों पर नृत्य कर रही है। और यह जादू सिर्फ रात में होता है दिन में नहीं।”

उसने करवट लेकर मेरी तरफ पलटते हुए कोहनी मोड़कर अपनी हथेली पर गाल टिकाते हुए कहा, “तुम्हें और क्या-क्या दिख रहा है?”

“मुझे दिख रहा है कि यह बात पुरानी है कि हर रात के बाद सुबह होती है। बात अब यह है कि रात अपने आप में खूबसूरत होती हैं। दुःख की रोशनी हमारे भीतर बिल्कुल अलग तरह का उजास भरती है। हमें भीतर से एनरिच, एनलाइट करती है। और फिर हम तो उदास फितरत के लोग हैं जानेमन । हमें तो इसी की गलबहियाँ में रस आता है।”

उसने मुस्कुराते हुए पूछा , “मेरे साथ चलोगी?”

मैंने हँसते हुए कहा, “डूब मरने के अलावा मेरे पास और भी बेहतर बिगाड़ हैं ज़िंदगी के।”

फिर घुँघरू- सी चाँदनी में हँसी खनकती रही।

रेत पर कदमों के दो जोड़ी निशान देर तक उभरते मिटते रहे।

3. पहेली

इच्छाओं के खोखले  बाँस में पाँच छेद करके बाँसुरी बना ली,  हालाँकि सुर अभी साधने नहीं आए; पर मेरी अंतिम इच्छा यही है कि कभी साधने आएँ भी ना।

चप्पल बड़ी होती जा रही थी, पैर उतने का उतना ही था। यह बात मुझे हैरान करने लगी। एक रोज़ नदी किनारे चप्पल उतारकर नदी में पैर डालते हुए मैंने उससे यह बात कही। उसने कुछ देर चप्पल को देखा, कुछ देर मेरे पैर को और गंभीर होकर कहा-“तुम्हारा पैर सिकुड़ता जा रहा है, चप्पल नहीं बड़ी हो रही।”

उसके यह कहने के बाद, मैंने भी एक बार चप्पल को देखा और फिर बहुत देर अपने पैर को फिर उसकी तरफ देख कर कहा- “मन अगर पैर की जगह है, तो पैर कहाँ हैं!”

कविताः दुआ का पौधा

  - रश्मि विभा त्रिपाठी

मेरे आगे

तनकर खड़ा था

क्या करती

पाँव छूने को चली

दुख मुझसे बड़ा था

अचानक

उसकी आँखों में

उतर आई खीज बड़ी

पल में टूटी अकड़

भीतर तक जल-भुन गया

और लौटना पड़ा

उसे

मुँह की खाए

अपनी हार से चिड़चिड़ाए

आदमी की तरह

करते हुए बड़-बड़, बड़-बड़

सुनो

उसने देख लिया

कि

तुमने जो रोपा था

द्वार पर

दुआ का पौधा

उसने अब कसकर

पकड़ ली है जड़।


दो लघुकथाएँ- 1. पपेट शो, 2.देवो भवः

  -  दीपाली ठाकुर

1. पपेट शो

"आर! "

"आरव. जल्दी आओ बेटा रिसेप्शन में जाना है न! आज, चलो जल्दी से तैयार हो जाओ।"

"क्या मम्मा अभी तो दस मिनट बस खेल" आरव ने झुंझलाकर कहा।

" कल खेल लेना " -खुशबू ने अपनी चूड़ियों का सेट जमाते कहा।

"कभी नहीं आता कल, आप रोज बोलती हो कल खेलना और रोज कभी मार्केट ,कभी आपकी किट्टी-" रुआँसा आरव चिल्ला पड़ा।

" बिहेव योरसेल्फ, ऐसे बात करते है बड़ों से तुम बहुत बिगड़ गए हो”- खुशबू ने आरव का हाथ खींचते हुए लगभग घसीटते हुए बाथरूम तक ला छोड़ा।

"अब अच्छे से मुँह हाथ धोकर आओ”- आँखें तरेरते हुए खुशबू बोली।

नन्हे आरव ने दरवाज़ा बंद कर पहले आँसुओं से चेहरा धोया, फिर साबुन से मुँह- हाथ धो मुस्कुराता हुआ अपनी वार्ड रॉब से अपनी फेवरेट टी शर्ट और केप्री निकाल ली ।

खुशबू ने उसकी ड्रेस देखी, तो वो वापस रख फुल स्लीव की शर्ट और फुल पेंट निकालकर सख्त आवाज़ में कहा-" ये पहनो! "

" ये मुझे पसंद नहीं है कॉलर चुभते हैं ,और मैं तेज़ दौड़.....

"हर बात पर बहस, हम पार्टी में जा रहे है।" और उसने जबरदस्ती कपड़ों में कैद कर दिया नन्हे जिस्म को।

आरव तैयार था

"मम्मा मैं खेल लूँ थोड़ी देर ,जब तक आप तैयार हो रहे हो?”  नन्हा आरव मनुहार करता हुआ बोला।

" नहीं, बिल्कुल नहीं। फिर से गंदे हो जाओगे – “ वो साड़ी जमाते हुई बोली।

"टी वी देख लो थोड़ी देर”- खुशबू ने फिर निर्देश दिया।

आरव को समझ नहीं आता कि जब मम्मा कहे, तब टी वी देखना बुरा क्यूँ नहीं है, जब वो कहे कल करूँगा तब कल कभी नहीं आता

टीवी पर पपेट शो चल रहा था । बड़ी प्यारी- प्यारी पपेट्स डोर खीचने वाले के इशारों पर नाच रही थी ।

आरव को बड़ा मजा आ रहा था। वो उन पपेट्स को देखकर बहुत खुश हो रहा था । अचानक टी वी की स्क्रीन पर अँधेरा छा गया ।

खुशबू तैयार थी और रिमोट के पावर बटन पर उसकी उँगली यकायक पपेट का चेहरा आरव के चेहरे में और डोर पकड़ने वाले का खुशबू के चेहरे में बदल गया ।

पपेट शो चालू था।

2. देवो भवः

द्वार पर बीच की जगह आने जाने के लिए छोड़ दोनों किवाड़ों की चौखट से लगी सुंदर रंगोली, दाएँ -बाएँ टेराकोटा के छोटी -छोटी तख्तियाँ, जिन पर शुभ - लाभ और चौखट के मध्य स्वस्तिक का चिह्न; आँगन में सुंदर टेराकोटा का कलात्मक तुलसी चौरा, तुलसी जी को अर्पित कुमकुम, फूल जो गृहस्वामी / स्वामिनी की आस्था के साक्षी हो- जैसे, घंटी का निशान बने हुए बटन पर हाथ धरते ही पवित्र गायत्री मंत्र जब उच्चारित होने लगा, मेरे तन मन का पुलक जैसे रोम -रोम से प्रदर्शित होने लगा ; पाश्चात्य अंधानुकरण के इस युग में ऐसा देसीपन शुद्ध पवित्र परिवेश कौन नहीं रीझ जाएगा ।

मैं भी गदगद भतीजे के घर के सात्विक , संस्कारित माहौल से; बैठक की साज- सज्जा भी मनमोहक भारतीय स्वाद लिये हुए, सर्वप्रथम विघ्नेश के दर्शन प्रवेश लेते ही, एक तरफ दीवार पर सागोन की लकड़ी का ‘अतिथि देवो भवः’ का कट आउट मैं तो निहाल।

पत्नी अस्पताल के आई सी यू में थी; इसी बड़े शहर में भतीजे के घर गए बरसों हो गए, जब मिलता बड़े प्रेम से कितनी मनुहार करता घर आने की, इसीलिए आज मन किया कि उसके घर जाया जाए ।

    आदर सत्कार भी ऐसा कि भतीजे, बहू दोनों बच्चों ने पैर छुए मैंने भी हर्षाए स्वर में कहा- "घर तो बहुत सुंदर सजाया है।”

भतीजे ने कहा- "जी ट्रेडिशनल इंडियन थीम में इंटीरियर है।"

 न जाने कितने व्यंजनों की सूची बनी मेरी आवभगत के लिए और फिर भतीजे ने पत्नी से मेरी पसंद बताकर -

जैसी मैं पीता वैसी बिना शक्कर की चाय के साथ मेरी पसंद के भुने चने और सींग दाने, अब पसंद नापसंद का इतना ध्यान मेरे खुद के बच्चे नहीं रख पाते, मैंने सोचा रात का खाना खाकर ही अस्पताल लौटूँ। भतीजे ने आता हूँ कह मोहलत माँगी  और अंदर चला गया ।

 लघुशंका से निवृत्त होने की चेष्टा से अंदर गया; किन्तु शायद गलत दिशा पकड़ ली कमरे के बाहर पहुँचा ही था कि पति -पत्नी की आवाजें सुन स्तब्ध रह गया।

स्त्री स्वर- "कर दी खातिरदारी अब खाने पर मत रोक लेना, नहीं तो रोज़ का झंझट पाल लिया समझो अभी तो टाइम लगेगा बुआ जी को ठीक होने में।"

पुरुष स्वर " ओहहो, तुम टेंशन मत लो मैं सम्हाल लूँगा ।"

स्त्री स्वर " हाँ हाँ सँभालो, चाहे जो बहाना बनाओ पर पीछा छुड़ा लेना ।"

मान बनाए रखने के लिए दबे पाँव उल्टे लौटा, तो नज़रें अतिथि देवो भवः पर अटक गई । सहसा जैसे उसका अर्थ समझ आ गया और मैं अंतर्धान हो गया।

सम्पर्कः बी-2/38, 'ठाकुर विला', रोहिनीपुरम, लोकमान्य सोसायटी, रायपुर (छ. ग.) deepalee.thakur@gmail.com

बाल कविताः खुद सूरज बन जाओ न

 
- प्रभुदयाल श्रीवास्तव

    चिड़िया रानी, चिड़िया रानी,

    फुरर-फुरर कर कहाँ चली।

    दादी अम्मा जहाँ सुखातीं,

    छत पर बैठीं मूँगफली।

 

   चिड़िया रानी चिड़िया रानी,

   मूँगफली कैसी होती।

   मूँगफली होती है जैसे,

   लाल रंग का हो मोती।

   चिड़िया रानी चिड़िया रानी,

   मोती मुझे खिलाओ न।

   बगुला भगत बने क्यों रहते,

   बनकर हंस दिखाओ न।

 

  चिड़िया रानी चिड़िया रानी,

  हंस कहाँ पर रहते हैं।

  काम भलाई के जो करते,

  हंस उन्हीं को कहते हैं।

  चिड़िया रानी चिड़िया रानी,

  भले काम कैसे करते ।

  सूरज भैया धूप भेजकर,

  जैसे  अंधियारा  हरते ।

 

  चिड़िया रानी चिड़िया रानी,

  सूरज से मिलवाओ न।

  अपना ज्ञान बाँटकर सबको,

  खुद सूरज बन जाओ न।

सम्पर्कः12 शिवम सुन्दरम नगर छिन्दवाड़ा मध्य प्रदेश 48000

व्यंग्यः भैया जी

 - शंकर लाल माहेश्वरी

भैया जी का नाम है भगवान् स्वरूप; किन्तु लोग इन्हें भाईचारे के कारण भैयाजी शब्द से संबोधित करते है। शादी-विवाह, मौत-मरकत, जाति-बिरादरी, जान-बरात, स्कूल-अस्पताल, थाना-चुगी नाका कहीं पर भी आपके दर्शन हो सकते हैं। कभी वे किसी से बतियाते, ताल ठोंकते, हाथ उठाते, नारा लगाते, तख्ती पकड़े, माइक थामे, रेली में धरने पर, जुलूस में और आम सभा के मंच पर भी दिखाई दे सकते है। सिर पर कभी लाल तो कभी सफेद टोपी में, कभी गले में भगवा रंग का रूमाल डाले तो कभी शुद्ध खादी के धवल परिधान में भाषण देते हुए इनके दर्शन लाभ कर धन्य हो सकते है।

यदि आपको स्कूल की फीस माफ कराना हो, जमीन का नामांतरण कराना हो, मकान की रजिस्ट्री कराना हो, बैंक से ऋण लेना हो, भामाशाही उपचार कराना हो, तो पहुँच जाइए भैयाजी के पास; किन्तु ध्यान रखना उनसे अकेले मिलोगे तभी काम होगा। काम कैसा भी हो आपको निराश नहीं लौटना पड़ेगा। उद्घाटन, शिलान्यास, भूमि पूजन, रैली, धरना, अनशन, प्रदर्शन इन सबके लिये भैयाजी की सेवाएँ सराहनीय है। वह भी निःशुल्क और समयबद्ध। क्षेत्रीय प्रशासन से लेकर दिल्ली दरबार तक इनकी पहुँच है। सुना है भैयाजी को किसी आयोग का अध्यक्ष बनाया गया है।

आजकल उनके ही गाँव के पास वाले शहर में उनकी चर्चा हर सुनागरिक की जबान पर है। मैं भी हनुमान बगीचे वाले चौराहे पर गया था। वहाँ शान्ता जी आँगनबाड़ी वाली मिल गई। वह चीख रही थी। नेता बनकर फिरने वाला ढोंगी समाजसेवक भैयाजी अबकी बार जो मेरे केन्द्र पर आया तो उसे धक्के देकर बाहर कर दूँगी। भोला कुम्हार कह रहा था, उन्होंने पैसे भी ले लिये और काम भी नहीं हुआ। थानेदार से तो हर माह बीस हजार की बन्दी लेना नहीं चूकता हैं। खुद नहीं आयेगा। पोते को इस सेवाकार्य के लिए नियुक्त कर रखा है। बेचारे सेठ धन्ना लाल की उस दिन सबके सामने लू उतार दी। कह रहा था-‘‘हिसाब-किताब ध्यान से रखना, नहीं तो रेड पड़वा दूँगा।’’ बेचारा गिड़गिड़ाकर कहने लगा, अगले महीने से समय पर आपका माल घर पर पहुँच जाएगा बाबू साहब! बड़े स्कूल वाला रामू चपरासी परेशान है इन दिनों। उसे चौबीसों घण्टे भैयाजी के घर सेवा देनी पड़ रही है। यह तो हद हो गई श्रीमती भैयाजी अपने कपड़े भी खुद नहीं धोती;  पर करे तो करे क्या रामा। परिवार को जो पालना है। नौकरी स्कूल की चाकरी भैयाजी के घर की। कैसी विडम्बना है यह। इन दिनों भैया जी को राज्य मन्त्री का दर्जा भी मिल गया है।

भैया भगवान् स्वरूप उर्फ भैयाजी जब भी शहर आते दो-चार चाटुकार चमचे साथ आते और पूर्व नियोजित योजनानुसार भैयाजी को वहीं ले जाते जहाँ काम के बदले भारी भरकम धनराशि उपलब्ध हो सके। कभी आपने काम के बदले अनाज वाली बात तो सुनी होगी पर धीरे-धीरे विकास की अनवरत प्रवाहित होने वाली धारा मायाजाल में फँसती दिखाई देने लगी। भैयाजी की विनम्रता, उदारता, समर्पण, कर्तव्यनिष्ठा, अनवरत सेवा-भावना की लोग प्रशंसा करते है। सबके सामने फिर पीछे मुड़कर हँस देते है। यदि आप रास्ते में मिल गये तो भैयाजी पूछेंगे, कहिए भैया ! क्या हालचाल है। घर पर सब ठीक है ना। बड़वा बेटा क्या कर रहा है? और हाँ, सीमा की तो शादी हो गई होगी। बड़ी अच्छी लड़की है वह। कभी कोई काम हो तो उसे कहना आकर मिल ले और हाँ, तुम्हारे बड़े लड़के ने बी.एड. कर लिया है ना। मास्टरों की सीधी भर्ती निकली है, उसे लेकर जयपुर आना। मास्टर बना दूँगा छोकरे को। तू भी क्या याद करेगा। जिन्दगी बन जाएगी। जब किसी का जीवन बनाना है, तो त्याग तो करना ही पड़ता है। मैंने हाँ में हाँ मिलाते हुए कह दिया हाँ बाबूजी! सही है। मैने भी संक्षिप्त उत्तर से काम चलाया।

अब उन्हें उसी शान्ता बाई की याद आ गई। कहने लगे-‘‘आजकल वो शान्ता बाई दिखाई नहीं दे रही है। अब वह गाँव छोड़कर चली गई सर। कह रही थी-जब तक यह भैया का भूत यहाँ मँडराता रहेगा, मै नहीं आने वाली। मेरी जिन्दगी बरबाद कर दी। अब अपने बड़े बेटे के पास अमृतसर में रह रही है। भैयाजी ने मातादीन को अच्छा भला काम दिलाया-‘हवाला का’। अपने दोस्त के यहाँ। पगार भी अच्छी थी किन्तु निकला बड़ा धोखेबाज। छोड़ आया उस धन्धे को। लाखों के वारे-न्यारे थे। देश- प्रेम की बात करता है। मातृभूमि की सेवा, भारत माँ की आन-बान-शान की रक्षा। यह कहता हुआ अपने भागीदार से लड़ाई करके आ गया। अब दर-दर की भीख माँगेगा। करेगा भी क्या ? इस बार तुम्हारी स्कूल में प्रधानाध्यापक जी बड़े नेक इन्सान है। मेहनती है। विद्यालय के विकास की चिन्ता है उन्हें। वफादार इतने कि जब से वे आए, दो साल हो गए मेरी दोनों लड़कियों और राहुल को निःशुल्क पढ़ा रहे है। मिलते कहाँ है आजकल ऐसे लोग।

गाँव वालों को सब्सिडी दिलाने, शौचालयों को मुफ्त बनवाने, वृद्धावस्था पेंशन दिलाने में गहरी भूमिका रही थी आपकी। किन्तु लोग भूल जाते है किए गए उपकार को दादा! लोग मुँह पर मीठे है, पर पीठ पीछे कह रहे है सब्सिडी से, बैंक लोन से, वृद्धावस्था पेंशन से, नरेगा कार्य से सब में भैयाजी की ‘बन्धी’ बंधी हुई है और बातें करते है समाज सेवा की। दलित और पिछड़ों का उद्धार और गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों को ऊपर उठाने की बातें। कब तक यह नौटंकी चलेगी। देखते है हम भी। कुछ निजी विद्यालयों में आर.टी.ई. में हुए घोटालों की जाँच करने में भैयाजी को नियुक्त किया गया। बिना विलम्ब के निरीक्षण करने पहुँच गए। भारी मात्रा में गड़बड़ थी। लाखों का घोटाला था; किन्तु तीन दिन की जगह सात दिनों में जाँच रिपोर्ट प्रस्तुत की गई, तो घोटाले की शिकायत बेबुनियाद निकली। एक स्कूल के संचालक भैयाजी के लिए बड़े काम के आदमी है। चुनाव में रात-दिन पसीना बहाने वाले संचालक महोदय ने विद्यालय की अनुदान राशि भी बढ़वा ली; क्योंकि भैयाजी भी सिद्धान्तवादी थे। उन्हें अधिक आभारी बनने का शौक नहीं था। संचालक जी उपकृत हुए। कहने लगे, इस बार आपके विद्यालय में आर.टी.ई. में छात्र संख्या बढ़ जाएगी। हाँ, जरूर बढ़ाओ। देश का विकास तभी होगा जब नीचे का आदमी शिक्षित बनकर ऊँचा उठेगा। भगवान् सब ठीक करेगा। आप निश्चिन्त रहे। जाते-जाते भैयाजी ने संचालक जी के कन्धे पर हाथ रखकर कहा- बोलो रावत सा. मैं कब वापस आऊँ? यह फोन पर बता देना। बस इतना ही कहना-‘‘आपकी याद आ रही है भैयाजी। बस, मैं समझ जाऊँगा।

भैयाजी की उदारता का क्या कहना, वे तो कहते है यदि आप वृद्धजन है। निःशुल्क रेल या हवाई यात्रा करना चाहते है तो कभी भी आकर मेरे फार्म हाउस वाले बंगले पर मिल ले। उम्र की चिन्ता न करे। चालीस तक भी होंगे तो चलेगा। आयु प्रमाण पत्र कुछ ले देकर बनवा लेना। बाद में मैं सब कुछ सम्हाल लूँगा। पूछो उस छोटू के बच्चे को मैंने कैसे तीन बार मु्फ्त में हवाई यात्राएँ करवाई है। मैं तो कहता हूँ, लोग व्यर्थ ही परेशान होते है। काम सबके होते है। समस्याएँ तो आती जाती है। सबका समाधान है। कहा गया है-‘‘जीवन में कुछ पाना हो तो खोना भी पड़ता है।’’

हमारी सरकार अच्छे दिनों के लिए ढेर सारी योजनाओं से जनता की सहायता कर रही है। व्यापार, उद्योग, बैंक, स्कूल, अस्पताल, पेन्शन, कन्या उन्नयन, किसान विकास की कई योजनाएँ है, जिनका उपयोग लोगों को करना चाहिए। किन्तु लोग समय पर लाभ नहीं उठाना जानते। नोट बंदी के समय रामनाथ आया था, कह रहा था, पुराने नोट पड़े रह गए दादा! क्या करें? मैने कहा, चिन्ता मत कर, ‘‘मैं हूँ ना, सब ठीक हो जाएगा। कल आता तो मैंने पुरुषोत्तम पाण्डे का यही काम करवाया था। साथ-साथ ही हो जाता। पुरुषोत्तम से जरूर मिल लेना।

जयपुर में भैयाजी का एक होटल है, राजदीप। निर्माण उस समय शुरू हुआ जब देश में नरेगा शुरू हुआ था। नरेगा से ही पचास से अधिक कुशल मजदूर और बीस कारीगरों की कठोर साधना से इस भव्य भवन का निर्माण पाँच वर्ष में पूरा हुआ। अब अपने ही गाँव के 14-15 वर्षीय नौजवान बालक अपना सेवा धर्म निभा रहे है। जिनमें 25 बालक है और 15 बालिकाएँ। होटल के ऊपरी भाग में आपको राजस्थानी कला व संस्कृति के दर्शन के साथ ही खान-पान भी राजस्थानी ही होगा। नीचे तलघर है यानी बेसमेण्ट। यहाँ मांसाहार, बार बालाएँ, नगर वधुएँ विदेशी शराब और नशीली हेरोइन की समुचित व्यवस्था है। इस कक्ष के दरवाजे पर लिखा होगा, वन्दे मातरम्। यही पहचान है नीचे वाले तल की।

भैयाजी को मैंने कहा, आपने दल बदलकर अच्छा नहीं किया। लोग आपके पुराने कारनामों को उघाड़ रहे हैं। कहते है किसना गुर्जर को लोन दिलाया तो आधा पैसा ही हाथ आया। बैक मेनेजर से पूछा तो कहने लगा-‘‘भैयाजी से जाकर मिल लो।’’ बीस लाख में से केवल अठारह लाख मिले। इतना भी घपला होता है क्या। पर करे तो करे क्या।  ‘‘कौन सुने, किससे कहें, सुने तो समझे नाहिं, कहना, सुनना, समझना सब मन हि के मन मांहि।’’

एक दिन मास्टर अशोक के तबादले के लिये भैयाजी को मैने कहा, तो वह कहने लगे- बारह वर्ष हो गए उसे यहाँ। कभी एक बार भी आया क्या मेरे पास। बुलाओ उसे अभी का अभी। अशोक जी नंगे पाँव दोड़े आये भैयाजी के पास। जैसे सुदामा जी दौड़कर गए थे। मास्टर गिड़गिड़ाया, रोया, दाँतों में अँगुली दबाई, पैर पड़ गया। बन्द कमरे में लम्बी बात हुई। लम्बी अवधि के ठहराव वालों की सूची तैयार की गई। सभी को उपकृत करने का आश्वासन दिया भैयाजी ने। दोनों ओर के आश्वासन रंग लाया और चुनाव के बाद तबादला हो गया। भैयाजी का लंगोटिया भीखू भाई चूड़ीघर बाजार में मिल गया। वर्षों तक साथ निभाया भैयाजी का उसने। कुछ समय उनका निजी सचिव भी बना रहा। अब तो भैयाजी के पैर जमीन पर नहीं टिकते। अब उनकी पाँचों नहीं दसों अँगुलियाँ घी में है। क्योंकि वेतन भत्तों में भारी बढ़ोतरी के साथ विदेशी यात्राओं में छूट तथा दैनिक भत्ते भी आसमान को छूने लगे है। सेवा केवल पाँच साल की और सेवाप्रसाद जीवन भर का। है ना आदमी तकदीर वाला। सावधान दोस्तों, अब उनका सेवा शुल्क भी आनुपातिक ढंग से बढ गया है। विद्यालय का वार्षिक उत्सव था। भैयाजी मुख्य अतिथि थे। उद्बोधन में कहा- मेरे देशवासियों, मैंने हमेशा जनभावना का ध्यान रखा है। लोगों को रास्ता दिखाया। उनकी लम्बित समस्याओं का समाधान किया। फिर भी लोग कहते है तो कहने दो। ‘‘कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना।’’ यदि भैयाजी से मिलना चाहें, तो दो माह बाद ही जाएँ; क्योंकि वे कल ही अपने सेवाकाल के पाँचवे वर्ष में सपरिवार निःशुल्क विदेश यात्रा करेंगे। पाँच बड़े राष्ट्रों में अन्तिम यात्रा चीन की होगी। जहाँ कुछ अधिक समय ठहर कर लौटने की योजना है। धैर्य बनाए रखे। मिलेंगे अवश्य।

सम्पर्कः पूर्व जिला शिक्षा अधिकारी, पोस्ट-आगूचा, जिला- भीलवाडा, राजस्थान. पिन- 311022, मो. 09413781610