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Jan 1, 2023

बाल कविताः खुद सूरज बन जाओ न

 
- प्रभुदयाल श्रीवास्तव

    चिड़िया रानी, चिड़िया रानी,

    फुरर-फुरर कर कहाँ चली।

    दादी अम्मा जहाँ सुखातीं,

    छत पर बैठीं मूँगफली।

 

   चिड़िया रानी चिड़िया रानी,

   मूँगफली कैसी होती।

   मूँगफली होती है जैसे,

   लाल रंग का हो मोती।

   चिड़िया रानी चिड़िया रानी,

   मोती मुझे खिलाओ न।

   बगुला भगत बने क्यों रहते,

   बनकर हंस दिखाओ न।

 

  चिड़िया रानी चिड़िया रानी,

  हंस कहाँ पर रहते हैं।

  काम भलाई के जो करते,

  हंस उन्हीं को कहते हैं।

  चिड़िया रानी चिड़िया रानी,

  भले काम कैसे करते ।

  सूरज भैया धूप भेजकर,

  जैसे  अंधियारा  हरते ।

 

  चिड़िया रानी चिड़िया रानी,

  सूरज से मिलवाओ न।

  अपना ज्ञान बाँटकर सबको,

  खुद सूरज बन जाओ न।

सम्पर्कः12 शिवम सुन्दरम नगर छिन्दवाड़ा मध्य प्रदेश 48000

व्यंग्यः भैया जी

 - शंकर लाल माहेश्वरी

भैया जी का नाम है भगवान् स्वरूप; किन्तु लोग इन्हें भाईचारे के कारण भैयाजी शब्द से संबोधित करते है। शादी-विवाह, मौत-मरकत, जाति-बिरादरी, जान-बरात, स्कूल-अस्पताल, थाना-चुगी नाका कहीं पर भी आपके दर्शन हो सकते हैं। कभी वे किसी से बतियाते, ताल ठोंकते, हाथ उठाते, नारा लगाते, तख्ती पकड़े, माइक थामे, रेली में धरने पर, जुलूस में और आम सभा के मंच पर भी दिखाई दे सकते है। सिर पर कभी लाल तो कभी सफेद टोपी में, कभी गले में भगवा रंग का रूमाल डाले तो कभी शुद्ध खादी के धवल परिधान में भाषण देते हुए इनके दर्शन लाभ कर धन्य हो सकते है।

यदि आपको स्कूल की फीस माफ कराना हो, जमीन का नामांतरण कराना हो, मकान की रजिस्ट्री कराना हो, बैंक से ऋण लेना हो, भामाशाही उपचार कराना हो, तो पहुँच जाइए भैयाजी के पास; किन्तु ध्यान रखना उनसे अकेले मिलोगे तभी काम होगा। काम कैसा भी हो आपको निराश नहीं लौटना पड़ेगा। उद्घाटन, शिलान्यास, भूमि पूजन, रैली, धरना, अनशन, प्रदर्शन इन सबके लिये भैयाजी की सेवाएँ सराहनीय है। वह भी निःशुल्क और समयबद्ध। क्षेत्रीय प्रशासन से लेकर दिल्ली दरबार तक इनकी पहुँच है। सुना है भैयाजी को किसी आयोग का अध्यक्ष बनाया गया है।

आजकल उनके ही गाँव के पास वाले शहर में उनकी चर्चा हर सुनागरिक की जबान पर है। मैं भी हनुमान बगीचे वाले चौराहे पर गया था। वहाँ शान्ता जी आँगनबाड़ी वाली मिल गई। वह चीख रही थी। नेता बनकर फिरने वाला ढोंगी समाजसेवक भैयाजी अबकी बार जो मेरे केन्द्र पर आया तो उसे धक्के देकर बाहर कर दूँगी। भोला कुम्हार कह रहा था, उन्होंने पैसे भी ले लिये और काम भी नहीं हुआ। थानेदार से तो हर माह बीस हजार की बन्दी लेना नहीं चूकता हैं। खुद नहीं आयेगा। पोते को इस सेवाकार्य के लिए नियुक्त कर रखा है। बेचारे सेठ धन्ना लाल की उस दिन सबके सामने लू उतार दी। कह रहा था-‘‘हिसाब-किताब ध्यान से रखना, नहीं तो रेड पड़वा दूँगा।’’ बेचारा गिड़गिड़ाकर कहने लगा, अगले महीने से समय पर आपका माल घर पर पहुँच जाएगा बाबू साहब! बड़े स्कूल वाला रामू चपरासी परेशान है इन दिनों। उसे चौबीसों घण्टे भैयाजी के घर सेवा देनी पड़ रही है। यह तो हद हो गई श्रीमती भैयाजी अपने कपड़े भी खुद नहीं धोती;  पर करे तो करे क्या रामा। परिवार को जो पालना है। नौकरी स्कूल की चाकरी भैयाजी के घर की। कैसी विडम्बना है यह। इन दिनों भैया जी को राज्य मन्त्री का दर्जा भी मिल गया है।

भैया भगवान् स्वरूप उर्फ भैयाजी जब भी शहर आते दो-चार चाटुकार चमचे साथ आते और पूर्व नियोजित योजनानुसार भैयाजी को वहीं ले जाते जहाँ काम के बदले भारी भरकम धनराशि उपलब्ध हो सके। कभी आपने काम के बदले अनाज वाली बात तो सुनी होगी पर धीरे-धीरे विकास की अनवरत प्रवाहित होने वाली धारा मायाजाल में फँसती दिखाई देने लगी। भैयाजी की विनम्रता, उदारता, समर्पण, कर्तव्यनिष्ठा, अनवरत सेवा-भावना की लोग प्रशंसा करते है। सबके सामने फिर पीछे मुड़कर हँस देते है। यदि आप रास्ते में मिल गये तो भैयाजी पूछेंगे, कहिए भैया ! क्या हालचाल है। घर पर सब ठीक है ना। बड़वा बेटा क्या कर रहा है? और हाँ, सीमा की तो शादी हो गई होगी। बड़ी अच्छी लड़की है वह। कभी कोई काम हो तो उसे कहना आकर मिल ले और हाँ, तुम्हारे बड़े लड़के ने बी.एड. कर लिया है ना। मास्टरों की सीधी भर्ती निकली है, उसे लेकर जयपुर आना। मास्टर बना दूँगा छोकरे को। तू भी क्या याद करेगा। जिन्दगी बन जाएगी। जब किसी का जीवन बनाना है, तो त्याग तो करना ही पड़ता है। मैंने हाँ में हाँ मिलाते हुए कह दिया हाँ बाबूजी! सही है। मैने भी संक्षिप्त उत्तर से काम चलाया।

अब उन्हें उसी शान्ता बाई की याद आ गई। कहने लगे-‘‘आजकल वो शान्ता बाई दिखाई नहीं दे रही है। अब वह गाँव छोड़कर चली गई सर। कह रही थी-जब तक यह भैया का भूत यहाँ मँडराता रहेगा, मै नहीं आने वाली। मेरी जिन्दगी बरबाद कर दी। अब अपने बड़े बेटे के पास अमृतसर में रह रही है। भैयाजी ने मातादीन को अच्छा भला काम दिलाया-‘हवाला का’। अपने दोस्त के यहाँ। पगार भी अच्छी थी किन्तु निकला बड़ा धोखेबाज। छोड़ आया उस धन्धे को। लाखों के वारे-न्यारे थे। देश- प्रेम की बात करता है। मातृभूमि की सेवा, भारत माँ की आन-बान-शान की रक्षा। यह कहता हुआ अपने भागीदार से लड़ाई करके आ गया। अब दर-दर की भीख माँगेगा। करेगा भी क्या ? इस बार तुम्हारी स्कूल में प्रधानाध्यापक जी बड़े नेक इन्सान है। मेहनती है। विद्यालय के विकास की चिन्ता है उन्हें। वफादार इतने कि जब से वे आए, दो साल हो गए मेरी दोनों लड़कियों और राहुल को निःशुल्क पढ़ा रहे है। मिलते कहाँ है आजकल ऐसे लोग।

गाँव वालों को सब्सिडी दिलाने, शौचालयों को मुफ्त बनवाने, वृद्धावस्था पेंशन दिलाने में गहरी भूमिका रही थी आपकी। किन्तु लोग भूल जाते है किए गए उपकार को दादा! लोग मुँह पर मीठे है, पर पीठ पीछे कह रहे है सब्सिडी से, बैंक लोन से, वृद्धावस्था पेंशन से, नरेगा कार्य से सब में भैयाजी की ‘बन्धी’ बंधी हुई है और बातें करते है समाज सेवा की। दलित और पिछड़ों का उद्धार और गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों को ऊपर उठाने की बातें। कब तक यह नौटंकी चलेगी। देखते है हम भी। कुछ निजी विद्यालयों में आर.टी.ई. में हुए घोटालों की जाँच करने में भैयाजी को नियुक्त किया गया। बिना विलम्ब के निरीक्षण करने पहुँच गए। भारी मात्रा में गड़बड़ थी। लाखों का घोटाला था; किन्तु तीन दिन की जगह सात दिनों में जाँच रिपोर्ट प्रस्तुत की गई, तो घोटाले की शिकायत बेबुनियाद निकली। एक स्कूल के संचालक भैयाजी के लिए बड़े काम के आदमी है। चुनाव में रात-दिन पसीना बहाने वाले संचालक महोदय ने विद्यालय की अनुदान राशि भी बढ़वा ली; क्योंकि भैयाजी भी सिद्धान्तवादी थे। उन्हें अधिक आभारी बनने का शौक नहीं था। संचालक जी उपकृत हुए। कहने लगे, इस बार आपके विद्यालय में आर.टी.ई. में छात्र संख्या बढ़ जाएगी। हाँ, जरूर बढ़ाओ। देश का विकास तभी होगा जब नीचे का आदमी शिक्षित बनकर ऊँचा उठेगा। भगवान् सब ठीक करेगा। आप निश्चिन्त रहे। जाते-जाते भैयाजी ने संचालक जी के कन्धे पर हाथ रखकर कहा- बोलो रावत सा. मैं कब वापस आऊँ? यह फोन पर बता देना। बस इतना ही कहना-‘‘आपकी याद आ रही है भैयाजी। बस, मैं समझ जाऊँगा।

भैयाजी की उदारता का क्या कहना, वे तो कहते है यदि आप वृद्धजन है। निःशुल्क रेल या हवाई यात्रा करना चाहते है तो कभी भी आकर मेरे फार्म हाउस वाले बंगले पर मिल ले। उम्र की चिन्ता न करे। चालीस तक भी होंगे तो चलेगा। आयु प्रमाण पत्र कुछ ले देकर बनवा लेना। बाद में मैं सब कुछ सम्हाल लूँगा। पूछो उस छोटू के बच्चे को मैंने कैसे तीन बार मु्फ्त में हवाई यात्राएँ करवाई है। मैं तो कहता हूँ, लोग व्यर्थ ही परेशान होते है। काम सबके होते है। समस्याएँ तो आती जाती है। सबका समाधान है। कहा गया है-‘‘जीवन में कुछ पाना हो तो खोना भी पड़ता है।’’

हमारी सरकार अच्छे दिनों के लिए ढेर सारी योजनाओं से जनता की सहायता कर रही है। व्यापार, उद्योग, बैंक, स्कूल, अस्पताल, पेन्शन, कन्या उन्नयन, किसान विकास की कई योजनाएँ है, जिनका उपयोग लोगों को करना चाहिए। किन्तु लोग समय पर लाभ नहीं उठाना जानते। नोट बंदी के समय रामनाथ आया था, कह रहा था, पुराने नोट पड़े रह गए दादा! क्या करें? मैने कहा, चिन्ता मत कर, ‘‘मैं हूँ ना, सब ठीक हो जाएगा। कल आता तो मैंने पुरुषोत्तम पाण्डे का यही काम करवाया था। साथ-साथ ही हो जाता। पुरुषोत्तम से जरूर मिल लेना।

जयपुर में भैयाजी का एक होटल है, राजदीप। निर्माण उस समय शुरू हुआ जब देश में नरेगा शुरू हुआ था। नरेगा से ही पचास से अधिक कुशल मजदूर और बीस कारीगरों की कठोर साधना से इस भव्य भवन का निर्माण पाँच वर्ष में पूरा हुआ। अब अपने ही गाँव के 14-15 वर्षीय नौजवान बालक अपना सेवा धर्म निभा रहे है। जिनमें 25 बालक है और 15 बालिकाएँ। होटल के ऊपरी भाग में आपको राजस्थानी कला व संस्कृति के दर्शन के साथ ही खान-पान भी राजस्थानी ही होगा। नीचे तलघर है यानी बेसमेण्ट। यहाँ मांसाहार, बार बालाएँ, नगर वधुएँ विदेशी शराब और नशीली हेरोइन की समुचित व्यवस्था है। इस कक्ष के दरवाजे पर लिखा होगा, वन्दे मातरम्। यही पहचान है नीचे वाले तल की।

भैयाजी को मैंने कहा, आपने दल बदलकर अच्छा नहीं किया। लोग आपके पुराने कारनामों को उघाड़ रहे हैं। कहते है किसना गुर्जर को लोन दिलाया तो आधा पैसा ही हाथ आया। बैक मेनेजर से पूछा तो कहने लगा-‘‘भैयाजी से जाकर मिल लो।’’ बीस लाख में से केवल अठारह लाख मिले। इतना भी घपला होता है क्या। पर करे तो करे क्या।  ‘‘कौन सुने, किससे कहें, सुने तो समझे नाहिं, कहना, सुनना, समझना सब मन हि के मन मांहि।’’

एक दिन मास्टर अशोक के तबादले के लिये भैयाजी को मैने कहा, तो वह कहने लगे- बारह वर्ष हो गए उसे यहाँ। कभी एक बार भी आया क्या मेरे पास। बुलाओ उसे अभी का अभी। अशोक जी नंगे पाँव दोड़े आये भैयाजी के पास। जैसे सुदामा जी दौड़कर गए थे। मास्टर गिड़गिड़ाया, रोया, दाँतों में अँगुली दबाई, पैर पड़ गया। बन्द कमरे में लम्बी बात हुई। लम्बी अवधि के ठहराव वालों की सूची तैयार की गई। सभी को उपकृत करने का आश्वासन दिया भैयाजी ने। दोनों ओर के आश्वासन रंग लाया और चुनाव के बाद तबादला हो गया। भैयाजी का लंगोटिया भीखू भाई चूड़ीघर बाजार में मिल गया। वर्षों तक साथ निभाया भैयाजी का उसने। कुछ समय उनका निजी सचिव भी बना रहा। अब तो भैयाजी के पैर जमीन पर नहीं टिकते। अब उनकी पाँचों नहीं दसों अँगुलियाँ घी में है। क्योंकि वेतन भत्तों में भारी बढ़ोतरी के साथ विदेशी यात्राओं में छूट तथा दैनिक भत्ते भी आसमान को छूने लगे है। सेवा केवल पाँच साल की और सेवाप्रसाद जीवन भर का। है ना आदमी तकदीर वाला। सावधान दोस्तों, अब उनका सेवा शुल्क भी आनुपातिक ढंग से बढ गया है। विद्यालय का वार्षिक उत्सव था। भैयाजी मुख्य अतिथि थे। उद्बोधन में कहा- मेरे देशवासियों, मैंने हमेशा जनभावना का ध्यान रखा है। लोगों को रास्ता दिखाया। उनकी लम्बित समस्याओं का समाधान किया। फिर भी लोग कहते है तो कहने दो। ‘‘कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना।’’ यदि भैयाजी से मिलना चाहें, तो दो माह बाद ही जाएँ; क्योंकि वे कल ही अपने सेवाकाल के पाँचवे वर्ष में सपरिवार निःशुल्क विदेश यात्रा करेंगे। पाँच बड़े राष्ट्रों में अन्तिम यात्रा चीन की होगी। जहाँ कुछ अधिक समय ठहर कर लौटने की योजना है। धैर्य बनाए रखे। मिलेंगे अवश्य।

सम्पर्कः पूर्व जिला शिक्षा अधिकारी, पोस्ट-आगूचा, जिला- भीलवाडा, राजस्थान. पिन- 311022, मो. 09413781610

कविताः हो उदय अब सूर्य कोई



- मीनाक्षी शर्मा ‘मनस्वी’

साँझ अब ढलने लगी है,

पीर सी पलने लगी है ।

हो उदय अब सूर्य कोई,

आस फिर जगने लगी है ।।

 

कितने भी झंझावात आएँ,

ना उसे फिर वो  डिगायें ।

प्रेमसिक्त वाणी लिये,

 हों वेद की जैसे ऋचाएँ ।।

 

उठ खड़ा जैसे हिमालय,

निज धरा शृंगार करता ।

मान मर्दन बैरि का कर,

युद्ध में हुंकार भरता ।।

 

कोई जो हो बनके भास्कर,

शक्ति का संचार कर दे ।

जनमानस के हृदय में,

दिव्यता की ज्योति भर दे ।।

 

हो गए हैं लुप्त प्रायः,

भाव जो कोमल हृदय के ।

चेतना को वे जगाकर,

 सचेतन सा रूप कर दे ।।

 

हृदय की धड़कनों में,

है अभी तक दया जिंदा।

ले रही है सांस अब भी,

करुणा की तुम करो ना निंदा ।।

 

दान कर दधीचि ने जब,

लोकहित साधा था तप से।

आज भी संसार उनको,

पूजता युग बीते जब से ।।

 

है अभी भी समय चेतो,

भाव ना खो जाएँ सारे ।

बन करके मशीनी मानव,

स्वयं का सत्य रूप हारे ।।


लेखिका के बारे में- ज्योतिष शास्त्र विशेषज्ञ गद्य एवं पद्य दोनों ही विधाओं में लगभग 15 वर्षों से लेखन,  कृति- ‘नवग्रह पचासा’। सम्पर्कः फ्लैट नं. 405, गणपति आशियाना, सिकंदरा, आगरा, उत्तर प्रदेश, 282007, meenakshishiv8@gmail.com


आलेखः 12 जनवरी जयंती- मनुष्यता का विचार देने वाले स्वामी विवेकानंद

विचार मनुष्य के मनुष्य होने और बने रहने का प्रमाण हैं। विचार ही आचरण को प्रेरित करते हैं। भारतीय जीवन सनातन युग से विचार-वृत्ति का जीवन रहा है। प्राचीन ऋषियों के चिंतन-मनन से लेकर आधुनिक ऋषि विवेकानंद तक यह विचारशीलता गतिशील रही है। मार्क्स ने अमीर और गरीब के बीच विभाजित दुनिया के उत्पीड़न को सामने रखकर संवेदना उत्पन्न की, लेकिन वास्तव में यह करुणा भारत से ही फैली है। वाल्मीकि से लेकर महावीर, बुद्ध, रामकृष्ण परमहंस और फिर विवेकानंद एवं गांधी तक इसी करुणा का विस्तार है। चूंकि कोई भी विचार स्थानीय या स्वदेशी नहीं होता, वह यदि आम आदमी की विचार प्रक्रिया को आंदोलित करता है तो सार्वभौमिक होता जाता है। अतएव भारतीय ऋषियों के विचारों को पहले आम भारतीय ने स्वीकार किया और फिर वहीं विचार दुनिया में फैले। इसका उदाहरण स्वामी विवेकानंद द्वारा शिकागो में दिया वह उद्बोधन है, जो दुनिया में आध्यात्मिक विज्ञान-सम्मत चेतना का आधार बना। यह चेतना आज भी भारत समेत दुनिया को आंदोलित कर रही है।   

आध्यात्मिक चेतना जगाने का काम भारत में सनातन परंपरा रही है। जिसे कुण्डलिनी और शक्तिपात के माध्यम से जागृत किया जाता है। स्वामी विवेकानंद आजीवन आध्यात्मिक चेतना और वेदांत के सत्य को जानने में लगे रहे। हालांकि आरंभ में वे अनिश्वरवादी थे और सार्थक गुरु की तलाश में भटक रहे थे। विवेकानंद में ऊर्जा के इस पुंज को स्थानांतरित करके गुरु रामकृष्ण परमहंस ने कहा था, ‘आज अपना सर्वस्व तुझे देकर में रिक्त हो गया। अब भारत का हित और सम्मान तुम्हारा दायित्व है।‘ इस ऊर्जा के आरोहण में छह दिन का समय लगा था। यहीं से उनका आध्यात्मिक चेतना का स्तर शिखर पर पहुँचा। धर्म और विश्व-बंधुत्व के इस पाठ से विवेकानंद धर्मांतरण की स्पर्धा में लगे समुदायों को भी ललकारते रहे थे। अपनी अंतस्चेतना के बूते ही उन्होंने शिकागो की धर्मसभा में भारतीयता का उद्घोष किया था। इस्लाम और ईसाई धर्मावलंबियों से पराजित भारत में जो धर्म के विरुद्ध अनैतिक विषवमन हो रहा था, उस पर नियंत्रण का यह पहला वैश्विक जयघोष था।

अस्तित्व की शक्ति कहें या परमात्मा अथवा ब्रह्माण्ड की ऊर्जा सब कुल एक ही माया है। जो व्यक्ति इस महाचेतना का स्वाद चख चुका होता है, वह अहंकार से शून्य हो जाता है। विवेकानंद जब अमेरिका के शिकागो की धर्मसभा में बोल रहे थे, तब वे अहंकार से तो शून्य थे, लेकिन भारतीय गरिमा के स्वाभिमान से अभिप्रेरित होकर ही बोल रहे थे। सनातन धर्म के महत्व का यही प्रस्थान बिंदु रहा है। दरअसल प्रत्येक व्यक्ति में आत्मशक्ति के रूप में पराशक्ति सुषुप्त अवस्था में विद्यमान रहती है। किंतु जब सक्षम गुरु द्वारा दीक्षा व संस्कार मिल जाते हैं तो मोहमाया के बंधन टूट जाते है और शिष्य को अंतर्निहित दिव्य-शक्ति का अनुभव होने लगता है। विवेकानंद के साथ भी यही हो रहा था। वे जब 1900 में भारत लौटे तो बेलूर मठ में बस गए। यहाँ समाधिस्थ रहते हुए उनकी दिव्य-चेतना का विस्तार इतना होने लग गया था कि सांसारिक देह में समाना असंभव हो गया। नतीजतन चार जुलाई 1902 को समाधि की अवस्था में ही स्वामी जी ने देह त्याग दी। उनकी चेतना का जो अदृश्य विस्तार है, वह आज भी भारतीय जनमानस में असर छोड़ने का काम कर रहा है। विज्ञान जगत में भी इस चेतना का असर देखा जा रहा है।   

अपनी चेतना के तेज को दूसरे व्यक्ति में स्थानांतरित या स्थापित करने की प्रक्रिया को सनातन विश्वास में कुण्डलिनी जागरण या शक्तिपात कहते हैं। इस साधना के बड़े साधक शिवपुरी के डॉ. रघुबीर सिंह गौर भी हैं। वे लैपटॉप पर ऑनलाइन होकर देश- विदेश के हजारों लोगों को शक्तिपात देकर आध्यात्मिक शांति संचरित करते हैं। ‘ऊँ‘ के उच्चारण के साथ वे इस विधि का आरंभ करते हैं और फिर ध्यानस्थ अवस्था में अँगूठे एवं अँगुलियों के संकेतों से हजारों किलोमीटर दूर बैठे लोग गुरुजी की चेतना के नियंत्रण में आते चलते हैं। आधा घंटा यह क्रिया चलती है और समाप्ति पर लोग गहन मानसिक शांति का अनुभव करते हैं। ऊर्जा का यह हस्तांतरण वही गुरु कर सकता है, जो अपनी कुण्डलिनी साधना से जागृत कर चुका हो। यही ऊर्जा परमहंस ने विवेकानंद में स्थापित की थी। अब विज्ञान ऐसा मान रहा है, ब्रह्माण्ड में जो तत्व विद्यमान हैं, वही सब मनुष्य के मस्तिष्क में हैं। इसलिए वह ब्रह्माण्डीय ऊर्जा को एक सीमित मात्रा में अपने शरीर में केंद्रित कर सकता है। अतएव पराग्रहियों के अस्तित्व के बारे में अब वैज्ञानिक कह रहे हैं कि वे चेतना की सूक्ष्म तरंगों के रूप में ब्रह्माण्ड में विचरण करने में सक्षम हैं। क्योंकि किसी यान द्वारा पृथ्वी तक की दूरी तय करना संभव ही नहीं है। इस धारणा की पुष्टि इस तथ्य से भी होती है कि अंतरिक्ष में हवा नहीं होती है। गोया, ध्वनि अथवा आवाज एक स्थान से दूसरे स्थान तक नहीं जाती, लेकिन तरंगे आ-जा सकती हैं। फलतः सौरमंडल से जो रेडियो संकेत मिल रहे हैं, उन्हें एलियन द्वारा भेजे संकेत माना जा रहा है।

भारत के पहले क्वांटम कंप्युटर ‘परम‘ के निर्माता और देश में सुपर कंप्युटिंग प्रणाली ‘सी-डेक‘ के संस्थापक डॉ. विजय भटकर का कथन इस परिप्रेक्ष्य में अहम् है। उनका कहना है, ‘सत्य को जानने के लिए कभी पश्चिमी शोधकर्ता स्मृति, शरीर और दिमाग पर निर्भर रहते थे। परंतु अब विज्ञान की नवीनतम ज्ञानधारा क्वांटम यांत्रिकी अर्थात् अति सूक्ष्मता का विज्ञान आने के बाद से उन्होंने चेतना पर भी बात शुरू कर दी है। अतएव अब वे अनुभव कर रहे हैं कि ‘भारतीय भाववादी सिद्धांत‘ को जाने बिना चेतना का आकलन संभव नहीं है। जबकि अब तक पश्चिमी विज्ञान का पूरा ध्यान प्रकृति बनाम पदार्थ पर केंद्रित था। इसलिए अब कंप्यूटर की भाषा को सूक्ष्मता से समझने के लिए नासा जैसा विश्व प्रसिद्ध वैज्ञानिक संस्थान पाणिनी व्याकरण की ‘अष्टाध्यायी‘ का अध्ययन कर रहा है।‘

पाश्चात्य विज्ञान पदार्थ की बात तो करता है, लेकिन पदार्थ में चेतना विकसित करने की बात नहीं करता। क्योंकि वर्तमान भौतिकी पदार्थ को ‘जड़’ मानती है, किंतु सनातन विज्ञान ऐसा नहीं मानता, वह पदार्थ को भी चैतन्य मानता है। परिणामतः ब्रह्माण्ड का अणुओं से निर्मित ऊपर से जड़ दिखने वाला प्रत्येक तत्व परिवर्तनशील है। पुष्पक विमान के बारे में कहा जाता है कि उसमें यात्रियों के लिए एक पीठिका हमेशा रिक्त रहती थी। दरअसल यह विमान वायु के घनत्व के अनुसार स्वमेव अपना आकार छोटा या बड़ा कर लेता था। यदि पदार्थ में चेतना जागृत करने का सूत्र मिल जाए तो पदार्थ में भी संवेदना सृजित होने लगेगी। भाववादी सिद्धांत का सूत्र इसी वैज्ञानिक चेतना का द्योतक है।

लोगों के मन में प्रश्न उठता है कि शक्पिात की विधि जो कोई संत-साधना से प्राप्त करता है, उसकी अदृश्य क्रिया को हम देख क्यों नहीं पाते हैं ? अपने अध्ययन और अनुभव से इस प्रश्न का जो उत्तर मेरी बुद्धि में आता है, वह है प्रकृति की अंदरुनी दुनिया में वास करने वाली कई चीजों को हम केवल आभास कर सकते हैं, प्रत्यक्ष देख नहीं सकते। जैसे, संगीत की लय को हम नहीं देख पाते, लेकिन उसे सुनने के लिए हमारे पास कान हैं। वह आवाज भी हम कहाँ देख पाते हैं, जो लय को प्रतिध्वनित करती है। हम गंध और दुर्गंध को भी नहीं देख पाते, लेकिन उसे महसूस करने के लिए हमारे पास नाक है। हम संवेदना को भी नहीं देख पाते, लेकिन उसे स्पर्श से जान जाते हैं। तमाम गैसों के रूप और कंप्युटर व मोबाइल तकनीक जो आज सर्पव्यापी है, लेकिन हम सॉफ्टवेयर की बुद्धि को कहाँ देख पाते हैं ? तत्पश्चात भी इन सभी का अस्तित्व है, जब इनका अस्तित्व है तो कुण्डलिनी और शक्तिपात जैसी क्रियाओं का भी अस्तित्व है, यही चेतना का विज्ञान है। इसीलिए जब परमहंस ने विवेकानंद में अपनी समस्त ऊर्जा का आरोहण किया, तब वह प्रकट रूप में दिखाई नहीं दी थी, लेकिन विवेकानंद के प्रवचनों के माध्यम से जिन बोलों का उच्चारण हुआ, उनसे भारतीय समाज आज भी प्रेरित-अभिप्रेरित हो रहा है। - प्रमोद भार्गव

जीवन दर्शनः माटी कहे कुम्हार से: निर्णय से नियति

 -विजय जोशी (पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक, भेल, भोपाल, म. प्र.)

जीवन का कोई भी पहलू हो हम हर पल निर्णायक की भूमिका में होते हैं और हमारे निर्णय ही हमारी नियति तय करते हैं। जहाँ एक ओर अच्छे निर्णय का समापन सुखद होता है, वहीं बुरे निर्णय का दुःखद। अत: यह आवश्यक है कि परिस्थिति कैसी भी हो हमारा निर्णय उचित, सामयिक एवं स्पष्ट होना चाहिये एवं इसके लिए आवश्यक है मानस का संतुलन तथा स्थिरता। कई बार कठिन परिस्थिति हमें गलत निर्णय कि दिशा की ओर मोड़ते हुए विफलता के मार्ग पर धकेल देती है।

अपने कार्य में निपुण एक कुम्हार अपने कर्तव्य के प्रति पूरी तरह समर्पित था। वह जो भी कार्य करता ग्राहक उसकी भरपूर सराहना करते थे। अपनी कार्य कुशलता के परिप्रेक्ष्य में उसकी समाज में प्रतिष्ठा भी गरिमापूर्ण थी। एक दिन जब वह सुबह- सुबह अपने कार्य की ओर अग्रसर हुआ तो लोगों के क्षणिक आनंद को ध्यान में रखते हुए उसने सनी मिट्टी को सुंदर चिलम का आकार प्रदान किया और उसी एक पल में न जाने ऐसा क्या हुआ कि उसने अपनी गरिमापूर्ण बनी बनाई चिलम को बिगाड़ दिया।

   माटी ने पूछा – भाई कुम्हार ऐसा क्या हुआ कि इतनी मेहनत और प्रेम से बनाई सुघड़ चिलम को खुद तुमने तोड़ दिया। क्या कारण था इसका ?

  कुम्हार ने आत्म स्वीकृति कि मुद्रा में कहा - हाँ मैं चिलम बनाने की सोच रहा था, किन्तु मेरी मति बदल गई। इसलिये अब मैं तुम्हें सुराही का आकार दूँगा।

 यह सुनकर प्रफुल्लित होकर माटी बोल उठी – अरे कुम्हार मुझे खुशी है कि तुम्हारी मति सही समय पर बदल गई। तुम्हारे सत्कार्य से मेरी तो ज़िंदगी ही बदल गई। यदि चिलम बनती तो न केवल खुद जलती ; अपितु दूसरों को भी जलाती। पर अब सुराही बनते ही न केवल खुद शीतल रहूँगी; बल्कि दूसरों की प्यास बुझाते हुए उन्हें भी शीतल रखूँगी।

   बात का सारांश मात्र इतना है कि हमारा सही समय पर लिया गया फैसला न केवल हमारे सुख का प्रयोजन बनाता है अपितु दूसरों के लिए भी लाभकारी होता है, अत: यह अत्यावश्यक है कि जीवन में पल एवं परिस्थिति कैसी भी हो, हम ठंडे दिल व दिमाग से सही फैसला करें। यही तो महात्मा गांधी ने भी कहा है कि कठिन परिस्थिति में निर्णय पर पहुँचने के लिए सबसे पहले एक पल के लिए केवल यह सोचा जाए कि हम जो निर्णय करने जा रहे हैं, उसका समाज के अंतिम छोर पर खड़े आदमी पर क्या प्रभाव होगा। लाभकारी या हानिकारक। और तब उसी पल में हमें उत्तर अपनी अंतरात्मा से तुरंत प्राप्त हो जाएगा। बगैर किसी दुविधा के हम सही निर्णय लेते हुए समाधान पर अपने आप अग्रसर हो जाएँगे। 

सम्पर्क: 8/सेक्टर-2, शांति निकेतन (चेतक सेतु के पास), भोपाल-462023, मो. 09826042641, E-mail- v.joshi415@gmail.com