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Jan 1, 2023

कविताः हो उदय अब सूर्य कोई



- मीनाक्षी शर्मा ‘मनस्वी’

साँझ अब ढलने लगी है,

पीर सी पलने लगी है ।

हो उदय अब सूर्य कोई,

आस फिर जगने लगी है ।।

 

कितने भी झंझावात आएँ,

ना उसे फिर वो  डिगायें ।

प्रेमसिक्त वाणी लिये,

 हों वेद की जैसे ऋचाएँ ।।

 

उठ खड़ा जैसे हिमालय,

निज धरा शृंगार करता ।

मान मर्दन बैरि का कर,

युद्ध में हुंकार भरता ।।

 

कोई जो हो बनके भास्कर,

शक्ति का संचार कर दे ।

जनमानस के हृदय में,

दिव्यता की ज्योति भर दे ।।

 

हो गए हैं लुप्त प्रायः,

भाव जो कोमल हृदय के ।

चेतना को वे जगाकर,

 सचेतन सा रूप कर दे ।।

 

हृदय की धड़कनों में,

है अभी तक दया जिंदा।

ले रही है सांस अब भी,

करुणा की तुम करो ना निंदा ।।

 

दान कर दधीचि ने जब,

लोकहित साधा था तप से।

आज भी संसार उनको,

पूजता युग बीते जब से ।।

 

है अभी भी समय चेतो,

भाव ना खो जाएँ सारे ।

बन करके मशीनी मानव,

स्वयं का सत्य रूप हारे ।।


लेखिका के बारे में- ज्योतिष शास्त्र विशेषज्ञ गद्य एवं पद्य दोनों ही विधाओं में लगभग 15 वर्षों से लेखन,  कृति- ‘नवग्रह पचासा’। सम्पर्कः फ्लैट नं. 405, गणपति आशियाना, सिकंदरा, आगरा, उत्तर प्रदेश, 282007, meenakshishiv8@gmail.com


आलेखः 12 जनवरी जयंती- मनुष्यता का विचार देने वाले स्वामी विवेकानंद

विचार मनुष्य के मनुष्य होने और बने रहने का प्रमाण हैं। विचार ही आचरण को प्रेरित करते हैं। भारतीय जीवन सनातन युग से विचार-वृत्ति का जीवन रहा है। प्राचीन ऋषियों के चिंतन-मनन से लेकर आधुनिक ऋषि विवेकानंद तक यह विचारशीलता गतिशील रही है। मार्क्स ने अमीर और गरीब के बीच विभाजित दुनिया के उत्पीड़न को सामने रखकर संवेदना उत्पन्न की, लेकिन वास्तव में यह करुणा भारत से ही फैली है। वाल्मीकि से लेकर महावीर, बुद्ध, रामकृष्ण परमहंस और फिर विवेकानंद एवं गांधी तक इसी करुणा का विस्तार है। चूंकि कोई भी विचार स्थानीय या स्वदेशी नहीं होता, वह यदि आम आदमी की विचार प्रक्रिया को आंदोलित करता है तो सार्वभौमिक होता जाता है। अतएव भारतीय ऋषियों के विचारों को पहले आम भारतीय ने स्वीकार किया और फिर वहीं विचार दुनिया में फैले। इसका उदाहरण स्वामी विवेकानंद द्वारा शिकागो में दिया वह उद्बोधन है, जो दुनिया में आध्यात्मिक विज्ञान-सम्मत चेतना का आधार बना। यह चेतना आज भी भारत समेत दुनिया को आंदोलित कर रही है।   

आध्यात्मिक चेतना जगाने का काम भारत में सनातन परंपरा रही है। जिसे कुण्डलिनी और शक्तिपात के माध्यम से जागृत किया जाता है। स्वामी विवेकानंद आजीवन आध्यात्मिक चेतना और वेदांत के सत्य को जानने में लगे रहे। हालांकि आरंभ में वे अनिश्वरवादी थे और सार्थक गुरु की तलाश में भटक रहे थे। विवेकानंद में ऊर्जा के इस पुंज को स्थानांतरित करके गुरु रामकृष्ण परमहंस ने कहा था, ‘आज अपना सर्वस्व तुझे देकर में रिक्त हो गया। अब भारत का हित और सम्मान तुम्हारा दायित्व है।‘ इस ऊर्जा के आरोहण में छह दिन का समय लगा था। यहीं से उनका आध्यात्मिक चेतना का स्तर शिखर पर पहुँचा। धर्म और विश्व-बंधुत्व के इस पाठ से विवेकानंद धर्मांतरण की स्पर्धा में लगे समुदायों को भी ललकारते रहे थे। अपनी अंतस्चेतना के बूते ही उन्होंने शिकागो की धर्मसभा में भारतीयता का उद्घोष किया था। इस्लाम और ईसाई धर्मावलंबियों से पराजित भारत में जो धर्म के विरुद्ध अनैतिक विषवमन हो रहा था, उस पर नियंत्रण का यह पहला वैश्विक जयघोष था।

अस्तित्व की शक्ति कहें या परमात्मा अथवा ब्रह्माण्ड की ऊर्जा सब कुल एक ही माया है। जो व्यक्ति इस महाचेतना का स्वाद चख चुका होता है, वह अहंकार से शून्य हो जाता है। विवेकानंद जब अमेरिका के शिकागो की धर्मसभा में बोल रहे थे, तब वे अहंकार से तो शून्य थे, लेकिन भारतीय गरिमा के स्वाभिमान से अभिप्रेरित होकर ही बोल रहे थे। सनातन धर्म के महत्व का यही प्रस्थान बिंदु रहा है। दरअसल प्रत्येक व्यक्ति में आत्मशक्ति के रूप में पराशक्ति सुषुप्त अवस्था में विद्यमान रहती है। किंतु जब सक्षम गुरु द्वारा दीक्षा व संस्कार मिल जाते हैं तो मोहमाया के बंधन टूट जाते है और शिष्य को अंतर्निहित दिव्य-शक्ति का अनुभव होने लगता है। विवेकानंद के साथ भी यही हो रहा था। वे जब 1900 में भारत लौटे तो बेलूर मठ में बस गए। यहाँ समाधिस्थ रहते हुए उनकी दिव्य-चेतना का विस्तार इतना होने लग गया था कि सांसारिक देह में समाना असंभव हो गया। नतीजतन चार जुलाई 1902 को समाधि की अवस्था में ही स्वामी जी ने देह त्याग दी। उनकी चेतना का जो अदृश्य विस्तार है, वह आज भी भारतीय जनमानस में असर छोड़ने का काम कर रहा है। विज्ञान जगत में भी इस चेतना का असर देखा जा रहा है।   

अपनी चेतना के तेज को दूसरे व्यक्ति में स्थानांतरित या स्थापित करने की प्रक्रिया को सनातन विश्वास में कुण्डलिनी जागरण या शक्तिपात कहते हैं। इस साधना के बड़े साधक शिवपुरी के डॉ. रघुबीर सिंह गौर भी हैं। वे लैपटॉप पर ऑनलाइन होकर देश- विदेश के हजारों लोगों को शक्तिपात देकर आध्यात्मिक शांति संचरित करते हैं। ‘ऊँ‘ के उच्चारण के साथ वे इस विधि का आरंभ करते हैं और फिर ध्यानस्थ अवस्था में अँगूठे एवं अँगुलियों के संकेतों से हजारों किलोमीटर दूर बैठे लोग गुरुजी की चेतना के नियंत्रण में आते चलते हैं। आधा घंटा यह क्रिया चलती है और समाप्ति पर लोग गहन मानसिक शांति का अनुभव करते हैं। ऊर्जा का यह हस्तांतरण वही गुरु कर सकता है, जो अपनी कुण्डलिनी साधना से जागृत कर चुका हो। यही ऊर्जा परमहंस ने विवेकानंद में स्थापित की थी। अब विज्ञान ऐसा मान रहा है, ब्रह्माण्ड में जो तत्व विद्यमान हैं, वही सब मनुष्य के मस्तिष्क में हैं। इसलिए वह ब्रह्माण्डीय ऊर्जा को एक सीमित मात्रा में अपने शरीर में केंद्रित कर सकता है। अतएव पराग्रहियों के अस्तित्व के बारे में अब वैज्ञानिक कह रहे हैं कि वे चेतना की सूक्ष्म तरंगों के रूप में ब्रह्माण्ड में विचरण करने में सक्षम हैं। क्योंकि किसी यान द्वारा पृथ्वी तक की दूरी तय करना संभव ही नहीं है। इस धारणा की पुष्टि इस तथ्य से भी होती है कि अंतरिक्ष में हवा नहीं होती है। गोया, ध्वनि अथवा आवाज एक स्थान से दूसरे स्थान तक नहीं जाती, लेकिन तरंगे आ-जा सकती हैं। फलतः सौरमंडल से जो रेडियो संकेत मिल रहे हैं, उन्हें एलियन द्वारा भेजे संकेत माना जा रहा है।

भारत के पहले क्वांटम कंप्युटर ‘परम‘ के निर्माता और देश में सुपर कंप्युटिंग प्रणाली ‘सी-डेक‘ के संस्थापक डॉ. विजय भटकर का कथन इस परिप्रेक्ष्य में अहम् है। उनका कहना है, ‘सत्य को जानने के लिए कभी पश्चिमी शोधकर्ता स्मृति, शरीर और दिमाग पर निर्भर रहते थे। परंतु अब विज्ञान की नवीनतम ज्ञानधारा क्वांटम यांत्रिकी अर्थात् अति सूक्ष्मता का विज्ञान आने के बाद से उन्होंने चेतना पर भी बात शुरू कर दी है। अतएव अब वे अनुभव कर रहे हैं कि ‘भारतीय भाववादी सिद्धांत‘ को जाने बिना चेतना का आकलन संभव नहीं है। जबकि अब तक पश्चिमी विज्ञान का पूरा ध्यान प्रकृति बनाम पदार्थ पर केंद्रित था। इसलिए अब कंप्यूटर की भाषा को सूक्ष्मता से समझने के लिए नासा जैसा विश्व प्रसिद्ध वैज्ञानिक संस्थान पाणिनी व्याकरण की ‘अष्टाध्यायी‘ का अध्ययन कर रहा है।‘

पाश्चात्य विज्ञान पदार्थ की बात तो करता है, लेकिन पदार्थ में चेतना विकसित करने की बात नहीं करता। क्योंकि वर्तमान भौतिकी पदार्थ को ‘जड़’ मानती है, किंतु सनातन विज्ञान ऐसा नहीं मानता, वह पदार्थ को भी चैतन्य मानता है। परिणामतः ब्रह्माण्ड का अणुओं से निर्मित ऊपर से जड़ दिखने वाला प्रत्येक तत्व परिवर्तनशील है। पुष्पक विमान के बारे में कहा जाता है कि उसमें यात्रियों के लिए एक पीठिका हमेशा रिक्त रहती थी। दरअसल यह विमान वायु के घनत्व के अनुसार स्वमेव अपना आकार छोटा या बड़ा कर लेता था। यदि पदार्थ में चेतना जागृत करने का सूत्र मिल जाए तो पदार्थ में भी संवेदना सृजित होने लगेगी। भाववादी सिद्धांत का सूत्र इसी वैज्ञानिक चेतना का द्योतक है।

लोगों के मन में प्रश्न उठता है कि शक्पिात की विधि जो कोई संत-साधना से प्राप्त करता है, उसकी अदृश्य क्रिया को हम देख क्यों नहीं पाते हैं ? अपने अध्ययन और अनुभव से इस प्रश्न का जो उत्तर मेरी बुद्धि में आता है, वह है प्रकृति की अंदरुनी दुनिया में वास करने वाली कई चीजों को हम केवल आभास कर सकते हैं, प्रत्यक्ष देख नहीं सकते। जैसे, संगीत की लय को हम नहीं देख पाते, लेकिन उसे सुनने के लिए हमारे पास कान हैं। वह आवाज भी हम कहाँ देख पाते हैं, जो लय को प्रतिध्वनित करती है। हम गंध और दुर्गंध को भी नहीं देख पाते, लेकिन उसे महसूस करने के लिए हमारे पास नाक है। हम संवेदना को भी नहीं देख पाते, लेकिन उसे स्पर्श से जान जाते हैं। तमाम गैसों के रूप और कंप्युटर व मोबाइल तकनीक जो आज सर्पव्यापी है, लेकिन हम सॉफ्टवेयर की बुद्धि को कहाँ देख पाते हैं ? तत्पश्चात भी इन सभी का अस्तित्व है, जब इनका अस्तित्व है तो कुण्डलिनी और शक्तिपात जैसी क्रियाओं का भी अस्तित्व है, यही चेतना का विज्ञान है। इसीलिए जब परमहंस ने विवेकानंद में अपनी समस्त ऊर्जा का आरोहण किया, तब वह प्रकट रूप में दिखाई नहीं दी थी, लेकिन विवेकानंद के प्रवचनों के माध्यम से जिन बोलों का उच्चारण हुआ, उनसे भारतीय समाज आज भी प्रेरित-अभिप्रेरित हो रहा है। - प्रमोद भार्गव

जीवन दर्शनः माटी कहे कुम्हार से: निर्णय से नियति

 -विजय जोशी (पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक, भेल, भोपाल, म. प्र.)

जीवन का कोई भी पहलू हो हम हर पल निर्णायक की भूमिका में होते हैं और हमारे निर्णय ही हमारी नियति तय करते हैं। जहाँ एक ओर अच्छे निर्णय का समापन सुखद होता है, वहीं बुरे निर्णय का दुःखद। अत: यह आवश्यक है कि परिस्थिति कैसी भी हो हमारा निर्णय उचित, सामयिक एवं स्पष्ट होना चाहिये एवं इसके लिए आवश्यक है मानस का संतुलन तथा स्थिरता। कई बार कठिन परिस्थिति हमें गलत निर्णय कि दिशा की ओर मोड़ते हुए विफलता के मार्ग पर धकेल देती है।

अपने कार्य में निपुण एक कुम्हार अपने कर्तव्य के प्रति पूरी तरह समर्पित था। वह जो भी कार्य करता ग्राहक उसकी भरपूर सराहना करते थे। अपनी कार्य कुशलता के परिप्रेक्ष्य में उसकी समाज में प्रतिष्ठा भी गरिमापूर्ण थी। एक दिन जब वह सुबह- सुबह अपने कार्य की ओर अग्रसर हुआ तो लोगों के क्षणिक आनंद को ध्यान में रखते हुए उसने सनी मिट्टी को सुंदर चिलम का आकार प्रदान किया और उसी एक पल में न जाने ऐसा क्या हुआ कि उसने अपनी गरिमापूर्ण बनी बनाई चिलम को बिगाड़ दिया।

   माटी ने पूछा – भाई कुम्हार ऐसा क्या हुआ कि इतनी मेहनत और प्रेम से बनाई सुघड़ चिलम को खुद तुमने तोड़ दिया। क्या कारण था इसका ?

  कुम्हार ने आत्म स्वीकृति कि मुद्रा में कहा - हाँ मैं चिलम बनाने की सोच रहा था, किन्तु मेरी मति बदल गई। इसलिये अब मैं तुम्हें सुराही का आकार दूँगा।

 यह सुनकर प्रफुल्लित होकर माटी बोल उठी – अरे कुम्हार मुझे खुशी है कि तुम्हारी मति सही समय पर बदल गई। तुम्हारे सत्कार्य से मेरी तो ज़िंदगी ही बदल गई। यदि चिलम बनती तो न केवल खुद जलती ; अपितु दूसरों को भी जलाती। पर अब सुराही बनते ही न केवल खुद शीतल रहूँगी; बल्कि दूसरों की प्यास बुझाते हुए उन्हें भी शीतल रखूँगी।

   बात का सारांश मात्र इतना है कि हमारा सही समय पर लिया गया फैसला न केवल हमारे सुख का प्रयोजन बनाता है अपितु दूसरों के लिए भी लाभकारी होता है, अत: यह अत्यावश्यक है कि जीवन में पल एवं परिस्थिति कैसी भी हो, हम ठंडे दिल व दिमाग से सही फैसला करें। यही तो महात्मा गांधी ने भी कहा है कि कठिन परिस्थिति में निर्णय पर पहुँचने के लिए सबसे पहले एक पल के लिए केवल यह सोचा जाए कि हम जो निर्णय करने जा रहे हैं, उसका समाज के अंतिम छोर पर खड़े आदमी पर क्या प्रभाव होगा। लाभकारी या हानिकारक। और तब उसी पल में हमें उत्तर अपनी अंतरात्मा से तुरंत प्राप्त हो जाएगा। बगैर किसी दुविधा के हम सही निर्णय लेते हुए समाधान पर अपने आप अग्रसर हो जाएँगे। 

सम्पर्क: 8/सेक्टर-2, शांति निकेतन (चेतक सेतु के पास), भोपाल-462023, मो. 09826042641, E-mail- v.joshi415@gmail.com


Dec 2, 2022

उदंती.com, दिसम्बर – 2022

चित्रकारः  विज्ञान व्रत 
 वर्ष- 15, अंक- 4

इस दुनिया में कुछ बड़ा करने के लिए 

आपको सौ साल जीने की जरूरत नही है,

बस एक दिन में ही ऐसा काम करों की 

पूरी दुनिया आपको सौ साल तक याद रखें।


 इस अंक में

अनकहीः खण्डित होती संवेदना  - डॉ. रत्ना वर्मा           

आलेखः आलेख- वरदान बने बढ़ती आबादी   - प्रमोद भार्गव

संस्कृतिः कश्मीरी महिलाओं का पारंपरिक आभूषण देझूर   - सरोज बाला

वन्य जीवनः देवी देवताओं के वाहन- प्रकृति संरक्षण के प्रतीक हैं  - बसन्त राघव

यादेंः  यहाँ बदला वफ़ा का बेवफाई के सिवा क्या है... - डॉ. दीपेन्द्र कमथान

विज्ञानः भाषा के साथ उसमें सहेजा ज्ञान भी लुप्त होता है   - स्रोत फीचर्स

सॉनेटः कादंबरी   - प्रो. विनीत मोहन औदिच्य

कहानीः  अनुगामिनी  - डॉ. बलराम अग्रवाल

व्यंग्यः भोजन के लिए हेल्पलाइन नम्बर - गिरीश पंकज

लघुकथाः  सोच  - हरीश कुमार 'अमित'

लघुकथाः  इमीटेशन   - खलील जिब्रान (अनुवाद :सुकेश साहनी)

लघुकथाः अमानत  - उर्मि कृष्ण

कविताः शुक्रिया तेरा   - अमृता अग्रवाल

कविताएँः उस घर का नाम  - संजय कुमार सिंह

ग़ज़लः आई याद पुरानी उसकी  - डॉ. आरती स्मित

आधुनिक बोध कथा 12-  सौदा  - सूरज प्रकाश

कविताः रैन बसेरा - पारुल हर्ष बंसल

चिंतनः मुझमे मेरा कितना?  - लिली मित्रा

किताबेंः मंत्रमुग्धा - माधुर्य- भाव- धारा का  मंत्रमुग्ध अवगाहन  - रश्मि विभा त्रिपाठी

प्रेरकः काश ये 11 बातें मुझे तब पता होतीं जब मैं 20 साल का था  - निशांत

जीवन दर्शनः दीन के दर्द का मर्म  - विजय जोशी

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आवरण पृष्ठ के चित्रकारः 
 विज्ञान व्रत - जन्म 17 अगस्त 1943, तेड़ा, मेरठ,  (उत्तर प्रदेश)। देश / विदेश की  विभिन्न  कलादीर्घाओं  में  चित्रों की  39  एकल  प्रदर्शनियाँ, सांस्कृतिक मंत्रालय भारत सरकार द्वारा Senior Fellowship (चित्रकला), ललित कला अकादमी दिल्ली  द्वारा आयोजित  राष्ट्रीय/अन्तरराष्ट्रीय  26  चित्रकला - शिविरों में भागीदारी। चित्रों का संग्रह: राष्ट्रपति भवन नयी दिल्ली, देश की प्रमुख अकादमियों , प्रसिद्ध व्यापारिक संस्थानों तथा देश/विदेश के शताधिक व्यक्तिगत संग्रहों में चित्र संगृहीत। विश्व हिन्दी सम्मेलन (दक्षिण अफ़्रीका) , इंग्लैंड और आयरलैंड के प्रमुख शहरों , मॉरीशस और सिंगापुर में आयोजित अन्तरराष्ट्रीय कवि सम्मेलनों में काव्य पाठ। इंग्लैंड के NRI कवियों की हिन्दी , उर्दू और पंजाबी  27 कविताओं ("Colours  Of  Poetry" में प्रकाशित) का अँग्रेज़ी में भावानुवाद। बालगीत, नवगीत दोहा तथा ग़ज़लों पर अनेक पुस्तकें का प्रकाशन।   

अनकहीः खण्डित होती संवेदना

-डॉ. रत्ना वर्मा 

प्यार के 35 टुकड़े??? क्या प्यार कोई जन्मदिन का केक है, जिसके टुकड़े- टुकड़े करके सबको बाँट दिया जाए। पर इन दिनों तो सब जगह यही चर्चा है कि प्यार में इतनी दरिंदगी! और तो और इस दिल दहला देने वाले कारनामें को अंजाम देने के बाद पिछले छह माह तक वह दरिंदा आराम से जीवन गुजारता रहा, ऐसे जैसे सच में ही उसने अपनी प्रियतमा के शरीर के नहीं, केक के ही 35 टुकड़े किए हों और शहर भर में उन टुकड़ों को बिखरा कर खुशियाँ मना रहा हो।

इस पूरे घटनाक्रम को जानने के बाद जो सवाल दिमाग में सबसे पहले आता है वह यह कि जब श्रद्धा को पिछले कई सालों से यह पता था कि आफताब उसे मार देगा, फिर भी उसके साथ ऐसी क्या मजबूरी रही होगी कि वह उससे अलग नहीं हो पाई। (श्रद्धा ने 2020 में पुलिस में इस डर को लेकर शिकायत भी दर्ज कराई थी) नतीजा उसे मार डाला गया, छह महीने तो उसने किसी को भनक भी नहीं लगने दी। यदि उसके माता पिता गुमशुदगी की रिपोर्ट नहीं लिखाते, तो किसी को खबर ही नहीं होती कि श्रद्धा की ऐसी नृशंस हत्या की गई है।

इस हत्याकांड से अनेक प्रश्न उठ खड़े हुए हैं। बदलते सामाजिक परिवेश में आज के युवा मनमर्जी के मालिक हो गए हैं। वे माता- पिता की दखलअंदाजी को पसंद नहीं करते, उन्हें उनकी बातें दकियानुसी लगती हैं। जैसे ही वे पढ़ाई- लिखाई पूरी करने के बाद आर्थिक रूप से स्वतंत्र होते हैं, उन्हें लगता है वे अपनी मर्जी के मालिक हैं और जैसे चाहे जीवन गुजार सकते हैं।  लोग संस्कारों की बात करते हैं कि कैसे जिन पिता ने, न जाने कितनी मुसीबत उठा कर उन्हें पाला-पोसा है, अच्छी शिक्षा दिलाई है, उनकी हर जिद पूरी की है, वही बच्चे बड़े होते ही अपने ही माता-पिता के इतने विरुद्ध हो जाते हैं कि बगावत पर उतर आते हैं।

 दरअसल आधुनिक तकनीक के चलते  युवाओं में ऑनलाइन दोस्ती आम हो गई है । श्रद्धा और आफताब भी एक ऑनलाइन डेटिंग एप के माध्यम से करीब आए थे। पर एक क्लिक से की गई दोस्ती कितनी  खतरनाक  हो सकती है यह इस हत्याकांड को देखते हुए समझा जा सकता है ।

मात्र बाहरी चमक- दमक के आकर्षण को प्यार और दोस्ती का नाम देकर जीवन को खूबसूरत नहीं बनाया जा सकता। हमारा समाज हमारा परिवार अभी इतना आधुनिक नहीं हो पाया है कि वह ‘लिव- इन रिलेशन’ को आसानी से स्वीकार कर पाए। अभी भी भारत के अधिकतर परिवार अपने सामाजिक- पारिवारिक संस्कार और परंपरा से बँधा हुआ है । यही वजह है कि लिव- इन में रहने वाले युवा अपने परिवार से, समाज से अलग- थलग पड़ जाते हैं।  फलस्वरूप अपनी परेशानियों को वे किसी के साथ बाँट नहीं पाते।  जब जीवन की कड़वी सच्चाई से उनका वास्ता पड़ता है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। चूँकि बगावत करके वे अपनों से दूर हुए थे; इसलिए मुसीबत के समय भी अपने माता- पिता के पास, दोस्तों के पास लौटने की उनकी हिम्मत नहीं होती और वे अपने साथी के अत्याचारों को सहते हुए भी उसके साथ रहने को अभिशप्त होते हैं।  शायद श्रद्धा भी मजबूर थी। यद्यपि उसने पुलिस को, दोस्तों को विभिन्न माध्यम से बताने की कोशिश की थी;  पर किसी ने भी उसके डर को गंभीरता से नहीं लिया । ऐसे समय में अकेले पड़ गए युवा डिप्रेशन में चले जाते हैं निराशा में आत्महत्या जैसे कदम उठाते हैं या फिर नशे और अपराध की दुनिया में चले जाते हैं। आज के  युवा वर्ग का अति महत्त्वाकांक्षी होना भी एक कारण है कि वह बहुत कम समय में बड़ी उपलब्धि हासिल कर लेना चाहता है और इसके लिए शॉर्टकट रास्ता अपना कर अपनी मंजिल तक पहुँचना चाहता है।

श्रद्धा वालकर हत्याकांड ने एक बार फिर देश और समाज के सामने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। खासकर महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराध और युवा पीढ़ी की वर्तमान जीवन -शैली को लेकर। अतः इस तरह के अपराध को राजनीतिक, सांप्रदायिक या किसी जाति विशेष से न जोड़ते हुए इसे एक समाजशास्त्रीय और मनोवैज्ञानिक दृष्टि से विवेचन करते हुए, इसके सामाजिक और कानूनी पहलुओं पर भी गंभीरता से सोचना होगा। सबसे जरूरी है- परिवार और संस्कार की बुनियाद को मजबूत करना,  वहीं दूसरी ओर आज की शिक्षा -व्यवस्था में भी सुधार करने की आवश्यकता है। कानून और व्यवस्था में सुधार की गुंजाइश तो हमेशा ही बनी रहती है;  परंतु यहाँ जो सबसे आवश्यक और जरूरी बात है,  वह है इंटरनेट और सोशल मिडिया का युवाओं पर बढ़ते प्रभाव को लेकर अंकुश।  शिक्षा के अलावा जो भी अन्य चीजें इस आधुनिक तकनीक ने युवाओं को परोसी हैं, वह उन्हें एक अलग ही दुनिया की सैर कराता है। अतः इसकी निगरानी के लिए आवश्यक और कठोर  कदम उठाए जाने चाहिए।

 जिस प्रकार शादी हो जाने के बाद नव दम्पती की खुशी परिवार और समाज की जिम्मेदारी होती है और वे उनकी देखरेख में अपनी नई जिंदगी की शुरूआत करते हैं, उसी प्रकार क्यों न लिव- इन में रहने वाले युवा जोड़ों के लिए भी कुछ नियम कानून बना दिया जाए । जिस प्रकार नई नौकरी ज्वाइन करने पर, घर किराए पर लेने पर, होटल में कमारा बुक करने पर यहाँ तक कि हवाई जहाज और रेल में यात्रा करते समय पहचान पत्र दिखाना आवश्यक होता है, तो इन युवाओं के लिए भी कुछ नियम कानून क्यों नहीं बनाए जा सकते हैं, ताकि वे एक व्यवस्था के तहत निगरानी में रहें और इस तरह की भयानक दुर्घटना से बचे रहें। केवल कानून बनाकर इतिश्री नहीं करना, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना है कि कानून का कठोरता से पालन किया जाए।