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Jun 11, 2013

ऊँचे शिखरों पर रोमांच का सफर

ऊँचे शिखरों पर रोमांच का सफर
- लोकेन्द्र सिंह
कठिनाइयाँ आपको अंदर से मजबूत करती हैं। अचानक से आई मुसीबतें आपको फटाफट निर्णय लेने का अनुभव देती हैं। अनजाने रास्ते और लंबे सफर आपके लिए नई राहें खोलते हैं। यह सब करने के लिए बस थोड़े-से साहस की जरूरत होती है।  उठाइए साइकिल और निकल जाइए ऐसे रास्तों पर जहाँ जाने के लिए आपका जी मचल रहा हो। जिंदगी को ठाट से जीने के लिए साइकिलिंग से अच्छा विकल्प नहीं है। यह कहना है रोमांच के साथी युवा देवेन्द्र तिवारी का। मध्यप्रदेश के जिले ग्वालियर में कृषक परिवार में जन्मे देवेन्द्र तिवारी देश के कई दुर्गम क्षेत्रों को साइकिलिंग से जीत चुके हैं।
अपनी पहली कठिन यात्रा का जिक्र करते हुए वे कहते हैं कि अचानक एक दिन बैठे-बैठे मेरे दिल में खयाल आया कि क्यों न हिमालय की चोटियों और घाटियों को अपनी साइकिल के पहिए से नापा जाए। कुल्लू मनाली क्षेत्र के 13,000 फीट से अधिक ऊँचे चँद्रखानी पास ट्रैक चला जाए। हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और उत्तराखंड ऐसे प्रदेश हैं जिनका जर्रा-जर्रा खूबसूरत और आकर्षक है। हर कोई बार-बार और हमेशा के लिए इन्हें अपने ज़ेहन में स्पंदित करने की चाह रखता है। अविवाहित श्री तिवारी चुटकी लेते हुए बताते हैं कि मनाली को उत्तर भारत का हनीमून कैपिटल भी कहते हैं। विवाह के बाद वे अपनी पत्नी के साथ जरूर इस खूबसूरत वादी में आना चाहेंगे, बल्कि बार-बार आते रहेंगे।
व्यास नदी के तट पर बसा यह शहर हमेशा पर्यटकों से गुलजार रहता है। कुल्लू की दो चीज काफी मशहूर हैं- ऊनी शाल और दशहरा पर्व। मनाली एडवेंचर में रुचि रखने वालों को भी अपनी ओर खींचता है। इसी चुंबकीय आकर्षण में आकर 13 हजार फीट से अधिक ऊँचे ट्रैक चँद्रखानी पास को फतह करने की मन में ठान ली। तब मेरे पास उम्दा माउंटेन साइकिल उपलब्ध नहीं थी। एक एडवेंचर क्लब से जुड़े होने पर मुझे किराए पर वह साइकिल उपलब्ध हो गई। जरूरी तैयारी के साथ मैं निकल पड़ा अपनी पहले कठिन सफर पर। मनाली से शुरू होने वाला चँद्रखानी पास ट्रैक मलाना और मणिकर्ण होते हुए बिजली महादेव तक जाता है। चँद्रखानी पास को देवी-देवताओं के मिलन की जगह भी कहा जाता है। समतल सड़कों पर साइकिलिंग के बजाय पहली बार ऊँचे शिखर पर साइकिल चलाने का रोमांच ही अलग था। मानो सातवाँ आसमान छू लिया हो। इस पहली जीत से इस यात्रा को और अधिक रोमांचकारी बनाने का साहस मन में पैदा हुआ। इस बार हाड़ कँपाने वाली सर्दी में हिमालच प्रदेश के बर्फीले पर्वतीय शृंखला धौलाधार में कुछ तूफानी करने का तय किया। यहाँ तो ऐसा लगा जैसे स्वप्नों में देखा स्वर्ग साकार उपस्थित हो गया हो। धौलाधार पर्वत रेंज कांगड़ा जिले का सबसे आकर्षक पर्यटन और साहसिक गतिविधियों का केन्द्र है। इसे 12 माह दूधिया बर्फ से ढका हुआ देखा जा सकता है। हनुमान का टिंबा या सफेद पर्वत इस पर्वत शृंखला की सबसे ऊंची चोटी है। धौलाधार की समुद्र तल से ऊंचाई 3500 से 6,000 मीटर तक है। छोटा हिमालय के नाम से ख्यात धौलाधार पर्वत शृंखला डलहौजी के पास से शुरू होती है। इसके बाद साहसिक खेलों में रुचि रखने वाले युवा देवेन्द्र तिवारी ने कभी पीछे पलटकर नहीं देखा। जैसे ऊँचे पहाड़ उन्हें आवाज देकर बुलाते हों, वे बार-बार उनके बुलावे पर जाते रहे। छोटा सियाचिन (14,200 फीट), रोहतांग पास (13,051 फीट), बड़ा-लाचा-ला-दर्रा (16,040 फीट), नकीला पास (15,547 फीट) और दुनिया के दूसरे सबसे ऊँचे चलने योग्य मार्ग तग-लांग-ला दर्रा (17,500 फीट) पर भी ग्वालियर के देवेन्द्र तिवारी ने भारत का झंडा फहराया।
मध्यप्रदेश में साइकिलिंग और साहसिक गतिविधियों में अपना योगदान देने के लिए देवेन्द्र तोमर का सरकार और सामाजिक संस्थाओं ने सम्मान भी किया है। कर्नाटक के राज्यपाल हंसराज भारद्वाज और केन्द्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने उन्हें साहसिक गतिविधि के लिए सम्मान दिया है। हाल ही में उन्हें वन्देमातरम् राष्ट्रीय अलंकरण से नवाजा गया।
देवेन्द्र तिवारी कहते हैं कि दुनिया को साइकिल के पहिए से नापने की उनकी अदम्य इच्छा है। वे साइकिल से विश्व यात्रा पर निकलकर बेटी बचाओ का संदेश देना चाहते हैं। साथ ही वे पर्यावरण के प्रति भी दुनिया को सचेत करना चाहते हैं। उनका मानना है कि व्यक्ति को दैनिक जीवन में फिर से साइकिल को अपना लेना चाहिए। इसके कई फायदे हैं- शरीर चुस्त रहेगा, ईधन का संकट कम होगा और महँगाई की मार से भी बचा जा सकेगा। ट्रैकिग पर जाने वाले साथियों को वे सलाह देते हैं कि ट्रैकिंग के लिए जगह और मार्ग चुनने से पहले अपनी रुचि और क्षमताओं को परखना जरूरी है। अगर आपको ऊँचाई पर चढऩे में तकलीफ है तो समतल मैदान ही चुनें। यदि ऊँचाई आपको आनंदित करती है और आप लम्बे समय तक पहाड़ों में भटकने का माद्दा रखते हैं तो जरूर लम्बे रास्ते, ऊँची जगह चुनें और ऊँचे शिखरों पर  जीवन को रोमांच के साथ जिएँ।
                           
संपर्क: गली नंबर-1 किरार कालोनी, एस.ए.एफ. रोड,
कम्पू, लश्कर, ग्वालियर (म.प्र.) 474001, मो. 9893072930

निदा फ़ाज़ली के 5 दोहे



निदा फ़ाज़ली के 5 दोहे
1
बच्चा बोला देखकर , मस्ज़िद आलीशान !
अल्ला तेरे एक को , इतना बड़ा मकान ॥
2
मैं रोया परदेस में, भीगा माँ का प्यार ।
दुख ने दुख से बात की, बिन चिट्ठी बिन तार ॥
3
' सीधा-सादा डाकिया, जादू करे महान ।
एक ही थैले में भरे, आँसू और मुस्कान ॥
4
रस्ते को भी दोष दे, आँखें भी कर लाल ।
चप्पल में जो कील है, पहले उसे निकाल ॥
5
जीवन के दिन रैन का, कैसे लगे हिसाब ।
दीमक के घर बैठकर, लेखक लिखे क़िताब ॥

प्रेरक

कल मैंने आपको कुछ बंदरों की कहानी पढ़वाई थी, जो कुँए में दिख रहे चंद्रमा को वास्तविक चंद्रमा समझकर उसे निकालने का प्रयास करते हैं लेकिन पेड़ की डाली टूट जाने के कारण बेचारे कुँए में गिरकर मर जाते हैं। कहानी का शीर्षक था 'मूर्ख बंदर और चंद्रमा’ । कहानी का ऐसा शीर्षक निष्प्रयोजन ही दिया गया था। वस्तुत: किसी भी जीव को मूर्ख नहीं कहना चाहिए। जिन जीवों जैसे गधा आदि को हम बहुधा मूर्ख कहते हैं वे मानव जाति के बहुत काम आते हैं और हर प्रकार के कष्टों को सहकर भी मानवों के लिए अति उपयोगी सिद्ध होते हैं!
बच्चों की कहानियों में आमतौर पर विभिन्न जंतुओं के लिए 'चालाक लोमड़ी’ , 'धूर्त सियार’ , 'कपटी मगरमच्छ’  जैसी उपमाओं का प्रयोग किया जाता है लेकिन इसका उद्देश्य केवल कहानी को बच्चों (और बड़ों) के लिए रोचक और बोधगम्य बनाना होता है, किसी जन्तु विशेष को अन्य जंतुओं से हीन दिखाना या उसका अपमान करना  नहीं।

दो बंदरों की कहानी
दो बंदर एक दिन घूमते-घूमते एक गाँव के समीप पहुँच गए और उन्होंने वहाँ सुन्दर व मीठे प्रतीत होने वाले फलों से लदा हुआ एक पेड़ देखा।
'इस पेड़ को देखो!’  एक बंदर ने दूसरे से चिल्लाकर कहा- 'ये फल कितने सुंदर दिख रहे हैं। ये अवश्य ही बहुत स्वादिष्ट होंगे! चलो हम दोनों पेड़ पर चढ़कर फल खाएँ’ ।
दूसरा बंदर बुद्धिमान था। उसने कुछ सोचकर कहा- 'नहीं, नहीं। एक पल के लिए सोचो। यह पेड़ गाँव के इतने समीप लगा है और इसके फल इतने सुंदर और पके हुए हैं, लेकिन यदि ये अच्छे फल होते तो गाँव वाले इन्हें ऐसे ही क्यों लगे रहने देते? लोगों ने इन्हें अवश्य ही तोड़ लिया होता! लेकिन ऐसा लगता है कि किसी ने भी इन फलों को हाथ भी नहीं लगाया है। इन्हें मत खाओ। मुझे विश्वास है कि ये फल खाने लायक नहीं हैं’ ।
'कैसी बेकार की बातें कर रहे हो!’  पहले बंदर ने कहा- 'मुझे तो इन फलों में कुछ बुरा नहीं दिख रहा। मैं तो फल खाने के लिए पेड़ पर चढूँगा’ ।
'जैसी तुम्हारी इच्छा’   बुद्धिमान् बन्दर ने कहा- 'मैं खाने के लिए कुछ और ढूँढता हूँ’ ।
पहला बंदर पेड़ पर चढ़कर फल खाने लगा और उसने जी भर के फल खाए; लेकिन वे फल उसका अंतिम भोजन बन गए क्योंकि फल स्वादिष्ट तो थे ;परन्तु जहरीले थे। दूसरा बंदर जब कहीं और से खा-पी कर आया तो उसने पेड़ के नीचे अपने मित्र को मरा हुआ पाया। उसे यह देखकर बहुत दु:ख हुआ लेकिन वह तो पहले ही अपने मित्र को सावधान कर चुका था।
अच्छे विचार- बुरे विचार
'मुझे कोई मार्ग नहीं सूझ रहा है. मैं हर समय उन चीज़ों के बारे में सोचता रहता हूँ जिनका निषेध किया गया है। मेरे मन में उन वस्तुओं को प्राप्त करने की इच्छा होती रहती है जो वर्जित हैं। मैं उन कार्यों को करने की योजनाएँ बनाते रहता हूँ जिन्हें करना मेरे हित में नहीं होगा। मैं क्या करूँ?’  - शिष्य ने गुरु से उद्विग्नतापूर्वक पूछा।
गुरु ने शिष्य को पास ही गमले में लगे एक पौधे को देखने के लिए कहा और पूछा कि वह क्या है। शिष्य के पास उत्तर नहीं था।
'यह बैलाडोना का विषैला पौधा है। यदि तुम इसकी पत्तियों को खा लो तो तुम्हारी मृत्यु हो जाएगी। लेकिन इसे देखने मात्र से यह तुम्हारा कुछ अहित नहीं कर सकता। उसी प्रकार, अधोगति को ले जाने वाले विचार तुम्हें तब तक हानि नहीं पहुँचा सकते जब तक तुम उनमें वास्तविक रूप से प्रवृत्त न हो जाओ । (hindizen.com से)

एक पाँव का जूता



 एक पाँव का जूता
- भैरव प्रसाद गुप्त
जाने कैसी आवाज़ उनके कानों में पड़ी कि वह चिहुँक उठीं। तीन दिन से रात में कई-कई बार ऐसा हो रहा था। जीवन में पहले ऐसा कभी हुआ हो, उन्हें याद नहीं। इसी कारण दो रातों वह अपने कानों पर विश्वास न कर सकीं, यों ही, कुछ नहीं कहकर उन्होंने अपने को बहला लिया और करवट बदलकर सो गयीं। किन्तु आज वह कुछ सावधान थीं, दो रातों के लगातार अनुभव ने उनके मन में अनजाने की एक सन्देह पैदा कर दिया था। दिन में कई-कई बार उन्होंने बाबूजी को घूर-घूर कर देखा था। बाबूजी उन्हें बेहद उदास दिखाई पड़ते थे। उन्हें ऐसा लगा था कि अबकी लखनऊ से वापस आने के बाद बाबूजी की बोली बहुत कम सुनने को मिली थी। लेकिन ऐसा तो जीवन में अनेक बार हो चुका था। उनके मौन-व्रत से कौन परिचित नहीं? फिर भी आज उन्हें लगा कि ज़रूर कोई बात है! बाबूजी उदास यों ही नहीं होते, मौन-व्रत भी वह सब से कहकर ही धारण करते। लेकिन इधर तो बाबूजी ने उनसे भी कोई बात नहीं की थी।
उन्होंने पूछा था-क्या बात है? ऐसे खोए-खोए क्यों दिखाई देते हैं? तबीयत तो ठीक है?
बाबूजी ने जाने कैसी नज़रों से उन्हें एक पल को देखा था और फिर आँखें झुकाकर घर से बाहर चले गये थे। उन्हें उस तरह जाते हुए देखकर मन में खटका होना स्वाभाविक ही था। उन्होंने सोचा, शायद वह बाहर बैठक में जाएँगे। वह दरवाजे तक आई थीं; लेकिन बाबूजी तो दूसरी दिशा में उसी तरह सिर झुकाए जाने कहाँ चले जा रहे थे। बिना कोई  ख़बर दिए तो वह कभी कहीं नहीं जाते। वह वहीं फ़र्श पर बैठ गई थीं।
ज़रा दूर जाकर ही बाबूजी लौट आए थे। द्वार पर ठिठककर वह बोले थे-मन व्यग्र है। लेकिन तुम कोई चिन्ता न करो। जाकर भोजन करो। मैं थोड़ा आराम करूँगा।-और वह बैठक की ओर बढ़ गए थे।
बाबूजी के इस तरह के व्यवहार की वह अभ्यस्त थीं। बाबूजी ने उन्हें शुरू से ही सिखाया था कि उनकी व्यग्रता की स्थिति में उन्हें अकेले छोड़ देना चाहिए, उनके पीछे नहीं पडऩा चाहिए और उनके आदेश का, बिना किसी हील-हुज्जत के, पालन करना चाहिए। उन्हें इसी से शान्ति मिलती है।
वह अन्दर जाकर बाबूजी के आदेश का पालन करने लगीं। बाबूजी की तरह इनका भी जीवन यान्त्रिक होकर रह गया था। सन् 31 में जो बाबूजी ने एक व्रत लिया था, जीवन-भर के लिए उसी के व्रती होकर रह गए। कभी किसी ने कोई अन्तर नहीं देखा... वही एक जोड़ा अपने काते सूत के खद्दर का कुर्ता, धोती, गंजी, गाँधी टोपी और झोला... वही चप्पल, वही अपने हाथ से कपड़े साफ करना, दिन-रात में एक बार भोजन करना, चौकी पर चटाई बिछाकर सोना, सदा तीसरे दर्जे में सफ़र करना, सच बोलना और जनता की सेवा के लिए सदा तत्पर रहना। पहले तो बाबूजी का यह सुराजी बाना जाने कैसा-कैसा उन्हें लगा था। यह किसी ऋषि की तपस्या से किसी भी माने में कम नहीं था। लेकिन बाबूजी की दृढ़ता भी कोई साधारण नहीं थी। कभी वह अपने पन से डिगे हों, ऐसा किसी ने नहीं देखा। वह बेचारी क्या करतीं? बब्बू को गोद में लिये वह मन-ही-मन रोतीं, लेकिन ऊपर से बाबूजी के आदेशों के पालन में कोई कमी दिखाई न दे, इसके प्रयत्न में लगी रहतीं। बब्बू के होने के बाद बाबूजी ने यह व्रत लिया, इसे वह अपना सौभाग्य समझतीं, वर्ना... और इसके आगे सोचकर वह काँप-काँप उठतीं। बाबूजी कभी ऐसे हठी हो जाएँगे, कौन सोचता था।
बाबूजी की तपस्या सफल होते बहुत देर न लगी। जनता के वह प्रिय हो गये। कस्बे से जि़ले के और फिर प्रान्त के नेता हो गये। चारों ओर बाबूजी की धूम, सब के मुँह पर बाबूजी-बाबूजी! लेकिन बाबूजी का जीवन वहीं-का-वहीं। रंचमात्र का भी परिवर्तन नहीं, जैसे जो बाबूजी पहले थे, वही अब भी, कहीं कोई अन्तर आया ही नहीं। फिर जेल... पुलिस की लाठियाँ ... और सन् बयालीस... भगवान की कृपा से उन्हें सिर्फ दस साल की सज़ा हुई, वर्ना लोग तो कहते थे, फाँसी पर लटका दिये जाएँगे।... प्यूनिटिव टैक्स... खेती-बारी ज़ब्त। कैसे कटे थे बब्बू की माँ के दिन! भगवान दुश्मन को भी न दिखाये वैसे दिन! लोग उनके पास भी आते सहमते। घर में एक दाना नहीं। रात को पड़ोसी सोता पडऩे पर छुपकर कुछ खाने को दे जाता, तो अधम काया की भूख मिटती वर्ना फ़ाँका...
आखिर वे यातना और आतंक के दिन भी कट ही गये। स्थिति सुधरी तो खोज-खबर लेनेवाले भी आए।... फिर तीन बरस बीतते-न-बीतते बाबूजी छूटकर आ गए। उनका स्वागत देखकर जैसे सारा कष्ट भूल गया। वह एक दिन और यह एक दिन! बाबूजी घर में आए तो बब्बू को गोद में उठाकर चूमा और उसकी माँ के सिर पर हाथ रखकर पूछा-तुम्हें बहुत कष्ट सहना पड़ा न!
तीन वर्ष तक रोते-रोते बब्बू की माँ के आँसू जैसे सूख गए थे। इस क्षण अचानक जाने कहाँ से फिर उबल पड़े।
बाबूजी जाने कैसे कण्ठ से बोले- रोती हो? मैं तो नहीं रोया।
बब्बू की माँ आँचल से आँसू पोंछती हुई बोलीं-आप आ गए, ये तो खुशी के आँसू थे।
बाहर भीड़ बाबूजी जि़न्दाबाद के नारे लगा रही थी।
बाबूजी अचानक गम्भीर होकर बोले-मैं आ गया, तुम खुश हो। लेकिन मेरी खुशी तो गुलामी ने लूट ली है। जब तक हमारा देश आज़ाद नहीं हो जाता, हमारी खुशी वापस नहीं आने की। आज़ादी बहुत मुश्किल चीज़ है, इसके लिए... और वह बब्बू को गोद से उतारकर बाहर चले गए।
बब्बू की माँ की समझ में कुछ न आया था। उनकी खुशी बहुत ही छोटी थी, वही उनका जीवन था। उन्होंने बाबूजी को कभी किसी शिकायत का मौका नहीं दिया।... लेकिन जब बाबूजी की खुशी के दिन आए तो अचानक ही बब्बू की माँ को लगा कि अब उनकी खुशी बहुत बड़ी हो गई है। कई बार उनका मुँह खुला कि बाबूजी से कुछ कहें। लेकिन कुछ कहने की हिम्मत नहीं पड़ी। जाने वह खुशी बाबूजी के चेहरे पर कब आई और कब चली गई, जैसे एक फुलझड़ी जली हो, और बुझ गई हो। और बब्बू की माँ मुँह ताकती रह गई हों।
बब्बू ने किसी तरह हाईस्कूल पास किया और अपनी योग्यता से या भाग्य से रेलवे में क्लर्क हो गया। लोगों ने बब्बू की माँ से कहा-बाबूजी का इकलौता लड़का और ...
लेकिन बब्बू की माँ ने बाबूजी से फिर भी कोई शिकायत न की।
लोगों ने कहा-बाबूजी के सभी-के-सभी साथी जाने क्या-से-क्या हो गये। लेकिन बाबूजी एम.एल.ए. होकर भी...
और बाबू जी के जीवन में जैसे कोई परिवर्तन आने ही वाला न हो। वही सब-कुछ, बल्कि और भी सख्ती के साथ। कभी-कभी वह आप ही बब्बू की माँ के पास आ बैठते और जैसे आत्म-स्वीकृति कर रहे हो, बोल उठते-बब्बू की माँ! मैं कितना ग़लत सोचता था! आज़ादी अपने में कोई खुशी की चीज़ नहीं। खुशी तो देश की खुशहाली में है। हाय, हम कितने ग़रीब हैं, कितने दुखी हैं! जिस दिन यह ग़रीबी दूर होगी, दरअसल वही खुशी का दिन होगा! ...
और बब्बू की माँ जैसे उनकी यह बात भी नहीं समझती और उनका मुँह ताकती रहतीं। उनकी खुशहाली बहुत छोटी थी और वह सोचती थीं कि बाबूजी उसे बड़ी आसानी से हासिल कर सकते हैं, लेकिन वह कुछ भी न कहतीं।
लोग कहते- बाबूजी सचमुच महात्मा हैं!
बब्बू की माँ सुनतीं और गुनतीं कि महात्मा का अर्थ क्या होता है, लेकिन कहतीं कुछ नहीं।
लोग कहते- न रहने पर तो सभी फ़कीर बनते हैं, रहने पर जो फ़कीर बने वही सच्चा फ़कीर!
बब्बू की माँ सुनतीं और गुनतीं कि फ़कीर किसे कहते हैं, लेकिन कहतीं कुछ नहीं।
उनकी बानी तो बाबूजी थे, उन्हें खुद कहने की क्या ज़रूरत?
एक बार पहले भी इसी तरह लखनऊ से लौटकर उन्होंने अपनी व्यग्रता प्रकट की थी। लेकिन उस बार तो ज़रा ही देर बाद बब्बू की माँ के पास आकर हँसते हुए कह गये थे-वे सब मुझे पाखण्डी कहते हैं, बब्बू की माँ। कहते हैं, जब फ़र्स्ट क्लास का टिकट मिलता है तो थर्ड क्लास में सफ़र करने का क्या मतलब? कुछ समझती हो?
बब्बू की माँ क्या समझें? जीवन में उन्होंने सफ़र कब किया कि उन्हें फ़र्स्ट और थर्ड की तमीज़ हो?
लेकिन उस बार रात में कभी कोई ऐसी आवाज़ सुनाई नहीं दी थी। अबकी तो तीन-तीन दिन बीत गए। दिन-भर बाबूजी मौन व्यग्रता में पड़े रहते हैं। और रात में कई-कई बार जाने कैसी आवाज़ बब्बू की माँ के कानों में पड़ती है कि वह चिहुँक-चिहुँककर उठ बैठती हैं। लगता है, जैसे कोई बालक रोता हो, बापू-बापू की रट लगाता हो।
बब्बू की माँ आज रात अपने को बहला न सकीं। वह उठ बैठीं। आवाज़ वैसी ही आ रही है। उन्होंने ज़रा ध्यान से आहट ली, तो लगा, आवाज बाहर से आ रही है। बाहर सहन में बाबूजी सो रहे थे। अन्दर आँगन की अपनी चारपाई से बब्बू की माँ उठ खड़ी हुई। आँगन में मैली चाँदनी फैली हुई थी। दिन-भर की लू की मारी हवा इस वक्त कुछ ठण्डी-ठण्डी सी लग रही थी। रात के सन्नाटे में वह किसी बालक के रुदन-सी आवाज़ कितनी भयानक लग रही थी! बब्बू की माँ को ध्यान आया कि पहले तो यह आवाज़ ज़रा-ज़रा देर में चुप हो जाती थी, लेकिन आज तो यह जाने कब से आ रही है।... दूर के अपने स्टेशन पर जाने बब्बू कैसे है? क्यों ऐसा लगता है कि जैसे बब्बू ही रो रहा हो? जैसे शिकायत कर रहा हो कि बाबूजी ने उसकी पढ़ाई भी पूरी नहीं कराई... यह उम्र हो गई, अभी शादी नहीं कराई... लेकिन नहीं, नहीं, वह शिकायत करने वाला, मुँह लेकर कुछ कहने वाला बेटा नहीं है! जैसी माँ , वैसा ही बेटा।...
वह आवाज़ जैसे और भी करुण, और भी भयानक हो उठी। अकेले घर में बब्बू की माँ को डर लगने लगा। वह चारपाई से उठ खड़ी हुई। बाहर के दरवाज़े के पास की खिड़की से उन्होंने बाहर झाँका। आवाज़ बाहर से आ रही थी। बाबूजी चौकी पर दायीं करवट पड़े थे। कुहनी में उनका मुँह छुपा हुआ था, साफ़ दिखाई न दे रहा था। वह आवाज़ उसी तरह बही आ रही थी। फिर बाबूजी को देखते हुए बब्बू की माँ को सहसा ही ऐसा लगा कि जैसे अब वह आवाज़ उनके कानों से टकराकर दूर चली गई है और उनको एक बहुत पुरानी बात याद आ गई। जब वह इस घर में आई थीं तो बाबूजी अकेले ही थे। उनके माँ-बाप जाने कब के गुज़र चुके थे। रात में चारों ओर जब सोता पड़ जाता तो वह इसी खिड़की पर आकर उन्हें धीरे-धीरे पुकारते, दरवाज़ा खोलो... और एक बार वह भी इस खिड़की पर आई थीं। यही जेठ के दिन थे। आँगन में सोई यी थीं कि अचानक उनकी नींद उचट गई। जाने मन में क्या उठा कि वह इस खिड़की पर आ गईं। लेकिन उन्हें पुकारें कैसे? फिर आँगन में से कुछ कंकडिय़ाँ चुन लाईयीं और एक-एक कर खिड़की से उनकी चारपाई पर फेंकने लगीं। वह उठे तो दरवाज़ा ज़ोर से खोलकर आँगन में चली गई थीं। उन्होंने अन्दर आकर कहा-एक कंकड़ी मेरी भौंह पर लगी है!
-अरे, उन्होंने व्यस्त होकर कहा था-कहाँ? चोट तो नहीं लगी?
-नहीं, नहीं, वह कंकड़ी थी कि पंखुड़ी? ...
और वह बब्बू! हे भगवान, उस रात कहीं वह चुक गई होतीं तो उन्हें बब्बू की माँ कौन कहता? और फिर उसके बाद तो ...
उनके मन में आया, एक कंकड़ी फेंकूँ क्या? ... कि अचानक बाबूजी चौकी पर उठ बैठे।
और बब्बू की माँ के मन में आया, दरवाज़ा खोल दूँ क्या? और सच ही बढ़कर उन्होंने दरवाज़ा खोला ही था कि उनकी आवाज़ आई-बब्बू की माँ! -उस आवाज़ में कैसी तो एक तड़प थी कि बब्बू की माँ का सपना टूट गया। सिर का आँचल ठीक करती हुई जैसे एक अपराधी की तरफ वह बोलीं-कहिए!
-इस बेला तुमने दरवाज़ा क्यों खोला?
-मुझे ऐसा लगा कि बाहर कोई बालक रो रहा है।
-तुमने सुना था?
-तीन रातों से सुन रहीं हूँ।
-ओह! तनिक रुककर बाबूजी ने कहा-यहाँ आओ।
वह सहमी-सहमी-सी उनके पास आ गई।
वह बोले- बैठो!
आपकी चौकी पर?
-हाँ, तुमसे एक बात कहनी है।
-मुझसे?
-हाँ, बाबूजी खड़े-खड़े ही बोले-अपनी यह बात मैं और किसी से कह नहीं सकता। ... जानती हो तीन रातों से मैं ही रो रहा हूँ...
-आप?
-हाँ, मैं। तुम ने ठीक ही किसी बालक का रुदन सुना। इन्सान जब रोता है तो बालक ही बन जाता है।
-लेकिन क्यों? आप तो मोह-माया...
-कितने दिनों बाद आज तुमने मुझसे एक सवाल पूछा है...
-ओह, क्षमा कीजिए!
-नहीं-नहीं, बब्बू की माँ! एक नहीं तुम हज़ार सवाल पूछो!
मेरा पतन हो गया है। जिस सिंहासन पर तुम लोगों ने मुझे बैठा रखा था, उससे मैं च्युत हो गया हूँ। मैं...
-यह सब आप क्या कहते हैं? मेरी समझ...
-आज तक तुम ने समझकर मेरी कोई बात नहीं मानी। मेरी बात ही तुम लोगों के लिए वेद-वाक्य रही। लेकिन आज मैं चाहता हूँ कि पहले तुम मेरी बात समझो। तुम्हें मैं वह पूरी घटना ही सुनाता हूँ, जिसने मेरे जीवन के सभी आदर्शों, सिद्धान्तों और बड़ी-बड़ी त्याग-तपस्या की बातों को एक मामूली- सी स्थिति की चट्टान पर पटककर चूर-चूर कर दिया है। मैं तीन दिनों से रो रहा हूँ, लेकिन ऐसा लगता है कि सारी जि़न्दगी जिस राह मैं चला हूँ, उसी पर मैं भटक गया हूँ। सुनो! उस दिन गाड़ी में बेहद भीड़ थी। दोपहर को गाड़ी पहुँची, तो ऐसी भीड़ डब्बे में घुसी कि मेरा दम फूलने लगा। ऐसा लग रहा था। कि मैं बेहोश हो जाऊँगा। लोगों की साँसों से जैसे लपटें छूट रही थीं । सोचा, उतरकर जान बचाऊँ, लेकिन उस भीड़ में से उतरना कोई मामूली काम न था। फिर भी मैं झोला लेकर उठ खड़ा हुआ। और किसी तरह एक पग बढ़ाया ही था कि गाड़ी ने सीटी दे दी। अब क्या करूँ, लोगों ने कहा, बैठ जाइए, गाड़ी चलेगी तो थोड़ी राहत मिलेगी। मेरे बैठते-बैठते गाड़ी चल पड़ी। तभी एक चमरौंधा जूता मेरी गोद में आ गिरा। मैंने खिड़की की ओर नज़र घुमाई तो एक पोटली मेरी पीठ से बज उठी। देखा, एक बूढ़ा किसान मेरी खिड़की में पाँव डाले ऊपर चढ़ रहा है। जाने मुझे क्या हुआ कि मेरा दिमाग ही खराब हो गया। गोद का जूता उठाकर मैंने बाहर फेंक दिया और मारे गुस्से से काँपने लगा। किसानों ने अन्दर आकर माथे का पसीना मेरे सिर पर चुलाते हुए कहा, छिमा कीजिएगा, बाबूजी, हमें दो ही टीसन जाना है। उसके मुँह से बाबूजी सुनकर मेरे ऊपर घड़ों पानी पड़ गया। वह शायद मुझे पहचानता था। मैंने दूसरी ओर मुँह फेर लिया वह अपनी पोटली और जूते सँभालने लगा। फिर बोला, हमारा एक जूता किधर जा पड़ा? मैं जानता था कि उसका एक जूता कहाँ है, लेकिन मेरे मुँह से कोई बात नहीं निकली। अब मैं सोच रहा था कि कहीं इसे मालूम हो जाय कि मैंने ही इसका एक जूता... वह छटपटाकर आस-पास के लोगों से पूछ रहा था और लोग उसे डाँट रहे थे। आखरी हार-पछताकर उसने पूछना बन्द कर दिया। फिर भी रह-रहकर बोल उठता था, जाने हमारा एक जूता कहाँ चला गया? भुभुर में मेरा पाँव जल जाएगा। आखरी बेल्थरा रोड आया और जब वह एक जूता और पोटली लटकाये नीचे उतर गया, तो मेरी जान में जान आयी। लेकिन, बब्बू की माँ, फिर जो दृश्य मैंने देखा है, वह... वह...बाबू जी का गला भर्रा गया- वह मैं कभी भी न भूल सकूँगा! वह किसान एक पाँव में जूता डाले और दूसरे नंगे पाँव से पिघलते कोलतार पर चला जा रहा था।  उसका पाँव पिघलते कोलतार पर ऐसे पड़ रहा था, जैसे अंगार पर और फिर मुझे ऐसा लगा कि वह नंगे पाँव अंगार पर नहीं, मेरी छाती पर चल रहा है... और मैं कुचला जा रहा हूँ ...कुचला जा रहा हूँ ... बब्बू की माँ, मैं क्या करूँ? क्या करूँ?- और बाबूजी अपनी छाती मसलते हुए चौकी पर बैठ गए।
बब्बू की माँ को लगा कि जैसे वही आवाज़ फिर उनके कानों से आकर टकराने लगी। वह उठ खड़ी हुईं और दरवाज़े की तरफ बढ़ती हुई बोलीं- मैं क्या जानूँ, बाबूजी मेरी समझ में तो आज तक आपकी कोई बात नहीं आई, फिर यह बात तो और भी मुश्किल मालूम होती है। मैं आपको क्या बता सकती हूँ?