दीपक की लौ में एक सादगी है,
वह अँधेरे से लड़ती
एक जिंदगी है।
खुद को
जलाकर जो राह दिखाए,
सच्ची
सेवा तो बस उसी की बंदगी है।
-भवानी प्रसाद मिश्र
इस अंक में
अनकहीः पर्व- त्योहार पर बढ़ता बाजार का शिकंजा -डॉ.रत्ना वर्मा
जलवायु परिवर्तनः इस साल ठंड कैसी होगी? - धीरज चतुर्वेदी
कविताः समंदर यूँ ही खारा नहीं हुआ - अर्चना अनुपम
आलेखः चितेरे हैं हम... - डॉ. महेश परिमल
पर्व- संस्कृतिः लुप्त होते लोकगीत - जेन्नी
शबनम
आलेखः प्रकृति की मूक शिक्षा - मीरा गोयल
आपदाः अपनी बर्बादी का मुआवज़ा चाहता है नेपाल - प्रमोद भार्गव
प्रकृतिः टाइडपूलिंग का मनोरम संसार - डॉ.
रमाकांत गुप्ता
कविताः प्रवाह के पार - अनीता सैनी
स्वास्थ्यः ...प्लास्टिक के उपयोग को
रोकना होगा -स्रोत फीचर्स
व्यंग्यः आओ शिकायत करें - रामेश्वर काम्बोज
‘हिमांशु’
लघुकथाः आर्द्रता - सन्तोष सुपेकर
लघुकथाएँ - 1.जन्म दिन, 2. बेटी का क़द, 3.अंतिम पंक्ति के... - आनन्द
हर्षुल
दो कविताएँः 1. संस्कार, 2. बड़े बुजुर्ग - डॉ. प्रगति गुप्ता
लघुकथाः जयजयवन्ती - अन्तरा करवडे
किताबेंः संघर्षमय जीवन का दस्तावेज - प्रो.
अश्विनी केशरवानी
दो कविताएँ- 1. हे पुरुष!, 2. खंडित मूर्तियाँ -
डॉ .अंजुल चौहान

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