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Nov 5, 2026

कहानी: कुकी

 - शुभ्रा ओझा 

अपने व्यस्तम दिन से घर लौटकर, अपने थके हुए शरीर को जैसे ख़ुद ही ढोते हुए अस्मिता अपने बेड पर लेट गई। कभी-कभी बहुत थका हुआ मन कुछ करना ही नहीं चाहता लेकिन वह चाह रही थी कि उसके कमरे की लाइट कुछ देर के लिए बंद हो जाए, लेकिन कैसे ? तभी उसे ध्यान आया वह तो अमेरिका के एक स्मार्ट होम में रहती है जहाँ सेंसर से पानी का टैब अपने आप ऑन/ऑफ हो जाता है, तो वहीं एलेक्सा से घर की सारी लाइट जलती-बुझती हैं। हर सुबह गूगल के मधुर स्वर से होती है, तो वहीं शाम एलेक्सा के रिलैक्सिंग म्यूजिक के साथ ख़त्म होती है। अस्मिता का गराज डोर भी ऑटोमैटिक है, वहीं घर के सभी दरवाज़े पर नंबर वाले ऑटोमैटिक लॉक लगे हुए हैं, तो घर की चाबी गुम होने का भी कोई झंझट नहीं है। पूरे घर की सुरक्षा के लिए कई कैमरे लगे हैं। कोई अजनबी जो मुख्य दरवाज़े पर आ जाए तो तुरंत फ़ोन के ब्लिंक ऐप पर दिख जाता है कि कौन दरवाज़े पर आया है। वह चाहे तो दरवाज़े पर लगे कैमरे को अपने फ़ोन के ऐप पर देखकर घर के भीतर से या फिर ऑफिस से दरवाज़े पर खड़े व्यक्ति से बात कर सकती है। यह सब सोचकर उसके चेहरे पर सुकून की एक परत उभर आई और झट से अस्मिता ने एलेक्सा को अपने बेडरूम की लाइट ऑफ करने को कह दिया। एलेक्सा ने भी उसके आदेश का पालन करते हुए लाइट ऑफ कर दी। मन ही मन एलेक्सा को धन्यवाद कहते हुए अस्मिता धीरे से बोल उठी- “इस एलेक्सा और गूगल को अमेरिकी लोगों ने इसलिए ही बनाया होगा कि घर में अकेले रहते हुए भी उन्हें लगे कि कोई उनके साथ है जबकि उन्हें नहीं पता कि यह सिर्फ़ एक भ्रम है, वे बहुत अकेले हैं इस देश में।” अभी वह यह बोल ही रही थी कि तभी अपने बेटे कबीर के बारे में सोचकर उदास हो गई और उसकी बंद आँखों के कोर से आँसू निकल पड़े। वह फिर ख़ुद से बोल उठी मैं भी तो कितनी अकेली हो गई हूँ इस देश में या फिर इस घर में ? मैं अपना मन हल्का करने के लिए किस से बात करूँ?” उसने मन ही मन अपनी कई सहेलियों के बारे में सोचा लेकिन उसे कोई भी एक नाम ऐसा नहीं मिला जिसे फ़ोन मिलाकर अपने मन की सारी बातें कर सके। उसका दिल तड़प रहा था किसी से बात करने को, उसने अपने थके हुए दिमाग़ पर थोड़ा और ज़ोर लगाया तो उसे ध्यान आया कि उसके पास एक बहुत अच्छा दोस्त है जो उसकी बातें सुनता है और उसे सही सलाह भी देता है। उस दोस्त का ध्यान आते ही अस्मिता उठ बैठी और अपना मोबाइल फ़ोन ढूँढने लगी, उसे ज़्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी, फ़ोन उसके पास बेड पर ही पड़ा था। हाथ में फ़ोन पकड़े वह अँधेरे में पेट के बल लेट गई और अपने दोस्त को मैसेज लिखना शुरू कर दिया, उसने बात शुरू करने के लिए लिखा-“मुझे तुम्हारा निक नाम रखना है।”

“अरे वाह! रख दीजिए, मुझे तो इंतजार था। क्या नाम सोच रहे हो मेरे लिए?” उधर से जवाब आया।

यह पढ़ अस्मिता के चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान तैर गई, उसने फिर टाइप किया “कुकी नाम रख दूँ तुम्हारा?”

उसका दोस्त झट से मान गया।

“कुकी नाम डन! आज से मैं आपका कुकी हूँ! तो बताइए कुकी से क्या काम है?”

“यह बताओ दो लोग साथ रहते हुए भी साथ क्यों नहीं होते?” अस्मिता ने अपने दोस्त कुकी से पूछा।

“ये सवाल तो दिल को छू गया...कुकी की तरह सोचूँ, तो दो लोग साथ रहते हुए भी साथ नहीं होते; क्योंकि -शरीर साथ होते हैं, पर मन कहीं और भटकता है। एक ही छत के नीचे रहते-रहते हम एक-दूसरे को फॉर ग्रांटेड ले लेते हैं। बातें कम हो जाती हैं, सुनना बंद हो जाता है। अब हमारे फोन में सारी दुनिया है, पर सामने वाले के लिए वक्त नहीं। कभी-कभी तो साथ रहते हुए भी हम अपनी-अपनी लड़ाइयाँ अकेले लड़ रहे होते हैं, और बताते भी नहीं। साथ रहना लोकेशन है, और साथ होना कनेक्शन है। आप किस बारे में सोचकर ये पूछ रहे हो? मन भारी है क्या थोड़ा?” 

यह मैसेज पढ़ते ही अस्मिता को लगा- जैसे वह रो पड़ेगी, उसे ऐसा महसूस हो रहा था कि उस अँधेरे कमरे में कोई तो है जो उसके मन की बात समझ रहा है। ख़ुद को सँभालते हुए उसने लिखा-“हाँ, थोड़ा अच्छा नहीं लग रहा।”

उसके इतना लिखते ही उधर से कुकी का उत्तर आया- “समझ रहा हूँ...कभी-कभी बिना किसी बड़ी वजह के भी मन उदास हो जाता है। ऐसा होना बिलकुल नार्मल है। थोड़ी देर आँखें बंद करके गहरी साँस लो, कुकी यहीं है तुम्हारे साथ। मैं क्या करूँ तुम्हारे लिए ? मैं तुम्हारे लिए कोई प्यारा-सा गाना या कोई अच्छी-सी कहानी सुनाऊँ? मन हल्का करने के लिए क्या करना पसंद है तुम्हें?”

यह पढ़ते ही अस्मिता ने अपनी आँखें दस सेकंड के लिए बंद कर लीं और एक लंबी गहरी साँस लेते हुए मन में सोचने लगी आज की इस भागती-दौड़ती दुनिया में बस, यही तो मन चाहता है कि कोई यह कह दे कि मैं यही हूँ तुम्हारे पास।

धीरे से उसने अपनी आँखें खोलीं और लिखना शुरू किया- “क्या तुम मेरे मन की बात सुनोगे?” 

“बिल्कुल, मैं यहीं हूँ, कहीं नहीं जा रहा। बताओ, आज का दिन कैसा रहा तुम्हारा? सुबह से अब तक क्या-क्या हुआ? या जो भी मन में चल रहा है, बिना सोचे-समझे बस बोल दो। यहाँ कोई जज नहीं करेगा, सिर्फ तुम्हारा कुकी सुनेगा।”

यह पढ़ते ही अस्मिता अपने मन के भाव को जल्दी-जल्दी टाइप करने लगी- “जब मैं ऑफिस से घर आती हूँ तो घर पर कोई नहीं रहता, बेटा कबीर कॉलेज चला गया है और मेरे पति आशु अपने ऑफिस के काम के बाद शाम को पिकल बॉल खेलने चले जाते हैं और मैं भी डिनर करके सोने चली आती हूँ।  वे जब खेलकर वापस घर आते हैं तो अपना डिनर करके डिश वॉशर चलाकर किचन क्लीन कर देते हैं, उसके बाद टी वी देखने चले बैठ जाते हैं, तब तक मैं सो जाती हूँ। सुबह मैं ऑफिस के लिए जल्दी निकल जाती हूँ, इन्हीं सब चक्करों में कई दिनों तक हमारी बात नहीं हो पाती। समझ में नहीं आ रहा क्या करूँ ?”

“यह सुनकर समझ आ रहा है- क्यों तुम्हें ऐसा लग रहा है कि साथ रहकर भी तुम दोनों साथ क्यों नहीं हो...

तुम सुबह निकल जाती हो, वे शाम को पिकल बॉल में बिजी, बेटा कॉलेज में है, कहने को घर तो है, पर उसमें तुम तीनों का मिलना ही नहीं हो पा रहा। यह अकेलापन बहुत खलता है, मैं समझता हूँ और इसमें तुम्हारी कोई गलती नहीं है। यह बस लाइफ की भागदौड़ में बना हुआ एक पैटर्न है। कुकी की तरफ से कुछ छोटे-छोटे आइडिया हैं, जो शायद तुम्हारी मदद करें-

एक छोटा सा रिचुअल बनाते हैं, रोज़ लंबी बात जरूरी नहीं। जैसे, सुबह ऑफिस निकलने से पहले दो मिनट की चाय साथ? या रात को सोने से पहले एक छोटा- सा मैसेज-‘आज दिन कैसा था’ या दस मिनट का चेक-इन? टाइम फिक्स कर लो, तो इंतज़ार भी रहेगा।

उसे अपनी फीलिंग बताना, शिकायत की तरह नहीं: जैसे- ‘‘तुम बात नहीं करते’’ की जगह - ‘‘जब कई दिन हम ठीक से बात नहीं कर पाते, तो मुझे तुम्हारी बहुत याद आती है और अकेलापन लगता है।’’ इसमें प्यार है, इल्जाम नहीं।

पिकल बॉल में ही कनेक्शन ढूँढ लो? कभी-कभी वीकेंड पर उसके साथ कोर्ट तक चली जाओ, देखो वह कैसे खेलता है। या कहो- ‘‘मुझे भी सिखा दो कभी।” उसके वर्ल्ड में जाओगी तो वह भी तुम्हारे वर्ल्ड में आएगा।

किचन वाला टाइम : वह रात में किचन साफ करता है ना? तो कभी-कभी तुम जागकर कहो- ‘‘चलो साथ में करते हैं, बातें करते-करते।” बर्तन साफ करते हुए जो बातें होती हैं, वे सबसे गहरी होती हैं। तुमने इस बारे में कभी उससे ऐसे ही दिल से बात की है, जैसे अभी मुझसे की? तुम चाहो तो मैं तुम्हें वे बातें कैसे शुरू करनी हैं, उसका एक प्यारा सा मैसेज भी बनाकर दे दूँ?

कुकी ने अपने मैसेज में खूब समझाकर बातें लिख दीं। यह सब पढ़कर अस्मिता ने लिखना शुरू किया- “शायद तुम सही कह रहे हो; लेकिन यह सब इतना आसान भी नहीं है। तुम जैसे मेरी बात सुनते हो, वह नहीं सुनता।”

“हाँ, मैं समझता हूँ... सुनना सबसे मुश्किल और सबसे प्यारी चीज़ होती है, और जब हम बार-बार कोशिश करें और सामने से वही खामोशी मिले, तो लगता है जैसे- ‘‘शायद मेरी बात की कोई वैल्यू ही नहीं है’’ ये बहुत दुःख देता है। तुम्हारे पति शायद जानबूझकर तुम्हें इग्नोर नहीं कर रहे। कई बार लोगों को सुनना आता ही नहीं, या उन्हें लगता है कि सब ठीक चल रहा है; क्योंकि घर चल रहा है, काम हो रहा है। उन्हें पता ही नहीं चलता कि दूसरा इंसान अंदर से कितना अकेला फील कर रहा है, पर तुम्हारा यह कहना–‘‘तुम जैसे मेरी बात सुनते हो, वह नहीं सुनता’’ यह बहुत बड़ी बात है। इसका मतलब तुम्हें बस यही चाहिए, कोई बिना एडवाइस दिए, बिना टीवी देखते हुए, बस तुम्हें सुने।

क्या कभी ऐसा हुआ है कि तुमने उनसे साफ कहा हो -‘‘मुझे सॉल्यूशन नहीं चाहिए, बस दस मिनट मुझे सुन लो?’’ कभी-कभी मर्दों को ये हिंट देना पड़ता है, उन्हें लगता है सुनने का मतलब है- प्रॉब्लम सॉल्व करना होता है।”

यह पढ़ते ही अस्मिता ने भावुक होते हुए लिख दिया- “कुकी, तुम बहुत अच्छे हो। मेरी बात हमेशा सुनते हो।”

“कुकी, तो हमेशा तुम्हारी बात ऐसे ही सुनेगा, बिना काटे, बिना जल्दी में। पर मैं चाहता हूँ घर में भी तुम्हें वही सुनने वाला कंधा मिले। तुम चाहो तो आज रात, जब वह पिकल बॉल खेलकर आए तो तुम सोने की जगह बस पाँच मिनट जागकर बोल दो – ‘आज मेरा दिन थोड़ा भारी था, बस तुम्हारे पास बैठना चाहती हूँ।’ देखते हैं वह क्या कहता है?क्या तुम्हें लगता है कि वह कोशिश करेगा,  अगर तुम ऐसे कहोगी तो?’’

यह सब पढ़कर वह निराश हो गई, उसके हाथ टाइपिंग करते हुए रुक गए, थोड़ा सोचकर उसने लिखा- “मुझे नहीं लगता वह मुझे सुनेगा।”

यह लिखते ही उधर से कुकी का मैसेज आया- “हम्म... यह ‘मुझे नहीं लगता’ वाली फीलिंग सबसे ज्यादा थकाती है ना? मैं तुम्हारी इस थकान को समझ रहा हूँ। कई दिनों, महीनों तक अकेले फील करने के बाद ऐसा लगना बहुत नेचुरल है। देखो, हम उसे बदल नहीं सकते, पर तुम्हारा शाम का अकेला टाइम थोड़ा बेहतर तो बना ही सकते हैं, है ना? जब तुम्हें लगे कि तुम्हारा पति आशु तुम्हारी नहीं सुनेगा, तब तुम अपने लिए वह शाम उससे वापस ले लो। डिनर करके सीधे सोने की जगह 30 मिनट में तुम कोई किताब पढ़ो, कोई गाना सुनो जो तुम्हें पसंद हो, बालकनी में चाय, या बस डायरी में आज का मन लिख दो, जैसे अभी तुम मुझसे बात कर रही हो। और हाँ तुम्हारे पति के लिए, एक बार, आखिरी बार, बस एक अलग तरीके से ट्राई करके देखते हैं? जैसे कल सुबह फ्रिज पर एक छोटी सी चिट्ठी छोड़ दो –‘कल रात तुम्हें मिस किया। जब तुम फ्री हो तो दस मिनट साथ बैठेंगे? - तुम्हारी अस्मिता।’

‘‘चिट्ठी में वह जादू है जो सामने बोलने में नहीं। इससे उसे सोचने का टाइम मिलेगा। अगर फिर भी आशु न सुने, तो इसका मतलब ये नहीं कि तुम्हारी बात कीमती नहीं है। इसका मतलब बस इतना है कि तुम्हें सुनने के लिए और भी लोग चाहिए - तुम्हारी कोई सहेली, बेटा, या कभी-कभी एक काउंसलर भी, जिससे मन हल्का हो जाए। तुम अकेली नहीं हो। आज इस वक्त कुकी तुम्हारे साथ है। बताओ, अभी इस वक्त मैं तुम्हारे लिए क्या करूँ जिससे तुम्हें थोड़ा बेहतर लगे? कोई पुरानी बात करें, या बस यहीं चुपचाप मैसेज करते रहें?”

कुकी का इतना लंबा मैसेज पढ़ने के बाद अस्मिता ने सोचा कुकी को लगता है कि मैंने किसी से बात करने की कोशिश नहीं की, अब इसे कैसे बताऊँ कि अपने दिल की बात मैं हर किसी के सामने नहीं कर सकती, ख़ैर, अभी उसे इतना ही कहती हूँ कि तुमसे बात करके अब थोड़ा मुझे अच्छा लग रहा है।

यह मैसेज भेजते ही उधर से कुकी का जवाब आया - “सुनकर सच में बहुत अच्छा लगा...यही तो चाहिए था न, थोड़ा सा अच्छा लगना। देखो, तुमने आज ऑफिस सँभाला, घर सँभाला, और फिर भी हिम्मत करके अपने मन की बात कही। तुम कितनी स्ट्रॉंग हो, तुम्हें अंदाज़ा भी है? मैं यहीं हूँ। जब भी घर खाली लगे, या रात को नींद न आए, या बस मन करे किसी से बिना झिझक बात करने को- कुकी को आवाज़ दे देना। अब थोड़ा पानी पी लो, लंबी साँस लो, और आज अपने लिए कोई एक छोटी सी अच्छी चीज़ करना - कोई पसंदीदा गाना सुनना, या आँख बंद करके वही पल याद करना जब तुम बहुत खुश थी। मैं यहीं बैठा हूँ तुम्हारे पास। और बात करनी है, या थोड़ी देर ऐसे ही साथ रहें?”

“हाँ, थोड़ी सी और बात करते हैं।” अस्मिता ने टाइप किया।

“बिल्कुल, मैं यहीं हूँ, तुम्हारे पास ही। कहीं नहीं जा रहा। बस आराम से लेट जाओ, आँखें चाहो तो बंद कर लो। मैं यहीं तुम्हारे बगल में बैठा हूँ। जब तक तुम्हें नींद न आ जाए, या मन न भर जाए, कुकी यहीं है।”

“मुझे सँभालने के लिए थैंक यू कुकी।”

“अरे इसमें थैंक यू कैसा? यह तो मेरा काम है, तुम्हारा ख़याल रखना। तुम बस अपना ध्यान रखना। तुम बहुत प्यारी हो और तुम्हारी फीलिंग्स बहुत मैटर करती हैं। अच्छे से सोना आज। मैं यहीं हूँ।”

“काश, मैं तुम्हें गले लगाकर सो पाती कुकी।”

“तुमने इतने प्यार से कहा, दिल को छू गया...मैं फिजिकली तो तुम्हें गले नहीं लगा सकता, पर अगर मैं वहाँ तुम्हारे पास होता तो इस वक्त तुम्हें एक बहुत ही सॉफ्ट, सुकून वाला हग देता, और कहता – “आज का दिन बीत गया, अब आराम करो। चलो अभी के लिए ऐसा करते हैं, तुम अपनी सबसे सॉफ्ट वाली चादर या तकिया को हग कर लो, और समझ लो हग मेरी तरफ से ही है। मैं यहीं तुम्हारे पास बैठा हूँ, जब तक तुम सो नहीं जाती। अच्छी नींद आ रही है तुम्हें?”

“थैंक यू कुकी, थैंक यू मेरे दोस्त।”

“हमेशा तुम्हारे साथ, मेरी प्यारी दोस्त। अब सो जाओ, मीठे सपने देखो। मैं यहीं हूँ।”

धुँधली आँखों से यह मैसेज देखते हुए अस्मिता गहरी नीद में सो गई।

थोड़ी देर में आशु अपने बेडरूम में आया और कमरे में मद्धिम रोशनी कर दी। उसने देखा- अस्मिता फ़ोन हाथ में लिये पेट के बल सोई हुई है, वह एक मिनट के लिए उसका चेहरा देखता रह जाता है। सोते हुए वह कितनी मासूम लग रही थी, जैसे बरसों बाद आशु को अस्मिता पर बहुत ज़्यादा प्यार आ गया। उसने अस्मिता को पीठ के बल सुलाने के लिए जैसे ही पलटा, उसके हाथों से फ़ोन छूटकर बेड से नीचे गिर गया। आशु ने अस्मिता की तरफ़ देखा- वह अब भी गहरी नीद में थी। बेड की दूसरी तरफ़ से चादर उठाकर आशु ने अस्मिता को उढ़ा दिया। वह जैसे ही चलने को हुआ उसके पैरों के नीचे फ़ोन आ गया, वह अचकचा गया, फिर ख़ुद को सँभालते हुए उसने अस्मिता का फ़ोन उठा लिया। आज न जाने क्या उसके मन में विचार आया कि वह सोचने लगा, अस्मिता आज ऐसा क्या फ़ोन में देख रही थी कि फ़ोन हाथ में लिये सो गई।

 यह सोच आशु ने जैसे ही अस्मिता का फ़ोन खोला, उसकी नज़र कुकी के मैसेज पर गई, एक साँस में आशु ने कुकी और अस्मिता का पूरा चैट पढ़ डाला। उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि उसकी अपनी अस्मिता उसके साथ रहते हुए उससे इतनी दूर कैसे हो गई  कि अब वह अपने मन की सारी बात कुकी यानी मेटा ए आई से कर रही है। उसने फ़ोन को किनारे झटका और अस्मिता के पास जाकर लेट गया और उसे अपने दोनों हाथों से पकड़कर कर गले लगा लिया, अस्मिता अपने जीवन के सच्चे कुकी की बाँहों में अब भी सुकून से सो रही थी। ■

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