December 12, 2019

लघु कथाएँ

 1- घर की लक्ष्मी
 - सुदर्शन रत्नाकर
   हमारी बुआ गाँव में रहती हैं। पहले तो हमारे पास शहर में रहने जाती थीं। इधर कई बरसों से नहीं पाईं। हममें से ही कोई तीज -त्योहार पर उनके पास चला जाता है। इस बार छुट्टियों  में मैंने जाने का मन बना लिया। शहरी जीवन की ऊब, अशांत वातावरण से दूर रहना चाहती थी। बुआ के घर जाना अच्छा लगा। एक पंथ दो काज। परिवर्तन भी हो जाएगा और मिलना भी। बुआ की बेटी मेरी हम उम्र है, वह भी अपने बच्चों के साथ रही थी।
 बुआ मेरे आगमन पर बहुत ख़ुश हुईं। घर में त्योहार जैसा माहौल बना रहता। कब दिन होता, कब रात ढलती, पता ही नहीं चलता। पर इस सारे ख़ुशी के माहौल में मुझे एक बात खटकती रहती। मुझसे या सुनीता  से कोई ग़लती हो जाती या हम काम नहीं करतीं, तो बुआ हमें तो डाँटती नहीं थीं। पर भाभी को बात- बात पर डाँट देतीं। कुछ दिन तो मैंने अनदेखी, अनसुनी कर दी ; लेकिन अब बुआ का डाँटना अखरने लगा था। भाभी भी हमारी हम उम्र हैं , वह भी तो किसी की बेटी हैं। बुआ को ऐसा नहीं करना चाहिए। मन में कुछ चुभता रहता था; पर मैं कुछ कह भी नहीं सकती थी। उनका निजी मामला था। भाभी डाँट खाकर भी ख़ुश रहती। काम में जुटी रहतीं। समय निकाल कर हमारे पास भी बैठ जातीं।
 एक सप्ताह कब समाप्त हो गया, पता ही नहीं चला। विदाई का दिन भी गया। बुआ ने कई उपहार मुझे दिए। उनका स्नेहिल  व्यवहार  बहुत अच्छा लगा लेकिन एक कसक, एक टीस-सी मन में थी कि ऐसी स्नेहिल बुआ अपनी बहू को इतना डाँटती क्यों हैं?
   चलने लगी तो बुआ ने गले लगा लिया। मैं अपने मन की बात छुपा नहीं पाई और बुआ से पूछ ही तो लिया-"बुआ ग़लती तो हम करती थीं; पर आप हमें ना डाँटकर केवल भाभी को ही क्यों डाँटती हैं।"
     बुआ बोलीं,"तुम मेरी बेटियाँ हो; पर हो तो पराई। तुम दोनों को क्या डाँटती और क्या काम करवाती। बहू तो मेरी अपनी है, इस घर की लक्ष्मी है। तुम दोनों से इस पर परम्परागत अधिकार अधिक है। जिस पर अधिकार होता है, उसी को तो डाँटा जाता है।" भाभी मुस्कुरा रही थीं।
2- शुद्ध जात
    माँजी मेरे पास रहने के लिए रही  थीं। उनको नहलाना- धुलाना, घुमाना, कपड़े लत्ते, खाना सब काम मुझे ही करने होंगे। थोड़ा कठिन लगा। इसलिए मैंने मेड ढूँढनी शुरु कर दी। पर मिली ही नहीं। तभी पता चला गली के सफ़ाई कर्मचारी की पन्द्रह-सोलह वर्ष की लड़की है। उससे बात की तो वह उसे काम पर भेजने के लिए तैयार हो गया। मैंने उसे समझा दिया कि वह किसी को बताइएगा नहीं कि उसकी बेटी यहाँ काम करती है। माँजी को तो बिलकुल ही पता नहीं चलना चाहिए।
   राधा माँजी के सारे काम पूरे मन से करती। उन्हीं के कमरे में सोती थी। माँजी ख़ुश थीं और मैं निश्चिंत।
   कई महीने निकल गए। एक दिन मैं घर पर नहीं थी। उस दिन राधा का भाई घर पर गया। कोई रिश्तेदार आए थे और उसकी माँ ने उसे घर बुलाया था। उसके भाई से माँजी को पता चल गया कि राधा कौन जात की है। मैं माँजी के सामने जाने से डर रही थी कि उनकी क्रोधाग्नि का सामना कैसे कर पाऊँगी। वह ठहरी जात- पात, छुआ-छूत में  विश्वास रखने तथा नित्य नियम करने वाली महिला।
   उन्होंने मुझे बुलाया । मैं डरते -डरते उनके पास गई। उन्होंने पूछा,"बहू, तुम जानती थी कि राधा कौन जात है।
" जी माँजी" मैंने संक्षिप्त सा उत्तर दिया"
"कोनो बात नहीं बहू, जब अपने सेवा कर सकें तो परायों की कौन जात, जो सेवा करे वही शुद्ध जात।
 3- ख़ुशबू
टिकिट लेने के लिए जैसे ही मैंने अपने हैंडबैग में हाथ डाला मेरा पैसों वाला पर्स उसमें से ग़ायब था । सारा बैग अच्छी तरह से देख लिया; लेकिन वहाँ था ही नहीं तो मिलता कहाँ से। घर से चलते हुए इसमें रखा ही नहीं था या फिर बस में चढ़ते समय किसीने निकाल लिया होगा। मेरी समझ में कुछ नहीं रहा था। एक तो सीट पर गाँव का कोई आदमी बैठा था, उसके मोटे कपड़ों से पसीने की गंध मेरे नथुनों में घुसकर सिर को चकरा रही थी, उस पर यह मुसीबत। स्वयं पर कोफ़्त हो रही थी। लम्बा सफ़र और उस पर पैसे नहीं। सोचा बस रुकवाकर उतर जाना ही मुनासिब होगा। एक बार फिर बैग में हाथ डाला। कुछ सिक्के खनकने लगे। उसमें झाँककर देखा काग़ज़ों के साथ एक- दो नोट भी नज़र आए। थोड़ी- सी आशा बँधी। तभी देखा- सहयात्री मेरी हर हरकत पर नज़र रख रहा है। मैंने उसकी ओर क्रोध से देखा तो वह अटपटा गया और खिड़की से बाहर देखने लगा।
    मैंने बैग में से नोट और सिक्के निकाल कर देखे, उनतालीस रुपये थे। संयोग था कि मेरी टिकट भी इतने की थी। मैं इत्मीनान से कंडक्डर का इंतज़ार करने लगी। सोचा -बस से उतर कर रिक्शा कर लूँगी और किराया घर जाकर दे दूँगी। सुबह ही पता चला था कि माँ ठीक नहीं है। जल्दी- जल्दी चलने के कारण सब कुछ गड़बड़ा गया था। इधर यात्री के पसीने की गंध मुझे और परेशान कर रही थी एक हथेली में पैसे रख कर दूसरे हाथ से अपना रुमाल नाक पर रख लिया था कितने  ज़ाहिल हैं ये लोग। अच्छी तरह नहाते- धोते  हैं, कपड़े बदलते हैं। सफ़र में दूसरे यात्री का ध्यान तो रख लेना चाहिए। मैं मन ही मन कुनमुना रही रही थी । कंडक्डर पीछे से टिकट देकर मेरी सीट तक पहुँचा था मैंने  उनताली रुपये देकर टकट माँगा।
"कहाँ का टिकिट चाहिए मैडम।"
 " उन्तालिस रुपये तो पानीपत तक के लगते हैं। वहीं का दीजिए न।" मैंने तल्ख़ी से कहा
 " मैडम सात रुपये और दें।"
 " सात रुपये और कैसे! उनतालीस ही तो लगते हैं । पिछली बार इतने ही दिए थे।"
 " वह पिछली बार की बात है मैडम। अब छियालिस लगेंगे। किराया बढ़ गया है।" कडंक्टर ने कहा। मेरी आवाज़ सुन कर सभी यात्री मेरी ओर देखने लगे।
"पर मेरे पास तो इतने ही पैसे हैं।" मैंने रुआँसी-सी होकर कहा
  " तो ऐसा कीजिए मैडम उनतालिस रुपये की टिकिट दे देता हूँ। वहाँ तक चली जाएँ, बाक़ी रास्ता पैदल चली जाएँ।"
      सभी यात्री हँसने लगे पर कोई सहायता के लिए आगे नहीं   रहा था। मैं शर्मिंदगी से ज़मीन में धँसी जा रही थी। समझ में नहीं रहा था कि क्या करूँ। तभी मेरे साथ बैठे यात्री ने अपनी जेब से दस रुपये का नोट निकाल कर कडंक्टर को देते हुए कहा,"ईब चुप भी हो जा, ले बाक़ी के पीसे और मैडम को टिकट काकर दे दे।"
       मैं उसे मना करने ही जा रही थी कि उसने हाथ के इशारे से रोकते हुए कहा," कोनो बात नहीं बैन जी मानस ही तो एक दूसरे के काम आवे है।"
  कडंक्टर ने टिकिट और तीन रुपये मेरे हाथ में थमा दिए। मैं कृतज्ञता से सहयात्री  को देख रही थी।
  मुझे अब उसके कपड़ों से पसीने की बदबू नहीं,  ख़ुशबू आ रही थी।
        4- द्वन्द्व
      मेरे पासपोर्ट की नियत तिथि समाप्त होने वाली थी इसलिए नवीनीकरण करवाना आवश्यक था। दो चक्कर पहले लगा चुकी थी, आज तीसरी  बार फिर आना पड़ा। पहले काउण्टर पर लम्बी लाइन थी। वहाँ की औपचारिकाताएँ तो पूरी हो गईं; पर दूसरी पंक्ति इससे भी लम्बी थी। अभी तो तत्काल के अन्तर्गत पासपोर्ट बनवा रही थी  साधारण  दशा में पता नहीं क्या हाल होता। थकावट हो रही थी; इसलिए पंक्ति के पीछे रखी बेंच पर आकर बैठ गई।
    थोड़ी देर में वॉकर के सहारे चलती हुई एक वृद्धा मेरे साथ आकर बैठ गईं। वॉकर उन्होंने एक ओर रख दिया। उनकी साँस फूली हुई थी  हाथ काँप रहे थे और बैठने में भी कठिनाई हो रही थी। ऐसी दशा में बेचारी पासपोर्ट बनवाने आई है। कोई विवशता तो रही होगी। सहज होते ही वह विवशता उन्होंने स्वयं ही बता दी।उनकी आयु नब्बे वर्ष है। पिछले मास ही उनके पति का देहांत हो गया था। बेटा विदेश में रहता है। कई वर्षों बाद पिता की मृत्यु का समाचार पाकर वह आया है। अब वह पैतृक मकान बेच कर वापस जाना चाहता है। वृद्धा पति के देहांत के बाद अकेली हो गई है। बेटा चाहता है वह यहीं वृद्धाश्रम में रह जाए; लेकिन वह तैयार नहीं हुई। उसका कहना था कि या तो वह अकेली रहेगी या उसके साथ जाएगी। बेटा उसे साथ ले जाने के लिए तैयार हो गया है। इसीलिए पासपोर्ट बनवाने के चक्कर में आई है।"
    वह वृद्धा भाग्यशाली थी, जिसका बेटा मकान बेचने के लालच में ही सही उसे साथ ले जाने के लिए तैयार तो हो गया था। मेरी आँखों के समक्ष वृद्धाश्रमों या घर में अकेले जीवनयापन करने वाले वृद्धों के चेहरे गये जो संतान का मुख देखने के लिए अंतिम साँस तक प्रतीक्षा करते हैं।

सम्पर्कः  ई-29, नेहरु  ग्राउण्ड, फ़रीदाबाद 121001, मो. 9811251135

1 Comment:

प्रीति अग्रवाल said...

सुदर्शन जी आपको बधाई! सभी लघुकथाएं अच्छी लगी, विशेषतः शुद्ध जात।

एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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