November 12, 2019

व्यंग्य

ना जी ना! मैं लिखना नहीं छोड़ूँगा
- विनय कुमार पाठक
मैं बहुत दु:खी तो नहीं हूँ पर दु:खी हूँ जरूर। अपने दुख से दु:खी नहीं हूँ। सामान्य तौर पर लोग अपने दुख से दु:खी नहीं होते दूसरे के सुख से दु:खी होते हैं। परंतु मैं उनके सुख से भी दु:खी नहीं हूँ जैसा कि आमतौर पर होता है। मुझे इस बात की भी चिंता नहीं है कि मेरे दु:खी होने की बात सुन कर वे खुश होंगे, रहीम जी की शैली में- सुनिअठिलहैं लोग सब...। मैं दु:खी हूँ उनके दुख से। आपको आश्चर्य तो जरूर होगा कि कोई मनुष्य दूसरे के दु:ख से दु:खी कैसे हो सकता है पर यह है सत्य।
हुआ यूँ कि गलती से मेरी एक रचना छप गई एक पत्रिका में। इस कारण से नहीं छपी कि मैं अच्छा लिखता हूँ, इस कारण से छप गई कि पत्रिका को कुछ नौसिखुओं को मौका देना था। संयोग से दूसरी रचना भी छप गई और जिस पत्रिका में छपी उसी की समीक्षा करने का मौका मिल गया और समीक्षा एक ऐसे पत्र में छप भी गई जिसका प्रसारण बहुत ज्यादा नहीं है। पर बुरा हो फेसबुक का। फेसबुक पर तो लोग जनम से मरण तक की सभी खबरें अपलोड करते हैं। सो मैंने भी इस समीक्षा की खबर मयस्क्रीनशॉटफेसबुक पर अपलोड कर दी। दो चार लोगों ने उसे लाइक भी कर दिया और व्यक्तिगत रूप से परिचित लोगों ने तारीफ में टिप्पणी लिखने की औपचारिकता भी कर दी। वैसे यह जगजाहिर है कि न तो लाइक करने वाले आपकी पोस्ट को पढ़ते हैं न ही टिप्पणी करने वाले। बस इस हाथ दे उस हाथ ले की शैली में एक दूसरे की पोस्ट को लाइक करने की प्रथा है इस फेसबुकिया संसार में। और टिप्पणी दो कारणों से की जाती है। पहला किसी दीन-हीन पोस्टकर्ता पर दया करके। दूसरे किसी पोस्टकर्ता से भविष्य में लाभ प्राप्त करने की प्रत्याशा में।
बस यहीं से जनाब दु:खी हो गए। दु:खी मन से उन्होंने टिप्पणी की कि ऐसे-ऐसे समीक्षक हो गए हैं जो लेखनकला से हीन लेखकों की तारीफ कर रहे हैं। उनके इसी दुख से मैं दु:खी हूँ और सोचता हूँ कि लिखना छोड़ ही दूँ। वैसे भी लिखने से ज्यादा से ज्यादा दो हजार रुपये की आमदनी सलाना हो पाती है। वैसे जो जनाब  दु:खी हैं वे भी बहुत बड़े लेखक, विचारक, समीक्षक आदि नहीं हैं, इसमें मुझे तो जरा भी भ्रम नहीं है। कुछ लोगों को शक भी है कि वे बड़े तो क्या साधारण भी नहीं है। एक ने तो उनकी तुलना उस फलहीन वृक्ष से कर दी जो खुद तो फल नहीं दे पाया और दूसरे फलदार वृक्षों को ईर्ष्या की निगाह से देखता है। बस जनाब लेखन दुनिया के एक बड़े हस्ताक्षर के संबंधी अथवा परिचित हैं और इसी कारण थोड़ी सी कृत्रिम साख है उनका लेखन की दुनिया में।
उनके दुख से द्रवित हो कर, उसी प्रकार जैसे अंतर्मन की पुकार सुन प्राय: नेताजी दल बदलते हैं, लेखन से पलायन की सोचता तो हूँ; पर एक दो खयाल आते हैं मन में और फिर पलायन का खयाल मेरे दिल से पलायन कर जाता है। जो बातें खयाल में आती हैं वे निम्नवत हैं-
जैसे हुजूर के विशाल बरगदीय लेखन व्यक्तित्व के सामने मैं बोंसाई हूँ (सिर्फ कद में, सौंदर्य की बात नहीं कर रहा) वैसे ही विराट कोहली के विराट खेल के सामने भी मैं पिद्दी ही हूँ क्योंकि क्रिकेट मैं अपने घर के बाउंड्री-वाल के अंदर ही खेलता हूँ जहाँ बॉल के बाउंड्री- वाल के बाहर जाने पर चौका नहीं लगता बल्कि खिलाड़ी आउट हो जाता है। अब यदि विराट कोहली मेरे इस टूच्चे खिलाड़ीपन पर दु:खी हो जाए तो क्या मैं बाउंड्रीवाल के अंदर क्रिकेट खेलना बंद कर दूँ?
पत्नी के घर से बाहर जाने पर, सालभर में एक दो दिन ही सही, कभी कभार मैं खाना बना लेता हूँ। खाना क्या बनाता हूँ किसी प्रकार चावल उबाल लेता हूँ और जैसे तैसे सब्जी बना लेता हूँ और सबसे बड़ी बात है कि उसे खा लेने की हिम्मत भी रखता हूँ। अब किचन से ज्यादा टीवी पर खाना बनाने वाले, सभ्य अर्थात अंग्रेजी भाषा में बोले तो शेफ, संजीव कपूर यदि आहत हो जाएँ कि कैसे-कैसे लोग कैसा-कैसा खाना बनाते हैं तो क्या मैं यदा कदा खाना बनाना सर्वदा के लिए छोड़ दूँ?
और मेरे बेसुरे गाने को सुन अरिजीत ठुनकने लगे तो क्या मैं बाथरूमसिंगिंग छोड़ दूँ? ना जी ना मैं नहीं छोड़ने वाला कुछ। हुजूर की तो दु:खी होने की आदत हैं। उनकी निगाह में उनके गुरुजन, वे खुद और उनके शिष्यों के अतिरिक्त कोई भी लिखने का हक नहीं रखता। उनके गूट वाले लिखते हैं तो साहित्य की सेवा होती है और दूसरे लिखते हैं तो जिस विधा में लिखते हैं उस विधा का सत्यानाश कर रहे होते हैं। वे तो किसी के किसी पद पर चयनित होने पर रूठ जाते हैं, किसी के पुरस्कार पाने पर ठुनकने लगते हैं। एक ज्ञानपीठ पुरस्कार के विजेता को तो उन्होंने यहाँ तक कह दिया कि अगर आपके संबंधी ज्ञानपीठ पुरस्कार समिति में नहीं होते ,तो आपको ज्ञानपीठ तो क्या अज्ञानपीठ पुरस्कार भी नहीं मिलता। रूठने दें हुजूर को। रानी रूठेगी तो क्या होगा? किस- किस को रोइए किस किस को जानिए लेखन बड़ी चीज है कलम तोड़ कर लिखिए।

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