October 14, 2019

तीन लघुकथाएँ

1- फ़र्ज़
-डॉ.नीरज सुधांशु  
उम्र होते ही माँ-बाप ने तो ‘लड़का डॉक्टर है’,यह जान कर ही शादी कर दी थी। तब लड़कियों से पूछने का चलन ही कहाँ था।
शादी के बाद शुरू में तो पति अपने छोटे से दवाखाने में देसी इलाज कर थोड़ा बहुत पैसा जुटा लेते थे, पर विभिन्न तरह के प्रयोगों की सनक ने उन्हें कहीं का न छोड़ा। कभी दूध के साथ हरी मिर्ची का प्रयोग, कभी केवल दूध का सेवन तो कभी स्वमूत्र का सेवन, ऐसे ही अनेक प्रयोग वे स्वयं पर ही करते।
दुकान तो धीरे-धीरे बंद हो गई पर सनक बढ़ती ही गई।घर खर्च चलाना भी मुश्किल हो गया।आखिरकार घर चलाने के लिए सविता को बाहर निकलना ही पड़ा। किस्मत से सरकारी स्कूल में नौकरी लग गई व दुगुनी ज़िम्मेदारी आ गई उसके कंधों पर। फिर भी कभी उफ्र न की उसने। अपना कर्तव्य मानकर निभाती चली गई।
अपनी अनेक छोटी-बड़ी इच्छाओं को दबाकर जो मिला उसी में संतुष्टि का अहसास करते हुए जीवन धारा में बहती रही। आज रिटायरमेंट के बाद वही घर का रास्ता कुछ ज़्यादा ही लम्बा हो गया था। पैर अपनी गति से आगे चल रहे थे व मन कहीं वर्षों पीछे भटक रहा था।
घर की चौखट पर कदम रखते ही चलचित्र की भांति चल रही अब तक के जीवन की रील अपनी फिरकी पूरी कर झटके से थम गई व उसे कुछ बोझ हलका होने का आभास हुआ।
आते ही पर्स एक ओर पटक कर आराम से चाय बनाकर बैठी ही थी चुस्कियों का आनंद लेने कि पति की बातों ने जैसे चाय में ज़हर-सा घोल दिया, फ्मैं चाहता था कि तुम बहुत नामी शिक्षक बनो, किताबें लिखो, अवार्ड पाओ। कुछ हद तक तो तुम सफल हुई हो पर पूरी तरह नहीं।”
सुनकर सुन्न-सी हो गई सविता।
मैं भी चाहती थी कि मेरा पति भी कुछ काम करे, इतने बड़े-बड़े न सही, कम-से-कम अपनी पत्नी व बच्चों का खर्च तो उठाए, जो कि तुम्हारा फ़र्ज़ भी था।”
2- कुदरत की नैमत
गुप्ता जी का पालतू कुत्ता टॉमी, जब भी गले में चमचमाते पट्टे व जंजीर के साथ घूमने निकलता तो उसका सामना रोज़ ही मोती व अन्य गली के कुत्तों से होता। वो उन्हें मुँहचिढ़ाता, हिकारत भरी नज़रों से देखता, नाक -भौं सिकोड़ता हुआ शान से गरदन उठा कर चलता। गली के कुत्तों को उसकी ये हरकत नागवार गुज़रती।
एक दिन जैसे ही वो घर से निकला, सबक सिखाने के इरादे से मोती व अन्य कुत्तों ने उसे घेर लिया।
मोती ने पूछा, फ्क्यों रे! ऐसा क्या है तेरे पास, जो तू इतना इतराताफिरता है?”
टॉमी ने मूँछों पर ताव देते हुए कहा, देखो! मैं कितनी शान से रहता हूँ। बढ़िया-बढ़िया खाता हूँ, मखमली बिस्तर पर सोता हूँ।”
तो इसमें कौन-सी बड़ी बात है। खुश तो हम भी रहते हैं, अच्छा ही खाते हैं, पाँव पसार कर सोते भी हैं।”कालू ने जवाब में पूँछ अकड़ा कर कहा।
तुम क्या जानो, घर के लोग मुझसे कितना प्यार करते हैं, मालकिन अपने बेटे की पिटाई करती हैं, पर मुझे बड़े प्यार से रखती हैं।”
तुझे तो एक मालकिन ही प्यार करती हैं, हमें तो सारा मोहल्ला प्यार करता है।”भूरे ने मूँछों को ताव दिया।
मैं वफादारी से उनके घर की चौकीदारी करता हूँ। दो वक्त बाहर घूमने भी जाता हूँ। है तुम्हारे पास मेरे जितनी सुविधाएँ?”
अब जवाब देने की बारी मोती की थी।
मोती ने भी मूँछों को ताव दिया और बोला, देखोटॉमी! वफादारी से हम भी सारे मोहल्ले के लोगों के घरों की देखभाल करते हैं। जब चाहे, जहाँ चाहे घूम भी लेते हैं। जो-जो तुम्हारे पास है, वो सब कम या ज़्यादा हमारे पास भी है। हाँ! बस एक चीज़ नहीं है हमारे पास और उसका न होना ही कुदरत की सबसे बड़ी नैमत है।”
टॉमी ने आँखें फाड़ते हुए पूछा, वो क्या?”
मोती ने गरदन उठाकर शान से कहा,-“गले का पट्ठा !”
3-अपेक्षा
‘‘रीमा, तुमने नीलेश को फोन कर दिया था न तत्काल में रिज़र्वेशन कराने के लिए?’’ सुमित ने नाश्ते की प्लेट अपनी ओर सरकाते हुए पूछा।
‘‘जी, उसी के फोन का इंतजार कर रही हूँ। रिज़र्वेशन मिल जाए ,तो अच्छा है, आशा मेरे बचपन की सहेली है, उसके बेटे की शादी में जाने का बहुत मन है मेरा, उसने भी
बहुत ज़ोर देकर आग्रह किया था। फिर हमारे यहाँ भी तो आई थी न वो शादी में, तो जाना तो जरूरी-सा है।’’ -चाय का सिप भरते हुए रीमा ने कहा।
ट्रीन-ट्रीन कर फोन बज उठा। बड़े उत्साह से रीमा ने फोन उठाया, ‘‘हाँ बेटा क्या रहा रिज़र्वेशन का?’’
‘‘सॉरीमाँ,नहीं मिल पाया।’’
‘‘ठीक है बेटा, कोई बात नहीं। कोई बात नहीं। कोई जाना ऐसा ज़रूरी भी नहीं था।’’ कहकर उसने फोन काट दिया।
पर सुमित से उसके मनोभाव छिप न सके। मुँह नीचे करके वह नाश्ता करने लगी।
‘‘ट्रेन में नहीं मिला टिकट तो प्लेन से कराने को कह देतीं।’’
‘‘नहीं, क्यों कहती?’’
‘‘आखिर बेटा है हमारा वह। हमारा अधिकार है उस पर।’’
‘‘तो, उसका भी फर्ज़ बनता था, वह भी तो कह सकता था न!’’ कहते हुए रीमा की आवाज भर्रा गई।
‘‘लाओ फोन दो, मैं ही कह देता हूँ।’’उसे सुबकते हुए देखकर सुमित से रहा नहीं गया।
‘‘नहीं, कसम है आपको मेरी, आप भी नहीं कहेंगे कुछ’’ रीमारुआँसी-सी लगभग फोन उठा कर पटकने को ही थी कि फोन फिर घनघना उठा।
‘‘माँ, मैंने आपका प्लेन का टिकट करा दिया है, आप प्रिन्ट आउट निकाल लेना और ध्यान से जाना।’’ उधर से आवाज़ आई।
‘‘आँखों में आँसू व होठों पर मुस्कान का मिलन देख सुमित ने मुस्कराते हुए मिठाई उसी ओर बढ़ा दी।
सम्पर्कः सरलकुटीर,आर्यनगर, बिजनौर-246701, niraj­_61@yahoo.com

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