August 18, 2018

कहानी

 उजली धूप 
 – सुदर्शन रत्नाकर
"माँ"
" हूँ"
" सर्दी लग रही है।" सबसे छोटे ने कहा
रधिया ने लिहाफ़ थोड़ा खींच कर छोटे की तरफ़ कर दिया। वह सो गया।
थोडी देर बाद बड़े ने पुकारा, "माँ"
" क्या है?"
"सर्दी लग रही है।"
उसने मँझले को दूसरी ओर करके बड़े को अपने पास कर लिया। वह भी सो गया। रधिया को भी झपकी गई। मँझला ठिठुरने लगा। उसने धीरे से पुकारा, "माँ, मुझे सर्दी लग रही है।"
अब की बारी रधिया की थी। वह बीच में से उठ गई। तीनों पर पूरी तरह से लिहाफ़ डाल कर वह स्वयं किनारे हो गई। अपने पाँव अंदर करके उसने बच्चों के ऊपर रख दिए।थोडी देर ऐसे ही बीत गई लेकिन आज की सर्दी उसे सोने नहीं दे रही थी। बाहर आसमान में गहरे ,काले बादल छा रहे थे जो ठहर -ठहर कर गरजने लगते। तेज़ हवा के कारण झोंपड़ी के दरवाज़े पर टँगा टाट उड़ कर उससे टकराता और उसका सारा शरीर सिंहर उठता। एक ओर तीनों बच्चे एक दूसरे से चिपक कर सो रहे थे और दूसरी ओर गठरी बना, छलनी -से कम्बल में लिपटा हरिया अपनी टाँगों को छाती से सटाने की कोशिश में बार -बार काँप उठता।
रधिया की टाँगों की गर्मी उसके सारे शरीर को गर्मी नहीं पहुँचा रही थी। वह लिहाफ़ को खींच कर थोड़ा-सा अपनी ओर करती, वह फिर उतर जाता। उसे लगा, उसका सारा बदन अकड़ता जा रहा है।,इतनी सर्दी में नींद में नहीं रही थी। वह उठकर बैठ गई।बच्चों पर पूरा लिहाफ़ डाल दिया। अँधेरे में ही टटोल कर पहनने के दो-चार कपडे उसने अपने ऊपर डाल लिए। सिर घुटनों में छुपा कर वह बैठ गई।अपनी ही साँसों से उसे थोडी गर्मी मिली।हरिया ने करवट ली। अपने बदन से गर्म हुई जगह से वह ठंडी जगह पर गया। ऊपर से सर्दी, नीचे से सर्दी।उसकी नींद उचट गई।
रधिया ने पूछा," नींद नहीं रही का?"
हरिया भी उठकर बैठ गया।
" आज तो बादल थमने का नाम ही नहीं ले रहे" रधिया ने कहा।
" आज शाम से इतने ही ज़ोर से तो बरस रहा है" हरिया ने जैसे ही कहा, एक ज़ोर का झोंका सारी झोंपड़ी को अंदर से गीला कर गया।
छलनी हुआ कम्बल, कपडे सब गीले हो गए। पानी धीरे-धीरे अंदर आना शुरु हो गया। रधिया ने बच्चों को उठा कर एक कोने में कर दिया।स्वयं भी दुबक कर एक ओर बैठ गई।
" एक लिहाफ़ और हो तो कितना अच्छा हो।सब सुख से सो लें।"- रधिया ने कहा
" सोच तो पिछले बरस से रहा हूँ। पर तीन-चार सौ से कम में बनता नहीं और इतना रुपये तो तुम जानत ही हो कहाँ से इक्ठ्ठे होवें।फिर अब तो सर्दी है ही कितने दिन।बस दस-बीस दिन।निकल ही जावैगी रधिया। पता ही नहीं चालेगा"
कहते हुए हरिया ,रधिया के साथ सट कर बैठ गया।
वर्षा और भी तेज़ हो गई। तेज़ बौछार के छींटों से तो उन्होंने स्वयं को बचा लिया था लेकिन झोंपड़ी से रिस-रिसकर आते पानी से वे  अपने को नहीं बचा पा रहे थे। पानी की बूँदें टपक -टपक कर लिहाफ़ को भिगोए जा रही थीं।रधिया ने तीनों बच्चों को उठा दिया। मँझला आँखें मलते लुढ़क रहा था और छोटा रोने लगा।
पूरी झोंपड़ी में कोई भी स्थान नहीं बचा था, जहाँ वे बैठ सकते ।सर्दी से उनके दाँत बजने लगे।
बड़े ने कहा," माँ आग ही जला दे न।" पर लकड़ी कहाँ थी। वह भी सब बाहर पड़ीं गीली हो रही थीं।
रधिया ने दियासलाई जलाई। डिब्बे में दो-चार काग़ज़ पड़े थे वह भी जला दिए। उससे गर्मी क्या मिलती। हाँ ,सारी झोंपड़ी रोशनी से अवश्य भर गई।
बिजली चमक रही थी। पानी अब भी बरस रहा था लेकिन थोड़ा कम।लगता था थोडी देर में सब शांत हो जाएगा। नीचे टाट और ऊपर अधगीला लिहाफ़ डाल कर रधिया ने तीनों बच्चों को फिर से सुला दिया। स्वयं उनीदीं आँखों से हरिया के साथ सटकर बैठ गई। एकाध बार झपकी भी गई और जब आँख खुली तो वर्षा थम चुकी थी। पूरा आसमान साफ़ था। तेज़ ठंडी हवा के साथ उजली धूप भी थी। रात का सारा कालापन उसने निगल लिया था।
सारा बदन अकड़ गया था उसका। लकड़ी हुई टाँगो को सीधा कर वह बैठ गई। हरिया और बच्चे भी उठ गए। सब कुछ पूर्ववत् होने लगा।दोनों को काम पर जाने की जल्दी थी। बच्चे उजली धूप में रात की सर्दी को भूल गए। इस उजली धूप में उनका भविष्य छुपा था, पता नहीं गहरा काला या धूप जैसा उजला।
सम्पर्कः-29, नेहरू ग्राँऊड , फ़रीदाबाद 121001
मो. 9811251135
E-mail- sudershanratnakar@gmail.com

0 Comments:

एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

-0-

लेखकों सेः उदंती.com एक सामाजिक- सांस्कृतिक वेब पत्रिका है। पत्रिका में सम- सामयिक लेखों के साथ पर्यावरण, पर्यटन, लोक संस्कृति, ऐतिहासिक- सांस्कृतिक धरोहर से जुड़े लेखों और साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे कहानी, व्यंग्य, लघुकथाएँ, कविता, गीत, ग़ज़ल, यात्रा, संस्मरण आदि का भी समावेश किया गया है। आपकी मौलिक, अप्रकाशित रचनाओं का स्वागत है। रचनाएँ कृपया Email-udanti.com@gmail.com पर प्रेषित करें।

उदंती.com तकनीकि सहयोग - संजीव तिवारी

टैम्‍पलैट - आशीष