March 24, 2018

कहानी

भीड़ का हिस्सा 
 - सुदर्शन रत्नाकर
लम्बे- लम्बे क़दम रखते हुए वह शीघ्रता से सडक़ पर आ गई। रात के नौ बजे थे। पर सर्दी का मौसम होने के कारण लोग कम थे। बस स्टॉप पर भी तीन चार यात्री खड़े थे। पन्द्रह मिनट बीत गए, परन्तु अभी तक बस नहीं आई थी। उसकी परेशानी बढ़ गई। बॉस ने उसे घर छोडऩे के लिए कहा भी था। पर उसने इन्कार कर दिया था। रात के समय यूँ उनके साथ अकेले जाना उसे ठीक नहीं लगा। भले ही उन्हें एक साथ काम करते कितने बरस हो गए हैं लेकिन उसकी सोच ने मना करना ही उचित समझा था। वह ऑफ़िस से समय पर निकल आती है। कभी -कभी देर हो जाती है पर इतना नहीं। आज तो विशेष रूप से मि. आनन्द ने उसे रुकने के लिए कह दिया था। साढ़े पाँच बजे ऑफ़िस बंद होता है, आज उसे काम निपटाते हुए छह बज गए थे। वह बाहर निकल ही रही थी कि वेदपाल उसे बुलाने आ गया था।
मि. मनीष आज छुट्टी पर थे। वह उनके साथ ही नए प्रोजेक्ट पर काम कर रही है, उसी सिलसिले में बॉस ने उसे बुलाया था और कब इतना समय हो गया उसे पता ही नहीं चला।
बस अभी तक नहीं आई थी। उसे घबराहट होने लगी। घर पर उसने फ़ोन तो कर दिया था, पर इतनी देर नहीं होनी चाहिए। संयता को दो दिन से बुखार है। आज वह उसे ऑफ़िस भी नहीं आने दे रही थी। मम्मा, आज मत जाओ, मेरे पास रुक जाओ न प्लीका।लेकिन वह उसकी प्लीकाको अनसुना करके आ गई थी। ऑफ़िस पहुँचने तक उसका मन खऱाब रहा। संयता की आवाज़ उसके कानों में गूँजती रही थी। लेकिन काम में व्यस्त हो जाने के बाद वह जैसे भूल ही गई थी, और अब तो इतनी रात हो गई है। पता नहीं वह कैसी होगी। सृजना की परीक्षाएँ हो रही हैं। शाम के समय वह उसे पढ़ाती है। आज उसने तैयारी भी की होगी कि नहीं। पहले ही वह पढ़ाई में पिछड़ रही है। पिछले टेस्ट में भी उसने कम अंक लिए थे। टीचर ने उसे बुलवाया था। वह जा ही नहीं पाई। ऑफ़िस से घर पहुँचने में ही सात बज जाते हैं। कहाँ से काम शुरू करे, उसकी समझ में नहीं आता।
 सुबह पाँच बजे उठने के साथ ही उसकी दिनचर्या आरम्भ हो जाती है, जो रात ग्यारह बजे तक चलती है। अपने लिए तो उसके पास समय ही नहीं बचता। विवाह से पहले उसे केवल ऑफ़िस जाना होता था इसलिए अच्छा लगता था लेकिन उसके बाद तो सब कुछ बदल गया है। वह एक धुरी बन कर रह गई है जिसके चारों ओर सिद्धार्थ, संयता, सृजना, मम्मीजी, घर परिवार ऑफ़िस सब घूमते हैं। अपनी सोच में वह अपने परिवार-ऑफ़िस को तोलती रहती है, कौन -सा पलड़ा भारी है। मन तो परिवार का साथ देता है लेकिन रहता है ऑफ़िस का ही। कहीं कुछ न कुछ हर बार परिवार के लिए छूट जाता है।
खड़े -खड़े वह थक जाती है। रेलिंग का सहारा लेकर वह फिर सोचने लगती है। वह कई बरस पीछे लौट जाती है। उससे एक वर्ष बड़ा भाई रितिन और वह एक ही कक्षा में थे। बोर्ड की परीक्षा में उसके अंक रितिन से अधिक आए थे और जब पिताजी ने रितिन को इंजीनियरिंग में दाखिला दिलवाने की बात कही तो वह भी जिद्द करने लगी। उस समय लड़कियाँ इंजीनियरिंग कम ही करती थीं। पिताजी तो मान ही नहीं रहे थे। पर माँ ने उसका साथ दिया था। कहीं माँ के अंतर में पढ़ -लिख कर आगे बढऩे की साध थी जो पूरी नहीं हो पाई और अब वह उसके माध्यम से पूरी करना चाहती थीं।
 पिताजी ने कहा था, लड़की को इंजीनियर बनाना क्या ज़रूरी है। बी.ए. कर ले, बाद में प्रशिक्षण लेकर स्कूल में नौकरी कर लेगी।लेकिन माँ ने समझौता नहीं किया था। पिताजी को उनकी बात माननी पड़ी थी। कुछ अलग से बनने, अलग से कर दिखाने की उसकी इच्छा पूरी हो गई थी। कोर्स पूरा होते ही उसकी नौकरी लग गई थी। रितिन को देर से मिली थी। पिताजी को अच्छा नहीं लगा था, पर माँ खुश थी। उन्हें उस पर गर्व था। ऐसा वह कई बार कहती थीं।
उसका ऑफिस नौ बजे का था। वह आठ बजे घर से निकलती और शाम छह बजे तक घर पहुँच जाती थी। घर का काम वह करती नहीं थी। माँ करने ही नहीं देती थी। छुट्टी के दिन वह अवश्य माँ की सहायता करती थी।
एक वर्ष यूँ ही बीत गया और फिर सिद्धार्थ के साथ उसका विवाह हो गया। घर-परिवार, परिवेश, नौकरी सब कुछ बदल जाने से उसके सामने कई चुनौतियाँ आ खड़ी हुईं। विवाह के कुछ समय तक तो कुछ विशेष घटित नहीं हुआ, लेकिन सृजना के जन्म के बाद तो जैसे सब कुछ ही बदल गया था। घर -नौकरी के बीच चलती जिंदगी में सृजना का आगमन ठहराव ले आया था। एक ठंडेपन का अहसास। जीवन से कोई लगाव ही नहीं रहा। इस परिधि के बीच घूमते -घूमते वह शेष सबसे कट गई
मम्मीजी ने तब कहा था,‘सुचिता, घर और बच्चों की देखभाल कारूरी है, नौकरी इतनी नहीं। सिद्धार्थ जितना पा लेता है, उतने से संतोष कर लेंगे।
 उसने कहा था, आज के इस महँगाई के युग में एक अकेले की कमाई से क्या होता है! अच्छा और पूरा जीवन जीने के लिए मेरी नौकरी तो ज़रूरी है। फिर पढ़ -लिख कर यूँ घर  पर बैठना भी तो ठीक नहीं लगता। इतनी अच्छी नौकरी छोड़ी भी तो नहीं जा सकती।
 पर वह पूरा जीवन कहाँ जी पाई है।। विश्लेषण करने पर अपने को नगण्य ही पाती है। बस आत्मसंतुष्टि भर उसके हिस्से में आती है। वह भीड़ में अपनी अलग पहचान बनाना चाहती थी, पर लगता है, वह स्वयं भीड़ का हिस्सा ही नहीं बन पाई, उसमें कहीं खो गई है।
 मम्मीजी ने भी परिस्थितियों के साथ समझौता कर लिया था, नहीं करतीं तो और भी कठिन हो जाता। सुबह वह बहुत- सा काम निपटाने का प्रयत्न करती है फिर भी मम्मीजी का सारा दिन  मेड से काम करवाने और बच्चों की देखभाल में ही निकल जाता है। इस उम्र में यह इच्छा रहती है कि घर सम्भालने में कोई सहायता करे। पर उनकी यह इच्छा पूर्ण नहीं हो पाई। शाम होते -होते वह थक जाती हैं। इधर वह भी थकी-माँदी घर पहुँचती है। दोनों एक दूसरे का मुँह देखती हैं। दोनों को ही आराम की आवश्यकता महसूस होती है। लेकिन मन मसोस कर रह जाती हैं। मम्मीजी तो कभी तबीयत खऱाब होने पर काम नहीं कर पातीं तो ऐसे में बच्चों को पढ़ाने के साथ-साथ घर के दूसरे काम भी पूरे करने होते हैं।
 सिद्धार्थ स्वयं थक कर आते हैं। न भी थके हों तो भी उनकी इच्छा रहती है कि ऑफ़िस से वापिस आने पर चाय मम्मीजी या वह बना कर दें। उनके छोटे-छोटे काम भी उसे ही करने पड़ते हैं। बच्चों को पढ़ाने के लिए कह दे तो भी वह खीझ जाते हैं। आज भी पता नहीं सृजना को टेस्ट की तैयारी करवाई होगी कि नहीं।
उसकी तन्द्रा टूटी। लोगों में हलचल होने लगी थी। शायद बस आ रही थी। वह रेलिंग छोड़ कर आगे आ गई। उसका अनुमान ठीक था, बस आ गई थी। सवारियाँ अधिक हो गई थीं, जैसे-तैसे वह बस में चढ़ गई पर बैठने के लिए जगह नहीं मिल पाई। महिला आरक्षित सीटों पर भी महिलाएँ बैठी थीं। उसने सोचा, इनकी भी देर से घर जाने की कोई विवशता रही होगी। वह भी उनके साथ थोड़ी-सी जगह पर बैठ गई। घर पहुँचते -पहुँचते सवा दस बज चुके थे।
संयता का बुखार अभी नहीं उतरा था। सृजना और मम्मीजी सो गई थीं। उसे ज़ोरों से भूख लगी थी। बिना गर्म किए उसने खाना प्लेट में लिया और खाने लगी। सिद्धार्थ बिस्तर में बैठे कोई मैगज़ीन पढ़ रहे थे। उसकी ओर देखा, मुस्कराए, पर इतनी देर से आने का कारण नहीं पूछा। क्या पूछते! वह जानती है उसका भारी वेतन घर गृहस्थी के बोझ को हल्का करने में कितना सहायक है।
खाना खाकर वह जल्दी से छोटे-मोटे काम निपटाने में लग गई। सुबह उसे फिर ऑफ़िस जाना था।
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email- sudershanratnakar@gmail.com

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