July 05, 2014

पर्यावरण


   बूढ़े पेड़ों को भी बचाना होगा

               - विनिता विश्वनाथन

हमारे मन में पुराने/बूढ़े पेड़ों की एक छवि बनी है। ऊँचेविशालहल्की से झुकती हुई डालें और उनके पत्तों की धीमी-सी सरसराहट। ये वयस्क जीव हमें बुढ़ापे की ओर धीरे-धीरे बढ़ते हुए समझ में आते हैं। इस छवि की एक वजह हमारी यह मान्यता है कि कुछ सालों की तेज़ वृद्धि के बाद जैसे-जैसे पेड़ों की उम्र बढ़ती हैउनकी वृद्धि दर कम होती जाती है। नेचर पत्रिका के 15 जनवरी के अंक में छपे शोध को पढ़कर लग रहा है कि हमारे इस नज़रिए को शायद बदलना पड़ेगा।
6 महाद्वीपों के उष्ण-कटिबंधी और समशीतोष्ण क्षेत्रों की 403 प्रजातियों के करीब 7 लाख पेड़ों के अध्ययन से यह पता चला है कि आकार (अर्थात उम्र) में जितना बड़ा पेड़उतनी ही अधिक उसकी वृद्धि दर होती है। यह शोध यू.एस. जिओलॉजिकल सर्वे के निक स्टीफेन्सन और साथियों ने 100 से भी ज़्यादा शोधकर्ताओं की मदद से किया है। उनके शोध से यह समझ में आता है कि सबसे ज़्यादा उम्र के पेड़ सबसे अधिक तेज़ी से और आश्चर्यजनक दर से बढ़ रहे हैं।  उदाहरण के लिए एक साल में किसी 100 से.मी. व्यास के पेड़ का द्रव्यमान उतना बढ़ जाता है जैसे कि 10-20 से.मी. व्यास का एक पूरा पेड़ उसमें जुड़ गया हो! और 100 से.मी. व्यास के पेड़ की वृद्धि दर 50 से.मी. व्यास के पेड़ से तीन गुना ज़्यादा पाई गई। इस अध्ययन के दौरान हुए विश्लेषण से यह भी पता चला है कि शोध के नतीजों पर न तो इस बात से कोई फर्क पड़ता है कि पेड़ कहाँ का है और न ही इस बात से फर्क पड़ता है कि वह पेड़ किस कुल का है।  
हम तो मानकर चल रहे थे कि पेड़ों की वृद्धि दर उम्र के साथ कम होती जाती है। तो पेड़ों की वृद्धि दर को लेकर हम इतना गलत क्यों निकलेकुछ लोग कह सकते हैं कि मनुष्य के रूप में हमारे अपने अनुभव की वजह से यह गलती हुई होगी। मनुष्यों में तो हम देखते आए हैं कि बुज़ुर्गों में वृद्धि धीमी हो जाती है। इसे परिस्थिति पर मनुष्यों के मानकों को थोपना अर्थात मानवीकरण कहते हैं। मगर अब लगता है कि पेड़ों को लेकर यह गलतफहमी केवल मानवीकरण का नतीजा नहीं थी।
दरअसलगलतफहमी का कारण इस विषय पर आज तक हुए कुछ शोध भी हैं। जैसे कि प्लान्टेशन (जिनमें एक ही प्रजाति के लगभग एक ही उम्र के पेड़ होते हैं) और कुछ जंगलों पर हुए शोध के आधार पर हमारा निष्कर्ष था कि बढ़ती उम्र के साथ उनकी वृद्धि कम हो जाती है। यह निष्कर्ष इसलिए निकला कि उनकी उत्पादकता या नेट प्रायमरी प्रोडक्टिविटी कम हो जाती है। इसका मतलब है कि जैसे-जैसे किसी प्लान्टेशन के पेड़ बड़े होते हैंउनमें पहले से कम कार्बन जुड़ता जाता है। वनस्पतियों में प्रकाश संश्लेषण की क्रिया की वजह से कार्बोहाइड्रेट के निर्माण के चलते उनमें कार्बन जुड़ता जाता है। चूंकि बड़े पेड़ों की नेट प्रायमरी प्रोडक्टिविटी कम होती हैइसलिए आज तक विश्व भर में वन अधिकारी और वन संवर्धकों ने जंगलों और प्लान्टेशन में कम उम्र के पेड़ों की संख्या को बनाए रखने पर ज़्यादा ध्यान दिया है।
बढ़ती उम्र के साथ कम उत्पादकता का एक कारण यह माना जाता है कि उम्र के साथ पत्तियों की कार्यक्षमताउनकी प्रकाश संश्लेषण की क्षमता कम होती जाती है। पत्ती के प्रति वर्ग से.मी. क्षेत्रफल में प्रकाश संश्लेषण के कारण जो कार्बोहाइड्रेट बनता हैवह पहले से कम हो जाता है। तो ऐसे में पेड़ की वृद्धि कम होना लाज़मी है। बढ़ती उम्र के साथ घटती वृद्धि का एक और कारण यह भी माना जाता है कि बड़े होने पर पेड़ों को अपनी ऊर्जा का उपयोग वृद्धि में कम और प्रजनन में ज़्यादा करना होता है।
ये शोध और उनके निष्कर्ष गलत नहीं हैंलेकिन इनमें कुछ कमियाँ  हैं। एक दिक्कत यह है कि ज़्यादातर शोध प्लान्टेशन में या समूचे जंगल के स्तर पर हुए हैं। अकेले पेड़ों पर काम कम हुआ है। जब पूरे जंगल या प्लान्टेशन को नापा जाता है तो मृत्यु दर अक्सर छिप जाती है। वृद्धि नापने के लिए एक बार पेड़ों को नापकर कुछ समय बाद उनको दोबारा नापा जाता है। तो इस अंतराल में प्लान्टेशन या जंगल के कुछ पेड़ों की मृत्यु तो हुई होगी। अगर आकलन में ये पेड़ छूट जाते हैंतो जंगल या प्लान्टेशन के स्तर पर वृद्धि कम ही दिखेगी। दूसरी बातअगर उम्र और वृद्धि के रिश्ते को समझने के लिए बराबर क्षेत्रफल के दो ऐसे प्लान्टेशन की तुलना करते हैं जिनमें सिर्फ पेड़ों की उम्र में फर्क है तो भी गड़बड़ हो सकती है। यह इसलिए कि बराबर क्षेत्रफल के होने के बावजूदअक्सर प्लान्टेशन में आप कम उम्र के छोटे पेड़ों को ज़्यादा संख्या में लगे पाएँगे और अधिक उम्र के कम पेड़ पाएँगे।
ऐसी परिस्थिति में पेड़ों को नापकर नतीजा सुनाना गलत साबित हो सकता है। अक्सर ऐसा भी होता है कि अध्ययन के लिए चुना गया प्लान्टेशन या जंगल बहुत ही विशाल है और नमूने के तौर पर कुछेक पेड़ों को नापा जाता है। ज़रूरी नहीं है कि जिन पेड़ों को पहले नापा थाउन्हीं पेड़ों को एक समय अंतराल के बाद फिर से नापा जाएउतनी ही संख्या के किन्हीं अन्य पेड़ों को नापा जा सकता है। कहने का मतलब है कि प्लान्टेशन या जंगल के स्तर पर शोध होता है तो दिक्कतें भी हो सकती हैं।
अब ऐसा भी नहीं था कि उम्र के साथ घटती वृद्धि पर पूरी सहमति थी। एक मुख्य सिद्धान्तजो मेटाबॉलिक स्केलिंग थ्योरी के नाम से जाना जाता हैके मुताबिक पेड़ों के द्रव्यमान में वृद्धि के साथ उनकी वृद्धि दर भी लगातार बढ़ती जानी चाहिए। और वृद्धि दर में यह बढ़ोतरी उम्र के साथ पेड़ों की घटती कार्यक्षमता के बावजूद संभव है। होता यह है कि उम्र के साथपत्तियों की मात्रा भी बढ़ जाती हैऔर इतनी बढ़ती है कि उस पेड़ की पत्तियों की सतह का कुल क्षेत्रफल उम्र के साथ बढ़ता है। पत्तियों का कुल क्षेत्रफल बढऩे के साथ ही बढ़ता है उनका प्रकाश संश्लेषणकार्बोहाइड्रेट का उत्पादन और द्रव्यमान में वृद्धि। तो इस विरोधाभास को सुलझाने की दृष्टि से स्टीफेन्सन और साथियों ने अपना शोध किया।
अपने शोध में स्टीफेन्सन और अन्य शोधकर्ताओं ने उन पेड़ों को चुना जो कम से कम 10 से.मी. के व्यास के थेऔर किसी भी जंगल में उन प्रजातियों के पेड़ों को नापा जिनके कम से कम 40 पेड़ उनको मिले। उन्होंने ज़मीन से ऊपर एक निर्धारित ऊँचाई पर तने पर पेड़ों के व्यास को दो बार नापाकम से कम एक साल के अंतराल में और कहीं कहीं पाँच से दस साल के अंतराल में। फिर सिद्ध समीकरणों के ज़रिए व्यास को लेकर हर प्रजाति के पेड़ों के सूखे द्रव्यमान (जैसे नेट प्रायमरी प्रोडक्टिविटी के लिए किया जाता है) का आकलन किया। इन आँकड़ों को लेकर फिर उन्होंने वृद्धि दर के आकलन किए। इस प्रकार 12 देशों के जंगली इलाकों से शोधकर्ताओं ने डैटा स्टीफेन्सन को भेजा और काफी विश्लेषण के बाद अपने नतीजों पर पहुँचे।
खैरअब तो कह सकते हैं कि कार्बन जोडऩे के लिए वयस्कविशाल पेड़ों को बचाने की भी ज़रूरत है। यह तो कहा नहीं जा सकता है कि जंगलों में छोटे पेड़ कम और बड़े पेड़ ज़्यादा होने चाहिएक्योंकि बराबर क्षेत्रफल में कार्बन जोडऩे में कम कुशल छोटे पेड़ बड़े पेड़ों की तुलना में काफी ज़्यादा लगाए जा सकते हैं। वायुमंडल से कार्बन डाईऑक्साइड के अवशोषण में बड़े पेड़ कहीं ज़्यादा अच्छा काम करते हैं और इस कारण इनको प्लान्टेशन और जंगलों में ज़्यादा सुरक्षा मिलनी चाहिए। ये बड़े पेड़ गिनती में तो जंगलों के कुल पेड़ों का 2 प्रतिशत होते हैंलेकिन जंगल के जीवित द्रव्यमान को देखें तो उसमें इन बड़े पेड़ों का योगदान 25 प्रतिशत तक होता है।
अलबत्ताबड़े पेड़ों को बचाए रखना आसान काम नहीं होगा क्योंकि जंगलों या प्राकृतवास का विखंडन (फॉरेस्ट या हैबिटैट फ्रैगमेन्टेशन)जो जंगलों और जैव विविधता के लिए कई दशकों से सबसे बड़े खतरों में से एक रहा हैइन पेड़ों को अनुपातहीन रूप से प्रभावित करता है। प्राकृतवास के विखंडन की बात को यूँ समझते हैं। किसी भी जंगल की परिधि पर कुछ पेड़ होंगे। बाहर के दबावजैसे हवा-आंधी का ज़ोररोगाणुलकड़ी का काटनामवेशियों का चरनाये सब अंदर के पेड़-पौधों-जीवों को कम और परिधि के पेड़ों को ज़्यादा प्रभावित करते हैं। यदि इसी जंगल को छोटे-छोटे टुकड़ों में बाँट दिया जाएतो परिधि पर लगे पेड़ों की संख्या ज़्यादा हो जाएगी। अगर सारे खंडों का क्षेत्रफल कुल मिलाकर उस बड़े जंगल जितना भी हो (जो वास्तव में होता नहीं हैजंगल कम हो जाते हैं)तब भीसीमा पर रहने का प्रभाव तो दिखेगा। और विखंडित परिस्थिति में परिधि पर ज़्यादा पेड़ हैं। जितने ज़्यादा खंडउतना ज़्यादा दबाव पेड़ों और जंगल के अन्य जीवों पर। शोध से यह पता चला है कि ज़्यादा उम्र के पेड़ ऐसे दबावों से अधिक प्रभावित होते हैं।
स्टीफेन्सन और साथियों के इस शोध के कई निहितार्थ हैं। हमें एक और कारण तो मिलता है पुरानेबूढ़े पेड़ों को बचाकर रखने का। साथ में इस बहस को सुलझाने में यह शोध हमारी मदद कर सकता है कि बढ़ते कार्बन डाईऑक्साइड प्रदूषण के चलतेपेड़ों में अधिक कार्बन जोडऩे के लिए कम उम्र के पेड़ ज़्यादा मददगार हैं या बड़े पेड़। (स्रोत फीचर्स)  

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जीवित पेड़ को तोला नहीं
 जा सकता मगर ...
नेट प्राइमेरी प्रोडक्टिविटी यानी कार्बन की वह मात्रा जो जीवित पेड़ों में एक नियमित अंतराल में जुड़ती है। इस अंतराल में पेड़ों के द्रव्यमान में बढ़ोतरी का मापन किया जाता है। वैसे तो इस उत्पादकता में लकड़ी (तनाडाल)फलपत्तोंफूलों और जड़ों का मापन होना चाहिए; लेकिन अक्सर जब नेट प्राइमेरी प्रोडक्टिविटी की बात होती है तो हम सिर्फ ज़मीन की सतह के ऊपर लकड़ी और पत्तियों के जीवित द्रव्यमान या वजऩ के बारे में बात करते हैं। अब किसी जीवित पेड़ को तो तोला नहीं जा सकता मगर पेड़ के व्यासऊँचाई और घनत्व से उसके द्रव्यमान का अनुमान लगाया जा सकता है। हर देश मेंविभिन्न परिस्थितियों में बढऩे वाले अनेक प्रजातियों के पेड़ों को हमने अपने उपयोग के लिए काटा है। अक्सर हम काफी व्यवस्थित रूप से इनकी कटाई करते हैं और कारखानों को बेचते हैं। तब से इनके वजऩ को नापते आ रहे हैं। साथ में इनके व्यासलम्बाई और उस प्रजाति की लकड़ी के घनत्व को भी नापा है। तो ऐसे करोड़ों पेड़ों से हमें यह पता चला है कि किसी एक पेड़ के व्यासघनत्वऊँचाई और वज़न या द्रव्यमान का क्या रिश्ता है। जीवित पेड़ के व्यास और ऊँचाई नापने के तरीके हमारे पास हैं। घनत्व अक्सर पहले से पता रहता है। तो अब एक बार नापकर अगर कुछ समय के अंतराल के बाद दोबारा पेड़ (या जंगल के सारे पेड़ों) को नापते हैं तो द्रव्यमान में हुई वृद्धि को ही नेट प्राइमेरी प्रोडक्टिविटी माना जाता है। इस तरीके से मिलने वाले आंकड़े अचूक तो नहींफिर भी काफी सही रहते हैं।   
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