February 02, 2014

तीन लघुकथाएँ

1. कीमत
- सुधा भार्गव

 पिता की मृत्यु के बाद पाँच वर्षों से महक भारत नहीं गई थी। इस वर्ष उसका बड़ा भाई बहुत बुला रहा था। भाभी के भी कई बार तकाज़े आ चुके थे। वह अपने को रोक न पाई। भतीजे-भतीजी और भाभी के लिए ढेर- सी सौगाते ले लीं। समझ नहीं आ रहा था -भाई के लिए क्या ले? लेने के लिए भी तो नहीं था। कहता- तुझे कुछ देना ही है तो हमेशा अपना प्यार देती रहे।
बहन के आने से पहले भाई ने सब सुविधाएँ जुटाने की कोशिश कीं। जानता था लंदन में लौकी, पपीता  बहुत  मँहगे मिलते हैं, और आम! आम मिलने पर भी उसकी बहिन वहाँ भरपेट नहीं खा पाती।  इसलिए पहले से ही खरीदकर घर में रख दिए।
गुनी, महक गोलगप्पे, भेलपूरी बड़े शौक से खाती है, उसकी तैयारी कर ली? और  हाँ, समोसे भी अभी बनाकर रख दे। जब वह आ जाएगी, तब खूब बातें करेंगे वरना तू रसोई में ही घुसी रहेगी। भाई अपनी पत्नी से बोला। 
ओह महक के भइया! पहले से बना दिया तो सब खराब हो जाएगा। मुझे भी अपनी ननद बाई की खातिरदारी करनी आती है! आप चिंता न करो। गुनी बहन के प्रति अपने पति की भावनाओं को महसूस कर मुस्करा दी।
बहन आई, भाई के आँगन में चिडिय़ाँ चहक उठीं, रात दिन में बदल गई। बातों का सिलसिला शुरू होता तो ननद भावज को पता ही नहीं लगता रात कब गुजर गई। भाई ने भी तो ऑफिस से एक हफ्ते की छुट्टी ले रखी थी।
महक के जाने का समय आ गया, उसे अपने बेटे से मिलने बंबई भी जाना था। उससे मिलने को बेताब थी। लरजते आँसुओं को पलकों में छिपाए भाई ने बहन को विदा किया। यादों को दिल में समाए, मिठाई का पिटारा बगल में दबाये महक ट्रेन में बैठ गई। सारे रास्ते मिठाई की प्यार भरी  खुशबू में डूबी हुई थी। उसके लिए तो वह अनमोल थी, जो दुनिया के किसी कोने में नहीं मिल सकती थी। बेटे के घर पहुँच गई। स्टेशन पर बेटे ने कार भेज दी थी। सुविधा से वह बेटे के घर पहुँच गई।
शाम घिर आई, शानदार बंगले में बैठी बहू के साथ महक बेटे की प्रतीक्षा कर रही थी। लंबा-चौड़ा व्यापार था, धन की कोई कमी नहीं पर बेटा धन कमाने की मशीन बन गया था। काफी रात बीते आया। कुशल क्षेम  पूछने  के बाद बोला-  माँ, मामा ने मेरे लिए क्या भेजा है?
बेटा मिठाई भेजी है। बड़ी ही स्वादिष्ट है, खाना खाने के बाद खा लेना या पहले खाएगा!
उंह!  मिठाई भी कोई खाता है आजकल? तुम तो जानती हो सारी मिठाई नौकरों के पेट में जाती है, फिर क्यों लाईं!
बेटा- तुम नहीं समझ सकोगे। इनकी कीमत आँकने के लिए वो आँखें चाहिए ,जो तुम्हारे पास नहीं हैं।

2. बंदर का तमाशा
 सड़क पर एक औरत बंदर का तमाशा दिखा रही थी। मैले- कुचैले, फटे -फटाए कपड़ों से किसी तरह तन को ढके हुए थी।  बंदर की कमर में रस्सी बँधी थी ,जिसका एक छोर उस औरत ने पकड़ रखा था। झटके दे-देकर कह रही थी- कुकड़े, माई-बाप और अपने भाई-बहनों को सलाम कर और कड़क तमाशा दिखा ;तभी तो तेरा- मेरा पेट भरेगा। बंदर भी औरत के कहे अनुसार मूक अभिनय कर पूरी तरह झुककर सलाम ठोकने की कोशिश कर रहा था ।
-अच्छा अब ठुमक-ठुमक कर नाच दिखा।
औरत ने गाना शुरू किया
अरे छोड़-छाड़ के अपने सलीम की गली
अनारकली डिस्को चली।
बंदर ने बेतहाशा हाथ-पैर फेंकने कमर-कूल्हे मटकाने शुरू किए, उसे डिस्को जो करना था। थककर ज़मीन पर बैठ गया तो तालियों ने उसका स्वागत किया।
तमाशा देखने वालों की भीड़ उमड़ पड़ी थी। लोग हँस-हँसकर कह रहे थे-पैसा फेंको तमाशा देखो।
और वह बंदर, बंदर नहीं था बल्कि बंदर का तमाशा दिखाने वाली उस गरीब औरत का दो वर्षीय नंग-धड़ंगा बेटा था।

3. होलिका मंदिर

-क्यों  मुँह लटकाए बैठा है?
-क्या करूँ?घर-घर दस्तक दी- गिड़गिड़ाया पर ऐसी दुत्कार मिली कि कुत्तों को भी नहीं मिलती। 
-अरे तूने कहा क्या --?
-यही कि मेरा बेटा बहुत बीमार है।  अगर थोड़ी मदद हो जाए तो अपनी जमा- पूँजी ,उधारी और बढ़े हाथों के सहयोग से उसका इलाज करा पाऊँगा।
-हम इक्कीसवीं सदी में रह रहे हैं लेकिन कुछ बातें बिलकुल नहीं बदली। एक बार फिर जा मगर दूसरे मोहल्ले में और जो मैं कहूँ वह कहना- एक  कागज पर लिख ले सच्चाई  के पुजारी। कितनी बार तुझे समझाया- सच की तरह बोल पर सच मत बोल।
 -हो गया उपदेश, जल्दी लिखवा!
लिख- मुझे कल सपने में होलिका आई थी।  आँखें उसकी अंगारों की तरह दहक रही थीं, मुँह से निकल रही थी आग की लपटें। कह रही थी- मेरी एक गलती- उसकी इतनी बड़ी सजा कि  हर वर्ष मुझे जलाते हो और इन पापियों और दरिंदों का क्या! जो बिना खूँटे से बँधे हज़ार गलतियाँ करते मस्त रहते  हैं। मैं सबको जलाकर राख कर दूँगी- सबको बर्बाद कर दूँगी। मेरे क्रोध से बचने का एक ही तरीका है। जा अपने गाँव वालों से कह दे। मेरे नाम से एक मंदिर बनवाएँ; जिसका नाम हो होलिका मन्दिर हो और हाँ- जब पहली बार वहाँ पूजा हो तो मेरी प्रतिमा पर फूलों का हार न चढ़ाया जाए, सोने का हार हो।
सबसे बाद में कातरता से कहना। मुझे गाँव को बचाना है। मदद करो माँ मदद करो।
अगले दिन मजबूर बाप ने ऐसा ही किया। शाम को घर लौटा तो बैग में दानराशि समा नहीं रही थी। 
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लेखकों से अनुरोध...

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