October 29, 2011

विजयी मंत्र


- रश्मि प्रभा
मैं नन्हा गाँधी
इस बार कोई सत्याग्रह नहीं करूँगा
अपनी पदयात्रा भी अकेले करूँगा
परायों से युद्ध जटिल होकर भी आसान था
पर अपने घर में ...
बाल सुलभ हठ हर उम्र में एक सुख देता है
पर जब अपने षडय़ंत्र करते हैं
एक दूजे को नीचा दिखाने का
हर संभव प्रयास करते हैं
तो भूख यूँ ही मर जाती है ...
फिर कैसा अनशन
और किससे क्या पाना।
जो मद के गुमां में होते हैं
उनके लिए तो प्रेम ही वर्जित है ...
न घर न देश .... सिर्फ मैं
तो इस मैं का हश्र मैं देखना चाहता हूँ
अपने नन्हें कदमों से वहाँ तक जाना चाहता हूँ
जहाँ 'मैं' स्तब्ध होता है
दिशाएं मौन होती हैं
अपना साया भी पीछे रह जाता है
वहाँ उस सन्नाटे में अपनी हथेली बढ़ाना चाहता हूँ
इस लम्बी यात्रा को वसुधैव कुटुम्बकम्
का विजयी मंत्र देना चाहता हूँ
मैं नन्हा गाँधी
पीछे आने वाली आहटों पर ध्यान लगाए
आज से अपनी यात्रा शुरू करता हूँ
तुम्हारी नजरें जहाँ- जहाँ जाती हैं
वहाँ वहाँ से तुम्हारा आह्वान करता हूँ
याद रखना मैं एक देश हूँ तुम्हारा
कोई पार्टी नहीं ...

Email : rasprabha@gmail.com

3 Comments:

POOJA... said...

kaash ham sabko bhi yaad rahta ki ham desh hain, party ya koi jaati ke nahi...
bahut hi prerak rachna hai...

अरुण चन्द्र रॉय said...

badhiya kavita..

दीपक 'मशाल' said...

बेहतर.. बधाई..

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