December 25, 2010

21वीं सदी का सपना

- अमर गोस्वामी
मेरे किशोर होते हुए पुत्र ने एक सपना देखा। उसने देखा कि एक मोटर साइकिल पर वह कहीं जा रहा था। रास्ते में घने जंगल, छोटी- बड़ी नदियां, छोटे- बड़े नगर, इन सबको पीछे छोड़ता हुआ वह एक भव्य महानगर में जा पहुंचा। महानगर के बीच में बने एक आलीशान नगर- द्वार के पास जब वह पहुंचा तो वहां उसे एक ब्रह्यचारी खड़े नजर आए। उन्होंने रेशमी वस्त्र धारण कर रखे थे। उनके गले में रुद्राक्ष की माला और पैरों में मत्स्याकार खड़ाऊ थी। रोशनी का फव्वारा उनके पूरे शरीर पर पड़ रहा था। ब्रह्यचारी ने हाथ के इशारे से रोका। पुत्र रुक गया।
ब्रह्यचारी ने कहा, 'वत्स, तुम न जाने कितने नद- नदी, वन- उपवन, नगर- उपनगर पार करते हुए यहां तक आए हो। तुम्हारी यात्रा पूरी हुई। तुम्हें अब कहीं जाने की जरूरत नहीं। यह महानगरी राजधानी ही सबकी मंजिल है।'
'मगर मुझे तो कहीं और जाना है।'
'यही सबकी मंजिल है, तुम्हारी भी।'
'जो आज्ञा!'
'तुमसे मैं प्रसन्न हूं। एक तोहफा देना चाहता हूं। जरा अपनी बाईं ओर देखो।' पुत्र ने बाईं ओर देखा। एक तरफ स्वर्णाभूषण और मुद्राओं का ढेर था तो दूसरी तरफ एक स्व- चलित स्टेनगन रखी थी। दोनों ही प्रकाश में चमक रहे थे। ब्रह्यचारी ने कहा, 'इन दोनों में से जो चाहो, तुम उठा लो।'
पुत्र ने एक नजर दोनों पर डाली। फिर लपककर स्टेनगन उठा ली। बोला, ब्रह्यचारीजी, यह स्टेनगन मेरे पास रहेगी तो मुझे किसी चीज की कमी नहीं होगी, ऐसे न जाने कितने स्वर्णाभूषण और धन की ढेरियां मेरे कदमों में होगी। बस, आशीर्वाद दीजिए, यह मोटर साइकिल और स्टेनगन सलामत रहे।'
'एवमस्तु!' ब्रह्यचारी ने कहा। अपने सपने की बात सुनकर बेटा हंसने लगा, पर उस दिन से मेरी आंखों की नींद गायब है।
स्त्री का दर्द
वे दोनों शहर से मजदूरी करके और कुछ जरूरत का सामान खरीद लौट रहे थे। स्त्री की गोद में बच्चा था। दोनों की उम्र यही 20-25 वर्ष की रही होगी। ऊबड़- खाबड़ और कंकड़ों- भरी सड़क पर चलते हुए अपने पति के बिवाई- भरे नंगे पैरों को देखकर स्त्री को असुविधा हो रही थी। वह बोली, 'ए, हो दीनू के बाबू! तुम अपनी पनही (जूता) जरूर खरीद लेना।'
'हां।' पुरुष ने कहा।
वे दोनों सोच रहे थे कि पनही खरीदना क्या आसान बात है? इतने दिनों से पैसा जोड़कर माह- भर पहले जो पनही उधार लेकर खरीदा था, उस पर किसी चोर की निगाह पड़ गई। उधार सिर पर था। अब उधार लेकर खरीदने की भी हैसियत नहीं थी।
फिर जहां रोज खाने को रूखा- सूखा जुटाना मुश्किल हो, वहां पनही बहुत ऊंची चीज थी, मगर औरत को अपने पांव में चप्पल और मर्द को नंगे पांव ऊबड़- खाबड़ पथरीले रास्ते पर चलते देखकर असुविधा होती थी। वह कई दिन इसी ऊहापोह में रही, कुछ पैसे चोरी से बचाने की कोशिश की, मगर वे बचे नहीं। उस दिन भी औरत ने कहा, 'न हो तो दीनू के बाबू, यह चप्पल पहन लो।।'
मर्द हंसा, 'जनाना चप्पल पहनें। इससे तो नंगे पैर अच्छे।'
ठीक ही कहा, 'नंगे पैर अच्छे!'
बगल से गंगा नदी बहती थी। चलते हुए औरत मन ही मन कुछ बुदबुदाई, 'हे गंगा मैया अगर जुटा सको तो दोनों को जुटाना नहीं तो इसे भी रख लो।'
औरत ने अपनी चप्पल छपाक से पानी में फेंक दी। अब औरत को मर्द के नंगे पांवों से असुविधा नहीं हो रही थी।

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