July 11, 2010

किसी रोज बनजारों की तरह

- प्रिया आनंद
मौसम में अब बस गुलाबी ठंडक बाकी रह गई थी जब मुझे प्रबाल प्रमाणिक के यहां से फोन आया। काफी दिनों से वे मुझे बुला रहे थे। हां, ना करते पूरा एक साल गुजर गया। इस बार भी जैसे मैं संकोच से घिर गई। कितना तो काम था। सिलसिलेवार ही सारे काम निपटते थे। ऐसे में चार दिन की छुट्टी निकाल लेना मुश्किल ही था।
-शायद छुट्टी नहीं मिलेगी मैंने हिचकते हुए कहा।
-छोड़ दीजिए ऐसी नौकरी, यह स्लेवरी है।
यह सुनने के बाद मैंने एक दिन का ऑफ लगाया और दो दिन की छुट्टी लेकर चल दी। चक्की के स्टाप पर उतरने के बाद मैंने देखा वहां धार ब्लाक जाने वाली बस खड़ी थी या यों कहें कि यात्रियों का इंतजार कर रही थी।
-बस कब तक चलेगी? मैंने वहां खड़े एक आदमी से पूछा।
-11 बजे... कहकर उसने मुंह फेर लिया। थोड़ी ही देर में बस पूरी तरह भर गई। हंसी तब आई जब सवारियों के साथ बकरियां भी बस में आ गईं। पहले तो उन्हें सीट के नीचे ठूंसने की कोशिश की गई। जब वे वहां बैठने को तैयार नहीं हुईं, तो बकरी वाले उन्हें गोद में लेकर बैठ गए। बस आहिस्ता चलती एक- एक सवारी उठाती- उतारती धार ब्लाक पहुंची। सामने एक बड़ा सा छतनार पेड़ था। वहीं एक आईस्क्रीम का ठेला था और एक छोटा सा रेस्तरां। कुछ सवारियां उतरकर होटल में चाय पीने चली गईं। बाकी आराम से पेड़ की छाया में बातें करने लगे। धार पहुंच कर आधी बस खाली हो गई थी। धूप की चमक तेज थी यह एरिया हिमाचल की ठंडक से थोड़ी दूर भी था इसलिए हवा में गर्मी थी।
-कहां पहुंचीं आप...? प्रबाल लाइन पर थे
-बस धार पर खड़ी है, हिलने का नाम नहीं ले रही।
-ऐसे ही चलती है, पर इसका एक फायदा है कि यह सीधे मेरे घर के सामने आपको उतारेगी।
सचमुच बस ने मुझे ठीक उनके घर के सामने उतार दिया। प्रबाल प्रमाणिक की अकादमी काफी बड़ी है। अंदर से लगातार कुत्तों के भौंकने की आवाज आ रही थी। बस की आवाज सुनते ही प्रबाल बाहर निकल आए। बताया कि मेरे रहने के लिए उनके सहयोगी अरूप चंद्रा के घर इंतजाम किया गया था। बंगाली होने के कारण प्रबाल का हिंदी उच्चारण बेहद फनी और लुभावना लगता है।
- अभी मैं कुत्तों का खाना बना रहा हूं, थोड़ी देर में वहां आऊंगा। ये आदमी आपको वहां ले जाएगा। तब तक आप रेस्ट करें। उन्होंने यह कह कर मुझे एक आदमी के साथ भेज दिया।
घर अच्छा था दो कमरों का छोटा सा फ्लैट। दीपाली ने मुस्कुरा कर मेरा स्वागत किया। दीपाली अरूप की पत्नी हैं। वह हिंदी समझ तो लेती हैं, पर बोल नहीं पाती।
शाम तक अरूप भी आ गए। वह भी किचन में दीपाली का हाथ बंटाने चले गए। खाने की मेज पर सब साथ थे। प्रबाल, अरूप और दीपाली। सभी एक जैसे मस्त मौला। यह बेलौस मस्ती और कहां...? पहली बार मुझे लगा कि काम के तनाव से बाहर निकलने के लिए ऐसी जगहों पर जरूर जाना चाहिए। कितनी अजीब बात थी कि प्रबाल ने कोलकाता से यहां आकर बसेरा बनाया था। शायद इसके पीछे हेरिटेज के प्रति उनका आकर्षण रहा हो। हिमाचल ने उन्हें जमीन नहीं दी थी इसलिए उन्होंने हिमाचल बार्डर पर जमीन ले ली थी और बीस कमरों का मकान डाल लिया था।
बीस कमरों का मकान... सुनने में अजीब लगता है, पर कुछ कमरे तो उन लावारिस कुत्तों के लिए थे, जो स्ट्रीट डॉग्स थे। जो सड़क पर घायल हो जाते थे। प्रबाल उनकी मरहम पट्टी करते और फिर उन्हें अपने पास रख लेते थे। अब वहां 17 कुत्तों का झुंड है। उनका खाना पकाना, सफाई सब प्रबाल के जिम्मे था। प्रबाल एक अच्छे पेंटर हैं। ग्लोबल पहचान वाले आर्टिस्ट, पर उनका ज्यादा नाम उनकी देवस्थान कला के कारण है। पेपर कटिंग से समूचा परिदृश्य निर्मित करने वाले प्रबाल अपने काम में दक्ष हैं और मशहूर भी। मथुरा के मंदिरों की चौखटों पर रंगीन कागजों और पन्नियों की कटिंग की सजावट को उन्होंने अपनी कला में ढाल लिया। अब यह कला देवस्थान कला के नाम से चर्चित हो चुकी है। अरूप कोलकाता में साफ्टवेयर इंजीनियर थे। वे भी कोलकाता को नमस्ते कर यहां आ गए थे। फोटोग्राफी और डाक्यूमेंट्रीज बनाने में उनकी स्पेशिएलिटी है और वे इसी काम में यहां आकर जुट गए थे। उसी शाम हम रणजीत सागर वाटर रिजर्वायर देखने गए।
चप्पूवाली नाव किनारे पर ही थी।
मदन हमें सैर कराने ले चलोगे? प्रबाल ने नाविक से कहा।
-क्यों नहीं आइए। मदन ने खुश होकर कहा।
सभी नाव में बैठ गए। मैं शायद पंद्रह सालों बाद ऐसी नाव में बैठी थी। बोटिंग ऐसी ही नाव में अच्छी लगती है। मोटर बोट का सफर बहुत जल्दी खत्म हो जाता है।
धीरे- धीरे नाव बीच झील में पहुंच गई। शाम होने को थी। पूरा आकाश सिंदूरी था और पानी पर भी उसकी लाल छाया थी। कुछ ही क्षणों के अंतराल में आकाश स्लेटी रंग में तबदील हो गया।पूर्व के पहाड़ों के पीछे से चांद निकला।
-यह पूर्णिमा की रात है... प्रबाल ने कहा और गुनगुनाने लगे।
-आपने कभी बाउल संगीत सुना है?
-नहीं...
-कोलकाता में ऐसे गीत आम हैं। बहुत खूबसूरत और मधुर।
अरूप और दीपाली बातों में मस्त थे। पूरे एक घंटे की बोटिंग के बाद हम वापस लौटे। चांद पूरे जोश से निकला था और चांदनी पूरी झील पर लहरियों में फैली हुई थी।
पहाड़ी के पीछे से मोर की आवाज आई। तुरंत झील के उस पार की पहाड़ी से दूसरे मोर ने जवाब दिया
-आहा! केका ध्वनि ... प्रबाल खुश होकर बोले।
-ये एक दूसरे को संदेश दे रहे हैं... रोमांटिक मैसेज
- हो सकता है यह अपनी टीम को बुला रहा हो कि चलो शिकार पर चलते हैं आखिर भोजन उन्हें भी तो ढूंढना है... अरूप ने कहा।
- तुम बेहद अनरोमांटिक हो कहकर प्रबाल फिर गीत गुनगुनाने लगे।
शाम को मशरूम सूप और -ब्राउन ब्रेड का शानदार डिनर था, साथ में मिठाई। खाने के बाद देर तक सब बातें करते रहे फिर गुड नाइट कर सोने को चल दिए।
अगली दोपहर छोटी- छोटी पूरियां सब्जी, दाल और बंगाल से आया खजूर का दानेदार गुड़। शायद मैंने जिंदगी में पहली बार खाया। शाम हमने वे डाक्यूमेंट्रीज देखी, जो प्रबाल और अरूप ने शेखावटी पेंटिंग्स से सजी हवेलियों पर बनाई थी। कमेंट्री करने वाली महिला का उच्चारण एकदम स्पष्ट पर कांशस था, जबकि पुरुष की आवाज बेलौस थी।
यह प्रिया मैडम की और मेरी आवाज है प्रबाल ने बताया।
प्रिया प्रवाल की पत्नी, जो अब बंगलूर में रहती हैं। उस रात डिनर पर प्रबाल ने बार- बार प्रिया को याद किया। शाम हम बसोहली की ओर चल पड़े। प्रबाल कोई चित्र बनाना चाहते थे। रास्ते में हमने शाल बनती देखी। अंगोरा ऊन की शाल भी यहां बनती है। 500 से 1500 तक की अच्छी शालें मिल जाती हैं। वहां उस समय कारीगर गोपाल सिंह खड्डी पर थे और काम कर रहे थे।
उससे आगे दोनों तरफ सरसों से पीले फूलों वाले खेतों की लंबी चौड़ी पट्टी थी। यह रणजीत सागर का वेटलैंड एरिया था और इस बार यहां बंपर फसल हुई थी। गाड़ी आगे बढ़ती गई और झोपडिय़ों के आकार में बदलाव आ गया। ढेरों लंबी चौड़ी झोपडिय़ां और जुगाली करती भैंसें।
क्या हम पंजाब में हैं ...? मैंने पूछा।
- हां यह एरिया पंजाब में ही है।
आकाश खुला नीला और विस्तृत था।
- जब सन्नी दोओल की गदर की शूटिंग हो रही थी यहां, तो मैं रोज ही देखने आता था। ड्राइवर मुन्ना ने कहा। पहाड़ दूर थे और हम हरे खेतों की बीच खड़े उस मंदिर को देख रहे थे, जो कम से कम तीन बार टूटा और बना था यह मंदिर। रणजीत सागर बांध की डूब में आ गया था पर अब बाहर था। मंदिर का निचला आधार दक्षिण के उत्कृष्ट वास्तु का परिचय देता था। नक्षत्र के आकार वाले चबूतरे पर मंदिर स्थित था। इससे ऊपर का हिस्सा पहाड़ी वास्तु पर बना था। सबसे ऊपर अनभ्यस्त हाथों की छाप थी। हां शिखर का आमलक पुराना ही था। मंदिर के द्वार पर पहाड़ी शैली में बने दो गंधर्वों की सुंदर मूर्तियां थीं, जिनके चेहरे पर अब कालिख पोत दी गई थी। टेराकोटा में बनी इन मूर्तियों का शिल्प खूबसूरत था पर इसके मुकाबले प्राचीन संरचना उत्कृष्ट थी।
- मंदिर के अंदर आले बने थे। भगवान वहां नहीं थे। शायद डूूब के वक्त लोगों ने यहां से उन्हें हटाकर कहीं और स्थापित कर दिया था। अब इस मंदिर में पशु बांधे जाते हैं। गोबर की गंध से मेरा सिर घूमने लगा, तो मैं बाहर आ गई। नदी घाटी-परियोजनाओं में रावी पर बना यह बांध विशालकाय है। पहले इसे थीन बांध कहा जाता था। इस पर 1982 में जब काम शुरू हुआ तब उसका कहर जम्मू-कश्मीर, हिमाचल और पंजाब ने समान रूप से झेला।
डूब की संपदा का आकलन लगभग 3800 करोड़ किया गया। रोचक यह हर बिंदु पर पंजाब सरकार ने हिमाचल सरकार को आश्वासन दिया कि मुआवजे के साथ हर विस्थापित परिवार के एक व्यक्ति को नौकरी मिलेगी। वादे वफा नहीं हुए। आज यह प्रोजेक्ट लाखों रुपए प्रतिदिन की कमाई कर रहा है। पर जो गया... वह तो गया, हरे-भरे खेत बसे बसाए घर... देवी-देवताओं के मंदिर.. जिसमें से एक मंदिर हमारे सामने था।
कितने विस्थापन झेलेगा हिमाचल...? अब रेणुका बांध की तैयारी है, फायदा दिल्ली का और तबाही हिमाचल की। विस्थापितों को मुआवजा और जमीनें मिलने के बीच कितने दशक गुजर जाएंगे, पता नहीं। अगले दिन मैं वापस लौट आई। इन तीन दिनों में मैंने बनजारों जैसे जिंदगी जी थी और तनावमुक्त हो गई थी। हां, एक और विस्थापन की आहट सुनाई देने लगी है।

पता- दिव्य हिमाचल, पुराना मटौर कार्यालय, कांगड़ा पठानकोट मार्ग,
कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश)176001
मोबाइल- 09816164058

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