February 25, 2009

शेयर मार्केट की स्थिरता में मेरा योगदान

- त्रिभुवन पांडे
मैं सब्जी वगैरह भी मंहगाई के हिसाब से उपयोग में लाता हूं। इससे दो लाभ होता है। कम वस्तु खरीदने से बाजार में वस्तुओं की कमी नहीं होती और मंहगाई की वृद्धि का मुझ पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
शेयर मार्केट में हिन्दी के एक छोटे से व्यंग्यकार का ऐसा कथा योगदान हो सकता है कि वह उसे स्थिर रखने के लिए अपनी सम्पूर्ण आर्थिक शक्ति उसमें झोंक दे। जब बुश जैसे आर्थिक भूकंप के महानायक व्हाइट हाउस में बैठकर रेक्टर स्केल से उसकी प्रभाव शक्ति नाप रहे हैं, यूरोप के पूंजी बाजार उसके भटके महसूस कर रहे हैं, भारत के रातों-रात लखपति बनने का ख्वाब देखने वाले लोग शेयर बाजार को कांपता देखकर मुश्किल से जुटाये रुपयों के डूबने की चिंता कर रहे हों तब मेरा निश्चिन्त रहना अर्थशास्त्रियों को काफी परेशान कर रहा है। इस पछाड़ खाकर गिरते शेयर मार्केट को स्थिर रखने में आखिर मेरा क्या योगदान हो सकता है। मैं जानता हूं आपको भी विश्वास नहीं हो रहा है, एडमस्मिथ और कौटिल्य को भी विश्वास नहीं होता, मुझे भी पहले स्थिरता के इस मध्यवर्गीय आर्थिक सिंद्धात पर विश्वास नहीं था लेकिन जैसे-जैसे दुनियां का बड़ा पूंजीबाजार एक के बाद एक धराशायी हो रहा है, स्थिरता के इस सिद्धांत पर मेरा विश्वास भी बढ़ता जा रहा है।
मेरा मार्केट में जो शेयर है वह सभी तरह के दबाव से मुक्त है। चावल, गेंहू, दाल, शक्कर, चाय, आलू, प्याज जैसी खाने की जरूरी चीजों में मंहगाई के बढऩे के अनुसार क्रय में कमी करता जाता हूं, इससे मार्केट में चीजों का अनुपात मंहगाई की वृद्धि के बराबर रहता है। मैं सब्जी वगैरह भी मंहगाई के हिसाब से उपयोग में लाता हूं। इससे दो लाभ होता है। कम वस्तु खरीदने से बाजार में वस्तुओं की कमी नहीं होती और मंहगाई की वृद्धि का मुझ पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
शेयर मार्केट में धन के उछाल की स्थिति हो या धड़ाम से गिरकर जमीन पर लेट जाने की इसका भी मुझ पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ता। मैं बैंक से लेनदेन के मामले में सदैव सतर्क रहा हूं। महीने में पेंशन के रूप में जो राशि जमा होती है उसमें से पचास रुपए बैंक में छोड़ देता हूं जिससे उनका काम चलता रहे। शेष रुपए निकाल लेता हूं जिससे मेरा काम चलता रहे। महीने में केवल एक बार बैंक जाने से बैंक स्टाफ भी प्रसन्न रहता है और अनावश्यक क्यू में खड़े रहने से बच जाने के कारण मुझे भी प्रसन्नता होती है। पेंशन में जो राशि मिलती है उसमें महीने भर खर्च चल जाए तो बड़ी बात होती है। शेयर मार्केट मेरी ओर से निश्चिंत हैं। उन्हें पता है कि मैं इस जन्म में शेयर मार्केट को अस्थिर करने की स्थिति में नहीं हूं, और इस दिशा में सोचना भी मेरे लिए कठिन है।
मेरा संवेदी सूचकांक साहित्य के स्थायी भाव की तरह स्थिर है। वह काफी दिनों से एक ही बिंदु पर टिका है। जब तक महंगाई भत्ता में वृद्धि नहीं होती वह इसी तरह स्थिर रहता है। कई बार छोटे-मोटे एरियर्स के कारण थोड़ी बहुत हलचल होती है लेकिन ऐसा कभी नहीं होता कि आज यदि दस हजार पर है तो कल उछल कर सीधे बीस हजार पर पहुंच जाए।
अमेरिका के निवृत्तमान राष्ट्रपति जार्ज बुश अरबों डालर झोंककर शेयर मार्केट सहित अमेरिकी आर्थिक साम्राज्य को स्थिर बनाने की कोशिश में जुटे हुए हैं लेकिन ईराक जैसे देशों में हमलों के कारण स्थिति जिस तरह चिंताजनक हुई है वह डीजल और पेट्रोल पर कब्जे के बाद भी ठीक नहीं हो सकी है। विकासशील देश के आर्थिक विशेषज्ञ भी यह बात अच्छी तरह समझ गए हैं कि उनके देश में अमेरिका की बड़ी-बड़ी कंपनियां क्यों चली आ रही हैं। आर्थिक क्षेत्र में कोई किसी की सेवा करने के लिए नहीं जाता। सब लूटने के लिए जाते हैं। ज्यादातर हुए तो लूट का थोड़ा बहुत हिस्सा उसी देश में लोक कल्याण के लिए छोड़ आते हैं।
भारत में जो आर्थिक स्थिरता है वह विश्व बंधुत्व की भावना के कारण है। मेरी भी यही स्थिति है। मैं अपने पड़ोसी से कभी नहीं लड़ता। भारत पड़ोसी देशों से नहीं लड़ता। मैं मुकदमे के खर्च से बच जाता हूं। भारत हथियारों के खर्च से बच जाता है। शेयर मार्केट में स्थिरता के लिए यह सबसे महत्वपूर्ण उपाय है।

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माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास
एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें...
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