February 25, 2009

तीन कविताएं

- डॉ. रत्ना वर्मा
डायरी के पृष्ठ
डायरी के पृष्ठों पर
मैंने जानबूझ कर छोड़ दी थी
कुछ खाली लकीरें,
इन लकीरों में
तुम थे।
गुलाब की पत्तियां
सहेज रखी थी
इन पृष्ठों पर
पत्तियों में
लिख दिया था
मैंने तुम्हारा नाम।
जिस दिन
यह पत्तियां सूख जायेंगी
इन पत्तियों से तुम्हारा नाम
आहिस्ता से उठा कर
डायरी के पृष्ठों की
खाली लकीरों पर लिख दूंगी
और यह कविता पूरी हो जायेगी।
एक शब्द कोश है तुम्हारी यादें
इस शब्द कोश से
एक-एक शब्द
बीन कर लिखी है मैंने
यह कविता
तुम्हारे नाम
जब भी तुम्हारी याद आती है
पढ़ लेती हूं यह कविता।
धूप का टुकड़ा
अपनी हथेली पर
मुटिठ्यों में बंद कर लेना चाहती हूं
टूटी हुई छत की खपरैल से
मेरे कमरे में आते हुए
इस धूप के टुकड़े को
वह हर बार
सरक जाता है
साबुन की गीली टिकिया की तरह
खिडक़ी से आती हवा
छोड़ जाती है
दीवार पर टंगी तिथियां
अब भी खुली हैं मेरी मुटिठ्यां
और फुदक रहा है धूप का टुकड़ा
मेरे कमरे में
बहुत कुछ सीखना चाहती हूं
धूप के टुकड़े से
लेकिन हर बार
जिंदगी का यह केलेंडर
मेरे बीच में आ जाता है।
बासंती खत
उतरती ठंड के हाथों
मौसम ने फिर
भेज दिया
एक बासंती खत
गुलाब की कलियों के नाम
अब
सुर्ख हो जाएंगी पंखुरियां
सुबह की गुनगुनी धूप
उतर कर
आ गई आंगन में
अब
सिलसिला शुरू होगा मनुहार का
धूप तापने बैठ जाएंगी क्यारियां
शाम की हवा
गूंजती है कानों में
मेंहदी हसन की $गज़लों की तरह
लौट रहे हैं चहकते हुए
नर-मादा के जोड़े
अपने पंखों से हवा को काटते हुए
अब
बजेंगी कहीं मधुर संबंधों की सारंगियां
मौसम ने फिर
भेज दिया
एक बासंती खत।
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1 Comment:

राजेश उत्‍साही said...

रत्‍नाजी बहुत सुंदर कविताएं हैं।

लेखकों से अनुरोध...

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