March 21, 2009

जीवन का नृत्य

जीवन का नृत्य
- शैफाली

आपने कभी जीवन को नृत्य करते देखा है? नहीं? फिर वो क्या था, जो उसकी आंखों में आंसू बनकर छलक आया था, जब वह अकेली रसोई में रोटी सेंक रही थी और तपते तवे पर जली हुई रोटी को ऐसे हटा रही थी, जैसे उसका कोई सपना गृहस्थी के चूल्हे पर राख हो रहा हो। फिर अचानक उसकी बेटी पीछे से आकर उसका पल्लू खींचती है, तो रोटी के डिब्बे से सबसे नरम रोटी पर खूब सारा घी लगाकर उसे यूं देती है, जैसे अपने किसी सबसे सुंदर सपने का निवाला उसके मुंह में डाल रही हो कि मैं न सही मेरी बेटी वो सपना पूरा करेगी। रोटी के हर कौर के साथ जैसे शपथ ले रही हो कि कुछ भी हो जाए, अपनी बेटी के सपनों को इस रसोई की भट्टी में जलने नहीं देगी।

मुझे जीवन का नृत्य तब भी दिखाई दिया था, जब घर में उसे सबसे बागी करार दिया गया था, जब उसने पिता की मृत्यु के बाद उनकी सरकारी नौकरी को लेने से मना कर दिया था, क्योंकि वह सॉफ्टवेयर इंजीनियर बनना चाहता था। मध्यमवर्गीय परिवार का इकलौता बेटा अपनी बड़ी बहन की तनख्वाह पर अपना सपना पाल रहा था...कि एक दिन इसी बहन के कदमों में ढेर सारे रुपए लाकर रख देगा जब उसे किसी बड़ी कंपनी में नौकरी मिल जाएगी।

जीवन का नृत्य तब भी देखा था, जब उसका सांवला रंग और भारी शरीर पुरुष की स्वप्न सुंदरी के पैमाने में फिट नहीं बैठ पा रहा था और उसने आजीवन विवाह न कर आश्रम से सबसे सांवली लड़की को गोद ले लिया था।

जीवन को उस डिस्को थेक पर भी नृत्य करते देखा है, जहां खुली पीठ पर बने टैटू सिगरेट के धुएं में धुंधले पड़ जाते हैं। प्रेम का स्पर्श देह से लिपटकर सड़ जाता है।

कभी अधूरे सपने पर तो कभी सपने के पूरा हो जाने पर, कभी प्रेम की लय में थिरकते हुए, कभी उदासी की बांहों में झूमते हुए, कभी अपनों से लड़कर तो कभी किसी अजनबी का हाथ पकड़ लहराते हुए, कभी संस्कारों के मंदिर में, कभी आधुनिकता के मंच पर, हर जगह मैंने जीवन को नृत्य करते हुए देखा है।

कोई वंचित नहीं रहता जीवन के नृत्य से, लेकिन अपने नृत्य में जो निपुण हो जाता है वह कृष्ण का रास हो जाता है, शिव का तांडव हो जाता है और फिर लोग कभी-कभी यह भी कह उठते हैं- पग घुंघरू बांध मीरा नाची रे......
जब मौन पिघल जाता है......

संवादों के पुल पर खड़े थे हम दोनों और नीचे खामोशी की नदी बह रही थी न जाने कौन-सा शब्द बहुत भारी हो गया कि जब चलने को हुए तो पुल टूट गया...

बहुत कठोर-सी वस्तु थी वह जो हमें एक-दूसरे के बीच अनुभव हो रही थी। गुस्से की आग, स्पर्श का कुनकुनापन, देह की अगन, ईष्र्या की जलन कोई भी उस कठोर वस्तु को पिघलाने में कामयाब नहीं हो सका। यूं ही समय आता, हमसे किनारा कर निकल जाता। हम चेहरे पर उम्र की लकीरें खींच रहे थे, किस्मत हाथों पर।

दूरियों ने अपने कदम तेज कर लिए थे, लेकिन यादें और शिकायतें बहुत धीरे-धीरे चल रही थीं। कहीं सुना था- 'स्लो एंड स्टडी ऑल्वेज़ वींसÓ, तो जो धीरे चल रहा था वह जीत गया और जो तेज कदमों से चलने के बाद रास्ते में सुस्ताने बैठ गया, वह हार गया।

दूरियां हार गईं, यादें जीत गईं, आंसुओं को इनाम में पाया तो शिकायतें धुंधला गईं। बहुत दिनों बाद फिर सामना हुआ, कोई वस्तु अब भी बीच में अनुभव हो रही थी, लेकिन वह कठोर नहीं थी समय की आग ने उसे थोड़ा नर्म कर दिया था। सुनाने के लिए अलग-सा कुछ नहीं था, मन की व्यथा एक जैसी और जानी पहचानी-सी थी। हम कुछ कहते इससे पहले ही मौन पिघल चुका था। अपनी-अपनी बातों को उसमें डुबोकर आंखों में सजा लिया।

मन की कड़वाहट, शिकायतें, गुस्सा जब मौन को इतना कठोर कर दें कि प्रेम का कोई स्पर्श उसे पिघला न सके, तो उसे समय के हाथ में सौंप दो। समय के हाथों में बहुत तपिश होती है, उसकी बांहों में आकर मौन पिघल जाता है...

और फिर से शुरू होता है बातों का सिलसिला, असहमति, तकरार, शिकायतें, अपेक्षाएं ... और दूर कहीं प्रेम मुस्कुरा रहा होता है, समय का हाथ थामे...

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