February 25, 2009

पिछले दिनों /आयोजन

मुक्तिबोध नाट्य समारोह और आसिफ के चित्र
पिछले माह इफ्टा और प्रगतिशील लेखक संघ रायपुर के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित 12 वें मुक्तिबोध नाट्य समारोह एवं कला उत्सव में चित्रकार स्वर्गीय आसिफ की एकल चित्रकला प्रदर्शनी का प्रसिद्ध आलोचक डॉ. नामवार सिंह ने उद्घाटन किया। आसिफ के इन चित्रों में प्रकृति की सुंदरता और ग्रामीण पृष्ठभूमि के विभिन्न आयाम नजर आ रहे थे। आसिफ की गहरी संवेदनशीलता को उसकी गतिशीलता के साथ हम आज भी समझ सकते हैं।
नाट्य समारोह के अवसर पर नामवर जी ने कहा कि - मुक्तिबोध ने अंधेरे में कविता लिखी। अंधेरा आज और गहरा हो गया है, इस अंधेरे के कई रूप हैं। यह सब कुछ मुक्तिबोध ने पहले देख लिया था। जो बारात अंधेरे में दिखती थी वह अब दिन दहाड़े दिखती है। यह दूरदृष्टि जिस कहानीकार या कवि में मिल सकती है वह मुक्तिबोध है। अंधेरा गहरा होता जा रहा है जिस अंधेरे का जिक्र उन्होंने अपनी रचनाओं में किया था उस लड़ाई से संघर्ष की ताकत और जीतने का विश्वास मुक्तिबोध से मिल सकता है। कार्यक्रम में प्रगतिशील लेखक संघ के महासचिव प्रभाकर चौबे, इप्टा के अध्यक्ष मिनहाज असद, राजेश श्रीवास्तव, आनंद हर्षुल, आलोक वर्मा, रवीन्द्र शाह और संयोजक सुभाष मिश्रा के साथ आमंत्रित रचनाकार एवं संस्कृतिकर्मियों ने प्रदर्शनी का अवलोकन करते हुए आसिफ को याद किया।
चिरंजीव दास स्मृति व्याख्यान माला
संस्कृति विभाग छत्तीसगढ़ शासन के सहयोग से 21 जनवरी को प्रतिवर्ष रायगढ़ में होने वाले चिरंजवी दास स्मृति व्याख्यान माला एवं एकल काव्य पाठ्य में देश के शीर्षस्थ कवि जिन्हें हाल ही में उत्तरप्रदेश सरकार द्वारा भारत भारती पुरस्कार से सम्मानित केदारनाथ सिंह का काव्य पाठ हुआ। उन्होंने लगभग एक घंटे तक अपनी कविताओं से श्रोताओं को अभिभूत किया। तथा चिरंजीव दास को एक महत्वपूर्ण कवि बताते हुए कहा कि यह क्षेत्रीय स्तर का बहुत बड़ा काम है इसकी गूंज राष्ट्रीय धारा तक पहुंचे ऐसा प्रयास किया जाना चाहिए।
इस अवसर पर केदारनाथ सिंह के काव्य व्यक्तित्व को रेखांकित करते हुए आलोचक प्रभात त्रिपाठी ने कहा कि केदारनाथ सिंह की कविता पिछले 50 वर्षों के इतिहास का एक प्रमाणित दस्तावेज है। उनकी कविता ग्रामीण जीवन से जुड़ी हुई होकर भी आधुनिक सभ्यता के संघर्षों को केंद्र में रखती है।
व्याख्यान माला के अंतर्गत इस वर्ष साहित्य अकेदमी से पुरस्कृत संस्कृत कवि तथा विद्वान प्रोफेसर अभिराज राजेन्द्र मिश्र ने भारतीय समाज का दर्पण- संस्कृत वाग्डमय पर अपना व्याख्यान दिया। प्रो मिश्र ने चिरंजीवदास को एक महान संस्कृत सेवी बताते हुए कहा कि संस्कृत का साहित्य पांच हजार वर्षों का साहित्य है तथा जब तक संस्कृत का वर्चस्व है तब तक भारत राष्ट्र की अस्मिता बनी हुई है।
पुस्तक लोकार्पण एवं काव्य पाठ
छत्तीसगढ़ लोक संस्कृति अनुसंधान संस्थान के तत्वाधान में पिछले माह रायपुर छत्तीसगढ़ में आयोजित समारोह में नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया द्वारा प्रकाशित रमेश अनुपम की पुस्तक, छह सौ वर्षों की सुदीर्घ काव्य यात्रा का संचयन 'जल भीतर इक बृच्छा उपजै' का लोकार्पण किया गया। इस अवसर पर केदार नाथ सिंह, विनोद कुमार शुक्ल, ज्ञानेन्द्रपति, विश्वरंजन, सुधीर सक्सेना, स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी, जगदीश उपासने, अजय कुमार, देवी प्रसाद वर्मा, राजेन्द्र मिश्र जैसे प्रसिद्ध साहित्यकार उपस्थित थे।
इसी मंच पर मेधा बुक्स दिल्ली से प्रकाशित तीन काव्य संग्रहों का भी आमंत्रित अतिथियों ने लोकार्पण किया- 'उठाता है कोई एक मुट्ठी ऐश्वर्य' (जया जादवानी) 'सफेद से ही कुछ दूरी पर पीला रहता था' (संजीव बख्शी) तथा 'लौटता हूं मैं तुम्हारे पास' (रमेश अनुपम)। उपरोक्त कार्यक्रम में मेधा बुक्स से प्रकाशित किताबों पर चर्चा हुई एवं केदारनाथ सिंह, विनोद कुमार शुक्ल ज्ञानेन्द्र पति, विश्व रंजन तथा सुधीर सक्सेना की कविताओं का काव्य पाठ हुआ।

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