January 19, 2009

क्या खूब कही

                                    एक फोन से पूरी होती हैं मुराद ...



मनुष्य अपनी मुरादें पूरी करने के लिए लम्बी लम्बी यात्राएं कर भगवान के द्वार जाता है, लेकिन हाईटेक होती इस दुनिया में ईश्वर तक अपनी फरियाद पहुंचाने के लिए भक्तों ने फोन का इस्तेमाल शुरू कर दिया है। अब तक इंदौर के जूना चिंतामन गणेश मंदिर में भक्त पत्रों के जरिए अपनी बात भगवान तक पहुंचाते ही थे, लेकिन अब तो पत्र लिखना पुराने जमाने की बात हो गई है सो उनके भक्त अब उन्हें फोन के जरिए अपनी मुराद पूरी करने की मन्नते मांगने लगे हैं।

मान्यता है कि इंदौर के जूना चिंतामन के गणेश जी से मांगी गई मन्नत जरूर पूरी होती है। इस मंदिर के पुजारी मदन लाल पाठक देश विदेश से प्राप्त भक्तों के पत्रों में लिखी समस्याओं को पढक़र गणेशजी को सुनाते हैं। जिन भक्तों की परेशानियां दूर हो जाती हैं वे धन्यवाद पत्र भी लिखते हैं। लेकिन हाई टेक के इस युग में अब भगवान को अपनी मुराद या परेशानी सुनाने के लिए पुजारी जी ने मोबाइल का इस्तेमाल शुरू कर दिया है।

पुजारी अपना मोबाइल गणेशजी के कान में लगा देते हैं और भक्त अपनी बात उनसे कह डालते हैं। गणेश जी तो संकट मोचन हैं ही, लेकिन लगता है गणेश जी ने कम्प्यूटर का इस्तेमाल करना शुरू नहीं किया है, नहीं तो वे अब तक इमेल से अपने भक्तों की समस्याएं सुनते और एक इमेल से ही अपने भक्तों की मन्नते पूरी होने का अर्शीवाद देते। तो जागिए गणेश जी जमाना ईमेल का है आप कब तक उन्नीसवीं सदी में अटके रहेंगे, आपके भक्त तो 21वीं सदी के पार जा चुके हैं।

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                                     बूढ़े बिल्ले ने पहने कांटैक्ट लेंस



पालतू जानवर पालना आसान नहीं होता, क्योंकि उनकी देखभाल मनुष्य के बच्चे से भी ज्यादा करनी पड़ती है। और यदि आपका कुत्ता या बिल्ली बीमार पड़ जाए तब तो चिंता और भी ज्यादा बढ़ जाती है। पालतू जानवरों के संदर्भ में अक्सर यह देखा गया है कि जब तक वह स्वस्थ होता है मालिक का दुलारा बना रहता है बीमार होते ही उसकी उपेक्षा होने लगती है, लेकिन अर्नेस्ट नाम के 15 साल के बिल्ले की किस्मत कुछ ज्यादा ही अच्छी है, जब अर्नेस्ट की आंखे उम्र बढऩे के साथ कमजोर होने लगीं तो वह उदास सा रहने लगा और पहले की तरह भाग दौड़ करने में अपने को असहाय महसूस करने लगा। अर्नेस्ट के मालिक पाल उसकी इस परेशानी से दुखित हो गए और उन्होंने उसका इलाज कराने की सोची। अर्नेस्ट की आंखों की रोशनी कम होने पर उन्होंने उसकी आंखों में कांटैक्ट लेंस लगवाना उचित समझा, क्योंकि बुढ़ापे में आपरेशन काफी जोखिम भरा हो सकता था।

अर्नेस्ट भी आंखों में लेंस लगाए जाने के बाद बेहद खुश है। अर्नेस्ट कांटैक्ट लेंस पहनने से पहले ठीक से देख नहीं पाता था। यहां तक कि उसे यह पता भी नहीं चलता था कि वह किधर जा रहा है। कांटैक्ट लेंस लगाने के बाद तो चमत्कार ही हो गया। अब अर्नेस्ट न सिर्फ अपनी आंखे पूरी तरह खोल सकता है बल्कि अच्छे से देख भी पाता है। पर कांटैक्ट लेंस के कुछ फायदे हैं तो दिक्कतें भी कम नहीं है। इसे लगाने वाले व्यक्ति को काफी सावधानी और सतर्कता बरतनी होती है। ऐसे में किसी बिल्ले का कांटैक्ट लेंस लगाने की बात आपको अजीब लग सकती है। लेकिन जिसके पाल जैसे मालिक हों उन्हें इसकी क्या चिंता। अर्नेस्ट तो कांटैक्ट लैंस लगाकर बूढ़ापे में जवान महसूस कर रहा है और फिर से भाग- दौड़ करके अपने मालिक के प्रति आभार व्यक्त कर रहा है।

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