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Dec 14, 2013

हरसिंगार

                 हरसिंगार
                                       
                                  - नलिनीकान्त

1
स्वर्ण कलश
शीश पर ले खड़ी
उषा कुमारी।

2
उषा रानी का
सुहाग का सिंधौरा
ललका गोला।

3
श्लोक पे श्लोक
पढ़ रहे पखेरू
भिनसार से।

4
आसमान पर
इतनी कविताएँ
छापी किसने!

5
धन्य चन्दन
जिधर से रगड़ो
देता सुगन्ध।

6
किस सीढ़ी से
अँगना में उतरी
किरण  परी?

7
बूढ़े नीम के
शीश पे ललछौंही
फागुनी टोपी।

8
वन-बाग में
खड़े नागा संन्यासी
आया वसन्त।

9
हवा चूमती
तो बोलने लगते
मौन पत्ते भी।

10
बाँध लेती है
भीगे आँचल में माँ
दु:ख का घर।

11
पहन टोपी
लाल, खुशबू बाँटे
हरसिंगार।

12
हीरक -जड़े
झुमके लाल-लाल
बाँटो पलाश।

13
दल के दल
बादल, बजा रहे
जोर माँदल।

14
मीठी मुस्कान
किसी चेहरे का है
इन्द्रधनुष।

15
वर्षा की बूँदें
टीन छत  पे गातीं
मेघ मल्हार।

16
लड़ें बादल
चमकी तलवारें
बिजलियों की।

17
पहाड़ों पर
देखो बना रहे
मेघ झोंपड़ी।

18
भूखे जनों को
नेता देते बधाई
खा के मलाई।

19
हरसिंगार
पहन टोपी लाल
चले बारात।

20
सरस्वती है
छिपी लुप्त नदी-सी
ढूँढ़ो अन्दर।

21
झाऊ वन में
लेटी है चाँदनी
चितकबरी

22
लाल है फ़्रॉक
दुपट्टा भी है लाल
उषा के गात।

23
सठिया गए
बच्चे, भूले जब से
परी-कथाएँ।

 लेखक के बारे में- जन्म -1-7-1925, स्थान-बन्दनहार, सन्ताल परगना, झारखण्ड विविध विधाओं की 17 पुस्तकें प्रकाशित, ‘कविता श्री’ मासिक का 46 वर्ष तक सम्पादन।
सम्पर्क: कविताश्री प्रकाशन, उत्तर बाज़ार, अण्डाल ( पश्चिमी बंगाल)-713 321 फोन- 9474699126

क्यों गाते हैं पक्षी?

क्यों गाते हैं

पक्षी?

-डॉ.अरविन्द गुप्ते

सुबह-सुबह होने वाला पक्षियों का कलरव किसे अच्छा नहीं लगता? कई पक्षियों के गीत मनुष्य को हमेशा से लुभाते आए हैं। भारत में गाने वाले पक्षियों में सबसे अधिक सराहना शायद कोयल को मिली है। कोयल से भी मधुर गाने वाले पक्षी हमारे देश में हैं, किन्तु पूरे देश में पाए जाने और मनुष्य के बहुत करीब रहने के कारण कोयल ने पहला स्थान पा लिया है। पक्षी यह मधुर गाना क्यों गाते हैं? अपने स्वयं के मनोरंजन के लिए या औरों को सुनाने के लिए?
सभी जंतुओं को एक-दूसरे से संवाद या संप्रेषण करने की ज़रूरत होती है और इसके लिए वे अलग-अलग तरीके अपनाते हैं। कई जंतु इशारों से संवाद करते हैं तो कई ध्वनि पैदा करके।
रीढ़ की हड्डी वाले जंतुओं में ध्वनि पैदा करने की व्यवस्था सबसे अधिक विकसित होती है, और इनमें भी सबसे अधिक है पक्षियों और स्तनधारियों में। संसार के सभी जंतुओं की तुलना में ध्वनि से संवाद करने की (यानी बोलने की) क्षमता मनुष्य में सबसे अधिक विकसित होती है। शायद मनुष्य के बाद ध्वनि की विविधता में अन्य स्तनधारियों की बजाय पक्षियों का ही नंबर आता है।
इनकी आवाज़ें दो प्रकार की होती है। एक तो वह जिसे हम 'गाना’कहते हैं। आम तौर पर यह ध्वनि विशिष्ट ऋतु में (यानी उस पक्षी के प्रजनन काल में) और अधिकतर नर के द्वारा पैदा की जाती है। उसी प्रजाति के अन्य नर के लिए किसी नर के गायन का मतलब होता है 'मेरे इलाके से दूर रहना’, जबकि वहाँ से गुज़रने वाली मादा के लिए इसका मतलब होता है- 'ज़रूरत है, ज़रूरत है एक श्रीमती की’। कुछ प्रजातियों में नर का गायन केवल दूसरे नरों को चेतावनी देने के लिए होता है ,तो अन्य कुछ प्रजातियों में केवल मादा को आकर्षित करने के लिए। किन्तु अधिकतर प्रजातियों में यह दोनों काम करता है।
मान लीजिए कि कोई नर दहियल (मैगपाय रॉबिन) पेड़ पर बैठ कर गा रहा है तो वह एक साथ निम्नलिखित घोषणाएँ कर रहा होता है 'मैं दहियल हूँ; मैं एक नर दहियल हूँ; मैं फलाना नर दहियल हूँ; मैं अपने क्षेत्र में हूँ; इस क्षेत्र में कोई अन्य नर दहियल आया तो मैं उसका सामना करूँगा; और मुझे एक मादा की ज़रूरत है।‘
आम तौर पर 'गाने’  का मतलब होता है ऐसी आवाज़ जिसमें लय और ताल हो और जो मनुष्य को मधुर लगे। इस दृष्टि से देखा जाए तो कुछ ही पक्षियों की आवाज़ को गाना कहा जा सकता है। किन्तु पक्षियों और अन्य जंतुओं के संदर्भ में गाने का आशय उस आवाज़ से है जो एक नर दूसरे नरों को चेतावनी देने और मादाओं को आकर्षित करने के लिए पैदा करता है। नर मोर और नर कौए द्वारा की गई कर्कश आवाज़ और नर उल्लू की हूक को मनुष्य भले ही गाना न माने, किन्तु जीव विज्ञान की दृष्टि से यह भी गाना ही है। इसी प्रकार, झिंगुरों की चीं-चीं और मेंढकों की टर्र-टर्र भी वैज्ञानिक दृष्टि से 'गाने’  हैं क्योंकि उनका उद्देश्य मादाओं को आकर्षित करना होता है।
हम अक्सर कहते हैं, 'कोयल गा रही है’। किंतु वास्तव में वह गा रही नहीं, बल्कि गा रहा होता है; क्योंकि केवल नर कोयल ही गाता है, मादा तो सिर्फ किक्-किक् की आवाज़ ही कर पाती है। दूसरी गौरतलब बात यह है कि नर कोयल पूरा काला होता है और मादा चितकबरी। इसलिए वह आसानी से दिखाई नहीं देती। नर केवल प्रजनन काल में ही, यानी फरवरी से मई तक, गाता है।
पक्षियों की दूसरे प्रकार की आवाज़ के कई उद्देश्य होते हैं जो गाने के उद्देश्य से अलग होते हैं। इनमें एक-दूसरे को खतरे की चेतावनी देना, बच्चों को खतरे की चेतावनी देना, भोजन मिल जाने पर बच्चों को बुलाना, चोट लगने पर कराहना, अपनी प्रजाति के सदस्यों को इकट्ठा करना आदि कई बातें शामिल हैं। हर प्रजाति में हर काम के लिए अलग-अलग ध्वनि होती है।
अंग्रेज़ी में गाने को सॉग और अन्य ध्वनियों को कॉल (पुकार) कहते हैं।

गायन
गाने की अवधि के अलावा गाने वाले की स्थिति भी बहुत महत्त्वपूर्ण होती है ताकि उसकी आवाज़ अधिक से अधिक दूरी तक पहुँच सके। ऐसा करने पर इनकी आवाज़ उनकी प्रजाति के अधिक से अधिक नरों तक और अधिक से अधिक मादाओं तक पहुँचती है। इसके लिए कई प्रजातियों के नर किसी ऊचे पेड़ की चोटी या भवन की छत पर बैठ कर गाते हैं। जो पक्षी ऐसे पर्यावरण में रहते हैं जहाँ ऊँचे पेड़ न हों या जो ज़मीन पर रहते हैं, वे हवा में उड़ान भर कर अपनी तान सुनाते हैं, जैसे चंडूल (लार्क) नामक पक्षी। जो पक्षी रात के समय सक्रिय होते हैं (जैसे उल्लू) या घनी झाड़ियों में रहते हैं उनकी आवाज़ तेज़ होती है।
ऑस्ट्रेलिया में पाए जाने वाले लायर बर्ड नामक पक्षी के नर घनी झाड़ियों के कारण एक-दूसरे को 3-4 मीटर की दूरी पर भी देख नहीं पाते, किंतु इनकी आवाज़ इतनी तेज़ होती है कि वे एक-दूसरे से लगभग एक किलोमीटर की दूरी रखते हैं। ग्रेट टिट प्रजाति में पाया गया है कि घने जंगलों में रहने वाले नरों की आवाज़ खुले मैदानों में रहने वाले नरों से अधिक तेज़ होती है। यहाँ तक कि शहरी क्षेत्र में रहने वाले ग्रेट टिट नरों की आवाज़ भी अधिक तेज़ पाई गई है जो कारों के शोर के बीच सुनाई पड़ जाती है।
गायन की अवधि की लंबाई और स्वरों की विविधता से फर्क पड़ता है। अधिक अच्छी तरह गाने वाला नर दूसरे नरों को अधिक डरा सकता है और अधिक मादाओं को आकर्षित कर सकता है। चूँकि पक्षियों के प्रजनन काल का समय निश्चित होता है, इस अवधि में नर अधिक समय तक गाते हैं ; क्योंकि उन्हें अपने क्षेत्र की घोषणा के साथ-साथ मादा को आकर्षित भी करना होता है। शेष समय में नर केवल क्षेत्र की घोषणा करने के लिए ही गाते हैं।
यूरोप में पाए जाने वाले फुटकी (सेज वार्बलर) नामक प्रजाति के पक्षी ठंड के मौसम में अफ्रीका चले जाते हैं और वसंत ऋतु में यूरोप लौट आते हैं। इनके नर पक्षी पहले यूरोप पहुँच कर अपना-अपना क्षेत्र निर्धारित कर लेते हैं और फिर दूसरे नरों को खदेडऩे के साथ दिन-रात गाते रहते हैं। अत: इनका गाना क्षेत्र की घोषणा करने के लिए न होकर केवल मादाओं को आकर्षित करने के लिए होता है। दूसरे नरों को तो वे पीछा करके खदेड़ते हैं।
अब सवाल यह उठता है कि ये पक्षी रात में भी क्यों गाते हैं? इसका कारण यह है कि प्रवासी पक्षी दिन के साथ रात में भी सफर करते हैं। क्या पता कोई मादा अफ्रीका से रात में आ रही हो। अत: अपने को तो दिन-रात गाते रहना चाहिए ताकि कोई न कोई मादा तो अपनी पुकार सुन ही ले। मज़ेदार बात यह है कि जैसे ही किसी नर का गाना सुन कर मादा उसके साथ संसार बसाने आ जाती है, उसका गाना अचानक बंद हो जाता है।
ग्रेट टिट नामक पक्षी गाना शून्य डिग्री करने से पहले ही जोड़ी बना लेते हैं। अत: इस प्रजाति के नर का गाना केवल अपने क्षेत्र की रक्षा करने के लिए होता है। किंतु यदि किसी जोड़ी की मादा मर जाए या अन्यत्र चली जाए तो वही नर छह गुना जोश के साथ गाना शून्य डिग्री कर देता है ;ताकि मादाओं को पता चल जाए कि इस विरही को एक संगिनी की आवश्यकता है।

भोर के समय गायन क्यों?
अधिकतर पक्षी पौ फटने से पहले जाग जाते हैं और गाना शून्य डिग्री कर देते हैं। उस समय अंधेरा होने के कारण उनका भोजन, यानी कीड़े, सक्रिय नहीं होते। अत: उजाला होने से पहले के समय का उपयोग वे अपने क्षेत्र की घोषणा करने के लिए कर लेते हैं। अँधेरे में दूसरा नर गाने वाले को देख नहीं सकता;किन्तु सुन सकता है और गाने वाले के क्षेत्र में घुसने की गुस्ताखी नहीं करता। उजाला होने पर गाने वाला और सुनने वाला दोनों अपना-अपना भोजन जुटाने में व्यस्त हो जाते हैं। दूसरा कारक यह होता है कि भोर के समय अन्य शोर नहीं होता या बहुत कम होता है और गाने की आवाज़ दूर तक जा सकती है। तीसरे, इस समय हवा भी नहीं चलती, या चलती भी है तो हल्की होती है। यह पाया गया है कि इन सब कारकों के चलते पक्षियों का भोर का गाना दोपहर की तुलना में बीस गुना अधिक स्पष्टता से सुनाई देता है।
इसी तरह शाम का गायन या सांध्यगान भी होता है किंतु आम तौर पर इसकी अवधि प्रभात गान से कम होती है।
नर पक्षी को गाने में काफी ऊर्जा लगानी पड़ती है- लगभग उतनी ही जितनी कि उसे उडऩे में खर्च करनी पड़ती है। किंतु चूँकि सवाल अपने क्षेत्र की रक्षा करने का और मादा को आकर्षित करने का होता है, नर पक्षी इस बात की परवाह नहीं करते कि उन्हें गाने के लिए कितना परिश्रम करना पड़ता है। यलो हैमर नामक प्रजाति का नर एक दिन में लगभग 3000 बार तान छेड़ता है यानी एक मौसम में पाँच लाख बार!
ज़ाहिर है कि हर पक्षी प्रजाति के गाने की आवाज़ दूसरी प्रजाति की आवाज़ से भिन्न होती है। इसके आधार पर उस प्रजाति के अन्य नर और मादाएँ गाने वाले को पहचानते हैं। यह भी पाया गया है कि कम से कम कुछ प्रजातियों में उसी प्रजाति के नरों की आवाज़ भी एक-दूसरे से भिन्न होती है। यदि किसी स्थान पर एक ही प्रजाति के तीन नर पक्षी रहते हैं तो वे एक-दूसरे की आवाज़ पहचानने लगते हैं और अपने-अपने क्षेत्र में शांतिपूर्वक रहते हैं। किंतु यदि इनमें से किसी भी नर के क्षेत्र में चौथे बाहरी नर की आवाज़ का टेप बजाया जाए तो वह तुरंत उत्तेजित हो जाता है और घुसपैठिए की तलाश करने लगता है।
कई प्रजातियों के नरों का गाना बहुत संक्षिप्त होता है, जबकि अन्य प्रजातियों के नर लंबी-लंबी तानें छेड़ते हैं। एक ही प्रजाति के नरों में गाने की अवधि और तीव्रता भी भिन्न-भिन्न होती है।
सवाल यह उठता है कि यदि गाने का उद्देश्य समान है 'अपने क्षेत्र की रक्षा करना और मादा को आकर्षित करना’तो यह भिन्नता क्यों? इसका जवाब विकास की प्रक्रिया के दौरान लैंगिक चयन से जुड़ा है। यह देखा गया है कि जो नर अधिक तेज़ आवाज़ में गाते हैं वे अपने क्षेत्र की रक्षा अधिक अच्छी तरह कर सकते हैं और उनकी ओर मादाएँ भी जल्दी आकर्षित होती हैं।

युगल गीत
पक्षियों की कई प्रजातियों के नर और मादा मिल कर दो गाने गाते हैं। अफ्रीका में पाई जाने वाली लटोरे (श्राइक) की कुछ प्रजातियों के नर और मादा के दो गाने में इतना अच्छा तालमेल होता है कि यह पहचानना कठिन होता है कि यह आवाज़ एक पक्षी की न होकर दो पक्षियों की है। हरिद्वार के गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय में हुए शोध से पता चला है कि पिद्दा (बुशचैट) नामक प्रजाति की मादा भी कई परिस्थितियों में, जैसे घोंसला बनाते समय, अंडे सेते समय या घुसपैठियों को चेतावनी देने के लिए गाती हैं। किंतु इनका गाना नर पक्षियों की तुलना में काफी संक्षिप्त होता है।

पुकार
पुकार के कई उद्देश्य होते हैं। अपने साथियों को खतरे की सूचना देना एक प्रमुख उद्देश्य होता है। खतरा आसमान में है (उडऩे वाला शिकारी पक्षी) या ज़मीन पर (सांप या बिल्ली या अन्य कोई खतरनाक जंतु) यह दर्शाने के लिए अलग-अलग ध्वनियाँ होती हैं। जब कोई कौआ दुर्घटनावश मर जाता है तब कोई अन्य कौआ एक विशिष्ट प्रकार की ध्वनि करता है, जिसे सुन कर आस-पास के सब कौए वहाँ पहुँच जाते हैं। इसके बाद वे कुछ अलग प्रकार की ध्वनि करते हैं जो शोकसभा में दिए जा रहे भाषण की तरह लगती हैं। किसी मुर्गी को अपने नवजात चूज़ों के साथ भोजन ढूँढ़ते देखना भी एक रोचक अनुभव होता है। मुर्गी लगातार एक ध्वनि करती रहती है मानों वह बच्चों से कह रही हो कि मेरे पीछे-पीछे आओ। जब उसे भोजन मिल जाता है तब वह एक अलग प्रकार की ध्वनि करती है जिसे सुन कर सारे चूज़े दौड़ कर वहाँ पहुँच जाते हैं।
जब आकाश में बाज़ के समान कोई खतरा दिखाई देता है तब मुर्गी अलग प्रकार की चेतावनी ध्वनि करती है जिसे सुन कर चूज़े दौड़ कर इधर-उधर छुप जाते हैं। बिल्ली या लोमड़ी या कुत्ते के रूप में ज़मीनी खतरा होने पर मुर्गी अलग आवाज़ में पुकार करती है। ऐसे समय चूज़े बुत बनकर अपने स्थान पर ठिठक जाते हैं।
इसी प्रकार हर प्रजाति में झुंड से अलग हो जाने, अपने जोड़ीदार से अलग हो जाने, घायल हो जाने, चूज़ों द्वारा माता या पिता से भोजन माँगने, भोजन माँगते चूज़ों को खतरे की चेतावनी देकर चुप कराने आदि के लिए अलग-अलग ध्वनियाँ होती हैं। मज़ेदार बात यह है कि ज़मीनी खतरे की चेतावनी देने के लिए लगभग सारी प्रजातियाँ एक-सी ध्वनि करती हैं ताकि आस-पास के सब पक्षी सावधान हो जाएँ।


नकलची पक्षी
कुछ पक्षी पैदा होते ही अन्य पक्षियों की, जंतुओं की और निर्जीव चीज़ों की आवाज़ों की नकल करने लगते हैं। भारत में पाए जाने वाले भुजंगा (ड्रैंगो) और लटोरा (श्राइक) पक्षी बहुत अच्छे नकलची होते हैं। ये अन्य पक्षियों की आवाज़ के अलावा अन्य जंतुओं और निर्जीव वस्तुओं (जैसे कार का हॉर्न) की भी नकल कर लेते हैं। एक लटोरा तो कुत्ते के पिल्ले की आवाज़ की नकल करते हुए पाया गया था। घने जंगल में पिल्ले की आवाज़ सुन कर लोग चौंक पड़ते थे। इसी प्रकार, इंग्लैंड में पाए जाने वाले स्टरलिंग नामक पक्षी ने रेफरी की सीटी की आवाज़ की नकल करके फुटबॉल मैच में खलल डालना शून्य डिग्री कर दिया था। भारत में पाई जाने वाली पहाड़ी मैना मनुष्य के बोलने की इतनी अच्छी नकल कर लेती है कि उसका अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया है। (स्रोत फीचर्स)

कब तक पहुँचेगी परिवर्तन की किरण

ब्रजवासी महिलाएँ

कब तक पहुँचेगी परिवर्तन की किरण

- देवेन्द्र प्रकाश मिश्र

इक्कीसवीं सदी की कल्पना वाले आजाद भारत में महिला सशक्तीकरण और उनके उत्थान के लिये चल रही तमाम योजनाओं के बावजूद उत्तर प्रदेश मूल की ब्रजवासी जाति की महिलाएँ समाज में उपेक्षित है ही साथ में औरतों व लड़कियों की खरीद-फरोख्त की परम्परा भी इस जाति में बदस्तूर जारी है। इस कारण नाच-गाकर लोगो के मनोरंजन का साधन बनी ब्रजवासी महिलाएँ अशिक्षा व रूढ़वादिता की अँधेरी सुरंग में जागरूकता के अभाव के कारण घुट-घुट कर जिन्दा रहने को विवश हैं। उत्तर प्रदेश में ही नहीं पूरे भारत में इस जाति की बेबश महिलाओं की दयनीय स्थिति महिला उत्थान एवं महिला सशक्तीकरण के दावों की पोल खोल रही है। हिन्दुस्तान के पुरूष प्रधान समाज में महिलाओं को पुरूषों के समान बराबर का दर्जा दिलाने के लिये सरकारी तौर पर तमाम कार्यक्रम चलाये जा रहें हैं साथ ही साथ अनेक सामाजिक, स्वैच्छिक व महिला संगठन प्रदेश व राष्ट्रीय स्तर पर महिलाओं को अधिकार और सम्मान दिलाने के लिये संघर्ष काम कर रहे हैं;लेकिन इनके क्रियाकलापों को अगर यथार्थ के आइने में देखा जाए तो इनके द्वारा किये जा रहे तमाम प्रयास ब्रजवासी जाति की महिलाओं के लिये बेमानी और खोखले होकर रह गये हैं। परिवार को आजीविका चलने में अहम व महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के बाद भी इस जाति की महिलाओं को 'दोयम दर्जा’ मिला ही है साथ में पति की प्रताड़ना और अत्याचार तथा सभ्य समाज की गालियाँ सुनना इनके किस्मत की नियति बन गई है। ब्रजवासी जाति और समाज से संबन्धित की गई खोजबीन के बाद जो कहानी उभरकर सामने आई है उसमें महिलाओं की दशा काफी दयनीय, निरीह एवं अबला नारी वाली नजर आती है। मजे की बात तो यह है कि इनकी स्थिति में परिवर्तन की किरण भी दूर-दूर तक दिखाई नहीं देती है। प्राचीन परम्परा को अपने भाग्य से जोड़कर जीवन यापन करने वाली ब्रजवासी जाति की महिलाएँ 'कठपुतली’बनी पुरूषों की अँगुलियों के इशारे पर नाचने को विवश है।
मूलरूप से उत्तर प्रदेश के गोकुल (ब्रज) क्षेत्र के निवासी होने के कारण कालान्तर में 'ग्वाल’ जाति परिवर्तन के कई दौरों से गुजरने के बाद यह ग्वालजाति पूर्वजों की मातृभूमि के नाम पर 'ब्रजवासी' जाति में तब्दील हो गई। यह 'ब्रजवासी ग्वाल’ प्राचीनकाल से ही नाच-गाना के द्वारा उस समय जमीदारों और धनवान परिवारों में होने वाले मांगलिक कार्यों और उत्सवों में महिलाएँ नाच-गाकर लोगों का मनोरंजन किया करती थीं। बदलते परिवेश के साथ ही गरीब होने के कारण ब्रजवासियों ने नाच-गाना को आजीविका से जोड़कर वर्षो पूर्व समाज में अन्य लोगों का मनोरंजन करना शुरू कर दिया था। ब्रिटिश शासन काल में इनका विखराव शुरू हुआ तो यह लोग गोकुल से अपना-अपना परिवार लेकर अलग-अलग स्थानों पर 'ब्रजवासी जाति’ के नाम पर आबाद होते चले गये। चूँकि जीविका का कोई अन्य साधन नहीं था;इसलिए इनकी महिलाओं ने नाच-गाने को पेशा बनाकर कर लोगो का मनोरंजन करने लगी। इस तरह होने वाली आमदनी से परिवार को जीवन-पोषण का जरिया बन गया। वर्तमान में यह स्थिति हो गई है कि प्रदेश का शायद ही कोई ऐसा जिला होगा जहाँ इस जाति के परिवार न रहते हों और इस जाति की महिलाएँ आज भी नाच-गाकर परिवार का भरण-पोषण कर रही हैं। गाँवों में निर्धनता और अभावों की जिन्दगी गुजारने के बाद भी ब्रजवासी समाज 'अनैतिकता’ के दलदल में धँसने से बचा हुआ है; लेकिन आधुनिक युग में आवागमन और संचार के साधनों के बढ़ने के साथ गाँव और शहर में जब धीरे-धीरे नाटक एवं नौटंकी का क्रेज कम होने लगा तब जीविका की तलाश में गाँव की ब्रजवासी महिलाओं ने देश के महानगरों की तरफ  का रुख किया और वहाँ पर चलने वाले बार में डांसर का काम करने लगी हैं। महानगरों की चकाचौंध का असर उनपर भी पड़ा और शार्टकट से अमीर बनने के लिए अब ब्रजवासी महिलाएँ अब अपने समाज की वर्जनाओं को तोडऩे में परहेज नहीं करती हैं।
हिन्दू धर्म के सभी देवी देवताओं की पूजा-अर्जना करना तथा हिन्दुओं के रीति-रिवाज व त्योहारों को मानने वाले ब्रजवासी समाज में लड़कों की अपेक्षा लड़की के जन्म पर आज भी ज्यादा खुशी मनाई जाती है; किन्तु लड़के को खानदान में बाप का नाम आगे बढ़ाने वाले 'घर के चिराग’ के रूप में मान्यता मिली हुई है। ब्रजवासियों को अपनी बोलचाल की एक अलग भाषा 'ग्वाली’  (फारसी) है जिसको केवल इसी जाति के लोग बोल और समझ सकते हैं ।इसका इन्हें मुसीबत के समय काफी फायदा भी मिलता है। ब्रजवासी समाज में प्रचलित परम्परा के अनुसार वह अपने बच्चों का बाल विवाह तो नहीं करते हैं , वरन् इस जाति के लोग अमूमन पन्द्रह वर्ष की आयु पूर्ण करने से पहले ही लड़के-लड़की का विवाह रस्मोरिवाज से कर देते हैं। ब्रजवासी जाति में दो प्रकार से शादियाँ धर्म विवाह एवं संविदा (कान्ट्रेक्ट) विवाह प्रचलित है। धर्म विवाह में दहेज देने की प्रथा है और इस रीति से हुई शादी के बाद लड़की नाच-गाने का पेशा अपनाने के बजाय घर-गृहस्थी का कार्य करती हैं। अलबत्ता इनसे होने वाली औलादों को भविष्य में नाच-गाना का पेशा अपनाने की पूरी आजादी रहती है। इस रीति के विपरीत संविदा विवाह में वर पक्ष के लोग प्रथा के अनुसार तयसुदा धन लड़की के परिजनों को देकर विवाह की रस्म पूरी की जाती है। धर्म विवाह में जहाँ छुटौती (तलाक) की गुजांइश काफी कम होती है वही संविदा रीति से किए गए विवाह में पुरुष को तलाक देने की छूट होती है। पति-पत्नी के बीच विवाद होने की स्थिति में छुटौती (तलाक) करने पर पति द्वारा शादी से पूर्व पत्नी के परिजनों को दी गई रकम व शादी में लिया गया दहेज पत्नी को वापस करना पड़ता है। किन्तु इस मध्य हुए बच्चे पिता के संरक्षण में दे दिए जाते हैं। यह कार्य बिना किसी लिखा-पढ़ी के पंचायत द्वारा किया जाता है। तलाकसुदा महिला से पुनर्विवाह करने वाला व्यक्ति उस महिला की तय की गई 'रकम’ उसके परिवारजनों को अदा करके खानापूर्ति के तौर पर साधारण समारोह करके ब्याह कर अपने घर लाता है। इस तरह खरीद कर लायी गई औरत को ताजिन्दगी नाच-गाने का पेशा करना पड़ता है और इसके द्वारा कमाई गई रकम से वह व्यक्ति उसके परिजनों को दी गई रकम की भरपाई करने के साथ ही परिवार का खर्चा भी चलता है। इस जाति की सबसे खास बात यह है कि कुँवारी लड़कियों से नाच-गाने का पेशा नही कराया जाता है और न ही उनको नाच-गाना की तालीम दिलाई जाती है। केवल संविदा रीति से ब्याही गई किशोर लड़कियाँ अपनी ससुराल में ही तालीम हासिल कर नाच-गाना का पेशा अपनाती हैं।
आजाद भारत में ब्रजवासी समाज के भीतर औरतों की खरीद-फरोख्त की प्राचीन परम्परा को अगर नज़र अन्दाज़ कर दिया जाए तो भी इस समाज में और भी तमाम कुरीतियाँ मौजूद हैं जिसके कारण महिलाओं की स्थिति काफी दयनीय व भयावह बनी हुई है। लड़कियों की किशोरावस्था में ही शादी हो जाने के कारण वह कम उम्र में ही माँ भी बन जाती हैं, इसके कारण वह कुपोषण का शिकार बनकर अन्य तमाम बीमारियों से ताउम्र ग्रस्त रहती हैं। परम्पराओं और रूढ़ियों के बीच पली बढ़ी इस समाज की अधिकतर लड़कियाँ व महिलाएँ अशिक्षित 'अंगूठाछाप’ हैं। इस कारण वे न जागरूक हैं और न ही अपने अधिकारों से परिचित हैं और न ही वे महिला संरक्षण के कानूनों को जानती हैं। परिणामस्वरूप वे आज भी उपेक्षित और शोषित की जा रही हैं। जबकि अशिक्षा के चलते पुरुष शराब आदि मादक पदार्थो के चंगुल में फँसे हुए हैं। इस कारण पति-पत्नी में मारपीट, पारिवारिक कलह एवं अन्य लड़ाई-झगड़े करना इन ब्रजवासियों में रोजमर्रा की जिन्दगी में शामिल हो गया है। पेट की आग को शान्त करने के लिए दूसरों का मनोरंजन कर पैसे कमाने की होड़ में शामिल ब्रजवासी समाज के परिवार बच्चों की परवरिश वाजिब ढग़ से नही कर पाते हैं। इसके कारण ब्रजवासियों के बच्चे बाल उम्र में पढऩे-लिखने के बजाय बचपन से ही कुसंगतियों में फँसकर अपना भविष्य अंधकारमय बना लेते हैं। बचपन से ही पान, बीड़ी, सिगरेट, शराब पीने की आदत पड़ जाने से तरह-तरह की बीमारियाँ इन्हें पूरी जिन्दगी परेशान करती रहती हैं। कमोवेश यही स्थिति लड़कियों की भी रहती है। शासन, प्रशासन व समाज से उपेक्षा पाने के कारण सरकार द्वारा बाल विकास व उत्थान के लिए चलाये जा रहे तमाम योजनाओं एवं कार्यक्रमों का लाभ ब्रजवासियों के बच्चों को नही मिल रहा है; जिसके कारण यह बच्चे नाच-गाने के उसी माहौल में बचपन से रम जाते हैं और बढ़ती उम्र के साथ पुश्तैनी धन्धा अपनाकर आजीविका चलाने लगते है। नाच-गाने का पुश्तैनी धंधा अपनाये ब्रजवासी औरतों के लिए इसे उनके भाग्य की विडम्बना ही कही जायेगी कि मांगलिक अवसर हो या फिर नाटक-नौटंकी अथवा डांस पार्टियाँ या अन्य कोई सुखद अवसर ,सभी में इन औरतों द्वारा दु:खों को बनावटी मुस्कान के पीछे छिपाकर नाच-गाना आदि के कार्यक्रम पेश किये जाते हैं, और इन कार्यक्रमों में शामिल होने वाले सभ्य समाज के 'कुलीन व्यक्ति’ इनसे बिजली की चकाचौंध रोशनी में भरपूर मनोरंजन करते हैं। मजे की बात तो यह है कि समाज के इन्ही 'कुलीन व्यक्तियों’ ने ही ब्रजवासी महिलाओं को 'बार डांसर' और 'तवायफ’आदि जैसे हिकारत वाले अपमानजनक नाम दिए हैं। जिसके कारण यह महिलाएँ आज भी 'सभ्य समाज’में गिरी दृष्टि से देखी जाती हैं। इसके विपरीत सभ्य कहे जाने वाले समाज को यथार्थ और हकीकत के आइने में देखा जाये तो उच्च जातियों की लड़कियाँ एवं महिलाएँ स्टेज शो अथवा आर्केस्ट्रा ग्रुपों के माध्यम से जो डांस व गानों के कार्यक्रम पेश करती हैं उनमें काम करने वाली लड़कियाँ इन ब्रजवासी औरतों की अपेक्षाकृत ज्यादा ही खुला प्रदर्शन कर वाहवाही लूटती है, इनको 'कलाकार’जैसे शब्द से नवाजा गया है। बातचीत में समाज द्वारा स्थापित किए गए दोहरे मापदण्ड पर आक्रोश ज़ाहिर करते श्रीमती श्रद्धादेवी कहती हैं कि हम ब्रजवासिनी एक सीमित दायरे में रहकर लोगों का दूर से नाच-गाकर अपनी कला का प्रदर्शन करके मनोरंजन करते हैं। किन्तु कुलीन महिला कलाकारों ने तो सभी सीमाएँ तोड़ देती हैं और फिल्मी कलाकारों की दुनिया तो हम लोगों के समाज से ज्यादा काली है। फिर यह सम्य कहा जाने वाला समाज हम लोगो के साथ ऐसा दोहरा बर्ताव क्यों कर रहा है? इस कटाक्षपूर्ण अनुत्तरित प्रश्नों पर महिला उत्थान की दिशा में काम करने वाली सामाजिक संस्थाओं एवं महिला संगठनों को एक बार फिर गहराई से मनन और विचार करके सार्थक प्रयास भी करने होगें तभी ब्रजवासी जाति की दबी-कुचली महिलाओं को उनका हक, न्याय एवं समाज में इज्जत और सम्मान के साथ जीने का मौका मिल पायेगा। बहरहाल दीन दुनिया की तरक्की से बेखबर और समाज से उपेक्षित रहते हुए भी भाग्य की नियति मानकर जीवन यापन करने वाली ब्रजवासी परिवार की महिलाएँ समाज की गालियाँ, पति की प्रताडऩाऐं खुशी-खुशी सहन करती ही हैं और अपने गम और अत्याचार को भुलाकर कठपुतली की तरह पुरूषों की अँगुलियों के इशारे पर नाच-गाकर लोगों का मनोरंजन करके अपने परिवार का पालन-पोषण कर रहीं हैं।
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार और टिप्पणीकार है)
       
सम्पर्क: हिन्दुस्तान ऑफिस, नगर पालिका कॉम्प्लेक्स निकट सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र, पलिया कला, जिला- खिरी (उ.प्र) मो.०९४१५१६६१०३,                     
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गज़ल़ें

- आशीष दशोत्तर

१. कतार में


सिमटा है सारा मुल्क ही कोठी या कार में,
आशीष तो खड़ा हुआ कब से कतार में।

बाज़ार दे रहा यहाँ ऑफर नए-नए,
ख्वाबों की मंजिलें यहाँ मिलती उधार में।

मिलते रहे हैं रोज ही यूँ तो हज़ार लोग,
मिलता नहीं है आदमी लेकिन हजार में।

पल भर में मंजिलें यहाँ हसरत की चढ़ गए,
सँभले कहाँ है आदमी अक्सर उतार में।

जिसने ज़मी के वास्ते अपना लहू दिया,
गुमनाम कर दिये गए जश्ने-बहार में।

छू कर हवा गुज़र गई परछाई आपकी,
खुशबू तमाम घुल गई कैसी बयार में।

जज़्बात को निगल लिया मैसेज ने यहाँ,
आती कहाँ है ख्वाहिशें चिट्ठी या तार में।

आशीष क्या अजीब है मेरे नगर के लोग,
अम्नो-अमा को ढूँढ़ते खँजर की धार में।


२. कश्तियाँ कागज की

लफ्ज़ आए होठ तक हम बोलने से रह गए,
इक अहम रिश्ते को हम यूँ जोडऩे से रह गए।

अब शिकारी आ गया बाज़ार के ऑफर लिये,
फिर परिन्दे अपने पर को खोलने से रह गए।

हर कहीं देखी निगाहें आँसुओं से तरबतर,
खुद के आँसू इसलिए हम पोंछने से रह गए।

बारिशें तो थीं मगर बस्ते का भारी बोझ था,
कश्तियाँ कागज की बच्चे छोड़ने से रह गए।

बेरहम दुनिया के जुल्मों की हदें ना पूछिए,
शाख पर वे फल बचे जो तोड़ने से रह गए।

आज फिर देखी किताबें-जि़न्दगी आशीष तो,
पृष्ठ कुछ ऐसे मिले जो मोड़ने से रह गए।


लेखक के बारे में: - जन्म -05 अक्टूबर 1972, शिक्षा - 1.एम.एस.सी. (भौतिक शास्त्र), एम.ए. (हिन्दी), एम.एल.बी., बी.एड, बी.जे.एम.सी., स्नातकोत्तर में हिन्दी पत्रकारिता पर विशेष अध्ययन। प्रकाशन - 1 मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी द्वारा काव्य संग्रह-खुशियाँ कैद नहीं होती-का प्रकाशन।, ग़ज़ल संग्रह 'लकीरें, 3 भगतसिंह की पत्रकारिता पर केंद्रित पुस्तक-समर में शब्द-प्रकाशित 4 नवसाक्षर लेखन के तहतकहानी की पाँच पुस्तकें प्रकाशित आठ वृत्तचित्रों में संवाद लेखन एवं पार्श्वस्वर। अनेक पुरस्कार एवं सम्मान।सम्प्रति - आठ वर्षों तक पत्रकारिता के उपरान्त अब शासकीय सेवा में। सम्पर्क- 39, नागर वास, रतलाम (म.प्र.) 457001, मो.098270-84966,  Email- ashish.dashottar@yahoo.com

कालजयी कहानियाँ

एक छोटा- सा मज़ाक

- अन्तोन चेखव, अनुवाद - अनिल जनविजय



सरदियों की खूबसूरत दोपहर... सर्दी बहुत तेज़ है। नाद्या ने मेरी बाँह पकड़ रखी है। उसके घुंघराले बालों में बर्फ़ इस तरह जम गई है कि वे चाँदनी की तरह झलकने लगे हैं। होंठों के ऊपर भी बर्फ़की एक लकीर-सी दिखाई देने लगी है। हम एक पहाड़ी पर खड़े हुए हैं। हमारे पैरों के नीचे मैदान पर एक ढलान पसरी हुई है जिसमें सूरज की रोशनी? से चमक रही है जैसे उसकी परछाई शीशे में पड़ रही हो। हमारे पैरों के पास ही एक स्लेज पड़ी हुई है जिसकी गद्दी पर लाल कपड़ा लगा हुआ है।
चलो नाद्या, एक बार फिसलें! मैंने नाद्या से कहा- सिर्फ़एक बार! घबराओ नहीं, हमें कुछ नहीं होगा, हम ठीक-ठाक नीचे पहुँच जाएँगे।
लेकिन नाद्या डर रही है। यहाँ से, पहाड़ी के कगार से, नीचे मैदान तक का रास्ता उसे बेहद लम्बा लग रहा है। वह भय से पीली पड़ गई है। जब वह ऊपर से नीचे की ओर झाँकती है और जब मैं उससे स्लेज पर बैठने को कहता हूँ तो जैसे उसका दम निकल जाता है। मैं सोचता हूँ- लेकिन तब क्या होगा, जब वह नीचे फिसलने का ख़तरा उठा लेगी! वह तो भय से मर ही जाएगी या पागल ही हो जाएगी।
मेरी बात मान लो! मैंने उससे कहा- नहीं-नहीं, डरो नहीं, तुममें हिम्मत की कमी है क्या?
आख़िरकार वह मान जाती है। और मैं उसके चेहरे के भावों को पढ़ता हूँ। ऐसा लगता है जैसे मौत का ख़तरा मोल लेकर ही उसने मेरी यह बात मानी है। वह भय से सफ़ेद पड़ चुकी है और काँप रही है। मैं उसे स्लेज पर बैठाकर, उसके कंधों पर अपना हाथ रखकर उसके पीछे बैठ जाता हूँ। हम उस अथाह गहराई की ओर फिसलने लगते हैं। स्लेज गोली की तरह बड़ी तेज़ी से नीचे जा रही है। बेहद ठंडी हवा हमारे चेहरों पर चोट कर रही है। हवा ऐसे चिंघाड़ रही है कि लगता है, मानों कोई तेज़ सीटी बजा रहा हो। हवा जैसे गुस्से से हमारे बदनों को चीर रही है, वह हमारे सिर उतार लेना चाहती है। हवा इतनी तेज़ है कि साँस लेना भी मुश्किल है। लगता है, मानों शैतान हमें अपने पंजों में जकड़कर गरजते हुए नरक की ओर खींच रहा है। आस-पास की सारी चीज़ें जैसे एक तेज़ी से भागती हुई लकीर में बदल गई हैं। ऐसा महसूस होता है कि आने वाले पल में ही हम मर जाएँगे।
मैं तुम से प्यार करता हूँ, नाद्या!- मैं धीमे से कहता हूँ।
स्लेज की गति धीरे-धीरे कम हो जाती है। हवा का गरजना और स्लेज का गूँजना अब इतना भयानक नहीं लगता। हमारे दम में दम आता है और आख़िरकार हम नीचे पहुँच जाते हैं। नाद्या अधमरी-सी हो रही है। वह सफ़ेद पड़ गई है। उसकी साँसें बहुत धीमी-धीमी चल रही हैं... मैं उसकी स्लेज से उठने में मदद करता हूँ।
अब चाहे जो भी हो जाए मै कभी नहीं फिसलूँगी, हरगिज़ नहीं! आज तो मैं मरते-मरते बची हूँ। मेरी ओर देखते हुए उसने कहा। उसकी बड़ी-बड़ी आँखों में ख़ौफ़ का साया दिखाई दे रहा है। पर थोड़ी ही देर बाद वह सहज हो गई और मेरी ओर सवालिया निगाहों से देखने लगी। क्या उसने सचमुच वे शब्द सुने थे या उसे ऐसा बस महसूस हुआ था, सिर्फ़ हवा की गरज थी वह? मैं नाद्या के पास ही खड़ा हूँ, मैं सिगरेट पी रहा हूँ और अपने दस्ताने को ध्यान से देख रहा हूँ।
नाद्या मेरा हाथ अपने हाथ में ले लेती है और हम देर तक पहाड़ी के आस-पास घूमते रहते हैं। यह पहेली उसको परेशान कर रही है। वे शब्द जो उसने पहाड़ी से नीचे फिसलते हुए सुने थे, सच में कहे गए थे या नहीं? यह बात वास्तव में हुई या नहीं। यह सच है या झूठ? अब यह सवाल उसके लिए स्वाभिमान का सवाल हो गया है. उसकी इज्ज़त का सवाल हो गया है। जैसे उसकी जि़न्दगी और उसके जीवन की खुशी इस बात पर निर्भर करती है। यह बात उसके लिए महत्त्वपूर्ण है, दुनिया में शायद सर्वाधिक महहत्त्वपूर्ण। नाद्या मुझे अपनी अधीरता भरी उदास नज़रों से ताकती है, मानों मेरे अन्दर की बात भाँपना चाहती हो। मेरे सवालों का वह कोई असंगत-सा उत्तर देती है। वह इस इन्तज़ार में है कि मैं उससे फिर वही बात शुरू करूँ। मैं उसके चेहरे को ध्यान से देखता हूँ- अरे, उसके प्यारे चेहरे पर ये कैसे भाव हैं? मैं देखता हूँ कि वह अपने आप से लड़ रही है, उसे मुझ से कुछ कहना है, वह कुछ पूछना चाहती है। लेकिन वह अपने ख्य़ालों को, अपनी भावनाओं को शब्दों के रूप में प्रकट नहीं कर पाती। वह झेंप रही है, वह डर रही है, उसकी अपनी ही खुशी उसे तंग कर रही है...। सुनिए! मुझ से मुँह चुराते हुए वह कहती है। क्या? मैं पूछता हूँ। चलिए, एक बार फिर फिसलें।
हम फिर से पहाड़ी के ऊपर चढ़ जाते हैं। मैं फिर से भय से सफ़ेद पड़ चुकी और काँपती हुई नाद्या को स्लेज पर बैठाता हूँ। हम फिर से भयानक गहराई की ओर फिसलते हैं। फिर से हवा की गरज़ और स्लेज की गूँज हमारे कानों को फाड़ती है और फिर जब शोर सबसे अधिक था मैं धीमी आवाज़ में कहता हूँ -मैं तुम से प्यार करता हूँ, नाद्या।
नीचे पहुँचकर जब स्लेज रुक जाती है तो नाद्या एक नज़र पहले ऊपर की तरफ़ढलान को देखती है जिससे हम अभी-अभी नीचे फिसले हैं, फिर दूसरी नज़र मेरे चेहरे पर डालती है। वह ध्यान से मेरी बेपरवाह और भावहीन आवाज़ को सुनती है। उसके चेहरे पर हैरानी है। न सिर्फ़चेहरे पर बल्कि उसके सारे हाव-भाव से हैरानी झलकती है। वह चकित है और जैसे उसके चेहरे पर यह लिखा है- क्या बात है? वे शब्द किसने कहे थे? शायद इसी ने? या हो सकता है मुझे बस? सा लगा हो, बस? से ही वे शब्द सुनाई दिए हों?
उसकी परेशानी बढ़ जाती है कि वह इस सच्चाई से अनभिज्ञ है। यह अनभिज्ञता उसकी अधीरता को बढ़ाती है। मुझे उस पर तरस आ रहा है। बेचारी लड़की! वह मेरे प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं देती और नाक-भौंह चढ़ा लेती है। लगता है वह रोने ही वाली है। घर चलें?  मैं पूछता हूँ। लेकिन मुझे... मुझे तो यहाँ फिसलने में खूब मज़ा आ रहा है। वह शर्म से लाल होकर कहती है और फिर मुझ से अनुरोध करती है- और क्यों न हम एक बार फिर फिसलें?
हुम... तो उसे यह फिसलना 'अच्छा लगता है’। पर स्लेज पर बैठते हुए तो वह पहले की तरह ही भय से सफ़ेद दिखाई दे रही है और काँप रही है। उसे साँस लेना भी मुश्किल हो रहा है। लेकिन मैं अपने होंठों को रुमाल से पोंछकर धीरे से खाँसता हूँ और जब फिर से नीचे फिसलते हुए हम आधे रास्ते में पहुँच जाते हैं तो मैं एक बार फिर कहता हूँ- मैं तुम से प्यार करता हूँ, नाद्या!
और यह पहेली पहेली ही रह जाती है। नाद्या चुप रहती है, वह कुछ सोचती है... मैं उसे उसके घर तक छोडऩे जाता हूँ। वह धीमे-धीमे क़दमों से चल रही है और इन्तज़ार कर रही है कि शायद मैं उससे कुछ कहूँगा। मैं यह नोट करता हूँ कि उसका दिल कैसे तड़प रहा है। लेकिन वह चुप रहने की कोशिश कर रही है और अपने मन की बात को अपने दिल में ही रखे हुए है। शायद वह सोच रही है।
दूसरे दिन मुझे उसका एक रुक्का मिलता है  'आज जब आप पहाड़ी पर फिसलने के लिए जाएँ तो मुझे अपने साथ ले लें। नाद्या।’उस दिन से हम दोनों रोज़ फिसलने के लिए पहाड़ी पर जाते हैं और स्लेज पर नीचे फिसलते हुए हर बार मैं धीमी आवाज़ में वे ही शब्द कहता हूँ- मैं तुम से प्यार करता हूँ, नाद्या!
जल्दी ही नाद्या को इन शब्दों का नशा-सा हो जाता है, वैसा ही नशा जैसा शराब या मार्फ़ीन का नशा होता है। वह अब इन शब्दों की खुमारी में रहने लगी है। हालाँकि उसे पहाड़ी से नीचे फिसलने में पहले की तरह डर लगता है लेकिन अब भय और ख़तरा मौहब्बत से भरे उन शब्दों में एक नया स्वाद पैदा करते हैं जो पहले की तरह उसके लिए एक पहेली बने हुए हैं और उसके दिल को तड़पाते हैं। उसका शक हम दो ही लोगों पर है- मुझ पर और हवा पर। हम दोनों में से कौन उसके सामने अपनी भावना का इज़हार करता है, उसे पता नहीं। पर अब उसे इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। शराब चाहे किसी भी बर्तन से क्यों न पी जाए- नशा तो वह उतना ही देती है। अचानक एक दिन दोपहर के समय मैं अकेला ही उस पहाड़ी पर जा पहुँचा। भीड़ के पीछे से मैंने देखा कि नाद्या उस ढलान के पास खड़ी है, उसकी आँखें मुझे ही तलाश रही हैं। फिर वह धीरे-धीरे पहाड़ी पर चढ़ने लगती है ...अकेले फिसलने में हालाँकि उसे डर लगता है, बहुत ज़्यादा डर! वह बर्फ़की तरह सफ़ेद पड़ चुकी है, वह काँप रही है, जैसे उसे फाँसी पर चढ़ाया जा रहा हो। पर वह आगे ही आगे बढ़ती जा रही है, बिना झिझके, बिना रुके। शायद आख़िर उसने फ़ैसला कर ही लिया कि वह इस बार अकेली नीचे फिसल कर देखेगी कि 'जब मैं अकेली होऊँगी तो क्या मुझे वे मीठे शब्द सुनाई देंगे या नहीं?’ मैं देखता हूँ कि वह बेहद घबराई हुई भय से मुँह खोलकर स्लेज पर बैठ जाती है। वह अपनी आँखें बंद कर लेती है और जैसे जीवन से विदा लेकर नीचे की ओर फिसल पड़ती है... स्लेज के फिसलने की गूँज सुनाई पड़ रही है। नाद्या को वे शब्द सुनाई दिए या नहीं- मुझे नहीं मालूम... मैं बस यह देखता हूँ कि वह बेहद थकी हुई और कमज़ोर-सी स्लेज से उठती है। मैं उसके चेहरे पर यह पढ़ सकता हूँ कि वह खुद नहीं जानती कि उसे कुछ सुनाई दिया या नहीं। नीचे फिसलते हुए उसे इतना डर लगा कि उसके लिए कुछ भी सुनना या समझना मुश्किल था।
फिर कुछ ही समय बाद वसन्त का मौसम आ गया। मार्च का महीना है... सूरज की किरणें पहले से अधिक गरम हो गई हैं। हमारी बर्फ़ से ढकी वह सफ़ेद पहाड़ी भी काली पड़ गई है, उसकी चमक खत्म हो गई है। धीरे-धीरे सारी बर्फ़ पिघल जाती है। हमारा फिसलना बंद हो गया है और अब नाद्या उन शब्दों को नहीं सुन पाएँगी। उससे वे शब्द कहने वाला भी अब कोई नहीं है: हवा ख़ामोश हो गई है और मैं यह शहर छोड़कर पितेरबुर्ग जाने वाला हूँ- हो सकता है कि मैं हमेशा के लिए वहाँ चला जाऊँगा।
मेरे पितेरबुर्ग रवाना होने से शायद दो दिन पहले की बात है। संध्या समय मैं बगीचे में बैठा था। जिस मकान में नाद्या रहती है यह बगीचा उससे जुड़ा हुआ था और एक ऊँची बाड़ ही नाद्या के मकान को उस बगीचे से अलग करती थी। अभी भी मौसम में काफ़ी ठंड है, कहीं-कहीं बर्फ़ पड़ी दिखाई देती है, हरियाली अभी नहीं है लेकिन वसन्त की सुगन्ध महसूस होने लगी है। शाम को पक्षियों की चहचहाट सुनाई देने लगी है। मैं बाड़ के पास आ जाता हूँ और एक दरार में से नाद्या के घर की तरफ़ देखता हूँ। नाद्या बरामदे में खड़ी है और उदास नज़रों से आसमान की ओर ताक रही है। बसन्ती हवा उसके उदास फीके चेहरे को सहला रही है। यह हवा उसे उस हवा की याद दिलाती है जो तब पहाड़ी पर गरजा करती थी जब उसने वे शब्द सुने थे। उसका चेहरा और उदास हो जाता है, गाल पर आँसू ढुलकने लगते हैं... और बेचारी लड़की अपने हाथ इस तरह से आगे बढ़ाती है मानो वह उस हवा से यह प्रार्थना कर रही होकि वह एक बार फिर से उसके लिए वे शब्द दोहराए। और जब हवा का एक झोंका आता है तो मैं फिर धीमी आवाज़ में कहता हूँ- मैं तुम से प्यार करता हूँ, नाद्या!
अचानक न जाने नाद्या को क्या हुआ! वह चौंककर मुस्कराने लगती है और हवा की ओर हाथ बढ़ाती है। वह बेहद खुश है, बेहद सुखी, बेहद सुन्दर।
और मैं अपना सामान बाँधने के लिए घर लौट आता हूँ...।
यह बहुत पहले की बात है। अब नाद्या की शादी हो चुकी है। उसने खुद शादी का फ़ैसला किया या नहीं- इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। उसका पति- एक बड़ा अफसर है और उनके तीन बच्चे हैं। वह उस समय को आज भी नहीं भूल पाई है, जब हम फिसलने के लिए पहाड़ी पर जाया करते थे। हवा के वे शब्द उसे आज भी याद हैं, यह उसके जीवन की सबसे सुखद, हृदयस्पर्शी और खूबसूरत याद है।
और अब, जब मैं प्रौढ़ हो चुका हूँ, मैं यह नहीं समझ पाता हूँ कि मैंने उससे वे शब्द क्यों कहे थे, किसलिए मैंने उसके साथ ऐसा मज़ाक किया था!...