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Oct 1, 2024

आलेखः रसोईघर से टूटा माताओं का नाता

 - डॉ. महेश परिमल

देश में 2.49 लाख करोड़ का होगा जंक फूड उद्योग, विश्व में भले ही जंक फूड का कारोबार घटा हो, पर हमारे देश में यह बहुत ही तेजी से बढ़़ रहा है। इसके पीछे बहुत ही वजहें हैं। सबसे बड़ी वजह है भारत में विभिन्न माध्यमों में दिखाए जाने वाले जंक फूड के लोक-लुभावन विज्ञापन। इसका पूरा फायदा बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ उठा रहीं हैं। यह वजह तो हमारे सामने है, पर हम कुछ भी नहीं कर सकते। इस दिशा में सरकार जागेगी अवश्य, पर हमेशा की तरह देर से। दूसरी सबसे बड़ी वजह है, जो हमारे बिलकुल करीब है। हम रोज ही उससे दो-चार होते ही हैं। पर हमें वह दिखाई नहीं देती। देगी भी नहीं; क्योंकि यह एक ऐसा व्यामोह है, जिसमें हम सब उलझे हुए हैं। हम चाहकर भी उससे छुटकारा नहीं पा सकते।

दूसरी वजह पर चर्चा करने के पहले एक बार अपने मोहल्ले या कॉलोनी के गेट पर सुबह-सुबह खड़े हो जाएँ। यह संभव न हो,तो आप दिन में एक बार कॉलोनी के गेट पर आने वालों की सूची ही देख लें। आप पाएँगे कि आने वालों में अधिकतर आयातित नाश्ता या भोजन लाने वाले विभिन्न उत्पादन कंपनियों के कर्मचारी ही होंगे। आखिर ये क्या हो रहा है? क्या लोगों ने घर पर नाश्ता या भोजन बनाना छोड़ दिया? या घर में खाना बनाने वाली या कामवाली बाइयों ने हड़ताल कर दी? क्या अब माँ के हाथ का खाना बच्चों को अच्छा नहीं लगता? या खाना बनाने वाले रामू चाचा के हाथों पर अब वह दम नहीं रहा। उनके बनाए भोजन पर अब उँगलियाँ चाटने का मन नहीं करता? वह खाना जिसे बनाने में माँ खुद को झोंक देती थी, अब वही खाना क्यों हमें अरुचिकर लग रहा है? कमी कहाँ रह गई है, कभी सोचा आपने? फास्ट फूड का यह व्यापार आज इसीलिए लगातार बढ़ रहा है; क्योंकि पहली वजह पर तो कभी न कभी काबू पा ही लिया जाएगा; लेकिन दूसरी बड़ी वजह आज आपके सामने है, इसे आप शायद कभी काबू नहीं पा पाएँगे।

बड़ा शहर हो या छोटा शहर, आज वहाँ तुरंत घर के दरवाजे पर आने वाला खाना सभी को रुचिकर लग रहा है। आपने भी कभी न कभी तो उस आयातित भोजन को चखा ही होगा। कितना मसालेदार, कितना तैलीय, कितना कुरकुरा और कितना लजीज होता होगा। इसका अंदाजा तो आपने अवश्य लगाया होगा। उस मसालेदार और कथित लजीज भोजन के सामने माँ, बहन या पत्नी के हाथों बना नाश्ता या भोजन काफी फीका लगता होगा ना? आप कहेंगे कि मुझे यह सब बिलकुल भी पसंद नहीं, मैं सादा भोजन करने में विश्वास करता हूँ। पर घर की देहरी पर जब आयातित भोजन लाने वाला कर्मचारी आ खड़ा होता है, तो आप भी थोड़ी देर के लिए ललचा तो जाते ही होंगे। अगर आप अपनी जिद पर अड़े रहे, तो फिर बच्चों को क्या जवाब दोगे? वह तो अपनी खुशी में आपको शामिल करना चाहते हैं; पर आपको  उनकी खुशी सुहाती नहीं है। आप बच्चों के सामने बुरे बन जाएँगे। भविष्य में बच्चे आपको दकियानूसी मानेंगे और फिर वे घर में मँगाना बंद कर बाहर से ही वह आयातित भोजन ग्रहण करके आएँगे। तब आप क्या करेंगे? आप कितनी भी कोशिश कर लें, यह मायाजाल आपको उलझाकर ही रहेगा। आप पार्टी में भी जाकर अनजान बन सकते हैं। भीड़ में अकेले हो सकते हैं। आप अपनी सादगी का राग वहाँ नहीं अलाप सकते। आपको कदम-कदम पर इसका सामना करना ही होगा।

यह सच है कि आजकल बच्चों को माँ के हाथ का भोजन अच्छा नहीं लगता। हर माँ की यही शिकायत होती है कि मेरा बच्चा रोज टिफिन ऐसे ही वापस ले आता है। मैं कितना भी अच्छा बनाऊँ, पर इसे तो अपने दोस्तों का ही खाना अच्छा लगता है। बच्चों के दोस्तों की मम्मी ऐसा क्या बनाती है, जो मेरे बच्चे को अच्छा लगता है? इसका राज यदि कभी जानने का अवसर मिलता है, तो बच्चे के दोस्त की मम्मी कह देती है कि उसने तो अपनी माँ या सास से सीखा है। मेरे बच्चे मेरे हाथ का खाना कभी जूठा नहीं छोड़ते। पर इसके पीछे का रहस्य कोई नहीं जानता। या तो वे भी आयातित नाश्ते या भोजन के प्रेमी हैं, या फिर उन्होंने अपने यहाँ कोई मोटे वेतन वाला कुक रखा है। जो सभी के लिए उनके अनुसार रुचिकर नाश्ता या भोजन बनाता है।

वास्तव में आज महिलाओं का रसोईघर से नाता टूटता जा रहा है। वे रसोई घर में जाकर भोजन बनाने के काम को बहुत ही छोटा मानने लगी हैं। उनका सोचना यही है कि इस काम के बजाए यदि हम दूसरा काम करेंगे, तो हमें अपनी तरह से जीने का अवसर मिलेगा और हम अपनी जिंदगी को ज्यादा ही अच्छी तरीके से जी लेंगी। रसोईघर से नाता टूटने का आशय यही है कि आप अपने भोजन से घर के सदस्यों को संतुष्ट नहीं कर पा रहीं हैं। ऐसे में घर का पुरुष एक दिन कहे कि आज मैं सभी के लिए भोजन बनाऊँगा, तो एक साथ विरोध के कई स्वर मुखर हो जाएँगे। आप रहने दीजिए पापा, आपके भोजन का स्वाद हमको पता है। आपको बनाना हो, तो अपने लिए बना लो, पर हम आपके हाथ का भोजन ग्रहण नहीं करेंगे। इस विरोध के सामने पापा का कद बहुत ही छोटा हो जाता है। पापा सोचते हैं, मैं इनके हाथों का खाना पूरे साल भर खा सकता हूँ, भले ही वह मुझे अच्छा न लगे, पर आज जब मैं सबके लिए अपनी पसंद का भोजन बनाना चाहता हूँ, तो विरोध के इतने स्वर मुखर हो गए? आखिर कहाँ कमी रह गई मेरे संस्कार में?

वास्तव में आजकल रसोईघर में जो भोजन तैयार हो रहा है, उसमें समर्पण का पूरी तरह से अभाव है। फोन पर बातचीत के साथ या फिर उससे निकलने वाले गानों की मधुर धुनों के बीच जो भोजन तैयार हो रहा है, उसमें मसाले तो सभी हैं, पर उस समर्पण का पूरी तरह से अभाव है, जो होना चाहिए। इसके साथ ही हम याद करें, बरसों पहले हमारे लिए भोजन बनाती माँ को। वह भोजन बनाते समय यही सोचती रहती थी कि आज मैं जो भोजन बनाऊँगी, उससे मेरे बच्चों का पेट अच्छे से भरेगा, वे भरपेट भोजन करेंगे। यह भोजन भले ही मेरे लिए न बचे, पर मेरे बच्चों को कम न पड़े, ईश्वर यही दया करना। इस भोजन को ग्रहण कर मेरे बच्चे स्वस्थ रहें, मेरी यही कामना है। सोचो, इस विचार के साथ तैयार किया जाने वाला भोजन भला कैसे अरुचिकर हो सकता है? आज की पीढ़ी इस समर्पण को शायद ही समझ पाएगी।

यह भी सच है कि आजकल की माँ भी बहुत व्यस्त हो गई हैं। वे कई भूमिकाओं में विभाजित होती हैं। घर के काम के अलावा उनके पास बहुत से ऐसे काम हैं, जो समाज के लिए अति आवश्यक हैं। उन कामों को संपादित करना भोजन बनाने से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है। यदि वे ऐसा न करें, तो सोशल मीडिया में वे सभी हाशिए पर आ जाएँगी; इसलिए घर के सदस्यों के लिए भोजन बनाने से भी अधिक समय महत्त्वपूर्ण कामों को करने में लगाती हैं। कामकाजी महिलाओं की तो बात ही न पूछो, उन्हें तो पल भर के लिए चैन नहीं। उन्हें कदम-कदम पर चुनौतियों का सामना करना होता है। रोज नई चुनौतियाँ उन्हें रसोईघर से दूर कर देती हैं। ऐश्वर्यशाली जीवन जीने वाली महिलाएँ केवल रसोईघर तक ही सीमित नहीं हैं, बाकी सभी जगह उनकी उपस्थिति अनिवार्य है। ऐसे में कैसे बन पाएगा रुचिकर भोजन? हम इस आयातित भोजन में ही अपना शेष जीवन देखते भर रह जाएँगे। साथ ही अनजाने में फास्ट फूड ग्रहण कर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मोहरे बन जाएँगे। बीमार होकर डॉक्टरों के दरवाजे खटखटाएँगे। मानसिक रोग का शिकार होकर मनोचिकित्सक की देहरी पर अपना माथा टेकेंगे। इसके बाद भी हम तथाकथित बाबाओं, साधु-महात्माओं के दरबार में जाने का एक मौका भी नहीं छोड़ेंगे। ये समाज की सच्ची सच्चाई है, जिस पर कोई सरकार कभी रोक नहीं लगा पाएगी। हम ही इस पर अंकुश लगा सकते हैं, क्या आप इसके लिए तैयार हैं? बोलो….

सम्पर्कः  टी 3- 204, सागर लेक व्यू, वृंदावन नगर, अयोध्या बायपास, भोपाल- 462022, मो. 09977276257


प्रेरकः एक सीख ऐसी भी

  - सुरभि डागर

अनुराधा बड़े उमंग से श्राद्ध कर रही थी । ससुर जी के लिए खीर  तो जरूर बनाऊँगी, उड़द- चावल, बूरा सारी चीजें ससुर जी की पसंद की बन रहीं थीं । पंडित जी को  भोजन कराना है। जाओ, बुलाकर ले आओ, साथ ही कपड़े भी बाहर निकालकर रख दो। दक्षिणा भी ऊपर ही रख देना कपड़ों के ।

मैं सोच रही हूँ- पंडित जी को गर्म रजाई और बर्तन भी दे दूँगी, ताकि पूज्य पिताजी को इसका लाभ प्राप्त हो। उनकी आत्मा भी संतुष्ट हो। उनको देखकर भी प्रसन्नता होगी । और वो दुआएँ देंगे।

सासू माँ चारपाई पर बैठी, सब कुछ मौन होकर देख रही थी। राजेश बहुत उलझन में था; पर बोल कुछ नहीं रहा था। 

पंडित जी को बुला लाया और कोने में खड़ा हो गया। पंडित जी के लिए आसन लगा दिया। पंडित जी ने कहा- रसोई से महक बाहर तक आ रही है 

अनुराधा ने कहा- पिताजी की पसंद की सब चीजें बनाई हैं ।

पंडित जी मुस्कुराते हुए बोले- माता जी को चाय मिली या नहीं?  ये तो चुप चारपाई पर बैठी हैं।

अरे पंडित! जी चूल्हा जूठा हो जाता, यदि कोई कुछ खा लेता।  पहले भोजन पिताजी के नाम का है।

पंडित जी पता नहीं क्या सोचकर चुप हो गए। इतने में भोजन की थाली आ गई। भर पेट भोजन किया । और उठ खड़े हुए। ‌ बोले- अब आज्ञा दो ।

 अनुराधा ने पंडित जी को कपड़े बर्तन, रुपये  और गर्म- ठंडे विस्तर दिए- बोली आशू के पापा पंडित जी का सामान पहुँचवा देना । 

राजेश ने अच्छा कहकर फिर मौन धारण कर लिया।

अनुराधा ने कहा- पंडित जी, दुआएँ देकर जाओ हमें। हमारे पिता जी जहाँ हो, खुश हों।

अब तो पंडित जी बोल उठे- दुआएँ तो नहीं; पर एक सीख जरूर दूँगा। जब पिताजी थे, तब उनको पकवान नहीं खिलाएँ। अब माता जी दुःखी हैं। न तुम दोनों इनकी इज्जत करते हो, न समय पर भोजन देते हो। अभी चाय तक नहीं मिली इनको । बिस्तर भी फटा पुराना है।  बर्तन भी अलग कर दिए हैं, बाद में माता जी का भी श्राद्ध इतनी ही प्रसन्नता से करना। जो हुआ, सो हुआ। अब माँ का ध्यान रख लो, तो पिताजी तो‌ आप ही खुश हो जाएँगे, दुआएँ भी देंगें और मैं भी दुआओं से झोली भर दूँगा। फिर करना पिताजी का श्राद्ध और मुझे बुलाना।

 माता जी के नयन गीले हो गए। अपनी साड़ी के पल्लू से आँसू पोछने‌ लगीं।

पर्व- संस्कृतिः सृष्टि की ऊर्जा है देवी दुर्गा

  - प्रमोद भार्गव

भारत में देवी की पूजा वैदिक युग में ही आरंभ हो गई थी। ऋग्वेद के देवी सूक्तम् में सभी देवताओं की आंतरिक शक्ति की बात कही गई है, जो ऊर्जा की प्रतीक है। हरिवंश पुराण में कालरात्रि, निद्रा और योगमाया के समन्वित रूपों के बारे में बताया है कि जब भगवान विष्णु नींद में होते हैं, तब देवी दुर्गा ही विश्व की सुरक्षा करती हैं। इसीलिए देवी कालरात्रि की काया का रंग घने अंधकार की तरह काला है और सिर के बाल बिखरे हुए है। गले में बिजली की तरह चमकने वाली माला डाली है। इनकी तीन आँखें हैं। तीनों नेत्र ब्रह्मांड के सामान अंडाकार हैं। इन चक्षुओं से तीव्र विद्युत की किरणें निरंतर प्रवाहित होती रहती है। जो अक्षय ऊर्जा की द्योतक हैं। यही ऊर्जा सृष्टि में फैली हुई है। इसी ऊर्जा में भगवान शिव का अर्धनारीश्वर रूप दृष्टिगोचर होता रहता है। इस रूप के स्त्री रूप से शरीर विज्ञान सम्मत मानव संरचना में एक्स तत्त्व से है और  पुरुष रूप में वाय तत्त्व से है। अर्थात् यह रूप स्त्री-पुरुष में समानता जताता है। भारतीय वाङ्मय में काम-ऊर्जा को सबसे शक्तिशाली ऊर्जा माना गया। इसीलिए पुरुष में जब वाय गुणसूत्र की अधिकता होती है तो पुरुष और स्त्रीयोचित गुण एक्स की अधिकता होती है तो स्त्री का जन्म होता है।  

दैवीय शक्तियाँ वे हैं, जो मनुष्य के अनुकूल हैं, अर्थात् फलदायी हैं और आसुरी शक्तियाँ वे हैं, जो मनुष्य के प्रतिकूल हैं, अर्थात उसे हानि पहुँचाने में समर्थ हैं। नवरात्रों का आयोजन दो ऋतुओं की परिवर्तन की जिस वेला में होता है, वह इस बात का द्योतक है कि जीवन में बदलाव की स्वीकार्यता अनिवार्य है। नवरात्रों का आयोजन अश्विन मास के शुक्ल पक्ष में किया जाता है। शुक्ल पक्ष घटते अंधकार या अज्ञान का प्रतीक है, वहीं कृष्ण पक्ष बढ़ते अंधकार और अज्ञान का प्रतीक है। प्रति माह उत्सर्जित और विलोपित होने वाले यही दोनों पक्ष जीवन के सकारात्मक और नकारात्मक पक्ष की प्रवृत्ति हैं। प्रकृति से लेकर जीवन में हर जगह अंतर्विरोध व्याप्त है। इन्हीं विरोधाभासी पक्षों में सामंजस्य बिठाने का काम दुर्गा के बहुआयामी रूप करते हैं।

  मार्कंडेय पुराण में प्रकाश और ऊर्जा के बारे में कहा गया है कि ‘देवों ने एक प्रकाश पुंज देखा, जो एक विशाल पर्वत के समान प्रदीप्त था। उसकी लपटों से समूचा आकाश भर गया था। फिर यह प्रकाश पुंज एक पिंड में बदलता चला गया, जो एक शरीर के रूप में अस्तित्व में आया। फिर वह कालांतर में एक स्त्री के शरीर के रूप में आश्चर्यजनक ढंग से परिवर्तित हो गया। इससे प्रस्फुटित हो रही किरणों ने तीनों लोकों को आलोकित कर दिया। प्रकाश और ऊर्जा का यही समन्वित रूप आदि शक्ति या आदि माँ कहलाईं। छान्दोग्य उपनिषद में कहा गया है कि ‘अव्यक्त’ से उत्पन्न तीन तत्त्वों अग्नि, जल और पृथ्वी के तीन रंग सारी वस्तुओं में अंतर्निहित हैं। अतः यही सृष्टि और जीवन के मूल तत्व हैं। अतएव प्रकृति की यही ऊर्जा जीवन के जन्म और उसकी गति का मुख्य आधार है।’ 

इस अवधारणा से जो देवी प्रकट होती है, वही देवी महिषासुर मर्दिनी है। इसे ही पुराणों में ब्रह्माण्ड की माँ कहा गया है। इसके भीतर सौंदर्य और भव्यता, प्रज्ञा और शौर्य, मृदुलता और शांति विद्यमान हैं। चरित्र के इन्हीं उदात्त तत्त्वों से फूटती ऊर्जा इस देवी के चेहरे को प्रगल्भ बनाए रखने का काम करती है। ऋषियों ने इसे ही स्त्री की नैसर्गिक आदि शक्ति माना है और फिर इसी का दुर्गा के नाना रूपों में मानवीकरण किया है। उपनिषदों में इन्हीं विविध रूपों को महामाया, योगमाया और योग निद्रा के नामों से चित्रित व रेखांकित किया गया। इनमें भी महामाया को ईष्वर या प्रकृति की सर्वोच्च सत्ता मानकर विद्या एवं अविधा में विभाजित किया गया है। विद्या व्यक्ति में आनंद का अनुभव कराती हैं, जबकि अविद्या सांसरिक इच्छाओं और मोह के जंजाल में जकड़ती है। विद्या को ही योगमाया या योगनिद्रा के नामों से जाना जाता है। 

योगमाया सृष्टि की वैश्विक व्यवस्था का प्रतीक है, जबकि योगनिद्रा स्रष्टा की समाधि की अवस्था में आई निद्रा है। यह स्थिति चेतन अवस्था से अंधकार के क्षेत्र में प्रवेश को दर्शाती है, जो प्रलय की भी द्योतक है। अंततः यही आदि शक्तियाँ क्षीर सागर में शेष शय्या पर लेटे भगवान नारायण, नारायण यानी जल में निवास करने वाले विष्णु को चेताती हैं कि समाधि के शून्य-भाव से जागो और अंधकारमयी विरोधी ताकतों से ब्रह्माण्ड को मुक्त कराओ। देवी की प्रकृति रूपी यही अवस्थाएँ सत्व, रज और तम गुणों में रूपांतरित होकर सृष्टि को संतुलित बनाए रखने का काम करती है; इसीलिए देवी को आद्या या असाधारण शक्ति कहा गया है। विश्व की इस जननी के बिना शिव भी ‘शव’ मात्र हैं। 

  जब ब्रह्मांड में ऊर्जा का विघटन होता है, तो आसुरी शक्तियाँ जाग्रत हो जाती हैं। ऊर्जा जब अव्यवस्थित हो जाती है, तब ध्वंसात्मक स्थितियों का निर्माण होता है। आज विध्वंसकारी वैज्ञानिक प्रयोगों के चलते दुनियाभर में ऊर्जा का ध्वंसात्मक रूप दिखाई दे रहा है। अराजक बनता यही परिवेष नकारात्मक यानी आसुरी ऊर्जा को बढ़ाता है। इस ऊर्जा को अक्षुण्ण बनाए रखने का काम ब्रह्मा, विष्णु, महेश करते हैं। देवी महात्म्य में कहा भी गया है कि देव और असुरों के बीच जब महायुद्ध हुआ तो वह सौ दिन तक चला। इस समय राक्षस महिश असुरों का राजा था और इंद्र देवताओं के अधिपति थे। इस संघर्ष में असुरों ने देवताओं का परास्त कर दिया। फलतः महिश देवों का भी सम्राट बन बैठा। 

   पराजित देवता प्रजापति ब्रह्मा के नेतृत्व में विष्णु व शिव के पास गए। उन्होंने युद्ध और फिर पराजय का दुखद वृत्तांत विष्णु व शिव को सुनाया। इसे सुनकर दोनों आक्रोश से लाल हो गए। विष्णु ने मुख खोला और उससे तीव्र गति से अक्षय ऊर्जा बाहर आई। ऐसा ही रोश ब्रह्मा और शिव ने ऊर्जा के रूप में मुख से प्रकट किया। इंद्र के शरीर से भी ऊर्जा का प्रस्फुटन हुआ। अन्य देवों ने भी अपने-अपने मुखों से ऊर्जा छोड़ी। ऊर्जा के इस प्रवाह से नकारात्मक ऊर्जा सकारात्मक ऊर्जा में परिवर्तित होने लग गई। मुखों से उत्सर्जित इन ऊर्जा रूपी लपटों ने एक पर्वत का आकार ग्रहण कर लिया। इसी पर्वत से कात्यायनी प्रकट हुईं। दुर्गा का यही रूप महिषासुर मर्दिनी कहलाया। 

लीला भाव में यही दुर्गा चार पैरों के राजा सिंह की पीठ से टिककर खड़ी हैं। सिंह भी क्रूर शक्ति का प्रतीक है, लेकिन उसे वश में कर लिया गया है। देवी अराजक महिश के शरीर को रौंद रही हैं। उनका एक पैर असुर के सिर पर है। महिष शक्तिशाली तो है, लेकिन उसका आचरण क्रूर है, इसलिए वह ब्रह्माण्ड के आध्यात्मिक आधार के अनुकूल नहीं है। यही कारण है कि कात्यायनी महिष को पददलित कर उसके अहंकार को चूर कर देती हैं। महिष के प्राण हरने के बाद कात्यायनी महिषासुर-मर्दिनी कहलाती हैं। इसीलिए इन्हें ब्रह्माण्ड की जननी कहा गया, जो पृथ्वी का प्रतीक है। ब्रह्माण्ड के अस्तित्व का यही बीज है। प्रकृति के इन्हीं रूपों का मानवीकरण करते हुए ऋग्वेद में कहा है कि ‘ज्ञान के सभी विषय और क्रियाकलाप अंततः देवी के रूप हैं। ‘सृष्टि सृजन के आरंभ से लेकर अब तक नारियाँ माँ का रूप हैं। नारी के मातृत्व की डिंब में स्थित इस ऊर्जा को प्रजापति ब्रह्मा ने स्वयं विभाजित करके मानव के अस्तित्व को सृजित किया था। वह नारी ही है, जो अपनी ऊर्जा से मनुष्य को मनुष्यत्व प्रदान करती है। साफ है, भगवती दुर्गा मूल प्रकृति का वह रूप हैं, जिसमें समस्त शक्तियाँ समाहित हैं।  

धरोहरः छत्तीसगढ़ में है माता कौशल्या का एकमात्र मंदिर

भगवान राम का ननिहाल ग्राम चंदखुरी 

हमारे देश में हर जगह भगवान राम के अनेक मंदिर हैं;  लेकिन उनकी माता कौशल्या का इकलौता मंदिर अगर कहीं देखने को मिलेगा, तो वह सिर्फ छत्तीसगढ़ में। कौशल्या माता का यह प्राचीन मंदिर छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से लगभग 27 किलोमीटर दूर ग्राम चंदखुरी में जलसेन तालाब के बीच स्थित है। 

इस स्थान को भगवान राम की माता कौशल्या की जन्मस्थली माना जाता है। प्रभु श्रीराम को गोद में लिये हुए माता कौशल्या की अद्भुत प्रतिमा इस मंदिर को दुर्लभ बनाती है। 1973 में  इस मंदिर का जीर्णोद्धार किए जाने की जानकारी मिलती है । अब पिछले वर्षों में तो माता कौशल्या का यह धाम और भी सुंदर और भव्य हो चुका है। इस प्राचीन मंदिर की खूबसूरती को देखने पर्यटक दूर- दूर से आने लगे हैं।  

माता कौशल्या का जन्मस्थान होने के कारण यह गाँव रामलला के ननिहाल के रूप में प्रसिद्ध है। यही वजह है कि दीपावली के अवसर पर कई दिनों तक ग्राम चंदखुरी  के साथ आस - पास के गाँवों में  घर- घर दिये जलाकर लंका पर विजय और राम जानकी की अयोध्या की वापसी का जश्न मनाते हैं।

भगवान राम की माता कौशल्या कोसल प्रदेश यानी छत्तीसगढ़ की राजकुमारी थी।   पद्म पुराण में उल्लेख है कि कौशल्या कोसलन राजकुमार की बेटी थीं। बाद के ग्रंथों में उन्हें दक्षिण कोसल के राजा सुकौशल और रानी अमृतप्रभा की बेटी बताया गया है। महाकौशल की पूरी प्रजा माता कौशल्या को बहन और भगवान श्रीराम को अपना भानजा मानते हैं। यही वजह है कि छत्तीसगढ़ के लोग इस रिश्ते को आत्मीयता के साथ निभाते हैं। यहाँ के मूल  निवासी अपने भानजे-भानजियों को भगवान का रूप मानकर उनका बहुत सम्मान के साथ आदर सत्कार करते हैं तथा उनके पाँव छूकर उनका आशीर्वाद लेते हैं। 

पुरातात्त्विक जानकारी के अनुसार इस मंदिर को 8वीं 9वीं शताब्दी में सोमवंशी राजाओं ने बनवाया था, जबकि लोककथाओं के आधार पर यहाँ के राजा को माता कौशल्या ने सपने में दर्शन देकर कहा था कि वे इस स्थान पर मौजूद हैं। तब राजा ने सपने वाली उस जगह पर खुदाई करवाई, तो उन्हें यह मूर्ति प्राप्त हुई।  बाद में राजा ने मंदिर बनवाकर मूर्ति की स्थापना की। 

छत्तीसगढ़ का यह गाँव कौशल्या माता के मंदिर के लिए तो प्रसिद्ध है ही, साथ ही यह छोटा- सा गाँव कभी 126 तालाबों के लिए भी मशहूर रहा है।  इस क्षेत्र में गाए जाने वाले एक गीत में  छह कोरी छह आगर तालाब होने का उल्लेख है। एक कोरी बराबर 20,  अर्थात् छह कोरी मतलब हुआ 120 और छह आगर यानी छह और। इस प्रकार कुल 126 तालाब हुए। 

विभिन्न शोधपत्रों, अभिलेखों में यह भी उल्लेख है कि भगवान श्रीराम ने अपना वनवास काल छत्तीसगढ़ के अनेक स्थानों पर व्यतीत किया था। श्री राम ने भाई लक्ष्मण और पत्नी सीता के साथ दंडकारण्य में 10 साल का लंबा समय व्यतीत किया।  राम सबसे पहले अयोध्या से 20 किलोमीटर दूर तमसा नदी के तट पर पहुँचे। तमसा नदी पार करने के बाद  दंडकारण्य (छत्तीसगढ़ ) के घने जंगलों में पहुँचे।  दंडकारण्य में वनवास के दौरान प्रभु श्रीराम छत्तीसगढ़ के कई जगहों से होकर गुजरे थे,  जिनमें सीतामढ़ी-हरचौका (कोरिया), रामगढ़, अम्बिकापुर (सरगुजा ), किलकिला (जशपुर ), शिवरीनारायण (जांजगीर -चांपा), तुरतिया वाल्मिकी आश्रम (बलौदा बाजार),चंदखुरी (रायपुर), राजिम (गरियाबंद), सिहावा सप्तऋषि आश्रम (धमतरी ),जगदलपुर (बस्तर ), रामाराम (सुकमा ) जैसे अनेक स्थलों में राम वनवास से जुड़ी अनेक स्मृतियाँ देखने को मिलती हैं।  इन साक्ष्यों को ही आधार मानते हुए अब क्षेत्र में राम वनगमन पथ को विकसित करने को लेकर बड़े पैमाने पर कार्य चल रहा है। इसके लिए 51 स्थलों को चिन्हित किया गया है। 

विश्वास है यह कार्य पूर्ण हो जाने के बाद संस्कारधानी छत्तीसगढ़ का नाम पर्यटन के क्षेत्र में प्रमुखता से लिया जाएगा। ( उदंती फीचर्स)

स्वास्थ्यः नारियल के फायदे अनेक

- डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

वर्ष 2014 में उमा आहूजा और उनके साथियों ने एशियन एग्री-हिस्ट्री पत्रिका में प्रकाशित एक शोधपत्र में बताया था कि नारियल के पेड़ों को मलेशिया (Malesia) जैव-भौगोलिक क्षेत्र मूल का माना जाता है। जैव-भौगोलिक क्षेत्र यानी वह क्षेत्र जिसमें वितरित जंतुओं और पादपों के गुणों में समानता होती है। मलेशिया जैव-भौगोलिक क्षेत्र में दक्षिण पूर्व एशिया (विशेष रूप से भारत), इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया, न्यू गिनी और प्रशांत महासागर में स्थित कई द्वीप समूह आते हैं। इस पेपर में पुरातात्त्विक साक्ष्यों, पुरालेखों एवं ऐतिहासिक अभिलेखों, और इसके उपयोग एवं इससे जुड़ी लोककथाओं के माध्यम से नारियल के इतिहास पर बात की गई है।
पुरातात्त्विक खुदाई के अलावा भारत में नारियल का उल्लेख शिलालेखों तथा धार्मिक, कृषि और आयुर्वेदिक महत्त्व के ग्रंथों में मिला है। इसके उपयोगों की बहुलता ने इसे जीवन-वृक्ष, समृद्धि-वृक्ष और कल्पवृक्ष (एक वृक्ष जो जीवन की सभी ज़रूरतें पूरी करता है) जैसे विशेषणों से नवाज़ा है। लेखक बताते हैं कि इसके खाद्य महत्त्व के अलावा इसके स्वास्थ्य, औषधीय और सौंदर्य लाभ भी हैं।
भारत में, नारियल मुख्य रूप से दक्षिणी राज्यों - केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में उगाया जाता है। 90% से अधिक नारियल का उत्पादन इन्हीं राज्यों में होता है। ऐसा इसलिए है; क्योंकि इन पेड़ों को गर्म और रेतीली मिट्टी की आवश्यकता होती है - ऐसी मिट्टी, जिसमें जल- निकासी बढ़िया हो और पोषक तत्त्व  भरपूर हों। साथ ही, इन्हें गर्म और आर्द्र जलवायु, और प्रचुर वर्षा की भी ज़रूरत होती है। 
उत्तर भारत की जलवायु मुख्यत: समशीतोष्ण है, जिसमें - जाड़े में अच्छी ठंड और गर्मियों में भीषण गर्म पड़ती है। इस क्षेत्र में अलग-अलग मौसम होते हैं और वर्षा भी असमान होती है, जो नारियल के पेड़ों की वृद्धि के लिए अनुकूल नहीं है। हालाँकि, पूर्वोत्तर के कुछ राज्य भी उपयुक्त तापमान और वर्षा के चलते नारियल उगाते हैं, लेकिन वहाँ की मिट्टी चिकनी है जो नारियल के पेड़ों के उगने के लिए आदर्श नहीं है।
नारियल की भूमिका
भगवान को प्रसाद में चढ़ाई जाने वाली कई वस्तुओं में नारियल का एक विशेष और उच्च स्थान है। इसका उपयोग धार्मिक और सामाजिक समारोहों में किया जाता है, वहाँ भी जहाँ इसकी खेती नहीं होती। नारियल के पेड़ का रत्ती भर हिस्सा भी बेकार नहीं जाता, सभी हिस्सों को किसी न किसी उपयोग में लिया जाता है। अपनी अनगिनत उपयोगिताओं और खाद्य, चारा एवं पेय के रूप में प्रत्यक्ष उपयोग के ज़रिए नारियल ने विभिन्न समुदायों के लोगों के बीच सांस्कृतिक, सामाजिक, धार्मिक और भाषायी तौर पर जगह बना ली है।
दक्षिण भारत में नारियल दैनिक जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। प्रत्येक मंदिर को नारियल के पेड़ों से सजाया जाता है, इसके (श्री)फल भगवान को चढ़ाए जाते हैं और भक्तों को प्रसाद के रूप में थोड़ा सा खोपरा और नारियल पानी दिया जाता है। 
तरावट और स्वास्थ्य के मामले में नारियल पानी का कोई सानी नहीं है; यह तो अमृत ही है! और, मिठाई ‘कोलिक्कतई' (या ‘मोदक') का भी कोई सानी नहीं है, जो नारियल की ‘गरी' से बनाई जाती है! (यह भगवान गणेश की पसंदीदा मिठाई है)। इसके अलावा, तमिलनाडु में पले-बढ़े होने के कारण मुझे (मेरी इच्छा के विपरीत) मेरी दादी हर महीने अरंडी के तेल या नारियल के तेल से स्नान करने के लिए मजबूर किया करती थीं!
स्वास्थ्य लाभ
नारियल के कई फायदे हैं। वेबसाइट Healthline.com इसकी ‘गरी' में पाए जाने वाले कई पोषक तत्त्वों को सूचीबद्ध करती है: भरपूर वसा, भरपूर फाइबर, और विटामिन ए, डी, ई और के, जो अधिक खाने को नियंत्रित करते हैं और पेट को स्वस्थ रखने में मदद करते हैं। 
इसके तेल की बात करें तो कुछ समूहों का सुझाव है कि नारियल का तेल शरीर की धमनियों और नसों में रक्त प्रवाह को लाभ पहुँचाता है, इस प्रकार यह हमारे हृदय की सेहत के लिए फायदेमंद होता है। कुछ समूह यह भी सुझाव देते हैं कि इससे अल्ज़ाइमर रोग थोड़ा टल सकता है, हालांकि इस सम्बंध में अधिक प्रमाण की आवश्यकता है। 
एक वरिष्ठ नागरिक होने के नाते मैं नारियल तेल का उपयोग करता हूँ, इस उम्मीद में कि यह मुझे ऐसी स्थितियों से बचाएगा। मैं अक्सर अपने सुबह के नाश्ते में टोस्ट पर मक्खन की जगह नारियल का तेल ही लगाता हूँ। मेरी दादी देखतीं, तो प्रसन्न होतीं! (स्रोत फीचर्स)